भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४२८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३४ |
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( ९ अपशूद्राधिकरणम् । सू० ३४—३८ )
शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ॥ ३४ ॥
यथा मनुष्याधिकारनियममपोद्य देवादीनामपि विद्यास्वधिकार उक्तस्तथैव द्विजात्यधिकारनियमस्यापवादेन शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादित्येतामाशङ्कां निवर्तयितुमिदमधिकरणमारभ्यते । तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादिति तावत्प्राप्तम्, अर्थित्वसामर्थ्ययोः संभवात्, 'तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः' ( तै० सं० ७।१।१।६ ) इतिवत् 'शूद्रो
भामती
कृषिकर्मण इव तत्तदवान्तरव्यापारस्य सस्याधिगमसाधनत्वम् । आग्नेयादीनामिवोत्पत्तिपरमापूर्वावान्तरव्यापाराणां भवन्मते स्वर्गसाधनत्वम् । तस्मात् कर्मणोऽपूर्वावान्तरव्यापारस्य वा देवताप्रसादावान्तरव्यापारस्य वा फलवत्त्वात् प्रधानत्वमुभयस्मिन्नपि पक्षे समानम्, न तु देवताया विग्रहादिमत्त्वात् प्राधान्यमिति न धर्ममीमांसायाः सूत्रमपि वा शब्दपूर्वत्वाद्यज्ञकर्म प्रधानं गुणत्वे देवताश्रुतिरिति विरुध्यते । तस्मात्सिद्धो देवतानां प्रायेण ब्रह्मविद्यास्वधिकारः ॥ ३३ ॥
अवान्तरसङ्गतिं कुर्वन्नधिकरणतात्पर्यमाह ॐ यथा मनुष्याधिकार इति ॐ । शङ्काबीजमाह ॐ तत्र इति ॐ । निर्मृष्टनिखिलदुःखानुषङ्गे शाश्वतिक आनन्दे कस्य नाम चेतनस्यार्थिता नास्ति, येनार्थिताया अभावाच्छूद्रो नाधिक्रियेत । नाप्यस्य ब्रह्मज्ञाने सामर्थ्याभावः । द्विविधं हि सामर्थ्यं निजं चागन्तुकं च । तत्र द्विजातीनामिव शूद्राणां श्रवणादिसामर्थ्यं निजमप्रतिहतम् । अध्ययनाधानाभावादाग-
भामती-व्याख्या
जैसे कृषिरूप कर्म और हलाकर्षणादि अवान्तर व्यापार के द्वारा सस्याधिगम ( अन्नोत्पत्ति ) का जनक होता है अथवा जैसे आप ( मीमांसकों ) के मत में दर्शपूर्णमाससंज्ञक आग्नेयादि छः कर्म उत्पत्ति अपूर्व और परमापूर्व के द्वारा स्वर्गरूप फल के जनक माने जाते हैं। वैसे ही हमारे ( वेदान्तियों के ) मत में यागरूप कर्म देवता-प्रसन्नता के द्वारा अपने फल का साधन माना जाता है, फलतः दोनों मतों में कर्म की फलोत्पादकता और प्रधानता समानरूप से सुरक्षित है, देवता की प्रधानता यहाँ भी नहीं मानी जाती, अतः पूर्व मीमांसा के "अपि वा शब्दपूर्वत्वाद यज्ञकर्म प्रधानं गुणत्वे देवताश्रुतिः" ( जै. सू. ९।१।९ ) इस सूत्र का किसी प्रकार का भी विरोध उपस्थित नहीं होता । [ "देवता वा प्रयोजयेदतिथिवद् भोजनस्य तदर्थत्वात्" ( जै. सू. ६।१।१६ ) इस सूत्र के द्वारा देवता को कर्म का प्रयोजक मान कर प्रधानता देने की आशङ्का उठाई गई, उसका निराकरण करते हुए सूत्रकार ने कहा—"अपि वा शब्दपूर्वत्वाद यज्ञकर्म प्रधानं स्याद् गुणत्वे देवताश्रुति"। अर्थात् "यजेत स्वर्गकामः"—इस शब्द के द्वारा याग को ही स्वर्गरूप फल का जनक अत एव प्रधान माना गया है, देवतादि अन्य पदार्थ उसी कर्म के अङ्ग या गुण माने जाते हैं। इस सिद्धान्त का विरोध यहाँ तब होता, जब कि देवता को फल का जनक एवं प्रधान माना जाता ]। यहाँ तो केवल इतना सिद्ध किया जाता है कि देवताओं का विशुद्ध ब्रह्म-विद्या में पूर्ण अधिकार है ॥ ३३ ॥
संगति— पूर्वाधिकरण से इस अधिकरण की संगति दिखाते हुए इस अधिकरण का प्रयोजन प्रस्तुत किया जाता है—"यथा मनुष्याधिकारनियममपोद्य"।
पूर्वपक्ष— ब्रह्म-विद्या में शूद्रों का अधिकार है—"तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यात्" । दुःख का सम्बन्ध जिसमें लेशमात्र भी नहीं, ऐसे विशुद्ध शाश्वतिक आनन्द की कामना किस चेतन पुरुष को नहीं होती ? यदि वह शूद्र में न होती, तब अवश्य ब्रह्मविद्या के अधिकार से शूद्र