भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४१५
मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमादयमदोष इति, नेत्युच्यते, नहि तावल्लोको नाम किञ्चित्स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति । प्रत्यक्षादिभ्य एव ह्यविचारितविशेषेभ्यः प्रमाणेभ्यः प्रसिद्धयन्नर्थो लोकात्प्रसिध्यतीत्युच्यते । न चात्र प्रत्यक्षादीनामन्यतमं प्रमाणमस्ति । इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्त्वात्प्रमाण-
भामती
प्रसादं प्रसन्नायाश्च फलदानं दर्शयति आहुतिभिरेव देवाम् हुतावः प्रीणाति तस्मै प्रीता इषमूर्जं च यच्छन्ति' इति । 'तृप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयति' इति च । धर्मशास्त्रकारा अप्याहुः— ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः । इति ।
पुराणवचांसि च भूयांसि देवताविग्रहादिपञ्चकप्रपञ्चमाचक्षते । लौकिका अपि देवताविग्रहादिपञ्चकं स्मरन्ति चोपचरन्ति च । तथाहि- यमं दण्डहस्तमालिखन्ति, वरुणं पाशहस्तम्, इन्द्रं वज्रहस्तम् । कथयन्ति च देवता हविर्भुज इति । तथेशनामिमामाहुः--देवग्रामो देवक्षेत्रमिति । तथास्याः प्रसादं च प्रसन्नायाश्च फलदानमाहुः-प्रसन्नोऽस्य पशुपतिः पुत्रोऽस्य जातः । प्रसन्नोऽस्य धनदो धनमनेन लब्धमिति । तदेतत् पूर्वपक्षी दूषयति ॐ नेत्युच्यते । न हि तावल्लोको नाम इति ॐ । न खलु प्रत्यक्षादिव्यतिरिक्तो लोको नाम प्रमाणान्तरमस्ति, किन्तु प्रत्यक्षादिमूला लोकप्रसिद्धिः सत्यतामश्नुते, तदभावे त्वन्धपरम्परावनमूलाभावाद्विप्लवते । न चात्र विग्रहादौ प्रत्यक्षादीनामन्यतममस्ति प्रमाणम् । न चेतिहासादिविमूलं भवितुमर्हति तस्यापि पौरुषेयत्वेन प्रत्यक्षाद्यपेक्षणात् । प्रत्यक्षादीनां चात्राभावादित्याह ॐ इतिहासपुराणमपि इति ॐ । ननूक्तं मन्त्रार्थवादेभ्यो विग्रहादिपञ्चकप्रसिद्धिरित्यत आह ॐ अर्थवादा
भामती-व्याख्या
स्वर्दृशं ( दिव्य दृष्टि-सम्पन्न ) हैं, हम आप की स्तुति करते हैं। यह मन्त्र भी देवताओं के ऐश्वर्य का प्रकाशक है। देवता अपने उपासक पर प्रसन्न हो वर-प्रदान करता है—"आहुतिभिरेव देवान् हुतादः प्रीणाति तस्मै प्रीता इषमूर्जं च यच्छन्ति" ( तै. सं. ५।४।४।१ ) अर्थात् देवतागण यजमान पर प्रसन्न होकर उसको अन्न और बल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार "तृप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयति"—यह मन्त्र भी तृप्ति आदि का अभिधायक है।
धर्मशास्त्रों में भी कहा है—"ते तृप्ताः तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः" । पुराणों में तो देवताओं के विग्रहादि-पञ्चक पर पुष्कल प्रकाश डाला गया है। [(१) विग्रह ( शरीर ), (२) हविर्भक्षण, (३) ऐश्वर्य, (४) प्रसन्नता और (५) फल-दातृत्व—ये देवता के विग्रहादिपञ्चक कहे जाते हैं ] । लौकिक-व्यवहार में भी देवताओं को विग्रहादि से युक्त ही माना जाता है, जैसे कि यमराज का चित्र लोग बनाते हैं—एक विकराल पुरुष आँखें फाड़े खड़ा है, उसके एक हाथ में सुदृढ़ मोटा दण्ड है। वरुण देवता के हाथ में पाश, इन्द्र के हाथ में वज्र दिखाया जाता है। लोग कहते भी हैं कि देवगण हवि का भक्षण करते हैं। देवता के प्रभुत्व का वर्णन करते हैं—'देवग्रामोऽयम्', 'देवक्षेत्रमिदम्'। इसी प्रकार देवता की प्रसन्नता और फल-दातृता का बखान भी किया जाता है—'प्रसन्नोऽस्य पशुपतिः', 'पुत्रोऽस्य जातः' । प्रसन्नोऽस्य धनदः, धनमनेन लब्धम्' ।
पूर्वपक्षी कथित पक्ष पर दोषाभिधान करता है—"नेत्युच्यते, न हि तावल्लोको नाम किञ्चित् स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति"। आशय यह है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों के आधार पर ही टिकी लोक-प्रसिद्धि यथार्थ मानी जाती है, स्वतन्त्र नहीं। जिस लोक-प्रसिद्धि में प्रत्यक्षादि का बल नहीं होता, वह एक अन्ध-परम्परामात्र रह जाती है, इतर प्रमाणों के द्वारा वह विप्लुत (बाधित) हो जाती है। देवता के विग्रहादि में प्रत्यक्षादि प्रमाण सम्भावित नहीं। इतिहासादि को भी देव-विग्रहादि का साधक नहीं मान सकते, क्योंकि इतिहासादि ग्रन्थ पुरुष-रचित होने के कारण प्रत्यक्षादि-सापेक्ष ही होते हैं और विग्रहादि में प्रत्यक्षादि का
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न्तरं मूलमाकाङ्क्षति। अर्थवादा अपि विधिनेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थाः सन्तो न पार्थग्- र्थ्येन देवादीनां विग्रहादिसद्भावे कारणभावं प्रतिपद्यन्ते। मन्त्रा अपि श्रुत्यादिविनि- युक्ताः प्रयोगसमवायिनोऽभिधानार्था न कस्यचिदर्थस्य प्रमाणमित्याचक्षते। तस्माद्-
भामती
अपि इति ॐ । विध्युद्देशेनैकवाक्यतामापद्यमाना अर्थवादा विधिविषयप्राशस्त्यलक्षणापरा न स्वार्थे प्रमाणं भवितुमर्हन्ति । 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ' इति हि शाब्दन्यायविदः, प्रमाणान्तरेण तु यत्र स्वार्थोऽपि सम्पद्यते यथा वायोः क्षेपिष्ठत्वम् । तत्र प्रमाणान्तरवशात्सोऽभ्युपेयते न तु शब्दसामर्थ्यात् । यत्र तु न प्रमाणान्तरमस्ति यथा विग्रहादिपञ्चके सोऽर्थः शब्दादेवावगन्तव्यः । अतत्परश्च शब्दो न तदवगमयितुमलमिति तदवगमायास्य तत्रापि तात्पर्यमभ्युपेतव्यम् । न चैकं वाक्यमुभयपरं भवतीति, वाक्यं भिद्येत । न च सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदो युज्यते । तस्मात्प्रमाणान्तरानधिगता विग्रहादिमत्ता-ऽन्यपराच्छब्दादवगन्तव्येति मनोरथमात्रमित्यर्थः । मन्त्राश्च व्रीह्यादिवच्छ्रुत्यादिविधिभिस्तत्र तत्र विनियुज्य- मानाः प्रमाणभावाननुप्रवेशिनः कथमुपयुज्यन्तां तेषु तेषु कर्मस्वेत्यपेक्षायां दृष्टे प्रकारे सम्भवति नादृष्ट-
भामती-व्याख्या
अभाव है, यही कहा जाता है—"इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्वात् प्रमाणान्तरं मूलमाकां-क्षति"। यह जो कहा गया कि मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों के द्वारा विग्रहादि-पञ्चक अवगत होता है, उसका खण्डन किया जाता है—"अर्थवादा अपि विधिनेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थाः"। महर्षि जैमिनि ने अर्थवादवाक्यों के स्वतन्त्र प्रामाण्य का निराकरण करते हुए कहा है—"विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै. सू. १।२।७) अर्थात् विधि-वाक्य के साथ एकवाक्यतापन्न होकर अर्थवाद वाक्य विधेय की प्रशंसा और निषेध्य पदार्थ की निन्दामात्र में पर्यवसित होते हैं, स्वाभिधेय अर्थ में प्रमाण ही नहीं होते, क्योंकि सर्व-सम्मत न्याय है कि "यत्परः शब्दः, स शब्दार्थः"। अर्थात् जिस पदार्थ में जिस शब्द का तात्पर्य अवसित होता है, वह शब्द उसी अर्थ का अभिधान किया करता है, अन्य अर्थ का नहीं। यदि अन्य अर्थ किसी प्रमाणान्तर से समर्थित होता है, तब वह प्रमाणान्तर ही उस अर्थ में प्रमाण माना जाता है, अर्थवाद वाक्य नहीं, जैसे "वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता" (तै. सं. २।१।१) इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा ध्वनित वायु का शीघ्रगामित्व प्रत्यक्ष प्रमाण से समर्थित है, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण ही उस अर्थ में प्रमाण माना जाता है, अर्थवाद वाक्य नहीं। किन्तु अर्थवाद के द्वारा ध्वनित जिस विग्रहादि-पञ्चकरूप अर्थ में कोई प्रमाणान्तर भी नहीं, वह अर्थ केवल अर्थवाद-वाक्य से प्रमाणित हो सकता था। जब कि अर्थवाद वाक्य का उसमें तात्पर्य ही नहीं, तब वह, उससे प्रमाणित क्योंकर होगा। एक ही अर्थवाद वाक्य विधेयार्थ की प्रशंसा भी करे और विग्रहादि-पञ्चक का प्रतिपादन भी—ऐसा मानने पर वाक्य-भेद हो जाता है—"अर्थभेदाद् वाक्यभेदः" (शाबर. पृ. ७८६)। वाक्य-भेद एक ऐसा दोष है, जिसे यथासम्भव नहीं होने देना चाहिए—"सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदश्च नेष्यते" (श्लो. वा. पृ. १३५)। फलतः देवता में विग्रहादिमत्ता अन्यार्थपरक अर्थवाद वाक्य से प्रमाणित होगी—यह मनोरथ मात्र है।
इसी प्रकार मन्त्र वाक्य भी विग्रहादि को प्रमाणित नहीं कर सकते, क्योंकि वे स्वयं श्रुति, लिङ्गादि प्रमाणों के द्वारा वैसे ही किसी अर्थ में विनियुक्त होते हैं, जैसे "व्रीहिभिर्य-जेत"—यहाँ तृतीया विभक्तिरूप श्रुति के द्वारा व्रीहि का याग में विनियोग होता है। वे किसी अर्थ में प्रमाण ही नहीं माने जाते। 'मन्त्राः कर्मसु कथं विनियुज्यन्ताम्'—इस प्रकार की कैमर्थ्याकांक्षा में दृष्ट प्रकार सम्भव होने पर अदृष्ट-कल्पना उचित नहीं होती। इस प्रकार तो
| देवादेर्ज्ञानेऽधिकारः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ४१७ |
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भावो देवादीनामधिकारस्य ॥ ३२ ॥
भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ ३३ ॥
