भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३३

न्यायस्य साधारणत्वात् । यत्पुनः संवर्गविद्यायां शूद्रशब्दश्रवणं लिङ्गं मन्यसे, न तल्लिङ्गं, न्यायाभावात् । न्यायोक्ते हि लिङ्गदर्शनं द्योतकं भवति । न चात्र न्यायोऽस्ति । कामं चायं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात्, तद्विषयत्वात्, न

भामती

सिद्धवदभिधानस्य न्यायपूर्वकत्वात् न्यायस्य चोभयत्र साम्यात् । द्वितीयं पूर्वपक्षमनुभाषते ॐ यत् पुनः संवर्गविद्यायाम् इति ॐ । दूषयति ॐ न तल्लिङ्गम् ॐ । कुतः ? ॐ न्यायाभावात् ॐ । न तावच्छूद्रः संवर्गविद्यायां साक्षाच्चोद्यते : यथैतया निषादस्थपतिं याजयेदिति निषादस्थपतिः किन्तु अर्थवादवगतोऽयं शूद्रशब्दः स चान्यतः सिद्धमर्थमवद्योतयति न तु प्रापयतीत्यध्वरमीमांसकाः । अस्माकं त्वन्यपरादपि वाक्यादसति बाधके प्रमाणान्तरेणार्थोऽवगम्यमानो विधिना चापेक्षितः स्वीक्रियत एव । न्यायश्चास्मिन्नर्थे उक्तो बाधकः । न च विध्यपेक्षाऽस्ति, द्विजात्यधिकारप्रतिलम्भेन विधेः पर्यवसानात् । विध्युद्देशगतत्वे त्वयं न्यायोऽपोद्यते वचनबलान्निषादस्थपतिवन्न त्वेष विध्युद्देशगत इत्युक्तम् । तस्मान्नार्थवादमात्राच्छूद्राधिकारसिद्धिरिति भावः । अपि च किमर्थवादबलाद्विद्यामात्रेऽधिकारः शूद्रस्य कल्प्यतां संवर्गविद्यायां वा ? न तावद्विद्यामात्र इत्याह ॐ कामं चायम् इति ॐ । न हि संवर्गविद्यायामर्थवादः श्रुतो विद्यामात्रेऽधिका-

भामती-व्याख्या

“तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनबक्लृप्तः (असमर्थः)” (तै. सं. ७।१।१।६) इस वाक्य में ‘यज्ञ’ शब्द ब्रह्म-विद्या का भी उपलक्षक है, अतः ‘ब्रह्मविद्यायामनवक्लृप्तः’—ऐसा निषेध-वाक्य भी सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि शूद्र की यज्ञानवक्लृप्ति का नियामक जो हेतु है—सामर्थ्याभाव, वह कर्म-विद्या और ब्रह्म-विद्या—दोनों में समान है ।

द्वितीय पूर्वपक्ष का अनुवाद किया जा रहा है—“यत्पुनः संवर्गविद्यायां शूद्रशब्दश्रवणं लिङ्गं मन्यसे”। इस पूर्व पक्ष का भी खण्डन किया जाता है—“न तल्लिङ्गम्, न्यायाभावात्”। दृष्टान्त-साधक युक्ति का दार्ष्टान्त में अभाव है, क्योंकि निषादस्थपति-इष्टि में निषादस्थपति का “एतया निषादस्थपतिं याजयेत्” (मै. सं. २।२।४) इस विधि के द्वारा साक्षात् विधान किया गया है [ “वास्तुमध्ये रौद्रं चरुं निर्वपेद्, यत्र रुद्रः प्रजाः शमयेत्”—इस वाक्य के द्वारा विहित रौद्र इष्टि के प्रकरण में कहा गया है—“एतया निषादस्थपतिं याजयेत्”। “स्थपतिर्निषादः स्यात्, शब्दसामर्थ्यात्” (जै. सू. ६।१।५१) इस सूत्र के द्वारा सिद्धान्त स्थापित किया गया है कि निषाद नाम की शूद्र जाति का स्थपति (राजमिस्त्री) उस इष्टि का अधिकारी है ] । संवर्ग-विद्या के प्रकरण में किसी शूद्र का विधि वाक्य प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होता, किन्तु अर्थवाद वाक्य में ‘शूद्र’ शब्द आया है । वह अन्य प्रमाण से ज्ञात पदार्थ का अवद्योतनमात्र (अनुवादमात्र) करता है, अज्ञात-ज्ञापक या विधायक नहीं—ऐसा धर्म-मीमांसकों का मत है । हमारा (ब्रह्म-मीमांसकों का) यह कहना है कि अन्यार्थक वाक्य के द्वारा अवगत वह पदार्थ भी विधि वाक्य के द्वारा स्वीकृत होता है, जिसका कोई बाधक प्रमाण उपलब्ध न हो । प्रकृत में वैसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि विधि-वाक्य द्विजातिरूप अधिकारियों को लेकर पर्यवसित हो जाता है । यदि साक्षात् विधि वाक्य में ‘शूद्र’ शब्द का उल्लेख होता, तब प्रत्यक्ष वचन के द्वारा निसर्ग-सिद्ध द्विजाति के अधिकार का अपवाद हो सकता था किन्तु वैसा प्रकृत में कोई वाक्य उपलब्ध नहीं, केवल एक अर्थवाद के आधार पर शूद्राधिकार की सिद्धि नहीं हो सकती ।

यह भी यहाँ जिज्ञासा होती है कि उक्त अर्थवाद के बल पर समस्त विद्याओं में शूद्राधिकार की कल्पना की जाती है? अथवा केवल संवर्ग-विद्या में? प्रथम कल्प का निरास किया जाता है—“कामं चायं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात्, तद्विषयत्वात्,

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