भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 454
४३६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३४

पनायेति गम्यते, जातिशूद्रस्यानधिकारात् । कथं पुनः शूद्रशब्देन शुगुत्पन्ना सूच्यत इति ? उच्यते—तदाद्रवणात् । शुचमभिदुद्राव, शुचा वाऽभिदुद्रुवे, शुचा वा रैक-मभिदुद्रावेति शूद्रः, अवयवार्थसंभवादूढार्थस्य चासंभवात् । दृश्यते चायमर्थोऽस्यामा-ख्यायिकायाम् ॥ ३४ ॥

भामती

स्त्विति । अहेति निपातः साटोपमामन्त्रणे । हारेण युक्ता इत्वा गन्त्री रथो हारेत्वा गोभिः सह तवैवास्तु किमेतन्मात्रेण मम धनेनाकल्पवर्तिनो गार्हस्थ्यस्य निर्वाहानुपयोगिनेति भावः । अहर् त्वेति तु पाठोऽन-र्थकतया च गोभिः सहेत्यत्र प्रतिसम्बन्ध्यनुपादानेन चाचार्यैर्दूषितः । तदस्यामाख्यायिकायां शक्यः शूद्रशब्देन जानश्रुती राजन्योऽप्यवयवव्युत्पत्त्या वक्तुं, स हि रैकवः परोक्षज्ञतां चिख्यापयिषुरातमनो जान-श्रुतेः शूद्रेति शुचं सूचयामास । ❖ कथं पुनः शूद्रशब्देन शुगुत्पन्ना सूच्यत इति ❖ । उच्यते ? ❖तदाद्रव-णात्❖ । तद्व्याचष्टे ❖शुचमभिदुद्राव❖ जानश्रुतिः । शुचं प्राप्तवानित्यर्थः । ❖ शुचा वा ❖ जानश्रुतिः । ❖दुद्रुवे❖ शुचा प्राप्त इत्यर्थः । अथवा शुचा रैकवं जानश्रुतिर्दुद्राव, गतवान् । तस्मात्तदाद्रवणादिति तच्छ-ब्देन शुग्वा जानश्रुतिर्वा रैक्वो वा परामृश्यत इत्युक्तम् ॥ ३४ ॥

भामती-व्याख्या

( छां. ४।१।३ ) । अर्थात् हे शोकातुर राजन् ! यह निष्कादि समस्त सामग्री आप के पास ही रहे । यहाँ 'अह' शब्द गर्वपूर्वक सम्बोधन में प्रयुक्त हुआ है । हारेत्वा ( 'हारेण युक्ता इत्वा इत्वरी' अर्थात् हारादि के साथ यह रथ और गौएँ हम ( जानश्रुति ) इनको लेकर क्या करेंगे ? गृहस्थ जीवन का निर्वाह इतने से नहीं हो सकता । उक्त श्रुति-वाक्य में जो कहीं 'अहरेत्वा'—ऐसा पाठ उपलब्ध होता है । वहाँ यद्यपि 'अह' और 'रे' दोनों पद सम्बोधनार्थ-कत्वेन सार्थक हैं, तथापि 'त्वा' पद अनर्थक होने के कारण उक्त श्रुति-वाक्य के भाष्य में भाष्यकार के द्वारा निरस्त कर दिया गया है। दूसरी बात यह भी है कि 'गोभिः'—यह पद भी प्रतिसम्बन्धी का ग्रहण न होने से साकांक्ष रह जाता है और जब वहाँ 'अह हारेत्वा'—ऐसा पाठ मानकर रथार्थक स्त्रीलिङ्ग 'इत्वा' पद का छेद किया जाता है, तब 'गोभिः सह इत्वा तवैव'—ऐसा अन्वय सम्पन्न हो जाने से 'गोभिः' पद साकाङ्क्ष भी नहीं रह जाता । [ इस समय उक्त श्रुति-वाक्य के उस भाष्य की आनुपूर्वी ऐसी उपलब्ध होती है—"अहेत्ययं निपातो विनिग्रहार्थीयोऽन्यत्र इह त्वनर्थकः, एवशब्दस्य पृथक्प्रयोगात्" ( छां. भा. पृ. २०२ ) । अर्थात् 'अह' शब्द तिरस्कारपूर्वक सम्बोधन में अन्यत्र प्रयुक्त होकर सार्थक माना जाता है, किन्तु यहाँ वह अनर्थक है, क्योंकि रैकव ने जो कह दिया है—तवैव । वहाँ एवकार के प्रयोग से ही जानश्रुति का तिरस्कार सिद्ध हो जाता है ] ।

इस उपाख्यान में यद्यपि जानश्रुति क्षत्रिय है, तथापि अवयवार्थ को लेकर 'शूद्र' शब्द के द्वारा अभिहित किया जा सकता है, क्योंकि वह रैकव अपनी परोक्षज्ञता को प्रकट करने के लिए जानश्रुति के शोक की सूचना 'शूद्र' पद के द्वारा देता है । जानश्रुति के हृदय में उत्पन्न शोक 'शूद्र' पद के द्वारा कैसे सूचित होता है ? इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है—"तदाद्रव-णात्" । उसकी व्याख्या है—"शुचमभिदुद्राव जानश्रुतिः" । अभिदुद्राव का अर्थ है—प्राप्तवान् । या 'शुचा दुद्रुवे जानश्रुतिः' अर्थात् शोक के द्वारा अभिभूत हुआ । अथवा 'शुचा दुद्राव' शोक-सन्तप्त जानश्रुति रैकव की शरण में गया । इस प्रकार सूत्रकार ने "तदाद्रवणात्"—यहाँ 'तत्' पद के द्वारा शुक् ( शोक ) या जानश्रुति अथवा रैकव का ग्रहण किया है । [ "शुचेर्दश्च" ( उणा. २।१९ ) इस सूत्र के द्वारा 'शुच शोके' धातु से 'रक्' प्रत्यय, चकार को दकार का आदेश एवं उकार को दीर्घ करने पर 'शूद्र' शब्द की निष्पत्ति पाणिनि ने मानी है, जिसका