भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३१

जानश्रुतिं पौत्रायणं शुश्रूषुं शूद्रशब्देन परामृशति—'अह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु' (छा० ४।२।३) इति। विदुरप्रभृतयश्च शूद्रायोनिप्रभवा अपि विशिष्ट-विज्ञानसंपन्नाः स्मर्यन्ते। तस्मादधिक्रियते शूद्रो विद्यास्विति। एवं प्राप्ते ब्रूमः—न शूद्रस्याधिकारः, वेदाध्ययनाभावात्। अधीतवेदो हि विदितवेदार्थो वेदार्थेष्वधिक्रियते। न च शूद्रस्य वेदाध्ययनमस्ति, उपनयनपूर्वकत्वादध्ययनस्य। उपनयनस्य

भामती

भविष्यति। अह हारेत्वा शूद्र इति शूद्रं सम्बोध्य तस्याः प्रवृत्तेः। न चैष शूद्रशब्दः कदाचिदवयवव्युत्पत्त्याऽशूद्रे वर्णनीयः। अवयवप्रसिद्धितः समुदायप्रसिद्धेरनपेक्षतया बलीयस्त्वात्। तस्माद्यथाऽनधीयानस्येष्टौ निषादस्थपतेरधिकारो वचनसामर्थ्यादेवं संवर्गविद्यायां शूद्रस्याधिकारो भविष्यतीति प्राप्तम्।

एवं प्राप्ते ब्रूमः—न शूद्रस्याधिकारो वेदाध्ययनाभावादिति। अयमभिसन्धिः—यद्यपि स्वाध्यायोऽध्येतव्य इत्यध्ययनविधिर्न किञ्चित्फलवत्कर्माभ्याम्नातः, नाप्यव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धपदार्थंगतः, न हि जुह्वादिवत्स्वाध्यायोऽव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धस्तथापि स्वाध्यायस्याध्ययनसंस्कारविधिरध्ययनस्यापेक्षितोपायतामवगमयन् किं पिण्डपितृयज्ञवत् स्वर्गं वा सुवर्णं भार्यमितिवदार्थवादिकं वा फलं कल्पयित्वा विनियोगभङ्गेन स्वाध्यायेनाधीयीतेत्येवमर्थः कल्पतां ? किंवा परम्परयाऽध्यय्यतोऽपेक्षितमधिगम्य निर्वृणोत्विति विषये, न दृष्टद्वारेण परम्परयाऽध्यय्यतोऽपेक्षितप्रतिलम्भे च यथाश्रुतविनियोगोपत्तौ च सम्भवन्त्यां श्रुतविनियोगभङ्गेनाध्ययनादेवाश्रुतादृष्टफलकल्पनोचिता। दृष्टश्च स्वाध्यायाध्ययनसंस्कारस्तेन हि पुरुषेण

भामती-व्याख्या

यदि अध्ययन न होने के कारण सभी प्रकार की ब्रह्म-विद्या में शूद्र का अधिकार नहीं, तब "वायुर्वाव संवर्गः" (छां. ४।३।१) इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित संवर्ग-विद्या में अधिकार अवश्य होना चाहिए, क्योंकि वहाँ "अह हारेत्वा शूद्र ! तवैव सह गोभिरस्तु" (छां. ४।२।३) इस प्रकार रैक्वाचार्य ने जानश्रुति को 'शूद्र' शब्द से सम्बोधित करके कहा है कि 'हे शूद्र ! ये सब 'रथ, काञ्चनमय हार एवं गौएँ तू अपने पास ही रख। यह 'शूद्र' शब्द जो 'शुचा द्रवति'—इत्यादि अवयवार्थ के द्वारा क्षत्रियादि वर्णों का बोधक माना जाता है, वह उचित नहीं, क्योंकि अवयव-शक्ति की अपेक्षा समुदाय (रूढ़) शक्ति प्रबल होती है। फलतः जैसे निषाद-स्थपति को अध्ययनादि के विना ही इष्टि-विशेष में विशेष वचन के आधार पर अधिकार है, वैसे ही संवर्ग-विद्या में शूद्र का अधिकार माना जायगा।

सिद्धान्त—उक्त पूर्व-पक्ष का खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न शूद्रस्याधिकारः, वेदाध्ययनाभावात्"। आशय यह है कि यद्यपि "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—यह अध्ययन-विधि न तो किसी फल के साधनीभूत कर्म के प्रकरण में अधीत है और न अध्ययन का कर्म के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध ही है। तथापि यहाँ एक यह संशय उपस्थित होता है कि क्या यह स्वाध्याय (अपनी शाखा) के अध्ययनरूप संस्कार का विधायक वाक्य अध्ययन में इष्ट-साधनता का बोध कराता हुआ पिण्डपितृयज्ञ अथवा स्वर्ण-धारण-विधि के समान अर्थवाद-प्रतिपादित स्वर्गादि फलों की कल्पना करके अध्ययनेन स्वाध्यायः संस्कार्यः'—ऐसा विनियोग भङ्ग करते हुए 'स्वाध्यायेनाधीयीत'—इस प्रकार के साध्य-साधनभाव का गमक माना जाय ? अथवा परम्परा या अन्य युक्तियों के द्वारा अवगत पदार्थ को ही अपना कर निराकाङ्क्ष हो जाय ? अक्षरावाप्ति पदार्थ-व्युत्पत्त्यादि परम्परा के द्वारा पदार्थ-ज्ञानरूप दृष्ट फल का लाभ जब अध्ययन से हो जाता है, तब अध्ययन का स्वर्गादिरूप अदृष्ट फल नहीं माना जा सकता एवं जब "अध्ययनेन स्वाध्यायं भावयेत्"—ऐसा यथाश्रुत साध्य-साधनभाव उपपन्न हो जाता है, तब इस विनियोग का भङ्ग करना भी उचित नहीं। अध्ययन-संस्कार दृष्टफलक इसलिए है

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