भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवताया ब्रह्मविद्यायामधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२७
योगोऽप्यणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिफलः स्मर्यमाणो न शक्यते साहसमात्रेण प्रत्याख्यातुम्। श्रुतिश्च योगमाहात्म्यं प्रख्यापयति—‘पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्’ (श्वे० २।१२) इति । ऋषीणामपि मन्त्रब्राह्मणदर्शिनां सामर्थ्यं नास्मदीयेन सामर्थ्येनोपमातुं युक्तम्। तस्मात्समूलमितिहासपुराणम्। लोकप्रसिद्धिरपि न सति संभवे निरालम्बनाऽध्यवसातुं युक्ता। तस्मादुपपन्नो मन्त्रादिभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमः। ततश्चार्थित्वादिसंभवादुपपन्नो देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामधिकारः। क्रममुक्तिदर्शना-न्यप्येवमेवोपपद्यन्ते ॥ ३३ ॥
भामती
वादादिसिद्धे देवताविग्रहादौ गुर्वादिपूजावद् देवतापूजात्मको यागो देवताप्रसादाद्वाऽद्वारेण सफलोऽवकल्पते अचेतनस्य तु पूजामप्रतिपाद्यमानस्य तदनुपपत्तिः। न चैवं यज्ञकर्मणो देवतां प्रति गुणभावाद् देवतात् फलोत्पादे यागभावनायाः श्रुतं फलवत्त्वं यागस्य च तां प्रति तत्फलांशं वा प्रति श्रुतं करणत्वं हातव्यम्। यागभावनाया एव हि फलवत्या यागलक्षणस्वकरणावान्तरव्यापारत्वाद् देवताभोजनप्रसादादीनां
भामती-व्याख्या
के साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे। वह अत्यन्त युक्ति-संगत है। शेष भाष्य अत्यन्त सुबोध है।
इस प्रकार मन्त्र और अर्थवादादि के द्वारा देवता के विग्रहादि-पञ्चक की सिद्धि हो जाने पर गुरु आदि के समान ही देवताओं की विधिवत् जो पूजा की जाती है वही याग है। उससे देवगण प्रसन्न होकर यजमान को फल देते हैं। शब्दात्मक जड़ देवता की पूजा से वह सफलता उपपन्न नहीं हो सकती।
शङ्का— यदि देवता अपनी यागरूप पूजा से प्रसन्न होकर फल देता है, तब देवता प्रधान और पूजारूप याग अङ्ग (गौण) हो जाता है, अतः ‘यजेत स्वर्गकामः’—यहाँ यागकरणक भावना में जो फल-वत्त्व एवं याग में उस भावना या स्वर्गादि फल का जो करणत्व श्रुत है, वह बाधित हो जाता है [क्योंकि यजिधातुरूप प्रकृति का अर्थ याग और ‘त’ प्रत्यय का भाट्टमतानुसार अर्थ भावना किया जाता है। कृतिरूप भावना में याग करण और स्वर्गादिफल साध्य या कर्म मान कर यागकरणक स्वर्गादिसाध्यक भावना या यागेन स्वर्गं भावयेत्—ऐसा शाब्द बोध किया जाता है, उसके अनुसार भावना में स्वर्गादि-जनकत्वरूप करणत्व एवं याग में उस भावना या स्वर्गादि को करणता पर्यवसित होती है। देवताओं को स्वर्ग का दाता मान लेने पर वह सब असंगत हो जाता है]।
समाधान— [जैसे ‘कुठारेण काष्ठं छिन्द्यात्’—यहाँ पर काष्ठ-छेदनरूप कार्य की करणता या प्रधानता अवगत होती है, करणत्व का अर्थ होता है—जनकत्व, जनकत्व का लक्षण है—अव्यवहितपूर्ववृत्तित्व । यद्यपि कुठार और काष्ठ-छेदन के मध्य में उद्यमन-निपातनरूप व्यापार का व्यवधान आ जाने से कुठार में काष्ठ-छेदन का अव्यवहितपूर्ववृत्तित्व नहीं रहता, तथापि व्यापार को व्यवधायक नहीं माना जाता, क्योंकि सव्यापार कुठारादि में ही करणता मानी जाती है, अतः व्यापार-युक्त कुठारादि में कार्याव्यवहितपूर्ववृत्तित्व होना चाहिए, वह प्रकृत में उपपन्न हो जाता है। वैसे ही] स्वर्गादि की करणता भावना में और भावना की करणता याग में श्रुत है। स्वर्गोत्पत्ति और भावना के मध्य में परमापूर्व एवं भावना और याग के मध्य में देवता-प्रसन्नतादि का व्यवधान रहने पर भी न तो भावनागत स्वर्गादि-जनकत्वरूप करणता समाप्त होती है और न यागगत भावना-जनकत्वरूप प्रधानता ।