भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मज्ञाने शूद्रानधिकारः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ४३५
मिव रैकमात्थ' ( छा० ४।१।३ ) इत्यस्माद्धंसवाक्यादात्मनोऽनादरं श्रुतवतो जानश्रुतेः पौत्रायणस्य शुगुत्पेदे, तामृषी रैकः शूद्रशब्देनानेन सूचयां बभूवात्मनः परोक्षज्ञताख्या-
भामती
वर्तत इति सयुग्वा रैकवस्तमिव कमेनं प्राणिमात्रं जानश्रुतिमात्थ । रैकवस्य हि ज्योतिरसहानं न त्वेतस्य प्राणिमात्रस्य । तस्य हि भगवतः पुण्यज्ञानसम्पन्नस्य रैकवस्य ब्रह्मविदो धर्मे त्रैलोक्योदरवर्तिप्राणभृन्मात्रधर्मोऽन्तर्भवति न पुनारैकवधर्मकक्षां कस्यचिद्धर्मोऽवगाहत इति । अथैष हंसवचनादात्मनोऽत्यन्तनिकर्षमुत्कर्षकाष्ठां च रैकवस्योपश्रुत्य विषण्णमानसो जानश्रुतिः कितव इवाक्षपराजितः पौनःपुन्येन निःश्वसन्नुद्वेलं कथमपि निशीथमतिवाहयाम्बभूव । ततो निशान्तपिशुनमनुभूतवन्दारुवृन्दप्रारब्धस्तुतिसहस्रसंवलितं मङ्गलतूर्यनिर्घोषमाकर्ण्य तल्पतलस्थ एव राजेकपदे यन्तारमाहूयाविवेश-वयस्य रैकवाह्वयं ब्रह्मविद्वमेकरतिं सयुग्वानमतिविविक्तेषु तेषु येषु विपिननगनिकुञ्जनदीपुलिनादिप्रदेशेष्वन्विष्य प्रयत्नतोऽस्मभ्यमाचक्ष्वेति । स च तत्रान्विष्यन् क्वचिदतिविविक्ते देशे शकटस्याधस्तात् पामानं कण्डूयमानं ब्राह्मणायनमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा च रैक्वोऽयं भवितेति प्रतिभावानुपविश्य सविनयमप्राक्षीत् त्वमसि हे भगवन् सयुग्वा रैकव इति । तस्य च रैकवभावानुमतिं च तेस्तेरिङ्गतैर्ज्ञातेर्गाहस्थ्येच्छां धनायां चोन्नीय यन्ता राज्ञे निवेदयामास । राजा तु तं निशम्य गवां षट्शतानि निष्कं च हारं चाश्वतरीरथं चादाय सत्वरं रैकवं प्रतिचक्रमे । गत्वा चाभ्युवाव हे रैकव गवां षट्शतानीमानि निष्कञ्च हारश्चायमश्वतरीरथ एतदादत्स्व, अनुशाधि मां भगवन्निति । अथैवमुक्तवन्तं प्रति साटोपं च सस्पृहं चोवाच रैकवः—अह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिर-
भामती-व्याख्या
महातेजस्वी रैक ऋषि समझ लिया है ? यह रैक कैसे हो सकता है ? कहाँ वह ब्रह्मवेत्ताओं का आदर्श महापुरुष पुण्यात्मा महात्मा रैकव और कहाँ यह एक साधारण राजा ? वस्तुतः आज महर्षि रैकव के यशः सूर्य की एक रश्मि की भी बराबरी किसी का यशःपुञ्ज नहीं कर सकता। अग्रगामी हंस की उक्ति के द्वारा जानश्रुति ने अपना अपकर्ष और रैकव का उत्कर्ष सुना, असह्य आघात से जानश्रुति का मन आहत हो गया, रातभर, नींद नहीं आई, बड़े-बड़े निःश्वासों और फूत्कारों के साथ करवटें बदल-बदल कर किसी प्रकार रात बिताई । रात बीतने की सूचना देनेवाले बन्दी और चारणगणों के द्वारा उच्चारित विरुदावलियों के घोष से मिश्रित प्रभाती स्वर-लहरियों को सुन कर राजा ने विस्तरे पर बैठे-ही-बैठे एकदम सारथी या धावक को बुलाकर आदेश दिया कि मित्रवर ! रैकव नाम के शकट-धारी (बैलगाड़ीवाले) ब्रह्म-वेत्ता को वन की सघन झाड़ियों, पर्वत-कन्दराओं, नदी के बालुकामय आदि एकान्त प्रान्तों में खोज कर हमें बताओ । सारथि ने खोजते-खोजते देखा कि एक व्यक्ति निर्जन स्थान पर बैलगाड़ी के नीचे बैठा अपने शरीर की खाज खुजाता है । उस ब्राह्मण को देखा 'यही रैकव होगा'—ऐसी सम्भावना कर के सारथि ने बैठ कर विनयपूर्वक पूछा—हे भगवन् ! शकटधारी रैकव आप ही हैं ? प्रश्नोत्तर एवं चिह्न-चक्रों से यही, रैकव है'—ऐसा जान लिया और प्रसङ्गतः यह भी जानकारी प्राप्त कर ली कि रैकव की गृहस्थ बनने की लालसा एवं धनाया [ “अशनायोदन्यधनायाबुभुक्षापिपासागधेषु” ( पा. सू. ७।४।३४ ) इस सूत्र के द्वारा निष्पन्न 'धनाया' शब्द का अर्थ—धनिक बनने की इच्छा ] है । सारथि ने अपनी यह समस्त जानकारी महाराज को दे दी । राजा ने वह सब सुना और छः सौ गौएँ, एक निष्क ( सोने का कण्ठा ), एक मोतियों का हार, खच्चर-जुता रथ —यह भेंट-पूजा की सामग्री लेकर रैकव की ओर प्रस्थान किया । वहाँ पहुँच कर रंकव से प्रार्थना की—हे रैकव ! ये छः सौ गौएँ, एक निष्क, एक हार और खच्चरवाही रथ आप स्वीकार करें और हमें ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश करें । रैकव ने उत्तर दिया— “अह हारेत्वा शूद्र ! तवैव सह गोभिरस्त्विति”