तुशब्दः पूर्वपक्षं व्यावर्तयति । बादरायणस्त्वाचार्यो भावमधिकारस्य देवादीनामपि मन्यते । यद्यपि मध्वादिविद्यासु देवतादिव्यामित्रास्वसंभवोऽधिकारस्य, तथाप्यस्ति हि शुद्धायां ब्रह्मविद्यायां संभवः । अर्थित्वसामर्थ्याप्रतिषेधाद्यपेक्षत्वादधिकारस्य । न च क्वचिदसंभव इत्येतावता यत्र संभवस्तत्राप्यधिकारोऽपोद्येत । मनुष्याणामपि न सर्वेषां ब्राह्मणादीनां सर्वेषु राजसूयादिष्वधिकारः संभवति । तत्र यो न्यायः सोऽत्रापि भविष्यति । ब्रह्मविद्यां च प्रकृत्य भवति दर्शनं श्रौतं देवाद्यधिकारस्य सूचकम्—'तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम्' (बृ० १।४।१०) इति । 'ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्' इति । 'इन्द्रो ह वै देवानामाभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणाम्' (छा० ८।७।२) इत्यादि च । स्मार्तमपि गन्धर्वयाज्ञवल्क्यसंवादादि । यदप्युक्तं—ज्योतिषि भावाच्चेति । अत्र ब्रूमः—ज्योतिरादिविषया अपि आदित्यादयो देवतावचनाः शब्दाश्चेतनावन्तमैश्वर्याद्युपेतं तं तं देवतात्मानं समर्पयन्ति, मन्त्रार्थवादादिषु तथाव्यवहारात् । अस्ति ह्यैश्वर्ययोगाद्देवतानां ज्योतिराद्या-
भामती
कल्पनोचिता । दृष्टश्च प्रकारः प्रयोगसमवेतार्थस्मरणं, स्मृत्वा चानुतिष्ठन्ति बल्यनुष्ठातारः पदार्थान् । औत्सर्गिकी चार्थपरता पदानामित्यपेक्षितप्रयोगसमवेतार्थस्मरणातत्पर्याणां मन्त्राणां नानधिगते विग्रहादावपि तात्पर्यं युज्यत इति न तेभ्योऽपि तत्सिद्धिः । तस्माद् देवताविग्रहवत्तादिभावग्राहकप्रमाणाभावात् प्राप्ता षष्ठप्रमाणगोचरतास्येति प्राप्तम् ॥ ३२ ॥
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—भावन्तु बादरायणोऽस्ति हि—
ॐ तुशब्दः पूर्वपक्षं व्यावर्तयति ॐ इत्यादि, ॐ भूतधातोरित्यादिष्वचेतनत्वमभ्युपगम्यते ॐ इत्यन्तमतिरोहितार्थम् । ॐ मन्त्रार्थवादादिव्यवहाराद् इति ॐ । आदिग्रहणेनेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणि
भामती-व्याख्या
यही है कि मन्त्रों से कर्मानुष्ठान में अपेक्षित क्रिया और उसके साधनीभूत देवतादि का स्मरण करके ही कर्मानुष्ठान सम्भव होता है । पदों में पदार्थपरता का होना एक औत्सर्गिक नियम है, अतः मन्त्र वाक्य का प्रयोग-समवेतार्थ के स्मरण को छोड़ कर विग्रहादि-पञ्चकरूप अनधिगतार्थ में तात्पर्य नहीं माना जा सकता, अतः मन्त्रादि के द्वारा भी देव-विग्रहादि की सिद्धि नहीं हो सकती । फलतः सद्भाव-साधक प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों के द्वारा जब विग्रहादि की सिद्धि नहीं हो सकी, तब अनुपलब्धिरूप छठे प्रमाण के द्वारा उनका अभाव ही सिद्ध होता है ॥ ३२ ॥
कथित पूर्व पक्ष का निराकरण किया जाता है—"भावं तु बादरायणोऽस्ति हि" । सूत्रस्थ 'तु' शब्द के द्वारा पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति करते हुए आचार्यवर बादरायण का कहना है कि ब्रह्मविद्या में देवताओं के अधिकार का सद्भाव है । यह जो कहा गया कि लोक-प्रसिद्ध ज्योतिर्मण्डल में ही 'आदित्य' पद का प्रयोग होता है, ज्योतिर्मण्डल चेतन नहीं, जड़मात्र है, अतः आदित्य उपासना कर ही नहीं सकता कि उसे अधिकार दिया जाय । वह कहना संगत नहीं, क्योंकि प्रसिद्ध ज्योतिर्मण्डल को आदित्य न कह कर उसके अधिष्ठातृ देव को आदित्य कहते हैं, वह चेतन है, जड़ नहीं । मन्त्र और अर्थवादादि वाक्यों में वैसा ही व्यवहार देखा जाता है । 'मन्त्रार्थवादादि'—यहाँ 'आदि' शब्द के द्वारा इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र का
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४१८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३३
तमभिश्वावस्थातुं, यथेष्टं च तं तं विग्रहं ग्रहीतुं सामर्थ्यम् । तथा हि श्रूयते सुब्रह्म- ण्यार्थवादे—मेधातिथेर्मेषेति । 'मेधातिथिं ह काण्वायनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार' ( षड्विंश० ब्रा० १।१ ) इति । स्मर्यते च—आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह' इति । मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते 'मृदब्रवीदापोऽब्रुवन्' इत्या- दिदर्शनात् । ज्योतिरादेस्तु भूतघातोरादित्यादिष्वचेतनत्वमभ्युपगम्यते । चेतना- स्त्वधिष्ठातारो देवतात्मानो मन्त्रार्थवादादिव्यवहारादित्युकम् । यदप्युक्तं - मन्त्रार्थ- वादयोरन्यार्थत्वान्न देवताविग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यमिति । अत्र ब्रूमः-प्रत्ययाप्रत्ययौ हि सद्भावासद्भावयोः कारणं, नान्यार्थत्वमनन्यार्थत्वं वा । तथाह्यन्यार्थमपि प्रस्थितः पथि पतितं तृणपर्णाद्यस्तीत्येव प्रतिपद्यते ।
अत्राह-विषम उपन्यासः । तत्र हि तृणपर्णादिविषयं प्रत्यक्षं प्रवृत्तमस्ति, येन तदस्तित्वं प्रतिपद्यते । तत्र पुनर्विध्युद्देशैकवाक्यभावेन स्तुत्यर्थेऽर्थवादे न पार्थग्- र्थ्येन वृत्तान्तविषया प्रवृत्तिः शक्याऽध्यवसातुम् । नहि महावाक्येऽर्थप्रत्यायकेऽवा- न्तरवाक्यस्य पृथक्प्रत्यायकत्वमस्ति यथा 'न सुरां पिबेत्' इति नञ्वति वाक्ये पद- त्रयसंबन्धात्सुरापानप्रतिषेध एवैकोऽर्थोऽवगम्यते, न पुनः सुरां पिबेदिति पदद्वय-
भामती
गृह्णन्ते । मन्त्रादीनां व्यवहारः प्रवृत्तिस्तस्य दर्शनादिति । पूर्वपक्षमनुभाषते । ॐ यदप्युक्तम् इति ॐ । एकदेशिमतेन तावत्परिहरति ॐ अत्र ब्रूमः इति ॐ । तदेतत् पूर्वपक्षिणमुत्थाप्य दूषयति ॐ अत्राह ॐ पूर्वपक्षी । शाब्दी खल्वियं गतिः । यत्तात्पर्याधीनवृत्तित्वं नाम नह्यन्यपरः शब्दोऽन्यत्र प्रमाणं भवितु- मर्हति । नहि श्वित्रिनिमार्जनपरं श्वेतो धावतीति वाक्यम् , इतः सारमेयवेगवद्गमनं गमयितुमर्हति । न च नञ्वति महावाक्येऽवान्तरवाक्यार्थो विधिरूपः शक्योऽवगन्तुम् । न च प्रत्ययमात्रात्सोऽप्यर्थोऽस्य भवति,
भामती-व्याख्या
ग्रहण किया गया है। 'मन्त्रादि-व्यवहार' का अर्थ है—मन्त्रादि वाक्यों की अर्थ-बोधन में प्रवृत्ति, वह अनुभव-सिद्ध है।
पूर्व-पक्ष का अनुवाद किया जाता है—"यदप्युक्तं मन्त्रार्थवादयोरन्यार्थत्वान्न देवता- विग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यम्"। इस पूर्वपक्ष का वेदान्त के एकदेशी आचार्य के मत से परिहार किया जाता है—"अत्र ब्रूमः"। इस एकदेशी आचार्य के मत का पूर्वपक्षी के माध्यम से खण्डन किया जाता है—"अत्राह पूर्वपक्षी"। यह शाब्दी मर्यादा है कि जिस शब्द का जिस अर्थ में तात्पर्य है, उस शब्द की उसी अर्थ में वृत्तिता (अभिधेयता) मानी जाती है, अत एव अन्यपरक शब्द अन्य अर्थ में प्रमाण नहीं हो सकता, जैसे कि 'श्वेतो धावति'—इस वाक्य में 'श्वेतः' शब्द के दो अर्थ होते हैं—( १ ) श्वेत कुष्ठवाला व्यक्ति और ( २ ) 'श्वा इतः'—ऐसा छेद करने पर कुत्ता इधर—ऐसा अर्थ होता है। उसी प्रकार 'धावु गतिशुद्ध्योः' धातु से निष्पन्न 'धावति' क्रिया पद के भी दो अर्थ होते हैं ( १ ) धोता है और ( २ ) दौड़ता है। 'श्वेत कुष्ठवाला (श्वित्री) व्यक्ति अपना कुष्ठ धोता है'—इस अर्थ के बोधक 'श्वेतो धावति'—इस वाक्य के द्वारा 'कुत्ता इधर दौड़ रहा है'—ऐसा अर्थ नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार "नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति'—इस महावाक्य का षोडशिग्रहण-कर्त्तव्यतारूप अवान्तर वाक्यार्थ में तात्पर्य पर्यवसित नहीं हो सकता । 'किसी वाक्य को सुनने के अनन्तर किसी अर्थ की जैसे-तैसे प्रतीति हो गई'—एतावता उस अर्थ में उस वाक्य का तात्पर्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रतीति भ्रमात्मक भी हो सकती हैं। शब्द प्रमाण ही वक्ता के तात्पर्य की अपेक्षा करता है, प्रत्यक्षादि प्रमाण नहीं, क्योंकि जो व्यक्ति जलाहरण के उद्देश्य से
अर्थवादानामुपयोगः ] हिन्दूसहितभामतीसंवलितम् ४१९
संबन्धात्सुरापानविधिरपीति । अत्रोच्यते—विषम उपन्यासः । युक्तं यत्सुरापान- प्रतिषेधे पदान्वयस्यैकत्वादवान्तरवाक्यार्थस्याग्रहणम् । विध्युद्देशार्थवादयोस्त्वर्थवाद-
भामती
तत्प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वात् । न पुनः प्रत्यक्षादीनामियं गतिः । नह्युदकाहरणार्थिना घटदर्शनायोन्मीलितं चक्षुर्घटपटौ वा पटं वा केवलं नोपलभते । तदेवमेकदेशिनि पूर्वपक्षिणा दूषिते परमसिद्धान्तवाद्याह ॐअत्रो- च्यते । विषम उपन्यासः इति ॐ । अयमभिसन्धिः--लोके विशिष्टार्थप्रत्यायनाय पदानि प्रयुक्तानि तदन्त- रेण न स्वार्थमात्रस्मरणे पर्यवस्यन्ति । नहि स्वार्थस्मरणमात्राय लोके पदानां प्रयोगो दृष्टपूर्वः । वाक्यार्थे तु दृश्यते । न चैतान्यस्मारितस्वार्थानि साक्षाद्वाक्यार्थं प्रत्याययितुमीशते इति स्वार्थस्मरणं वाक्यार्थमि- तयेऽवान्तरव्यापारः कल्पितः पदानाम् । न च यदर्थं यत् तत् तेन विना पर्यवस्यतीति न स्वार्थमात्रा- भिधानेन पर्यवसानं पदानाम् । न च नञ्वति वाक्ये विधानपर्यवसानम् । तथा सति नञ्पदमनर्थकं स्यात् । यथाहूः—
साक्षाद्यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णस्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति ।
सेयमेकस्मिन्वाक्ये गतिः । यत्र तु वाक्यस्यैकस्य वाक्यान्तरेण सम्बन्धस्तत्र लोकानुसारतो भूतार्थ-
भामती-व्याख्या
घट देखने के लिए आँख खोलता है, वह पुरोऽवस्थित घट और पट—दोनों या केवल पट को क्या नहीं देखता ?
