भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४३४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. सू. ३४ |
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सर्वासु विद्यासु। अर्थवादस्थत्वात्तु न क्वचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते। शक्यते चायं शूद्रशब्दोऽधिकृतविषयो योजयितुम्। कथमित्युच्यते? 'कंवर एनमेतत्सन्तं सयुग्वान-
भामती
रिणमुपनयति, अतिप्रसङ्गात्। अस्तु तर्हि संवर्गविद्यायामेव शूद्रस्याधिकार इत्यत आह ॐ अर्थवादस्थत्वाद् इति ॐ। तत्किमेतच्छूद्रपदं प्रमत्तगीतं, न चैतद् युक्तं तुल्यं हि साम्प्रदायिकमित्यत आह। ॐ शक्यते चायं शूद्रशब्द इति ॐ। एवं किलात्रोपाख्यायते- जानश्रुतिः पौत्रायणो बहुदायी श्रद्धादेयो बहुपाक्यः प्रियातिथिर्बभूव। स च तेषु तेषु ग्रामनगरशृङ्गाटरेषु विविधानामन्नपानानां पूर्णानितिथिम्य आवसथान् कारयामास। सर्वत एत्येतेष्वावसथेषु ममान्नपानमर्थिन उपयोग्क्ष्यन्त इति। अथास्य राज्ञो दानशौण्डस्य गुणगरिमसन्तोषिताः सन्तो देवर्षयो हंसरूपमास्थाय तदनुग्रहाय तस्य निदाघसमये दोषा हर्म्यतलस्थस्योपरि मालामाबध्याजग्मुस्तेषामग्रेसरं हंसं सम्बोध्य पृष्ठतो व्रजन्नेकतमो हंसः साद्भुतमभ्युवाच। भल्लाक्ष! भल्लाक्ष! जानश्रुतेरस्य पौत्रायणस्य द्युलोक आयतं ज्योतिस्तन्मा प्रसाङ्क्षीर्मैतस्त्वा धाक्षीदिति। तमेवमुक्तवन्तमग्रगामी हंसः प्रत्युवाच--कं वर! एनमेतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ। अयमर्थः-वर इति सोपहासमवरमाह। अथवा वरो वराकोऽयं जानश्रुतिः। कमित्याक्षेपे, यस्मादयं वराकस्तस्मात्कमेनं किम्भूतमैतत् सन्तं प्राणिमात्रं रैक्वमिव सयुग्वानमात्थ। युग्वा गन्त्री शकटी तया सह
भामती-व्याख्या
न सर्वासु विद्यासु”। उक्त अर्थवाद वाक्य केवल संवर्ग-विद्या में श्रुत है, अतः समस्त विद्याओं में अधिकार का प्रयोजक नहीं हो सकता, अन्यथा अतिप्रसङ्ग उपस्थित होता है। वस्तुतः उक्त वाक्य अर्थवाद होने के कारण संवर्ग-विद्या में भी शूद्राधिकार का विधायक नहीं हो सकता—“अर्थवादत्वात्तु न क्वचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते।” यहाँ ‘शूद्र’ शब्द यदि किसी विद्या में भी शूद्र के अधिकार का नियामक नहीं हो सकता, तब क्या यह निरर्थक और प्रमत्त-गीतमात्र है? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है—‘शक्यते चायं शूद्रशब्दोऽधिकृतविषयो योजयितुम्’। छान्दोग्योपनिषत् में ऐसा उपाख्यान आया है कि पुत्रनाम के राजा का पौत्र और जनश्रुति का पुत्र जानश्रुति राजा था, जो ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दान एवं अतिथियों का भोजनादि से पूर्ण सत्कार किया करता था। उसने अपने राज्य के नगरों और गाँवों के चौराहों पर अतिथियों के लिए विविध अन्न-पानादि से परिपूर्ण धर्मशालाएं बनवाई थीं। अन्न-पानार्थी सभी ओर से आकर उन धर्मशालाओं में अन्न-पानादि का पूर्ण उपयोग किया करते थे। उस दानवीर राजा के सद्गुणों से सन्तुष्ट होकर देवता और ऋषिगण हंसों का रूप धारण कर राजा को अनुगृहीत करने के लिए जब वह गर्मियों के समय रात्रि में अपने महल की खुली छत पर सो रहा था, तब आकाश मार्ग से ऊपर-ऊपर उड़ते जा रहे थे। उन हंसों की पंक्ति के आगे उड़नेवाले हंस को पीछे उड़नेवाले हंस ने कहा भो भल्लाक्ष ! [‘भल्लाक्ष’ शब्द का मूल शब्द है-भद्राक्ष, जिसका अर्थ होता है—स्वस्थनेत्रवाला। यहाँ कटाक्षपूर्ण उक्ति या विपरीत-लक्षणा से अन्धे व्यक्ति का बोधक है, इस प्रकार अग्रगामी हंस को पृष्ठगामी हंस कहता कि हे अन्धे ! ] सामने यह जो द्युलोक को छूता हुआ ज्योतिःस्तम्भ दिखाई दे रहा है, यह महाराज जानश्रुति का यशःपुञ्ज है, इसके बीच से मत निकलना नहीं तो भस्मीभूत हो जाओगे। इसके उत्तर में अग्रगामी हंस ने पृष्ठगामी हंस को कहा—‘कंवर ! एनमेतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति” [ ‘वर’ शब्द भी ‘भल्लाक्ष’ शब्द के समान कटाक्षपूर्ण सम्बोधन या विपरीत-लक्षणा के द्वारा अवर या ‘नीच’ अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अग्रगामी हंस पृष्ठगामी को वैसा ही उत्तर देता है कि ‘हे नीच हंस !] किस ऐसे साधारण राजा की बात करता है? तूने क्या इसे शकट (बैलगाड़ी) पर चलनेवाला