भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४३०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३४

वेदितुं न शक्यते। भवति च लिङ्गं शूद्राधिकारस्योपोद्वलकम्। संवर्गविद्यायां हि

भामती

पठ्यते, यथा दर्शपूर्णमासं प्रकृत्य व्रीहीनवहन्तीति । न चानारभ्याधीतमप्यव्यभिचरितं क्रतुसम्बन्धितया क्रतुमुपस्थापयति, येन वाक्येनेव क्रतुना सम्बध्येताध्ययनं, न हि यथा जुह्वाद्यव्यभिचरितक्रतुसम्बद्धमेवं स्वाध्याय इति। तस्मान्नैव क्रत्वर्थे नियमो नापि पुरुषार्थे । पुरुषेच्छाधीनप्रवृत्तिर्हि पुरुषार्थो भवति, यथा फलं तदुपायो वा । तदुपायेऽपि हि विधितः प्राक् सामान्यरूपा प्रवृत्तिः पुरुषेच्छानिबन्धनेव। इतिकर्तव्यतासु तु सामान्यतो विशेषतश्च प्रवृत्तिर्विधिपराधीनंव। नह्यनधिगतकरणभेद इतिकर्तव्यतासु घटते । तस्माद्विध्यधीनप्रवृत्तितायज्ञानां क्रत्वर्थता । क्रतुरिति हि विधिविषयेण विधि परामृशति विषयिणम् । तेनाथंते विषयीक्रियत इति क्रत्वर्थः । न चाध्ययनं वा स्वाध्यायो वा तदर्थज्ञानं वा प्राग् विधेः पुरुषेच्छाधीनप्रवृत्तियेन पुरुषार्थः स्यात् । यदि चाध्ययनेनैवार्थोवबोधरूपं नियम्येत ततो मानान्तरविरोधः । तद्रूपस्य विनाप्यध्ययनं पुस्तकादिपाठनाप्यधिगमात् । तस्मात्सुवर्णं भार्यमितिवदध्ययनादेश्च फलं कल्पनीयम् । तथा चाध्ययनविधेरनियमकरवाच्छूद्रस्याध्ययनेन वा पुस्तकादिपाठेन वा सामर्थ्यमस्तीति सोऽपि ब्रह्मविद्यायामधिकृतः । मा भूद्धाऽध्ययनाभावात्सर्वत्र ब्रह्मविद्यायामधिकारः, संवर्गविद्यायां तु

भामती-व्याख्या

प्रकृत (दर्शपूर्णमास) कर्म सम्पन्न नहीं होता, क्योंकि "व्रीहीनवहन्ति"-यह वाक्य दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित है, किन्तु "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" (शत. ब्रा. ११।५।६) यह वाक्य किसी क्रतु के प्रकरण में पठित न होने के कारण किसी ऋतु के लिए अध्ययन का नियम नहीं करा सकता। अनारभ्याधीत अध्ययन भी सामान्यतः ऋतु का उपस्थापक हो सकता था, यदि उसका क्रतु के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध होता, किन्तु "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति" (तै. सं. ३।५।७।२) यहाँ जुहू अनारभ्याधीत होने पर भी ऋतु का अव्यभिचरित सम्बन्धी होने कारण क्रतु का जैसे उपस्थापक है, वैसा अध्ययन नहीं।

पुरुषार्थ में भी अध्ययन का नियम नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'पुरुषार्थ' शब्द से वही पदार्थ अभिहित होता है, जिसमें पुरुष की अपनी इच्छा से प्रवृत्ति हो, जैसे—स्वर्गादि फल और उसका साधन यागादि। यागादिरूप साधन में विधि से पूर्व पुरुष की सामान्यतः प्रवृत्ति होती है। यागादि साधन पदार्थ के इतिकर्तव्यभूत (प्रयाजादि अङ्ग-कलापरूप सहायक) व्यापार में तो प्रवृत्ति विधि के पूर्व नहीं, अपितु विधि के अधीन ही होती है, क्योंकि किस व्यापार का कौन साधन (करण) है—इस प्रकार का विशेष ज्ञान जब तक न हो, तब तक इतिकर्तव्य में प्रवृत्ति नहीं होती, वह विशेष ज्ञान विधि वाक्य से ही होता है। अतः अङ्गभूत पदार्थों में विधितः प्रवृत्ति होने के कारण क्रत्वर्थता मानी जाती है। 'क्रत्वर्थता' पद में ऋतु (याग) अपनी विधि का विषय है, अतः विधि के विषयीभूत अङ्ग-कलापरूप विषयों का उपलक्षक है, उसके लिए जो अभ्यर्थित हो, उसे क्रत्वर्थ कहते हैं। अध्ययन या स्वाध्याय अथवा अर्थ-ज्ञान—इनमें से कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं, जिसमें विधि के पूर्व अपनी इच्छा से पुरुष की प्रवृत्ति होती हो, जिससे कि वह पुरुषार्थ कहा जा सके। यदि "अध्ययनेनैवार्थज्ञानं भावयेत्"—ऐसा नियम माना जाता है, तब प्रमाणान्तर से विरोध आता है, क्योंकि वेदार्थ का ज्ञान विधिपूर्वक अध्ययन के बिना अपने-आप पुस्तकों के पढ़ने से भी उपपन्न हो जाता है। फलतः "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस विधि को नियम विधि न मान कर "सुवर्णं भार्यम्" (तै. ब्रा. २।२।४।५) इस विधि के समान अपूर्व विधि मान कर अध्ययन के द्वारा ही अर्थज्ञान-रूप फल की कल्पना करनी होगी। अध्ययन (गुरुमुखोच्चारणानुच्चारण) का स्वाभाविक सामर्थ्य तो शूद्र में भी है, अतः ब्रह्मविद्या में उसका अधिकार क्यों न होगा ?