इस प्रकार पूर्वपक्षी के द्वारा एकदेशी का खण्डन हो जाने के पश्चात् परम सिद्धान्त- वादी कहता है—"अत्रोच्यते विषम उपन्यासः" । अभिप्राय यह है कि लोक में जिस विशिष्ट अर्थ की प्रतीति कराने के लिए पद प्रयुक्त होते हैं, उसके बिना पद केवल स्वार्थमात्र के स्मरण में पर्यवसित नहीं होते, क्योंकि केवल (असंसृष्ट) पदार्थ का स्मरण दिलाने के लिए पदों का प्रयोग नहीं देखा जाता, वाक्यार्थरूप विशिष्टार्थ की प्रतीति कराने के लिए तो स्वार्थ- स्मारकत्वेन पदों का प्रयोग देखा जाता है, क्योंकि पद अपने स्वार्थ का स्मरण न दिला कर साक्षात् वाक्यार्थ का बोध नहीं करा सकते । पदों के ही दो व्यापार माने जाते हैं—(१) पदार्थ स्मरण और (२) स्मृत पदार्थों के द्वारा वाक्यार्थ का अवबोधन । फलतः पदार्थ-स्मारण पदों का अवांतर व्यापार है। पदों का परम तात्पर्य वाक्यार्थ-बोधन है, उसके बिना केवल स्वार्थाभिधानमात्र से पदों का पर्यवसान नहीं माना जाता । नञ्-घटित वाक्य का विधानरूप वाक्यार्थैकदेश में तात्पर्य सम्भव नहीं, अन्यथा नञ् पद का प्रयोग ही निरर्थक हो जाता है, जैसा कि वार्तिककार ने कहा है—
साक्षाद् यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ (श्लो. वा. पृ. ९४३)
[पद यद्यपि साक्षात् पदार्थों का अभिधान ही करते हैं, तथापि उतने मात्र से उनका तात्पर्य समाप्त नहीं होता, अपितु वाक्यार्थ-बोध कराने के लिए पदों का पदार्थ-प्रतिपादन व्यापार वैसा ही नान्तरीयक (अनिवार्य) है, जैसा कि ओदनादि के पाक का निष्पादन करने के लिए चूल्हे में लगी लकड़ियों का अग्नि प्रज्वलित करना]। यह तो एक वाक्य की प्रक्रिया है।
| ४२० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३३ |
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स्थानि पदानि पृथगन्वयं वृत्तान्तविषयं प्रतिपद्यान्तरं कैमर्थ्यवशेन कामं विधेः स्तावकत्वं प्रतिपद्यन्ते । यथा हि—'वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः' इत्यत्र विध्युद्देशवर्तिनां वायव्यादिपदानां विधिना संबन्धः, नैवं 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति' इत्येषामर्थवादगतानां पदानाम् । न हि भवति वायुर्वा आलभेतेति क्षेपिष्ठा देवता वा आलभेतेत्यादि । वायुस्वभावसंकीर्तनेन त्ववान्तरमन्वयं प्रतिपद्यैव विशिष्टदैवत्यमिदं कर्मेति विधिं स्तुवन्ति । तद्यत्र सोऽवान्तरवाक्यार्थः प्रमाणान्तरगोचरो भवति, तत्र तदनुवादेनार्थवादः प्रवर्तते । यत्र प्रमाणान्तरविरुद्धस्तत्र गुणवादेन । यत्र तु तदुभयं नास्ति तत्र किं प्रमाणान्तराभा-
भामती
व्युत्पत्तौ च सिद्धायामेकैकस्य वाक्यस्य तत्तद्विशिष्टार्थप्रत्यायनेन पर्यवसितवृत्तिनः पश्चात् कुतश्चिद्धेतोः प्रयोजनान्तरापेक्षायामन्वयः कल्प्यते । यथा 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति वायव्यं श्वेतमालभेत' इत्यत्र । इह हि यदि न स्वाध्यायाध्ययनविधिः स्वाध्यायशब्दवाच्यं वेदराशिं पुरुषार्थतामनेष्यत्ततो भूतार्थमात्रपर्यवसितार्थवादा विध्युद्देशेन नैकवाक्यतामगमिष्यन् । तस्मात् स्वाध्यायविधिवशात् कैमर्थ्याकाङ्क्षायां वृत्तान्तादिगोचराः सन्तस्तत्प्रत्यायनद्वारेण विधेयप्राशस्त्यं लक्षयन्ति, न पुनरविवक्षितस्वार्था एव तल्लक्षणे प्रभवन्ति; तथा सति लक्षणैव न भवेत् । अभिधेयाविनाभावस्य तद्बीजस्याभावात् । अत एव गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गाशब्दः स्वार्थसम्बद्धमेव तीरं लक्षयति न तु समुद्रतीरं, तत्कस्य हेतोः, स्वार्थप्रत्यासत्त्यभावात् । न चैतत्सर्वं स्वार्थाविवक्षायां कल्पते । अत एव यत्र प्रमाणान्तरविरुद्धार्था अर्थवादा दृश्यन्ते, यथादित्यो वै यूपो यजमानः प्रस्तर इत्येवमादयः । तत्र
भामती-व्याख्या
जहाँ एक वाक्य का वाक्यान्तर से सम्बन्ध होता है, वहाँ लोक-व्यवहार के आधार पर सिद्धार्थ-बोधकता को सिद्धवत् मान कर प्रत्येक वाक्य अपने विशिष्टार्थ के अवबोधन में पर्यवसित हो जाता है, किन्तु पश्चात् किसी विशेष आकाङ्क्षा को लेकर एक वाक्यार्थ का दूसरे वाक्यार्थ के साथ सम्बन्ध जोड़ा जाता है, जैसे 'वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः, वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेनभागधेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति” ( तै. सं. २।१।१ ) यहाँ “वायव्यमालभेत भूतिकामः”—इतना विधि वाक्य और शेष अर्थवाद वाक्य है। “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” ( तै. आ. २।१५ ) यह विधि वाक्य यदि 'स्वाध्याय' पद से अभिहित अर्थवादादि-घटित सकल वेद-राशि में पुरुषार्थ-पर्यवसायिता अवगमित न करता, तब भूतार्थ-मात्र का प्रतिपादन कर अर्थवाद वाक्य चरितार्थ हो जाते और विधि-वाक्य के साथ एकवाक्यतापन्न नहीं होते । अतः स्वाध्यायाध्ययन-विधि के द्वारा 'किमर्थमिदमर्थवादवाक्यम् ?' इस प्रकार की उत्थापित कैमर्थ्याकांक्षा में अर्थवादवाक्य एक अपने किसी वृत्तान्तान्वाख्यान के माध्यम से वायुदेवताक कर्मादिरूप विधेयार्थ की प्रशंसा कर देते हैं कि 'प्रशस्तमिदं कर्म, तस्मादवश्यं कर्त्तव्यम्' । अर्थवाद वाक्य अपने अभिधेयार्थ का प्रतिपादन करके ही कथित प्राशस्त्य के लक्षक होते हैं, अन्यथा नहीं, जैसा कि वार्तिककार कहते हैं—'अभिधेयाविनाभूते-प्रतीतिर्लक्षणोच्यते' ( तं. वा. पृ. ३५४ ) अत एव 'गङ्गायां घोषः'—यहाँ पर 'गङ्गा' पद अपने प्रवाहरूप अभिधेय ( शक्य ) अर्थ से सम्बन्धित तट का ही लक्षक होता है, समुद्र-तटादि का नहीं, ऐसा क्यों ? इस लिए कि समुद्र-तट के साथ गङ्गा के शक्यार्थ का सम्बन्ध नहीं होता। यह सब कुछ स्वार्थ की अववक्षा करके अर्थवाद वाक्य नहीं कर सकते। अत एव जहाँ अर्थवाद वाक्य प्रमाणान्तर से विरुद्ध अर्थ का अभिधान करते हैं, जैसे—"आदित्यो वै यूपः" (तै. ब्रा. २।१।५ ), "यजमानः प्रस्तरः" ( तै. सं.
अर्थवादानामुपयोगः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२१
भामती
यथा प्रमाणान्तराविरोधः यथा च स्तुत्यर्थता तदुभयसिद्धयर्थं गुणवादस्त्विति च तत्सिद्धिरिति चासूत्र- यज्जैमिनिः । तस्माद्यत्र सोऽर्थोऽर्थवादानां प्रमाणान्तरविरुद्धस्तत्र गुणवादेन प्राशस्त्यलक्षणेति लक्षित- लक्षणा । यत्र तु प्रमाणान्तरसंवादस्तत्र प्रमाणान्तरादिवाsubार्थवादादपि सोऽर्थः प्रसिध्यति । द्वयोः परस्परा- नपेक्षयोः प्रत्यक्षानुमानयोरिवैकत्रार्थे प्रवृत्तेः । प्रमात्रपेक्षया त्वनुवादकत्वं, प्रमाता ह्यव्युत्पन्नः प्रथमं यथा प्रत्यक्षादिभ्योऽर्थमवगच्छति न तथाऽऽम्नायतस्तत्र व्युत्पत्त्याद्यपेक्षत्वात्, न तु प्रमाणापेक्षया द्वयोः स्वार्थे-
भामती-व्याख्या
२।६।५।३) इत्यादि स्थलों पर प्रमाणान्तर के अविरोध एवं विधेयार्थ के प्राशस्त्य का सम्पादन जैसे हो सके, वैसा मार्ग अपनाने के लिए महर्षि जैमिनि ने सङ्केत किया है—"गुणवादस्तु" (जै. सू. १।२।१०), "तत्सिद्धिः" (जै. सू. १।४।२३) अर्थात् प्रमाणान्तर से विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादन करनेवाले अर्थवाद वाक्यों की गौणी वृत्ति अपनाकर विधि वाक्यों के साथ एकवाक्यता की जा सकती है, जैसे कि प्रस्तर (एक मुट्ठी भर कुशा) को वेदी में बिछाकर उसके ऊपर जुहू आदि पात्र रखे जाते हैं। उस प्रस्तर को यजमान इसलिए कह दिया गया है कि उससे यजमान के कार्य (यागानुष्ठान) की सिद्धि होती है, अतः प्रस्तर उतना ही श्रेष्ठ और उपादेय है, जितना कि यजमान। [जैसे 'सिंहो माणवकः'—यहाँ 'सिंह' पद की स्वशक्यार्थगत शूरत्वरूप गुण के सम्बन्ध से माणवक में वृत्ति (प्रवृत्ति) मानी जाती है, अतः इस वृत्ति का नाम गौणी वृत्ति कहा जाता है। वैसे ही 'यजमानः प्रस्तरः'— यहाँ पर यजमान में जो याग-साधनत्व गुण है, उसके सम्बन्ध से 'यजमान' पद की प्रस्तर में प्रवृत्ति का नाम गौणी वृत्ति है। तत्सिद्धि-पेटिका में इतना ही प्रदर्शित किया गया है और अर्थवादाधिकरण में जो अर्थवाद-वाक्यों की विधि-वाक्य के साथ एकवाक्यता सिद्ध की गई है, वह यहाँ लक्षितलक्षणा के द्वारा सम्पन्न होती है, क्योंकि "अभिधेयाविनाभूते प्रतीति- र्लक्षणोच्यते" (तं० वा० पृ० ३५४) इसके अनुसार 'यजमान' पद का जो अभिधेय (शक्य) अर्थ है—यजमानत्व, उससे अविनाभूत है—याग-साधनत्व और याग-साधनत्व का अविनाभूत प्रशस्तत्व है, जिसकी आधारता यहाँ प्रस्तर में विवक्षित है। "प्रस्तरं बर्हिष उत्तरं सादयति" (तै. सं. २।६।५) इस विधि वाक्य के द्वारा प्रस्तर का विधान किया जाता है, विधेयार्थ की प्रशंसा करके ही अर्थवाद वाक्य विधि वाक्य से एकवाक्यतापन्न होते हैं, अतः यहाँ 'यजमान' पद के द्वारा लक्षित की लक्षणा प्राशस्त्य में होने के कारण लक्षितलक्षणा कही जाती है। वस्तुतः जैसे 'द्विरेफ' पद की लक्षणा दो रकारों से घटित 'भ्रमर' पद में होती है और 'भ्रमर' पद का अभिधेय भौंरा होता है, अतः 'द्विरेफो गुञ्जति'—यहाँ लक्षित-लक्षणा मानी जाती है, वैसे ही प्रायः सर्वत्र अर्थवाद वाक्यों की 'प्रशस्तम्', पद में लक्षणा करके 'प्रशस्तत्वाद् विधे- यम्'—ऐसी पदैकवाक्यता विवक्षित होती है, फलतः लक्षितलक्षणा पर्यवसित हो जाती है ]। जहाँ पर अर्थवाद वाक्यों का प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से संवाद (समर्थन) प्राप्त होता है, वहाँ पर विवक्षित पदार्थ में प्रमाणान्तर के समान ही अर्थवाद वाक्य भी प्रमाण माना जा सकता है, क्योंकि किसी-किसी वस्तु की सिद्धि में प्रत्यक्ष और अनुमान—दोनों प्रमाण परस्पर निरपेक्ष होकर जैसे प्रवृत्त हो जाते हैं, वैसे ही प्रमाणान्तर और अर्थवाद वाक्य— दोनों ही एक ही अर्थ के साधक माने जाते हैं किन्तु प्रमाता की दृष्टि में वैसे स्थल पर अर्थ- वाद वाक्य को अनुवादक माना जाता है, क्योंकि प्रमाता व्यक्ति जब तक अव्युत्पन्न (अगृहीतशक्तिक) है, तब तक शब्द के द्वारा अर्थावबोध नहीं कर सकता, प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा वह जैसे पदार्थों की अवगति करता है, वैसे शब्द के द्वारा नहीं, वहाँ
| ४२२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३३ |
