भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थवादानामुपयोगः ] हिन्दूसहितभामतीसंवलितम् ४१९
संबन्धात्सुरापानविधिरपीति । अत्रोच्यते—विषम उपन्यासः । युक्तं यत्सुरापान- प्रतिषेधे पदान्वयस्यैकत्वादवान्तरवाक्यार्थस्याग्रहणम् । विध्युद्देशार्थवादयोस्त्वर्थवाद-
भामती
तत्प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वात् । न पुनः प्रत्यक्षादीनामियं गतिः । नह्युदकाहरणार्थिना घटदर्शनायोन्मीलितं चक्षुर्घटपटौ वा पटं वा केवलं नोपलभते । तदेवमेकदेशिनि पूर्वपक्षिणा दूषिते परमसिद्धान्तवाद्याह ॐअत्रो- च्यते । विषम उपन्यासः इति ॐ । अयमभिसन्धिः--लोके विशिष्टार्थप्रत्यायनाय पदानि प्रयुक्तानि तदन्त- रेण न स्वार्थमात्रस्मरणे पर्यवस्यन्ति । नहि स्वार्थस्मरणमात्राय लोके पदानां प्रयोगो दृष्टपूर्वः । वाक्यार्थे तु दृश्यते । न चैतान्यस्मारितस्वार्थानि साक्षाद्वाक्यार्थं प्रत्याययितुमीशते इति स्वार्थस्मरणं वाक्यार्थमि- तयेऽवान्तरव्यापारः कल्पितः पदानाम् । न च यदर्थं यत् तत् तेन विना पर्यवस्यतीति न स्वार्थमात्रा- भिधानेन पर्यवसानं पदानाम् । न च नञ्वति वाक्ये विधानपर्यवसानम् । तथा सति नञ्पदमनर्थकं स्यात् । यथाहूः—
साक्षाद्यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णस्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ इति ।
सेयमेकस्मिन्वाक्ये गतिः । यत्र तु वाक्यस्यैकस्य वाक्यान्तरेण सम्बन्धस्तत्र लोकानुसारतो भूतार्थ-
भामती-व्याख्या
घट देखने के लिए आँख खोलता है, वह पुरोऽवस्थित घट और पट—दोनों या केवल पट को क्या नहीं देखता ?
इस प्रकार पूर्वपक्षी के द्वारा एकदेशी का खण्डन हो जाने के पश्चात् परम सिद्धान्त- वादी कहता है—"अत्रोच्यते विषम उपन्यासः" । अभिप्राय यह है कि लोक में जिस विशिष्ट अर्थ की प्रतीति कराने के लिए पद प्रयुक्त होते हैं, उसके बिना पद केवल स्वार्थमात्र के स्मरण में पर्यवसित नहीं होते, क्योंकि केवल (असंसृष्ट) पदार्थ का स्मरण दिलाने के लिए पदों का प्रयोग नहीं देखा जाता, वाक्यार्थरूप विशिष्टार्थ की प्रतीति कराने के लिए तो स्वार्थ- स्मारकत्वेन पदों का प्रयोग देखा जाता है, क्योंकि पद अपने स्वार्थ का स्मरण न दिला कर साक्षात् वाक्यार्थ का बोध नहीं करा सकते । पदों के ही दो व्यापार माने जाते हैं—(१) पदार्थ स्मरण और (२) स्मृत पदार्थों के द्वारा वाक्यार्थ का अवबोधन । फलतः पदार्थ-स्मारण पदों का अवांतर व्यापार है। पदों का परम तात्पर्य वाक्यार्थ-बोधन है, उसके बिना केवल स्वार्थाभिधानमात्र से पदों का पर्यवसान नहीं माना जाता । नञ्-घटित वाक्य का विधानरूप वाक्यार्थैकदेश में तात्पर्य सम्भव नहीं, अन्यथा नञ् पद का प्रयोग ही निरर्थक हो जाता है, जैसा कि वार्तिककार ने कहा है—
साक्षाद् यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पर्यवस्यन्ति निष्फले ॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तौ नान्तरीयकम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥ (श्लो. वा. पृ. ९४३)
[पद यद्यपि साक्षात् पदार्थों का अभिधान ही करते हैं, तथापि उतने मात्र से उनका तात्पर्य समाप्त नहीं होता, अपितु वाक्यार्थ-बोध कराने के लिए पदों का पदार्थ-प्रतिपादन व्यापार वैसा ही नान्तरीयक (अनिवार्य) है, जैसा कि ओदनादि के पाक का निष्पादन करने के लिए चूल्हे में लगी लकड़ियों का अग्नि प्रज्वलित करना]। यह तो एक वाक्य की प्रक्रिया है।