भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२९

विद्यायामनवक्लृप्तः' इति च निषेधाश्रवणात्। यच्च कर्मस्वनधिकारकारणं शूद्रस्या- नग्नित्वं, न तद्विद्यास्वधिकारस्यापवादकं लिङ्गम्। न ह्याहवनीयादिरहितेन विद्या

भामती

न्तुकसामर्थ्याभावे सत्यनधिकार इति चेत्, हन्ताधानाभावे सत्यग्न्यभावादग्निसाध्ये कर्मणि मा भूदधि- कारः, न च ब्रह्मविद्यायामग्निः साधनमिति किमित्यनाहिताग्नयो नाधिक्रियन्ते ? न चाध्ययनाभावात- त्साधनायामनधिकारो ब्रह्मविद्यायामिति साम्प्रतम्, यतो युक्तं यदाहवनीये जुहोत्याहवनीयस्य होमाधि- करणतया विधानात्तद्रूपस्यालौकिकत्यानारभ्याधीतवाक्यविहितादाधानदन्यतोऽनधिगमादाधानस्य च द्विजा- तिसम्बन्धितया विधानात् । तत्साध्योऽग्निरलौकिको न शूद्रस्यास्तीति नाहवनीयादिसाध्ये कर्मणि शूद्रस्या- धिकार इति । न च तथा ब्रह्मविद्यायामलोकिकमस्ति साधनं यच्छूद्रस्य न स्यात् । अध्ययननियम इति चेत् । न, विकल्पासहत्वात्—तदध्ययनं पुरुषार्थं वा नियम्येत, यथा धनार्जने प्रतिग्रहादि । क्रत्वर्थं वा, यथा व्रीहीनवहन्तीत्यवघातः । न तावत् क्रत्वर्थं, नहि स्वाध्यायोऽध्येतव्य इति कञ्चित् क्रतुं प्रकृत्य

भामती-व्याख्या

को वञ्चित रहना पड़ता। शूद्र में ब्रह्म-ज्ञान का सामर्थ्य नहीं—यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि सामर्थ्य दो प्रकार का होता है—(१) स्वाभाविक और (२) आगन्तुक (यत्न-साध्य) । श्रवणादि की स्वाभाविक शक्ति शूद्रों में भी वैसी ही हैं, जैसे द्विजाति में। ‘अध्ययन-साध्य वेद-ग्रहणादि की आगन्तुक शक्ति न होने के कारण शूद्रों को ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं’— ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि गुरुमुखाच्चारणानुच्चारणरूप अध्ययन को शक्ति भी स्वाभाविक है, केवल अग्न्याधान के द्वारा अग्निमत्ता नहीं, अतः शूद्र को अग्नि-साध्य यागादि कर्मों में अधिकार न दिया जाय, किन्तु ब्रह्मविद्या में अग्नि का कोई अपेक्षा नहीं, अतः जिन्होंने अग्नि का आधान नहीं किया, ऐसे शूद्रों का ब्रह्म-विद्या में अधिकार क्यों नहीं ? “यदाहवनीये जुहोति” (तं. ब्रा. १।१।१०।५) यह वाक्य होमाधिकरणत्वेन अग्नि का विधान करता है, अतः समस्त कर्मकाण्ड में अनाहिताग्नि का अधिकार नहीं—यह तो ठीक है, क्योंकि यह अग्नि लौकिक अग्नि न होकर दृष्टादृष्ट संस्कारात्मक अलौकिक अग्नि है एवं अनारभ्याधीत [किसी एक कर्म के प्रकरण में पठित न होकर सामान्यतः विहित] होने के कारण समस्त कर्मों का अङ्ग है, [जैसा कि भाष्यकार कहते हैं— “सर्वकर्मार्थं वाधानम्। सर्वकर्मार्थं यदग्नि- द्रव्यम्” (शाबर. पृ. १०३८)। वार्तिककार भी कहते हैं— “अनारभ्यवादेनाहवनीयः सर्व- होमार्थ इति तद्रहितकर्मान्तराभावादाहिताग्नेरधिकारः” (तं. वा. पृ. ७९८) ]। आधान कर्म का विधान भी तीन वर्णों के लिए ही किया गया है—"वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः” (तै. ब्रा. १।१।२।६।७)। इस प्रकार कर्म-कलाप में शूद्र का अधिकार न होने पर भी ब्रह्मविद्या में किसी प्रकार का वैसा अलोकिक पदार्थ अपेक्षित नहीं कि उसमें शूद्र को अधिकार न होता ।

शङ्का—विधिपूर्वक अध्ययन में त्रैवर्णिक का ही अधिकार है और अध्ययन के विना वेदार्थ-ज्ञान सम्भव नहीं, क्योंकि 'अध्ययनेनैवार्थज्ञानं भावयेत्'—इस प्रकार नियम स्वीकार किया जाता है, नियम-जन्य अपूर्व भी वेदार्थानुष्ठान का अङ्ग माना जाता है, शूद्र अध्ययन नहीं कर सकता, अतः वह अध्ययन के नियम से जनित अपूर्व से वञ्चित होने के कारण किसी भी वेदार्थ के अनुष्ठान का अधिकारी नहीं माना जा सकता ।

समाधान—उक्त नियम का आकार क्या (१) अध्ययनेनैव पुरुषार्थं भवेत्—ऐसा है ? अथवा (२) अध्ययनेनैव यागानुष्ठानं भावयेत्—ऐसा ? जैसे “व्रीहीनवहन्ति”—यहाँ पर अवघातेनैव वैतुष्यं भावयेत्—ऐसा नियम माना जाता है, उस नियम से जन्य अदृष्ट के विना