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भामती ऽनपेक्षत्वादित्युक्तम् । नन्वेवं मानान्तरविरोधेऽपि कस्माद् गुणवादो भवति यावता शब्दविरोधे मानान्तर- मेव कस्मान्न बाध्यते । वेदान्तैरिवाद्वैतविषयैः प्रत्यक्षादयः प्रपञ्चगोचराः कस्माद्धार्थवादवद्वेदान्ता अपि गुणवादेन न नीयन्ते । अत्रोच्यते—लोकानुसारतो द्विविधो हि विषयः शब्दानाम् , द्वारतश्च तात्पर्यतश्च । यथैकस्मिन् वाक्ये पदानां पदार्था द्वारतो वाक्यार्थश्च तात्पर्यतो विषयः । एवं वाक्यद्वयैकवाक्यतायामपि यथेयं देवदत्तीया गौः क्रेतव्येत्येकं वाक्यमेषा बहुक्षीरेत्यपरं, तदस्य बहुक्षीरत्वप्रतिपादनं द्वारम् । तात्पर्यं तु क्रेतव्येति वाक्यान्तरार्थे । तत्र यद् द्वारतस्तत्प्रमाणान्तरविरोधेऽन्यथा नीयते । यथा विषं भक्षयेति वाक्यं माऽस्य गृहे भुङ्क्ष्वेति वाक्यान्तरार्थपरं सत् । यत्र तु तात्पर्यं तत्र मानान्तरविरोधे पौरुषेयमप्रमाणमेव भवति । वेदान्तास्तु पौर्वापर्यपर्यालोचनया निरस्तसमस्तभेदप्रपञ्चब्रह्मप्रतिपादनपरा अपौरुषेयतया स्वतःसिद्धतात्त्विकप्रमाणभावाः सन्तस्तात्त्विकप्रमाणभावात् प्रत्यक्षादीनि प्रच्याव्य सांव्यावहारिकेतस्मिन् व्यवस्थापयन्ति । न चादित्यो वै यूप इति वाक्यमादित्यस्य यूपत्वप्रतिपादनपरमपि तु यूपस्तुतिपरम् । तस्मात्प्रमाणान्तरविरोधे द्वारभूतो विषयो गुणवादेन नीयते, यत्र तु प्रमाणान्तरं विरोधकं नास्ति
भामती-व्याख्या व्युत्पत्ति की ही अपेक्षा होती है, प्रमाणान्तर की नहीं, क्योंकि दोनों प्रमाण परस्पर निरपेक्ष होकर ही प्रमेय-प्रवण माने जाते हैं, यह कहा जा चुका है। शङ्का—प्रमाणान्तर का विरोध रहने पर भी वाक्यों को अत्यन्त अप्रमाण न मानकर गौणी वृत्ति क्यों अपनाई जाती है ? प्रमाणान्तर के विरोध पर शब्द को गौणी वृत्ति अप- नाने के लिए क्यों विवश किया जाता है, प्रमाणान्तर का ही विरोधी शब्द के द्वारा वैसे ही बाध क्यों नहीं मान लिया जाता, जैसे अद्वैतविषयक प्रत्यक्षादि प्रमाणों का बाध होता है ? अथवा प्रमाणान्तर-विरुद्ध अर्थवाद वाक्यों में जैसे गुणवाद माना जाता है, वैसे प्रत्यक्षादि से विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक वेदान्त वाक्यों में गुणवाद क्यों नहीं लागू किया जाता ? समाधान — लौकिक व्यवहार के आधार पर शब्दों की द्विविध प्रवृत्ति मानी जाती है—(१) द्वार ( साधन) रूपेण और (२) तात्पर्यतः । जैसे एक ही वाक्य में पदों के पदार्थ और वाक्यार्थ — दोनों ही विषय माने जाते हैं, द्वाररूपेण पदार्थ और तात्पर्य रूपेण वाक्यार्थ । अर्थात् पद अपने पदार्थ-स्मरण के द्वारा वाक्यार्थ के बोधक होते हैं। वैसे ही दो वाक्यों की एकवाक्यता में भी माना जाता है, जैसे- 'इयं देवदत्तीया गौः क्रेतव्या' और 'एषा बहुक्षीरा' यहाँ पर बहुक्षीरत्वादि का प्रतिपादन द्वारमात्र है, परमतात्पर्य तो क्रयण की कर्तव्यता में ही होता है। उनमें द्वारभूत पदार्थों का यदि प्रमाणान्तर से विरोध उपस्थित होता है, तब गौणादि वृत्तियों के द्वारा शब्दों का अन्यथा-नयन किया जाता है, 'विषं भक्षय'—इस वाक्य का तात्पर्य 'मा अस्य गृहे भुङ्क्ष्व'—इस वाक्य के विषयीभूत अर्थ में ही प्रमाणान्तर का विरोध उपस्थित होता है, वहाँ पौरुषेय वाक्य तो अत्यन्त अप्रमाण हो जाते हैं, किन्तु वेदान्त- वाक्यों का पौर्वापर्य की आलोचना से द्वैत-प्रपञ्च-रहित ब्रह्म तत्त्व में ही परम तात्पर्य निश्चित होता है। अपौरुषेय होने के कारण वेदान्त वाक्यों का प्रामाण्य स्वतःसिद्ध है, अतः इस प्रमाणभाव से गिरा कर प्रत्यक्षादि द्वैतविषयक प्रमाण वेदान्त-वाक्यों का अन्यथा-नयन नहीं कर सकते, प्रत्युत वेदान्त के अनुरोध पर प्रत्यक्षादि प्रमाणों का केवल व्यावहारिक सत्ता के बोधन में ही तात्पर्य पर्यवसित होता है । "आदित्यो वै यूपः" (तै. ब्रा. २।१।५) यह वाक्य आदित्य में यूपत्व (यूपरूपता) का विधायक नहीं, अपितु यूप की स्तुति ही करता है कि यूप पर घृत का लेप कर देने से धूप में वह आदित्य के समान तेजस्वी और चमकीला हो जाता है। इस प्रकार प्रमाणान्तर से विरुद्धार्थक अर्थवाद वाक्यों का गौणी वृत्ति के द्वारा
अर्थवादानामुपयोगः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२३
भामती
यथा देवताविग्रहादौ तत्र द्वारतोऽपि विषयः प्रतीयमानो न शक्यस्त्यक्तुम् । न च गुणवादेन नेतुं, को हि मुख्ये सम्भवति गौणमाश्रयेदतिप्रसङ्गात् । तथा सत्यनधिगतं विग्रहमपि प्रतिपादयद् वाक्यं भिद्येतेति चेत् । अद्धा भिन्नमेवैतद्वाक्यं, तथा सति तात्पर्यभेदोऽपीति चेत्, न, द्वारतोऽपि तदवगतौ तात्पर्यान्तरकल्पनाया अयोगात् । न च यत्र यस्य न तात्पर्यं तस्य तत्राप्रामाण्यं तथा सति विशिष्टपरं वाक्यं विशेषणेऽप्रमाणमिति विशिष्टपरमपि न स्यात्, विशेषणाविषयत्वात् । विशिष्टविषयत्वेन तु तदाक्षेपे परस्पराश्रयत्वम् । आक्षेपादिशेषणप्रतिपत्तौ सत्यां विशिष्टविषयत्वं विशिष्टविषयत्वाच्च तदाक्षेपः । तस्माद्विशिष्टप्रत्ययपरेभ्योऽपि पदेभ्यो विशेषणानि प्रतीयमानानि तस्यैव वाक्यस्य विषयत्वेनानिच्छताप्यभ्युपेयानि यथा, तथाऽन्यपरेभ्योऽप्यर्थवादवाक्येभ्यो देवताविग्रहादयः प्रतीयमाना असति प्रमाणान्तरविरोधे न युक्तास्त्यक्तुं, न हि मुख्यार्थसम्भवे गुणवादो युज्यते । न च भूतार्थमप्यपौरुषेयं वचो मानान्तरापेक्षं स्वार्थे येन मानान्तरासम्भवे भवेदप्रमाणमित्युक्तम् ।
स्यादेतत्—तात्पर्यभेदेऽपि यदि वाक्यभेदः कथं तर्ह्यर्थैकत्वादेकं वाक्यम् । न, तत्र तत्र यथास्वं तत्तत्पदार्थविशिष्टैकपदार्थप्रतीतिपर्यवसानसम्भवात् । स तु पदार्थान्तरविशिष्टः पदार्थ एकः क्वचिद् द्वारभूतः क्वचिद् द्वारीत्येतावन् विशेषः ।
भामती-व्याख्या
सामञ्जस्य किया जाता है ।
जहाँ पर अर्थवाद वाक्यों का कोई प्रमाणान्तर विरोधी नहीं होता, वहाँ द्वारभूत अर्थ में भी गौणी वृत्ति नहीं अपनाई जाती, जैसे देवता-विग्रहादि के प्रतिपादक अर्थवाद वाक्य । ऐसे स्थल पर मुख्यार्थ का परित्याग नहीं किया जाता, क्योंकि प्रमाणान्तर-विरोधरूप निमित्त के बिना मुख्यार्थ का त्याग कर देने पर अतिप्रसङ्ग उपस्थित होता है । अर्थवाद वाक्य यदि प्रमाणान्तरानधिगत देव-विग्रहादि के भी प्रतिपादक माने जाते हैं, तब वाक्यभेदापत्ति क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि ऐसे स्थल पर वाक्य-भेद माना ही जाता है । यदि वाक्य-भेद है, तब उन वाक्यों के तात्पर्य का भी भेद क्यों नहीं ? देवता-विग्रहादि की सिद्धि जब अर्थवादों के द्वारभूत अर्थ के द्वारा हो जाती है, तब उनमें तात्पर्य मानना व्यर्थ है । द्वारभूत अर्थ में जिस वाक्य का तात्पर्य नहीं, उसका उसमें प्रामाण्य नहीं होगा ? यदि यहाँ प्रामाण्य नहीं माना जाता, तब विशिष्टार्थ-परक वाक्य के अविषयीभूत विशेषणात्मक अर्थ में भी प्रामाण्य क्योंकर होगा ? 'विशिष्टार्थपरकं वाक्यं विशेषणविषयकम्, विशिष्टार्थविषयकत्वात्'—ऐसा अनुमान करने पर अन्योन्याश्रयता होती है, क्योंकि आक्षेप या अनुमान के द्वारा विशेषण की प्रतिपत्ति होने पर विशिष्टविषयकत्व और विशिष्टविषयकत्व के द्वारा विशेषणविषयकत्व की सिद्धि होती है । अतः विशिष्टार्थपरक वाक्यों के द्वारा प्रतीयमान विशेषणभूत अर्थों में जैसे उन वाक्यों की विषयता मानी जाती है, वैसे ही अन्यपरक अर्थवाद वाक्यों के द्वारा प्रतीयमान विग्रहादि का प्रमाणान्तर से विरोध न होने पर परित्याग नहीं किया जा सकता । मुख्यार्थ की उपपत्ति होने पर गौण अर्थ नहीं अपनाया जाता—यह कहा जा चुका है । भूतार्थविषयक अपौरुषेय वाक्य भी मानान्तर-सापेक्ष नहीं होते कि उनका मानान्तरानपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य समाप्त हो जाता ।
तात्पर्य की एकता होने पर भी यदि वाक्य-भेद माना जाता है. तब महर्षि जैमिनि ने उनमें जो एकत्व का प्रतिपादन किया है—"अर्थैकत्वादेकं वाक्यं साकाङ्क्षं चेद्विभागे स्यात्" (जै. सू. २।१।४६ ) । वह उपपन्न क्योंकर होगा ? इस शङ्का का समाधान यह है कि वहाँ पर भी तत्तत्पदार्थ-विशिष्ट एकपदार्थ की प्रतीति में पर्यवसान माना जा सकता है। वह पदार्थान्तर से विशिष्ट पदार्थ कहीं द्वारभूत होता है और कहीं द्वारी ( मुख्य )—यह अन्य बात है ।
| ४२४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३३ |
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वाद् गुणवादः स्यात्, आहोस्वित्प्रमाणान्तराविरोधाद्विद्यमानवाद इति प्रतीतिशरणैर्विद्यमानवाद आश्रयणीयो न गुणवादः। एतेन मन्त्रो व्याख्यातः। अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीनां स्वरूपम्। न हि स्वरूपरहितेन्द्राद्यश्वस्तस्यारोपयितुं शक्यन्ते। नच चेतस्यानारूढायै तस्यै तस्यै देवतायै हविः प्रदातुं शक्यते। श्रावयति च — 'यस्य देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट्करिष्यन्' (ऐ० ब्रा० ३।८।१) इति। नच शब्दमात्रमर्थस्वरूपं संभवति शब्दार्थयोर्भेदात्। तत्र
भामती
नन्वेवं सत्योदनं भुक्त्वा ग्रामं गच्छतीत्यत्रापि वाक्यभेदप्रसङ्गः। अन्यो हि संसर्ग ओदनं भुङ्क्तेति, अन्यस्तु ग्रामं गच्छतीति। न एकत्र प्रतीतेरपर्यवसानाद्, भुङ्क्तेति हि समानकर्तृकता पूर्वकालता च प्रतीयते। न चेयं प्रतीतिरपरकालक्रियान्तरप्रत्ययमन्तरेण पर्यवस्यति। तस्माद्यावति पदसमूहे पदाहिताः पदार्थस्मृतयः पर्यवस्यन्ति तावदेकं वाक्यम्। अर्थवादवाक्ये चेताः पर्यवस्यन्ति, विनैव विधिवाक्यं विशिष्टार्थप्रतीतेः। न च द्वाभ्यां द्वाभ्यां पदाभ्यां विशिष्टार्थप्रत्ययपर्यवसानात् पञ्चषट्पदवति वाक्ये एकस्मिन्नानात्वप्रसङ्गः। नानात्वेऽपि विशेषणानां विशेष्यस्यैकत्वात्, तस्य च सकृच्छ्रुतस्य प्रधानभूतस्य गुणभूतविशेषणानुरोधेनावर्त्तनायोगात्। प्रधानभेदे तु वाक्यभेद एव। तस्माद्विधिवाक्यादर्थवादवाक्यमन्यदिति वाक्ययोरेव स्वस्ववाक्यार्थप्रत्ययावसितव्यापारयोः पश्चात् कुतश्चिदपेक्षायां परस्परान्वय इति सिद्धम्।
भामती-व्याख्या
शङ्का — विभिन्नार्थ के प्रतिपादक वाक्यों की एकवाक्यता नहीं मानी जाती है, तब 'ओदनं भुक्त्वा ग्रामं गच्छति'— इत्यादि स्थल पर भी वाक्य-भेद होना चाहिए, क्योंकि 'ओदनं भुक्त्वा'— इसका अर्थ अन्य है और 'ग्रामं गच्छति'— इसका अन्य।
