भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३३
तमभिश्वावस्थातुं, यथेष्टं च तं तं विग्रहं ग्रहीतुं सामर्थ्यम् । तथा हि श्रूयते सुब्रह्म- ण्यार्थवादे—मेधातिथेर्मेषेति । 'मेधातिथिं ह काण्वायनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार' ( षड्विंश० ब्रा० १।१ ) इति । स्मर्यते च—आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह' इति । मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते 'मृदब्रवीदापोऽब्रुवन्' इत्या- दिदर्शनात् । ज्योतिरादेस्तु भूतघातोरादित्यादिष्वचेतनत्वमभ्युपगम्यते । चेतना- स्त्वधिष्ठातारो देवतात्मानो मन्त्रार्थवादादिव्यवहारादित्युकम् । यदप्युक्तं - मन्त्रार्थ- वादयोरन्यार्थत्वान्न देवताविग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यमिति । अत्र ब्रूमः-प्रत्ययाप्रत्ययौ हि सद्भावासद्भावयोः कारणं, नान्यार्थत्वमनन्यार्थत्वं वा । तथाह्यन्यार्थमपि प्रस्थितः पथि पतितं तृणपर्णाद्यस्तीत्येव प्रतिपद्यते ।
अत्राह-विषम उपन्यासः । तत्र हि तृणपर्णादिविषयं प्रत्यक्षं प्रवृत्तमस्ति, येन तदस्तित्वं प्रतिपद्यते । तत्र पुनर्विध्युद्देशैकवाक्यभावेन स्तुत्यर्थेऽर्थवादे न पार्थग्- र्थ्येन वृत्तान्तविषया प्रवृत्तिः शक्याऽध्यवसातुम् । नहि महावाक्येऽर्थप्रत्यायकेऽवा- न्तरवाक्यस्य पृथक्प्रत्यायकत्वमस्ति यथा 'न सुरां पिबेत्' इति नञ्वति वाक्ये पद- त्रयसंबन्धात्सुरापानप्रतिषेध एवैकोऽर्थोऽवगम्यते, न पुनः सुरां पिबेदिति पदद्वय-
भामती
गृह्णन्ते । मन्त्रादीनां व्यवहारः प्रवृत्तिस्तस्य दर्शनादिति । पूर्वपक्षमनुभाषते । ॐ यदप्युक्तम् इति ॐ । एकदेशिमतेन तावत्परिहरति ॐ अत्र ब्रूमः इति ॐ । तदेतत् पूर्वपक्षिणमुत्थाप्य दूषयति ॐ अत्राह ॐ पूर्वपक्षी । शाब्दी खल्वियं गतिः । यत्तात्पर्याधीनवृत्तित्वं नाम नह्यन्यपरः शब्दोऽन्यत्र प्रमाणं भवितु- मर्हति । नहि श्वित्रिनिमार्जनपरं श्वेतो धावतीति वाक्यम् , इतः सारमेयवेगवद्गमनं गमयितुमर्हति । न च नञ्वति महावाक्येऽवान्तरवाक्यार्थो विधिरूपः शक्योऽवगन्तुम् । न च प्रत्ययमात्रात्सोऽप्यर्थोऽस्य भवति,
भामती-व्याख्या
ग्रहण किया गया है। 'मन्त्रादि-व्यवहार' का अर्थ है—मन्त्रादि वाक्यों की अर्थ-बोधन में प्रवृत्ति, वह अनुभव-सिद्ध है।
पूर्व-पक्ष का अनुवाद किया जाता है—"यदप्युक्तं मन्त्रार्थवादयोरन्यार्थत्वान्न देवता- विग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यम्"। इस पूर्वपक्ष का वेदान्त के एकदेशी आचार्य के मत से परिहार किया जाता है—"अत्र ब्रूमः"। इस एकदेशी आचार्य के मत का पूर्वपक्षी के माध्यम से खण्डन किया जाता है—"अत्राह पूर्वपक्षी"। यह शाब्दी मर्यादा है कि जिस शब्द का जिस अर्थ में तात्पर्य है, उस शब्द की उसी अर्थ में वृत्तिता (अभिधेयता) मानी जाती है, अत एव अन्यपरक शब्द अन्य अर्थ में प्रमाण नहीं हो सकता, जैसे कि 'श्वेतो धावति'—इस वाक्य में 'श्वेतः' शब्द के दो अर्थ होते हैं—( १ ) श्वेत कुष्ठवाला व्यक्ति और ( २ ) 'श्वा इतः'—ऐसा छेद करने पर कुत्ता इधर—ऐसा अर्थ होता है। उसी प्रकार 'धावु गतिशुद्ध्योः' धातु से निष्पन्न 'धावति' क्रिया पद के भी दो अर्थ होते हैं ( १ ) धोता है और ( २ ) दौड़ता है। 'श्वेत कुष्ठवाला (श्वित्री) व्यक्ति अपना कुष्ठ धोता है'—इस अर्थ के बोधक 'श्वेतो धावति'—इस वाक्य के द्वारा 'कुत्ता इधर दौड़ रहा है'—ऐसा अर्थ नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार "नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति'—इस महावाक्य का षोडशिग्रहण-कर्त्तव्यतारूप अवान्तर वाक्यार्थ में तात्पर्य पर्यवसित नहीं हो सकता । 'किसी वाक्य को सुनने के अनन्तर किसी अर्थ की जैसे-तैसे प्रतीति हो गई'—एतावता उस अर्थ में उस वाक्य का तात्पर्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रतीति भ्रमात्मक भी हो सकती हैं। शब्द प्रमाण ही वक्ता के तात्पर्य की अपेक्षा करता है, प्रत्यक्षादि प्रमाण नहीं, क्योंकि जो व्यक्ति जलाहरण के उद्देश्य से