भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३४ |
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च वर्णत्रयविषयत्वात्। यत्त्वर्थित्वं न तदसति सामर्थ्येऽधिकारकारणं भवति। सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकारकारणं भवति, शास्त्रीयेऽर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्यापेक्षितत्वात्, शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्याध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात्। यच्चेदं 'शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः' इति 'तन्न्यायपूर्वकत्वाद्विद्यायामप्यनवक्लृप्तत्वं द्योतयति,
भामती
सम्प्राप्यते प्राप्तश्च फलवत्कर्मब्रह्मावबोधमभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनमुपजनयति, न तु सुवर्णधारणादौ दृष्टद्वारेण परम्परयाप्यस्त्यपेक्षितं पुरुषस्य, तस्माद्विपरिवृत्त्य साक्षाद्धारणादेव विनियोगभङ्गेन फलं कल्प्यते । यदा चाध्ययनसंस्कृतेन स्वाध्यायेन फलवत्कर्मब्रह्मावबोधो भाव्यमानोऽभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजन इति स्थापितं तदा यस्याध्ययनं तस्यैव कर्मब्रह्मावबोधोऽभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनो नान्यस्य, यस्य चोपनयनसंस्कारस्तस्यैवाध्ययनं, स च द्विजातीनामेवेत्युपनयनाभावेनाध्ययनसंस्काराभावात् पुस्तकादिपठितस्वाध्यायजन्योऽर्थावबोधः शूद्राणां न फलाय कल्पत इति शास्त्रीयसामर्थ्याभावान्न शूद्रो ब्रह्मविद्यायामधिकृत इति सिद्धम् ।
❀ यज्ञेऽनवक्लृप्तः ❀ इति यज्ञग्रहणमुपलक्षणार्थम् । विद्यायामप्यनवक्लृप्त इत्यपि द्रष्टव्यम् ।
भामती-व्याख्या
कि उसके द्वारा पुरुष की अपनी शाखा प्राप्त होती है । [(१) उत्पत्ति, (२) विकृति, (३) संस्कृति और (४) आप्ति—इन चार प्रकारों के जनक कर्म संस्कार कर्म हैं—जैसे आधान संस्कार से अग्नि की उत्पत्ति, अवघात से व्रीहि की विकृति होती है और प्रोक्षण कर्म से व्रीहि संस्कृत होते हैं। वैसे ही अध्ययन संस्कार से स्वाध्याय (अपनी शाखा) की आप्ति (प्राप्ति या कण्ठस्थता) होती है]। प्राप्त स्वाध्याय अभ्युदय के हेतुभूत कर्म (धर्म) के ज्ञान और निःश्रेयस के साधनीभूत ब्रह्म-ज्ञान को जन्म देता है। सुवर्ण-धारणादि कर्म किसी दृष्ट फल के द्वारा पुरुषार्थ का उत्पादन परम्परा भी नहीं करते, अतः 'धारणेन सुवर्णं भावयेत्' ऐसा यथाश्रुत विनियोग भङ्ग करके 'सुवर्णधारणेन भ्रातृव्यस्य दुर्वर्णत्वं भावयेत्'—ऐसा साध्य-साधनभाव माना जाता है, किन्तु प्रकृत में उसकी कोई आवश्यकता नहीं [ "सुवर्णं हिरण्यं भार्यम्" तस्माद् दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवति" (तै. ब्रा. २।२।४।६) इस वाक्य के विषय में सन्देह किया गया है कि इस वाक्य के द्वारा विहित सुवर्ण-धारण क्या क्रत्वर्थ है? अथवा पुरुषार्थ? सिद्धान्त-सूत्र है—"अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात्" (जै. सू. ३।४।२०)। अर्थात् उक्त वाक्य किसी कर्म के प्रकरण में नहीं अप्रकरण-पठित (अनारभ्याधीत) है, अतः कर्म के प्रकरण में पठित वाक्य की अपेक्षा इस अनारभ्याधीत वाक्य का यह अन्तर है कि इसके द्वारा विहित सुवर्ण-धारण क्रत्वर्थ नहीं, अपितु पुरुषार्थ है, फलतः आर्थवादिक भ्रातृव्य (शत्रु) की दुर्वर्णता ही सुवर्ण-धारण का फल है, जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"तस्माद् दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवतीत्येवमादिना एवंजातीयकानां फलेन सम्बन्धः" (शाबर. पृ. ९५५)]।
जब कि 'अध्ययन के द्वारा संस्कृत (प्राप्त) स्वाध्याय अभ्युदयफलक कर्मावबोध और निःश्रेयसफलक ब्रह्मावबोध का साधन है'—ऐसा स्थापित (निर्णीत) हो गया, तब जिस व्यक्ति ने अध्ययन किया है, उसी को अभ्युदयार्थक कर्मावबोध और निःश्रेयसार्थक ब्रह्मावबोध होगा, अन्य को नहीं। अध्ययन वही कर सकता है, जिसका उपनयनसंस्कार हो गया हो, उपनयन संस्कार केवल त्रैवर्णिक पुरुषों का ही विहित है, अतः उपनयन और अध्ययन से वञ्चित शूद्रों को जो अपने-आप पुस्तकादि के पढ़ लेने मात्र से अर्थावबोध होता है, वह अभीष्ट फल नहीं दे सकता। इस प्रकार आगन्तुक शास्त्रीय सामर्थ्य न होने के कारण शूद्र ब्रह्म-विद्या का अधिकारी नहीं माना जा सकता—यह सिद्ध हो गया।