समाधान — उक्त स्थल पर एक अर्थ में प्रतीति का पर्यवसान नहीं होता, क्योंकि 'भुक्त्वा'— ऐसा कहने पर दो क्रियाओं की समानकर्तृता और भोजन क्रिया में पूर्वकालता प्रतीत होती है, जैसा कि आचार्य पाणिनि कहते हैं— "समानकर्तृकयोः पूर्वकाले क्त्वा" (पा. सू. ३।४।२१)। अतः यह प्रतीति अन्यकालीन क्रियान्तर की प्रतीति के बिना सम्भव नहीं। फलतः जितने पद-समूह में पदों के द्वारा उपस्थापित पदार्थों की स्मृतियाँ पर्यवसित होती हैं, उतने समूह को एक वाक्य कहते हैं। अर्थवाद वाक्य में उक्त पदार्थ-स्मृतियाँ पर्यवसित हो जाती हैं, क्योंकि विधि-वाक्य के बिना ही विशिष्टार्थ की प्रतीति उपपन्न हो जाती है। 'इस प्रकार तो दो-दो पदों के द्वारा विशिष्टार्थ की प्रतीति पर्यवसित हो जाती है, अतः पाँच-छः पदवाले एक वाक्य में भी नानात्व (वाक्य-भेद) होना चाहिए'— इस आपत्ति का परिहार यह है कि उक्त स्थल पर विशेषणों के अनेक होने पर भी विशेष्य एक ही है। वह प्रधानभूत है, अतः सकृत् श्रुत है, उसकी आवृत्ति गुणीभूत पदार्थों के अनुरोध पर नहीं हो सकती, अपितु 'प्रतिप्रधानं गुणावृत्तिः'— इस न्याय के आधार पर गुण (अङ्ग) रूप पदार्थों की आवृत्ति होती है, [जैसा कि महर्षि जैमिनि का सङ्केत है— "शेषस्य हि परार्थत्वाद् विधानात् प्रतिप्रधानभावः स्यात्" (जै. सू. ११।१।४)। भाष्यकार भी कहते हैं— "न च प्रधानं प्रतिगुणं भिद्यते, प्रतिप्रधानं हि गुणो भिद्यते" (शाबर. पृ. ६६७)। वार्तिककार की भी स्पष्ट उक्ति है—
प्रधानं नीयमानं हि तत्राङ्गान्न्यपकर्षति।
अङ्गमाकृष्यमाणं तु नाङ्गान्तरमसज्जते ॥ (तं. वा. पृ. ४८६) ]
दो प्रधान पदार्थ एक वाक्य के द्वारा प्रतिपादित नहीं होते, क्योंकि प्रधान पदार्थों का भेद होने
देवताया ब्रह्मविद्यायामधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२५
भामती
ॐ अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि इति ॐ । देवतामुद्दिश्य हविरवमृश्य च तद्विषयस्वत्वत्याग इति यागशरीरम् । न च चेतस्यानालिखिता देवतोद्देष्टुं शक्या, न च रूपरहिता चेतसि शक्यते आलेखितुमिति यागविधिनेव तद्रूपापेक्षिणा यावद्गम्यमपरेभ्योऽपि मन्त्रार्थवादेभ्यस्तद्रूपमवगतं तदभ्युपेयते । रूपान्तरकल्पनायां मानाभावात् । मन्त्रार्थवादयोरत्यन्तपरोक्षवृत्तिप्रसङ्गाच्च । यथा हि 'व्रात्यो व्रात्यस्तोमेन यजेत' इति व्रात्यस्वरूपापेक्षायां 'यस्य पिता पितामहो वा सोमं न पिबेत् स व्रात्य' इति सिद्धवद् व्रात्यस्वरूपमवगतं व्रात्यस्तोमविध्यपेक्षितं सद्गिधिप्रमाणकं भवति, यथा वा स्वर्गस्वरूपमलौकिकं स्वर्गकामो यजेतेति विधिनापेक्षितं सदर्थवादतोऽवगम्यमानं विधिप्रमाणकम् , तथा देवतारूपमपि । ननूद्देशो रूपज्ञानमपेक्षते न पुनः रूपसत्तामपि, देवतायाः समारोपेणापि च रूपज्ञानमुपपद्यते इति
भामती-व्याख्या
पर वाक्य-भेद हो ही जाता है। फलतः विधि वाक्य से अर्थवाद वाक्य भिन्न है। विधि और अर्थवादरूप दोनों भिन्न वाक्य अपने-अपने वाक्यार्थों का बोध जब करा चुकते हैं, तब उत्थापित आकाङ्क्षा के द्वारा दोनों का परस्पर अन्वय होता है यह सिद्ध हो गया।
"अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीनां स्वरूपम्"— इस भाष्य का आशय यह है कि देवता के उद्देश्य से द्रव्य (हवि) का निर्देश करते हुए द्रव्यगत स्वत्व का मानस त्याग ही याग कहलाता है। [ "यजतिचोदना द्रव्यदेवताक्रियं समुदाये कृतार्थत्वात्" (जै. सू. ४।२।२७) की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है—"द्रव्यं देवतामुद्दिश्य त्यज्यते, तस्य च क्रिया, यया क्रियया तयोः सम्बन्धो भवति"। वार्तिककार ने याग और होम का स्वरूप बताते हुए कहा है—देवतोद्देशेन स्वत्वत्यागमात्रं यागः, देवतोद्दिश्यत्यज्यमानस्वत्वद्रव्यप्रक्षेपो जुहोतिः" (तं. वा. पृ. ९८१)]। देवता को तभी उद्देश किया जा सकता है, जब कि मन में उसका आलेख (रेखाङ्कन) हो। रूप-रहित पदार्थ का चित्त में आलेख कभी नहीं हो सकता, अतः याग-विधि के द्वारा ही देवता का वह रूप स्वीकृत किया जाता है, जो विधेय-स्तुतिपरक अर्थवाद वाक्यों से अवगत होता है। उससे भिन्न रूपान्तर की कल्पना में कोई प्रमाण नहीं। किसी प्रकार यदि रूपान्तर की कल्पना करते हैं, तब देवता के स्वरूप का रेखाङ्कन करनेवाले मन्त्र और अर्थवाद वाक्य अत्यन्त उपेक्षित और निरर्थक-से हो जाते हैं। जैसे "व्रात्यो वा व्रात्यस्तोमेन यजेत" [अपने कर्मों और संस्कारों से रहित द्विज व्रात्य कहलाता है, उसके लिए प्रायश्चित्त के रूप में व्रात्यस्तोम नाम के एकाह क्रतु का विधान 'लाट्यायन' (८।६), 'ताण्ड्य' (१७।२।१) और 'कात्यायन' (१७।४।१) इत्यादि शास्त्रों में किया गया है। सब व्रात्य चार प्रकार के माने गए हैं—(१) हीनाचार, (२) निन्दित, (३) कनिष्ठ और (४) ज्येष्ठ। व्रात्यस्तोम भी चार ही होते हैं। उनमें से प्रथम स्तोम का अधिकारी हीनाचार, द्वितीय का निन्दित, तृतीय का कनिष्ठ और चतुर्थ का ज्येष्ठ अधिकारी माना जाता है]। इन व्रात्यस्तोमों के विधि वाक्य को अपना कर्म-विधान सम्पन्न करने के लिए "यस्य पिता पितामहो वा सोमं न पिबेत्, स व्रात्यः"—इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित व्रात्य के स्वरूप की अपेक्षा है, अतः उस व्रात्य के स्वरूप में विधि-वाक्य ही मौलिक प्रमाण माना जाता है। अथवा जैसे "स्वर्गकामो यजेत"— इस विधि के द्वारा अलौकिक स्वर्ग-स्वरूप अपेक्षित है। वह किसी अर्थवाद से अवगत होने पर भी विधिप्रमाणक ही माना जाता है। वैसे ही अर्थवादादि से अवगत देवता-स्वरूप भी विधिप्रमाणक ही माना जाता है।
शङ्का—यह जो कहा गया कि यागरूप स्वत्व-त्याग किसी देवता के उद्देश्य से किया
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४२६ [ अ. १ पा. ३ सू. ३३
यादृशं मन्त्रार्थवादयोरिन्द्रादीनां स्वरूपमवगतं न तत्तादृशं शब्दप्रमाणकेन प्रत्याख्यातुं युक्तम् । इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण संभवन्मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि साधयितुम् । प्रत्यक्षादिमूलमपि संभवति-भवति ह्यस्माकमप्रत्य- क्षमपि चिरंतनानां प्रत्यक्षम् । तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति स्मर्यते । यस्तु ब्रूयादिदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवादिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्य- मिति, स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधेत् । इदानीमिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽ- स्तीति ब्रूयात् । ततश्च राजसूयादिचोदनोपरुन्ध्यात् । इदानीमिव च कालान्तरेऽप्य- व्यवस्थितप्रायान्वर्णश्रमधर्मान्प्रतिजानीते । ततश्च व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात् । तस्माद्धर्मोत्कर्षवशाच्चिरंतना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते । अपि च स्मरन्ति- 'स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः' (यो० सू० २।४४) इत्यादि ।
भामती
समारोपितमेव रूपं देवतायाः मन्त्रार्थवादैरुच्यते । सत्यं, रूपज्ञानमपेक्षते । तच्चान्यतोऽसम्भवान्मन्त्रार्थ- वादेभ्य एव, तस्य तु रूपस्यासति बाधकेऽनुभवारूढं तथाभावं परित्यज्यान्यथात्वमननुभूयमानमसाम्प्रतं कल्पयितुम् । तस्माद्विध्यपेक्षितमन्त्रार्थवादैरन्यपरेरपि देवतारूपं बुद्धावुपनिधीयमानं विधिप्रमाणकमेवेति युक्तम् । स्यादेतत् - विध्यपेक्षायामन्यपरावपि वाक्यादवगतोऽर्थः स्वीक्रियते, तदपेक्षैव तु नास्ति, शब्द- रूपस्य देवताभावात्, तस्य च मानान्तरवेद्यत्वादित्यत आह ॐ न च शब्दमात्रम् इति ॐ । न केवलं मन्त्रार्थवादतो विग्रहसिद्धिरपि त्वितिहासपुराणलोकस्मरणेभ्यो मन्त्रार्थवादमूलेभ्यो वा प्रत्यक्षादि- मूलेभ्यो वेत्याह ॐ इतिहास इति ॐ । ॐ श्लिष्यते ॐ युज्यते । निगदव्याख्यातमन्यत् । तदेवं मन्त्रार्थ-
भामती-व्याख्या
जाता है, उसके लिए देवता-स्वरूप की अपेक्षा होती है। वहाँ यह शङ्का होती है कि अपेक्षित देवता का स्वरूप वस्तुसत् न होकर भी यदि आरोपित मान लिया जाता है, तब भी देवता के स्वरूप का ज्ञान सम्पन्न हो जाता है, अतः वास्तविक देव-स्वरूप की क्या आवश्यकता ?
समाधान-यह ठीक है कि देवता के रूप-ज्ञान की अपेक्षा है, वह ज्ञान अन्य प्रकार से सम्भव न होकर मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों से उत्पन्न होता है। मन्त्रादि से प्रकाशित देवता के स्वरूप का जब कोई बाधक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, तब उसे वास्तविक न मान कर आरोपित मानना सर्वथा अनुचित है। इस प्रकार मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों के द्वारा बुद्धि में देव-स्वरूप का जो चित्रण किया जाता है, वह विधिप्रमाणक ही है, अर्थवादादि- प्रमाणक नहीं, क्योंकि अर्थवादादि वाक्यों का तात्पर्य कर्म की प्रशंसा में ही होता है, देवता- स्वरूप-प्रकाशन में नहीं।
यह जो "यस्यै देवतायै हविगृहीतं स्यात् तां मनसा ध्यायेत्" (ऐ. ब्रा. ३।८।१)-इस वाक्य में निर्दिष्ट देवता-ध्यान का स्वरूप बताते हुए देवस्वामी ने कहा है-"देवतासम्बन्धिनः शब्दस्यैव ध्येयत्वम्, श्रुतिसमवायात् । आग्नेयम्, ऐन्द्रमित्यादौ श्रुत्यैव देवताप्रतिपादकस्यैव तद्धितेन ध्येयत्वम्, नार्थं (सङ्कर्ष. पृ. २०५) । इससे शब्दात्मक देवता की ही प्रतीति होती है, उसका निराकरण किया जाता है-"न च शब्दमात्रमर्थस्वरूपं सम्भवति, शब्दार्थयो- र्भेदात्"। केवल मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों से ही देवता के विग्रहादि की सिद्धि नहीं होती, अपितु इतिहास, पुराण, लोक-प्रसिद्धि से भी होती है-"इतिहास-पुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण सम्भवन्मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि साधयितुम्" । "चिरन्तना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते"। यहाँ 'श्लिष्यते' का अर्थ है-युज्यते । अर्थात् यह जो प्रसिद्धि है कि व्यासादि महर्षियों में योगज धर्म का इतना उत्कर्ष था कि वे देवगणों
देवताया ब्रह्मविद्यायामधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२७
योगोऽप्यणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिफलः स्मर्यमाणो न शक्यते साहसमात्रेण प्रत्याख्यातुम्। श्रुतिश्च योगमाहात्म्यं प्रख्यापयति—‘पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्’ (श्वे० २।१२) इति । ऋषीणामपि मन्त्रब्राह्मणदर्शिनां सामर्थ्यं नास्मदीयेन सामर्थ्येनोपमातुं युक्तम्। तस्मात्समूलमितिहासपुराणम्। लोकप्रसिद्धिरपि न सति संभवे निरालम्बनाऽध्यवसातुं युक्ता। तस्मादुपपन्नो मन्त्रादिभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमः। ततश्चार्थित्वादिसंभवादुपपन्नो देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामधिकारः। क्रममुक्तिदर्शना-न्यप्येवमेवोपपद्यन्ते ॥ ३३ ॥
भामती
वादादिसिद्धे देवताविग्रहादौ गुर्वादिपूजावद् देवतापूजात्मको यागो देवताप्रसादाद्वाऽद्वारेण सफलोऽवकल्पते अचेतनस्य तु पूजामप्रतिपाद्यमानस्य तदनुपपत्तिः। न चैवं यज्ञकर्मणो देवतां प्रति गुणभावाद् देवतात् फलोत्पादे यागभावनायाः श्रुतं फलवत्त्वं यागस्य च तां प्रति तत्फलांशं वा प्रति श्रुतं करणत्वं हातव्यम्। यागभावनाया एव हि फलवत्या यागलक्षणस्वकरणावान्तरव्यापारत्वाद् देवताभोजनप्रसादादीनां
भामती-व्याख्या
के साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे। वह अत्यन्त युक्ति-संगत है। शेष भाष्य अत्यन्त सुबोध है।
इस प्रकार मन्त्र और अर्थवादादि के द्वारा देवता के विग्रहादि-पञ्चक की सिद्धि हो जाने पर गुरु आदि के समान ही देवताओं की विधिवत् जो पूजा की जाती है वही याग है। उससे देवगण प्रसन्न होकर यजमान को फल देते हैं। शब्दात्मक जड़ देवता की पूजा से वह सफलता उपपन्न नहीं हो सकती।
शङ्का— यदि देवता अपनी यागरूप पूजा से प्रसन्न होकर फल देता है, तब देवता प्रधान और पूजारूप याग अङ्ग (गौण) हो जाता है, अतः ‘यजेत स्वर्गकामः’—यहाँ यागकरणक भावना में जो फल-वत्त्व एवं याग में उस भावना या स्वर्गादि फल का जो करणत्व श्रुत है, वह बाधित हो जाता है [क्योंकि यजिधातुरूप प्रकृति का अर्थ याग और ‘त’ प्रत्यय का भाट्टमतानुसार अर्थ भावना किया जाता है। कृतिरूप भावना में याग करण और स्वर्गादिफल साध्य या कर्म मान कर यागकरणक स्वर्गादिसाध्यक भावना या यागेन स्वर्गं भावयेत्—ऐसा शाब्द बोध किया जाता है, उसके अनुसार भावना में स्वर्गादि-जनकत्वरूप करणत्व एवं याग में उस भावना या स्वर्गादि को करणता पर्यवसित होती है। देवताओं को स्वर्ग का दाता मान लेने पर वह सब असंगत हो जाता है]।
समाधान— [जैसे ‘कुठारेण काष्ठं छिन्द्यात्’—यहाँ पर काष्ठ-छेदनरूप कार्य की करणता या प्रधानता अवगत होती है, करणत्व का अर्थ होता है—जनकत्व, जनकत्व का लक्षण है—अव्यवहितपूर्ववृत्तित्व । यद्यपि कुठार और काष्ठ-छेदन के मध्य में उद्यमन-निपातनरूप व्यापार का व्यवधान आ जाने से कुठार में काष्ठ-छेदन का अव्यवहितपूर्ववृत्तित्व नहीं रहता, तथापि व्यापार को व्यवधायक नहीं माना जाता, क्योंकि सव्यापार कुठारादि में ही करणता मानी जाती है, अतः व्यापार-युक्त कुठारादि में कार्याव्यवहितपूर्ववृत्तित्व होना चाहिए, वह प्रकृत में उपपन्न हो जाता है। वैसे ही] स्वर्गादि की करणता भावना में और भावना की करणता याग में श्रुत है। स्वर्गोत्पत्ति और भावना के मध्य में परमापूर्व एवं भावना और याग के मध्य में देवता-प्रसन्नतादि का व्यवधान रहने पर भी न तो भावनागत स्वर्गादि-जनकत्वरूप करणता समाप्त होती है और न यागगत भावना-जनकत्वरूप प्रधानता ।
| ४२८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३४ |
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( ९ अपशूद्राधिकरणम् । सू० ३४—३८ )
शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ॥ ३४ ॥
यथा मनुष्याधिकारनियममपोद्य देवादीनामपि विद्यास्वधिकार उक्तस्तथैव द्विजात्यधिकारनियमस्यापवादेन शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादित्येतामाशङ्कां निवर्तयितुमिदमधिकरणमारभ्यते । तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादिति तावत्प्राप्तम्, अर्थित्वसामर्थ्ययोः संभवात्, 'तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः' ( तै० सं० ७।१।१।६ ) इतिवत् 'शूद्रो
भामती
कृषिकर्मण इव तत्तदवान्तरव्यापारस्य सस्याधिगमसाधनत्वम् । आग्नेयादीनामिवोत्पत्तिपरमापूर्वावान्तरव्यापाराणां भवन्मते स्वर्गसाधनत्वम् । तस्मात् कर्मणोऽपूर्वावान्तरव्यापारस्य वा देवताप्रसादावान्तरव्यापारस्य वा फलवत्त्वात् प्रधानत्वमुभयस्मिन्नपि पक्षे समानम्, न तु देवताया विग्रहादिमत्त्वात् प्राधान्यमिति न धर्ममीमांसायाः सूत्रमपि वा शब्दपूर्वत्वाद्यज्ञकर्म प्रधानं गुणत्वे देवताश्रुतिरिति विरुध्यते । तस्मात्सिद्धो देवतानां प्रायेण ब्रह्मविद्यास्वधिकारः ॥ ३३ ॥
अवान्तरसङ्गतिं कुर्वन्नधिकरणतात्पर्यमाह ॐ यथा मनुष्याधिकार इति ॐ । शङ्काबीजमाह ॐ तत्र इति ॐ । निर्मृष्टनिखिलदुःखानुषङ्गे शाश्वतिक आनन्दे कस्य नाम चेतनस्यार्थिता नास्ति, येनार्थिताया अभावाच्छूद्रो नाधिक्रियेत । नाप्यस्य ब्रह्मज्ञाने सामर्थ्याभावः । द्विविधं हि सामर्थ्यं निजं चागन्तुकं च । तत्र द्विजातीनामिव शूद्राणां श्रवणादिसामर्थ्यं निजमप्रतिहतम् । अध्ययनाधानाभावादाग-
भामती-व्याख्या
जैसे कृषिरूप कर्म और हलाकर्षणादि अवान्तर व्यापार के द्वारा सस्याधिगम ( अन्नोत्पत्ति ) का जनक होता है अथवा जैसे आप ( मीमांसकों ) के मत में दर्शपूर्णमाससंज्ञक आग्नेयादि छः कर्म उत्पत्ति अपूर्व और परमापूर्व के द्वारा स्वर्गरूप फल के जनक माने जाते हैं। वैसे ही हमारे ( वेदान्तियों के ) मत में यागरूप कर्म देवता-प्रसन्नता के द्वारा अपने फल का साधन माना जाता है, फलतः दोनों मतों में कर्म की फलोत्पादकता और प्रधानता समानरूप से सुरक्षित है, देवता की प्रधानता यहाँ भी नहीं मानी जाती, अतः पूर्व मीमांसा के "अपि वा शब्दपूर्वत्वाद यज्ञकर्म प्रधानं गुणत्वे देवताश्रुतिः" ( जै. सू. ९।१।९ ) इस सूत्र का किसी प्रकार का भी विरोध उपस्थित नहीं होता । [ "देवता वा प्रयोजयेदतिथिवद् भोजनस्य तदर्थत्वात्" ( जै. सू. ६।१।१६ ) इस सूत्र के द्वारा देवता को कर्म का प्रयोजक मान कर प्रधानता देने की आशङ्का उठाई गई, उसका निराकरण करते हुए सूत्रकार ने कहा—"अपि वा शब्दपूर्वत्वाद यज्ञकर्म प्रधानं स्याद् गुणत्वे देवताश्रुति"। अर्थात् "यजेत स्वर्गकामः"—इस शब्द के द्वारा याग को ही स्वर्गरूप फल का जनक अत एव प्रधान माना गया है, देवतादि अन्य पदार्थ उसी कर्म के अङ्ग या गुण माने जाते हैं। इस सिद्धान्त का विरोध यहाँ तब होता, जब कि देवता को फल का जनक एवं प्रधान माना जाता ]। यहाँ तो केवल इतना सिद्ध किया जाता है कि देवताओं का विशुद्ध ब्रह्म-विद्या में पूर्ण अधिकार है ॥ ३३ ॥
संगति— पूर्वाधिकरण से इस अधिकरण की संगति दिखाते हुए इस अधिकरण का प्रयोजन प्रस्तुत किया जाता है—"यथा मनुष्याधिकारनियममपोद्य"।
पूर्वपक्ष— ब्रह्म-विद्या में शूद्रों का अधिकार है—"तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यात्" । दुःख का सम्बन्ध जिसमें लेशमात्र भी नहीं, ऐसे विशुद्ध शाश्वतिक आनन्द की कामना किस चेतन पुरुष को नहीं होती ? यदि वह शूद्र में न होती, तब अवश्य ब्रह्मविद्या के अधिकार से शूद्र
ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२९
विद्यायामनवक्लृप्तः' इति च निषेधाश्रवणात्। यच्च कर्मस्वनधिकारकारणं शूद्रस्या- नग्नित्वं, न तद्विद्यास्वधिकारस्यापवादकं लिङ्गम्। न ह्याहवनीयादिरहितेन विद्या
भामती
न्तुकसामर्थ्याभावे सत्यनधिकार इति चेत्, हन्ताधानाभावे सत्यग्न्यभावादग्निसाध्ये कर्मणि मा भूदधि- कारः, न च ब्रह्मविद्यायामग्निः साधनमिति किमित्यनाहिताग्नयो नाधिक्रियन्ते ? न चाध्ययनाभावात- त्साधनायामनधिकारो ब्रह्मविद्यायामिति साम्प्रतम्, यतो युक्तं यदाहवनीये जुहोत्याहवनीयस्य होमाधि- करणतया विधानात्तद्रूपस्यालौकिकत्यानारभ्याधीतवाक्यविहितादाधानदन्यतोऽनधिगमादाधानस्य च द्विजा- तिसम्बन्धितया विधानात् । तत्साध्योऽग्निरलौकिको न शूद्रस्यास्तीति नाहवनीयादिसाध्ये कर्मणि शूद्रस्या- धिकार इति । न च तथा ब्रह्मविद्यायामलोकिकमस्ति साधनं यच्छूद्रस्य न स्यात् । अध्ययननियम इति चेत् । न, विकल्पासहत्वात्—तदध्ययनं पुरुषार्थं वा नियम्येत, यथा धनार्जने प्रतिग्रहादि । क्रत्वर्थं वा, यथा व्रीहीनवहन्तीत्यवघातः । न तावत् क्रत्वर्थं, नहि स्वाध्यायोऽध्येतव्य इति कञ्चित् क्रतुं प्रकृत्य
भामती-व्याख्या
को वञ्चित रहना पड़ता। शूद्र में ब्रह्म-ज्ञान का सामर्थ्य नहीं—यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि सामर्थ्य दो प्रकार का होता है—(१) स्वाभाविक और (२) आगन्तुक (यत्न-साध्य) । श्रवणादि की स्वाभाविक शक्ति शूद्रों में भी वैसी ही हैं, जैसे द्विजाति में। ‘अध्ययन-साध्य वेद-ग्रहणादि की आगन्तुक शक्ति न होने के कारण शूद्रों को ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं’— ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि गुरुमुखाच्चारणानुच्चारणरूप अध्ययन को शक्ति भी स्वाभाविक है, केवल अग्न्याधान के द्वारा अग्निमत्ता नहीं, अतः शूद्र को अग्नि-साध्य यागादि कर्मों में अधिकार न दिया जाय, किन्तु ब्रह्मविद्या में अग्नि का कोई अपेक्षा नहीं, अतः जिन्होंने अग्नि का आधान नहीं किया, ऐसे शूद्रों का ब्रह्म-विद्या में अधिकार क्यों नहीं ? “यदाहवनीये जुहोति” (तं. ब्रा. १।१।१०।५) यह वाक्य होमाधिकरणत्वेन अग्नि का विधान करता है, अतः समस्त कर्मकाण्ड में अनाहिताग्नि का अधिकार नहीं—यह तो ठीक है, क्योंकि यह अग्नि लौकिक अग्नि न होकर दृष्टादृष्ट संस्कारात्मक अलौकिक अग्नि है एवं अनारभ्याधीत [किसी एक कर्म के प्रकरण में पठित न होकर सामान्यतः विहित] होने के कारण समस्त कर्मों का अङ्ग है, [जैसा कि भाष्यकार कहते हैं— “सर्वकर्मार्थं वाधानम्। सर्वकर्मार्थं यदग्नि- द्रव्यम्” (शाबर. पृ. १०३८)। वार्तिककार भी कहते हैं— “अनारभ्यवादेनाहवनीयः सर्व- होमार्थ इति तद्रहितकर्मान्तराभावादाहिताग्नेरधिकारः” (तं. वा. पृ. ७९८) ]। आधान कर्म का विधान भी तीन वर्णों के लिए ही किया गया है—"वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः” (तै. ब्रा. १।१।२।६।७)। इस प्रकार कर्म-कलाप में शूद्र का अधिकार न होने पर भी ब्रह्मविद्या में किसी प्रकार का वैसा अलोकिक पदार्थ अपेक्षित नहीं कि उसमें शूद्र को अधिकार न होता ।
शङ्का—विधिपूर्वक अध्ययन में त्रैवर्णिक का ही अधिकार है और अध्ययन के विना वेदार्थ-ज्ञान सम्भव नहीं, क्योंकि 'अध्ययनेनैवार्थज्ञानं भावयेत्'—इस प्रकार नियम स्वीकार किया जाता है, नियम-जन्य अपूर्व भी वेदार्थानुष्ठान का अङ्ग माना जाता है, शूद्र अध्ययन नहीं कर सकता, अतः वह अध्ययन के नियम से जनित अपूर्व से वञ्चित होने के कारण किसी भी वेदार्थ के अनुष्ठान का अधिकारी नहीं माना जा सकता ।
समाधान—उक्त नियम का आकार क्या (१) अध्ययनेनैव पुरुषार्थं भवेत्—ऐसा है ? अथवा (२) अध्ययनेनैव यागानुष्ठानं भावयेत्—ऐसा ? जैसे “व्रीहीनवहन्ति”—यहाँ पर अवघातेनैव वैतुष्यं भावयेत्—ऐसा नियम माना जाता है, उस नियम से जन्य अदृष्ट के विना
| ४३० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३४ |
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वेदितुं न शक्यते। भवति च लिङ्गं शूद्राधिकारस्योपोद्वलकम्। संवर्गविद्यायां हि
भामती
पठ्यते, यथा दर्शपूर्णमासं प्रकृत्य व्रीहीनवहन्तीति । न चानारभ्याधीतमप्यव्यभिचरितं क्रतुसम्बन्धितया क्रतुमुपस्थापयति, येन वाक्येनेव क्रतुना सम्बध्येताध्ययनं, न हि यथा जुह्वाद्यव्यभिचरितक्रतुसम्बद्धमेवं स्वाध्याय इति। तस्मान्नैव क्रत्वर्थे नियमो नापि पुरुषार्थे । पुरुषेच्छाधीनप्रवृत्तिर्हि पुरुषार्थो भवति, यथा फलं तदुपायो वा । तदुपायेऽपि हि विधितः प्राक् सामान्यरूपा प्रवृत्तिः पुरुषेच्छानिबन्धनेव। इतिकर्तव्यतासु तु सामान्यतो विशेषतश्च प्रवृत्तिर्विधिपराधीनंव। नह्यनधिगतकरणभेद इतिकर्तव्यतासु घटते । तस्माद्विध्यधीनप्रवृत्तितायज्ञानां क्रत्वर्थता । क्रतुरिति हि विधिविषयेण विधि परामृशति विषयिणम् । तेनाथंते विषयीक्रियत इति क्रत्वर्थः । न चाध्ययनं वा स्वाध्यायो वा तदर्थज्ञानं वा प्राग् विधेः पुरुषेच्छाधीनप्रवृत्तियेन पुरुषार्थः स्यात् । यदि चाध्ययनेनैवार्थोवबोधरूपं नियम्येत ततो मानान्तरविरोधः । तद्रूपस्य विनाप्यध्ययनं पुस्तकादिपाठनाप्यधिगमात् । तस्मात्सुवर्णं भार्यमितिवदध्ययनादेश्च फलं कल्पनीयम् । तथा चाध्ययनविधेरनियमकरवाच्छूद्रस्याध्ययनेन वा पुस्तकादिपाठेन वा सामर्थ्यमस्तीति सोऽपि ब्रह्मविद्यायामधिकृतः । मा भूद्धाऽध्ययनाभावात्सर्वत्र ब्रह्मविद्यायामधिकारः, संवर्गविद्यायां तु
भामती-व्याख्या
प्रकृत (दर्शपूर्णमास) कर्म सम्पन्न नहीं होता, क्योंकि "व्रीहीनवहन्ति"-यह वाक्य दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित है, किन्तु "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" (शत. ब्रा. ११।५।६) यह वाक्य किसी क्रतु के प्रकरण में पठित न होने के कारण किसी ऋतु के लिए अध्ययन का नियम नहीं करा सकता। अनारभ्याधीत अध्ययन भी सामान्यतः ऋतु का उपस्थापक हो सकता था, यदि उसका क्रतु के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध होता, किन्तु "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति" (तै. सं. ३।५।७।२) यहाँ जुहू अनारभ्याधीत होने पर भी ऋतु का अव्यभिचरित सम्बन्धी होने कारण क्रतु का जैसे उपस्थापक है, वैसा अध्ययन नहीं।
पुरुषार्थ में भी अध्ययन का नियम नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'पुरुषार्थ' शब्द से वही पदार्थ अभिहित होता है, जिसमें पुरुष की अपनी इच्छा से प्रवृत्ति हो, जैसे—स्वर्गादि फल और उसका साधन यागादि। यागादिरूप साधन में विधि से पूर्व पुरुष की सामान्यतः प्रवृत्ति होती है। यागादि साधन पदार्थ के इतिकर्तव्यभूत (प्रयाजादि अङ्ग-कलापरूप सहायक) व्यापार में तो प्रवृत्ति विधि के पूर्व नहीं, अपितु विधि के अधीन ही होती है, क्योंकि किस व्यापार का कौन साधन (करण) है—इस प्रकार का विशेष ज्ञान जब तक न हो, तब तक इतिकर्तव्य में प्रवृत्ति नहीं होती, वह विशेष ज्ञान विधि वाक्य से ही होता है। अतः अङ्गभूत पदार्थों में विधितः प्रवृत्ति होने के कारण क्रत्वर्थता मानी जाती है। 'क्रत्वर्थता' पद में ऋतु (याग) अपनी विधि का विषय है, अतः विधि के विषयीभूत अङ्ग-कलापरूप विषयों का उपलक्षक है, उसके लिए जो अभ्यर्थित हो, उसे क्रत्वर्थ कहते हैं। अध्ययन या स्वाध्याय अथवा अर्थ-ज्ञान—इनमें से कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं, जिसमें विधि के पूर्व अपनी इच्छा से पुरुष की प्रवृत्ति होती हो, जिससे कि वह पुरुषार्थ कहा जा सके। यदि "अध्ययनेनैवार्थज्ञानं भावयेत्"—ऐसा नियम माना जाता है, तब प्रमाणान्तर से विरोध आता है, क्योंकि वेदार्थ का ज्ञान विधिपूर्वक अध्ययन के बिना अपने-आप पुस्तकों के पढ़ने से भी उपपन्न हो जाता है। फलतः "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस विधि को नियम विधि न मान कर "सुवर्णं भार्यम्" (तै. ब्रा. २।२।४।५) इस विधि के समान अपूर्व विधि मान कर अध्ययन के द्वारा ही अर्थज्ञान-रूप फल की कल्पना करनी होगी। अध्ययन (गुरुमुखोच्चारणानुच्चारण) का स्वाभाविक सामर्थ्य तो शूद्र में भी है, अतः ब्रह्मविद्या में उसका अधिकार क्यों न होगा ?
ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३१
जानश्रुतिं पौत्रायणं शुश्रूषुं शूद्रशब्देन परामृशति—'अह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु' (छा० ४।२।३) इति। विदुरप्रभृतयश्च शूद्रायोनिप्रभवा अपि विशिष्ट-विज्ञानसंपन्नाः स्मर्यन्ते। तस्मादधिक्रियते शूद्रो विद्यास्विति। एवं प्राप्ते ब्रूमः—न शूद्रस्याधिकारः, वेदाध्ययनाभावात्। अधीतवेदो हि विदितवेदार्थो वेदार्थेष्वधिक्रियते। न च शूद्रस्य वेदाध्ययनमस्ति, उपनयनपूर्वकत्वादध्ययनस्य। उपनयनस्य
भामती
भविष्यति। अह हारेत्वा शूद्र इति शूद्रं सम्बोध्य तस्याः प्रवृत्तेः। न चैष शूद्रशब्दः कदाचिदवयवव्युत्पत्त्याऽशूद्रे वर्णनीयः। अवयवप्रसिद्धितः समुदायप्रसिद्धेरनपेक्षतया बलीयस्त्वात्। तस्माद्यथाऽनधीयानस्येष्टौ निषादस्थपतेरधिकारो वचनसामर्थ्यादेवं संवर्गविद्यायां शूद्रस्याधिकारो भविष्यतीति प्राप्तम्।
एवं प्राप्ते ब्रूमः—न शूद्रस्याधिकारो वेदाध्ययनाभावादिति। अयमभिसन्धिः—यद्यपि स्वाध्यायोऽध्येतव्य इत्यध्ययनविधिर्न किञ्चित्फलवत्कर्माभ्याम्नातः, नाप्यव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धपदार्थंगतः, न हि जुह्वादिवत्स्वाध्यायोऽव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धस्तथापि स्वाध्यायस्याध्ययनसंस्कारविधिरध्ययनस्यापेक्षितोपायतामवगमयन् किं पिण्डपितृयज्ञवत् स्वर्गं वा सुवर्णं भार्यमितिवदार्थवादिकं वा फलं कल्पयित्वा विनियोगभङ्गेन स्वाध्यायेनाधीयीतेत्येवमर्थः कल्पतां ? किंवा परम्परयाऽध्यय्यतोऽपेक्षितमधिगम्य निर्वृणोत्विति विषये, न दृष्टद्वारेण परम्परयाऽध्यय्यतोऽपेक्षितप्रतिलम्भे च यथाश्रुतविनियोगोपत्तौ च सम्भवन्त्यां श्रुतविनियोगभङ्गेनाध्ययनादेवाश्रुतादृष्टफलकल्पनोचिता। दृष्टश्च स्वाध्यायाध्ययनसंस्कारस्तेन हि पुरुषेण
भामती-व्याख्या
यदि अध्ययन न होने के कारण सभी प्रकार की ब्रह्म-विद्या में शूद्र का अधिकार नहीं, तब "वायुर्वाव संवर्गः" (छां. ४।३।१) इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित संवर्ग-विद्या में अधिकार अवश्य होना चाहिए, क्योंकि वहाँ "अह हारेत्वा शूद्र ! तवैव सह गोभिरस्तु" (छां. ४।२।३) इस प्रकार रैक्वाचार्य ने जानश्रुति को 'शूद्र' शब्द से सम्बोधित करके कहा है कि 'हे शूद्र ! ये सब 'रथ, काञ्चनमय हार एवं गौएँ तू अपने पास ही रख। यह 'शूद्र' शब्द जो 'शुचा द्रवति'—इत्यादि अवयवार्थ के द्वारा क्षत्रियादि वर्णों का बोधक माना जाता है, वह उचित नहीं, क्योंकि अवयव-शक्ति की अपेक्षा समुदाय (रूढ़) शक्ति प्रबल होती है। फलतः जैसे निषाद-स्थपति को अध्ययनादि के विना ही इष्टि-विशेष में विशेष वचन के आधार पर अधिकार है, वैसे ही संवर्ग-विद्या में शूद्र का अधिकार माना जायगा।
सिद्धान्त—उक्त पूर्व-पक्ष का खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न शूद्रस्याधिकारः, वेदाध्ययनाभावात्"। आशय यह है कि यद्यपि "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—यह अध्ययन-विधि न तो किसी फल के साधनीभूत कर्म के प्रकरण में अधीत है और न अध्ययन का कर्म के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध ही है। तथापि यहाँ एक यह संशय उपस्थित होता है कि क्या यह स्वाध्याय (अपनी शाखा) के अध्ययनरूप संस्कार का विधायक वाक्य अध्ययन में इष्ट-साधनता का बोध कराता हुआ पिण्डपितृयज्ञ अथवा स्वर्ण-धारण-विधि के समान अर्थवाद-प्रतिपादित स्वर्गादि फलों की कल्पना करके अध्ययनेन स्वाध्यायः संस्कार्यः'—ऐसा विनियोग भङ्ग करते हुए 'स्वाध्यायेनाधीयीत'—इस प्रकार के साध्य-साधनभाव का गमक माना जाय ? अथवा परम्परा या अन्य युक्तियों के द्वारा अवगत पदार्थ को ही अपना कर निराकाङ्क्ष हो जाय ? अक्षरावाप्ति पदार्थ-व्युत्पत्त्यादि परम्परा के द्वारा पदार्थ-ज्ञानरूप दृष्ट फल का लाभ जब अध्ययन से हो जाता है, तब अध्ययन का स्वर्गादिरूप अदृष्ट फल नहीं माना जा सकता एवं जब "अध्ययनेन स्वाध्यायं भावयेत्"—ऐसा यथाश्रुत साध्य-साधनभाव उपपन्न हो जाता है, तब इस विनियोग का भङ्ग करना भी उचित नहीं। अध्ययन-संस्कार दृष्टफलक इसलिए है
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च वर्णत्रयविषयत्वात्। यत्त्वर्थित्वं न तदसति सामर्थ्येऽधिकारकारणं भवति। सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकारकारणं भवति, शास्त्रीयेऽर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्यापेक्षितत्वात्, शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्याध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात्। यच्चेदं 'शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः' इति 'तन्न्यायपूर्वकत्वाद्विद्यायामप्यनवक्लृप्तत्वं द्योतयति,
भामती
सम्प्राप्यते प्राप्तश्च फलवत्कर्मब्रह्मावबोधमभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनमुपजनयति, न तु सुवर्णधारणादौ दृष्टद्वारेण परम्परयाप्यस्त्यपेक्षितं पुरुषस्य, तस्माद्विपरिवृत्त्य साक्षाद्धारणादेव विनियोगभङ्गेन फलं कल्प्यते । यदा चाध्ययनसंस्कृतेन स्वाध्यायेन फलवत्कर्मब्रह्मावबोधो भाव्यमानोऽभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजन इति स्थापितं तदा यस्याध्ययनं तस्यैव कर्मब्रह्मावबोधोऽभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनो नान्यस्य, यस्य चोपनयनसंस्कारस्तस्यैवाध्ययनं, स च द्विजातीनामेवेत्युपनयनाभावेनाध्ययनसंस्काराभावात् पुस्तकादिपठितस्वाध्यायजन्योऽर्थावबोधः शूद्राणां न फलाय कल्पत इति शास्त्रीयसामर्थ्याभावान्न शूद्रो ब्रह्मविद्यायामधिकृत इति सिद्धम् ।
❀ यज्ञेऽनवक्लृप्तः ❀ इति यज्ञग्रहणमुपलक्षणार्थम् । विद्यायामप्यनवक्लृप्त इत्यपि द्रष्टव्यम् ।
भामती-व्याख्या
कि उसके द्वारा पुरुष की अपनी शाखा प्राप्त होती है । [(१) उत्पत्ति, (२) विकृति, (३) संस्कृति और (४) आप्ति—इन चार प्रकारों के जनक कर्म संस्कार कर्म हैं—जैसे आधान संस्कार से अग्नि की उत्पत्ति, अवघात से व्रीहि की विकृति होती है और प्रोक्षण कर्म से व्रीहि संस्कृत होते हैं। वैसे ही अध्ययन संस्कार से स्वाध्याय (अपनी शाखा) की आप्ति (प्राप्ति या कण्ठस्थता) होती है]। प्राप्त स्वाध्याय अभ्युदय के हेतुभूत कर्म (धर्म) के ज्ञान और निःश्रेयस के साधनीभूत ब्रह्म-ज्ञान को जन्म देता है। सुवर्ण-धारणादि कर्म किसी दृष्ट फल के द्वारा पुरुषार्थ का उत्पादन परम्परा भी नहीं करते, अतः 'धारणेन सुवर्णं भावयेत्' ऐसा यथाश्रुत विनियोग भङ्ग करके 'सुवर्णधारणेन भ्रातृव्यस्य दुर्वर्णत्वं भावयेत्'—ऐसा साध्य-साधनभाव माना जाता है, किन्तु प्रकृत में उसकी कोई आवश्यकता नहीं [ "सुवर्णं हिरण्यं भार्यम्" तस्माद् दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवति" (तै. ब्रा. २।२।४।६) इस वाक्य के विषय में सन्देह किया गया है कि इस वाक्य के द्वारा विहित सुवर्ण-धारण क्या क्रत्वर्थ है? अथवा पुरुषार्थ? सिद्धान्त-सूत्र है—"अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात्" (जै. सू. ३।४।२०)। अर्थात् उक्त वाक्य किसी कर्म के प्रकरण में नहीं अप्रकरण-पठित (अनारभ्याधीत) है, अतः कर्म के प्रकरण में पठित वाक्य की अपेक्षा इस अनारभ्याधीत वाक्य का यह अन्तर है कि इसके द्वारा विहित सुवर्ण-धारण क्रत्वर्थ नहीं, अपितु पुरुषार्थ है, फलतः आर्थवादिक भ्रातृव्य (शत्रु) की दुर्वर्णता ही सुवर्ण-धारण का फल है, जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"तस्माद् दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवतीत्येवमादिना एवंजातीयकानां फलेन सम्बन्धः" (शाबर. पृ. ९५५)]।
जब कि 'अध्ययन के द्वारा संस्कृत (प्राप्त) स्वाध्याय अभ्युदयफलक कर्मावबोध और निःश्रेयसफलक ब्रह्मावबोध का साधन है'—ऐसा स्थापित (निर्णीत) हो गया, तब जिस व्यक्ति ने अध्ययन किया है, उसी को अभ्युदयार्थक कर्मावबोध और निःश्रेयसार्थक ब्रह्मावबोध होगा, अन्य को नहीं। अध्ययन वही कर सकता है, जिसका उपनयनसंस्कार हो गया हो, उपनयन संस्कार केवल त्रैवर्णिक पुरुषों का ही विहित है, अतः उपनयन और अध्ययन से वञ्चित शूद्रों को जो अपने-आप पुस्तकादि के पढ़ लेने मात्र से अर्थावबोध होता है, वह अभीष्ट फल नहीं दे सकता। इस प्रकार आगन्तुक शास्त्रीय सामर्थ्य न होने के कारण शूद्र ब्रह्म-विद्या का अधिकारी नहीं माना जा सकता—यह सिद्ध हो गया।
ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३३
न्यायस्य साधारणत्वात् । यत्पुनः संवर्गविद्यायां शूद्रशब्दश्रवणं लिङ्गं मन्यसे, न तल्लिङ्गं, न्यायाभावात् । न्यायोक्ते हि लिङ्गदर्शनं द्योतकं भवति । न चात्र न्यायोऽस्ति । कामं चायं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात्, तद्विषयत्वात्, न
भामती
सिद्धवदभिधानस्य न्यायपूर्वकत्वात् न्यायस्य चोभयत्र साम्यात् । द्वितीयं पूर्वपक्षमनुभाषते ॐ यत् पुनः संवर्गविद्यायाम् इति ॐ । दूषयति ॐ न तल्लिङ्गम् ॐ । कुतः ? ॐ न्यायाभावात् ॐ । न तावच्छूद्रः संवर्गविद्यायां साक्षाच्चोद्यते : यथैतया निषादस्थपतिं याजयेदिति निषादस्थपतिः किन्तु अर्थवादवगतोऽयं शूद्रशब्दः स चान्यतः सिद्धमर्थमवद्योतयति न तु प्रापयतीत्यध्वरमीमांसकाः । अस्माकं त्वन्यपरादपि वाक्यादसति बाधके प्रमाणान्तरेणार्थोऽवगम्यमानो विधिना चापेक्षितः स्वीक्रियत एव । न्यायश्चास्मिन्नर्थे उक्तो बाधकः । न च विध्यपेक्षाऽस्ति, द्विजात्यधिकारप्रतिलम्भेन विधेः पर्यवसानात् । विध्युद्देशगतत्वे त्वयं न्यायोऽपोद्यते वचनबलान्निषादस्थपतिवन्न त्वेष विध्युद्देशगत इत्युक्तम् । तस्मान्नार्थवादमात्राच्छूद्राधिकारसिद्धिरिति भावः । अपि च किमर्थवादबलाद्विद्यामात्रेऽधिकारः शूद्रस्य कल्प्यतां संवर्गविद्यायां वा ? न तावद्विद्यामात्र इत्याह ॐ कामं चायम् इति ॐ । न हि संवर्गविद्यायामर्थवादः श्रुतो विद्यामात्रेऽधिका-
भामती-व्याख्या
“तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनबक्लृप्तः (असमर्थः)” (तै. सं. ७।१।१।६) इस वाक्य में ‘यज्ञ’ शब्द ब्रह्म-विद्या का भी उपलक्षक है, अतः ‘ब्रह्मविद्यायामनवक्लृप्तः’—ऐसा निषेध-वाक्य भी सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि शूद्र की यज्ञानवक्लृप्ति का नियामक जो हेतु है—सामर्थ्याभाव, वह कर्म-विद्या और ब्रह्म-विद्या—दोनों में समान है ।
द्वितीय पूर्वपक्ष का अनुवाद किया जा रहा है—“यत्पुनः संवर्गविद्यायां शूद्रशब्दश्रवणं लिङ्गं मन्यसे”। इस पूर्व पक्ष का भी खण्डन किया जाता है—“न तल्लिङ्गम्, न्यायाभावात्”। दृष्टान्त-साधक युक्ति का दार्ष्टान्त में अभाव है, क्योंकि निषादस्थपति-इष्टि में निषादस्थपति का “एतया निषादस्थपतिं याजयेत्” (मै. सं. २।२।४) इस विधि के द्वारा साक्षात् विधान किया गया है [ “वास्तुमध्ये रौद्रं चरुं निर्वपेद्, यत्र रुद्रः प्रजाः शमयेत्”—इस वाक्य के द्वारा विहित रौद्र इष्टि के प्रकरण में कहा गया है—“एतया निषादस्थपतिं याजयेत्”। “स्थपतिर्निषादः स्यात्, शब्दसामर्थ्यात्” (जै. सू. ६।१।५१) इस सूत्र के द्वारा सिद्धान्त स्थापित किया गया है कि निषाद नाम की शूद्र जाति का स्थपति (राजमिस्त्री) उस इष्टि का अधिकारी है ] । संवर्ग-विद्या के प्रकरण में किसी शूद्र का विधि वाक्य प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होता, किन्तु अर्थवाद वाक्य में ‘शूद्र’ शब्द आया है । वह अन्य प्रमाण से ज्ञात पदार्थ का अवद्योतनमात्र (अनुवादमात्र) करता है, अज्ञात-ज्ञापक या विधायक नहीं—ऐसा धर्म-मीमांसकों का मत है । हमारा (ब्रह्म-मीमांसकों का) यह कहना है कि अन्यार्थक वाक्य के द्वारा अवगत वह पदार्थ भी विधि वाक्य के द्वारा स्वीकृत होता है, जिसका कोई बाधक प्रमाण उपलब्ध न हो । प्रकृत में वैसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि विधि-वाक्य द्विजातिरूप अधिकारियों को लेकर पर्यवसित हो जाता है । यदि साक्षात् विधि वाक्य में ‘शूद्र’ शब्द का उल्लेख होता, तब प्रत्यक्ष वचन के द्वारा निसर्ग-सिद्ध द्विजाति के अधिकार का अपवाद हो सकता था किन्तु वैसा प्रकृत में कोई वाक्य उपलब्ध नहीं, केवल एक अर्थवाद के आधार पर शूद्राधिकार की सिद्धि नहीं हो सकती ।
यह भी यहाँ जिज्ञासा होती है कि उक्त अर्थवाद के बल पर समस्त विद्याओं में शूद्राधिकार की कल्पना की जाती है? अथवा केवल संवर्ग-विद्या में? प्रथम कल्प का निरास किया जाता है—“कामं चायं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात्, तद्विषयत्वात्,
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| ४३४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. सू. ३४ |
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सर्वासु विद्यासु। अर्थवादस्थत्वात्तु न क्वचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते। शक्यते चायं शूद्रशब्दोऽधिकृतविषयो योजयितुम्। कथमित्युच्यते? 'कंवर एनमेतत्सन्तं सयुग्वान-
भामती
रिणमुपनयति, अतिप्रसङ्गात्। अस्तु तर्हि संवर्गविद्यायामेव शूद्रस्याधिकार इत्यत आह ॐ अर्थवादस्थत्वाद् इति ॐ। तत्किमेतच्छूद्रपदं प्रमत्तगीतं, न चैतद् युक्तं तुल्यं हि साम्प्रदायिकमित्यत आह। ॐ शक्यते चायं शूद्रशब्द इति ॐ। एवं किलात्रोपाख्यायते- जानश्रुतिः पौत्रायणो बहुदायी श्रद्धादेयो बहुपाक्यः प्रियातिथिर्बभूव। स च तेषु तेषु ग्रामनगरशृङ्गाटरेषु विविधानामन्नपानानां पूर्णानितिथिम्य आवसथान् कारयामास। सर्वत एत्येतेष्वावसथेषु ममान्नपानमर्थिन उपयोग्क्ष्यन्त इति। अथास्य राज्ञो दानशौण्डस्य गुणगरिमसन्तोषिताः सन्तो देवर्षयो हंसरूपमास्थाय तदनुग्रहाय तस्य निदाघसमये दोषा हर्म्यतलस्थस्योपरि मालामाबध्याजग्मुस्तेषामग्रेसरं हंसं सम्बोध्य पृष्ठतो व्रजन्नेकतमो हंसः साद्भुतमभ्युवाच। भल्लाक्ष! भल्लाक्ष! जानश्रुतेरस्य पौत्रायणस्य द्युलोक आयतं ज्योतिस्तन्मा प्रसाङ्क्षीर्मैतस्त्वा धाक्षीदिति। तमेवमुक्तवन्तमग्रगामी हंसः प्रत्युवाच--कं वर! एनमेतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ। अयमर्थः-वर इति सोपहासमवरमाह। अथवा वरो वराकोऽयं जानश्रुतिः। कमित्याक्षेपे, यस्मादयं वराकस्तस्मात्कमेनं किम्भूतमैतत् सन्तं प्राणिमात्रं रैक्वमिव सयुग्वानमात्थ। युग्वा गन्त्री शकटी तया सह
भामती-व्याख्या
न सर्वासु विद्यासु”। उक्त अर्थवाद वाक्य केवल संवर्ग-विद्या में श्रुत है, अतः समस्त विद्याओं में अधिकार का प्रयोजक नहीं हो सकता, अन्यथा अतिप्रसङ्ग उपस्थित होता है। वस्तुतः उक्त वाक्य अर्थवाद होने के कारण संवर्ग-विद्या में भी शूद्राधिकार का विधायक नहीं हो सकता—“अर्थवादत्वात्तु न क्वचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते।” यहाँ ‘शूद्र’ शब्द यदि किसी विद्या में भी शूद्र के अधिकार का नियामक नहीं हो सकता, तब क्या यह निरर्थक और प्रमत्त-गीतमात्र है? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है—‘शक्यते चायं शूद्रशब्दोऽधिकृतविषयो योजयितुम्’। छान्दोग्योपनिषत् में ऐसा उपाख्यान आया है कि पुत्रनाम के राजा का पौत्र और जनश्रुति का पुत्र जानश्रुति राजा था, जो ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दान एवं अतिथियों का भोजनादि से पूर्ण सत्कार किया करता था। उसने अपने राज्य के नगरों और गाँवों के चौराहों पर अतिथियों के लिए विविध अन्न-पानादि से परिपूर्ण धर्मशालाएं बनवाई थीं। अन्न-पानार्थी सभी ओर से आकर उन धर्मशालाओं में अन्न-पानादि का पूर्ण उपयोग किया करते थे। उस दानवीर राजा के सद्गुणों से सन्तुष्ट होकर देवता और ऋषिगण हंसों का रूप धारण कर राजा को अनुगृहीत करने के लिए जब वह गर्मियों के समय रात्रि में अपने महल की खुली छत पर सो रहा था, तब आकाश मार्ग से ऊपर-ऊपर उड़ते जा रहे थे। उन हंसों की पंक्ति के आगे उड़नेवाले हंस को पीछे उड़नेवाले हंस ने कहा भो भल्लाक्ष ! [‘भल्लाक्ष’ शब्द का मूल शब्द है-भद्राक्ष, जिसका अर्थ होता है—स्वस्थनेत्रवाला। यहाँ कटाक्षपूर्ण उक्ति या विपरीत-लक्षणा से अन्धे व्यक्ति का बोधक है, इस प्रकार अग्रगामी हंस को पृष्ठगामी हंस कहता कि हे अन्धे ! ] सामने यह जो द्युलोक को छूता हुआ ज्योतिःस्तम्भ दिखाई दे रहा है, यह महाराज जानश्रुति का यशःपुञ्ज है, इसके बीच से मत निकलना नहीं तो भस्मीभूत हो जाओगे। इसके उत्तर में अग्रगामी हंस ने पृष्ठगामी हंस को कहा—‘कंवर ! एनमेतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति” [ ‘वर’ शब्द भी ‘भल्लाक्ष’ शब्द के समान कटाक्षपूर्ण सम्बोधन या विपरीत-लक्षणा के द्वारा अवर या ‘नीच’ अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अग्रगामी हंस पृष्ठगामी को वैसा ही उत्तर देता है कि ‘हे नीच हंस !] किस ऐसे साधारण राजा की बात करता है? तूने क्या इसे शकट (बैलगाड़ी) पर चलनेवाला