भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थवादानामुपयोगः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२१
भामती
यथा प्रमाणान्तराविरोधः यथा च स्तुत्यर्थता तदुभयसिद्धयर्थं गुणवादस्त्विति च तत्सिद्धिरिति चासूत्र- यज्जैमिनिः । तस्माद्यत्र सोऽर्थोऽर्थवादानां प्रमाणान्तरविरुद्धस्तत्र गुणवादेन प्राशस्त्यलक्षणेति लक्षित- लक्षणा । यत्र तु प्रमाणान्तरसंवादस्तत्र प्रमाणान्तरादिवाsubार्थवादादपि सोऽर्थः प्रसिध्यति । द्वयोः परस्परा- नपेक्षयोः प्रत्यक्षानुमानयोरिवैकत्रार्थे प्रवृत्तेः । प्रमात्रपेक्षया त्वनुवादकत्वं, प्रमाता ह्यव्युत्पन्नः प्रथमं यथा प्रत्यक्षादिभ्योऽर्थमवगच्छति न तथाऽऽम्नायतस्तत्र व्युत्पत्त्याद्यपेक्षत्वात्, न तु प्रमाणापेक्षया द्वयोः स्वार्थे-
भामती-व्याख्या
२।६।५।३) इत्यादि स्थलों पर प्रमाणान्तर के अविरोध एवं विधेयार्थ के प्राशस्त्य का सम्पादन जैसे हो सके, वैसा मार्ग अपनाने के लिए महर्षि जैमिनि ने सङ्केत किया है—"गुणवादस्तु" (जै. सू. १।२।१०), "तत्सिद्धिः" (जै. सू. १।४।२३) अर्थात् प्रमाणान्तर से विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादन करनेवाले अर्थवाद वाक्यों की गौणी वृत्ति अपनाकर विधि वाक्यों के साथ एकवाक्यता की जा सकती है, जैसे कि प्रस्तर (एक मुट्ठी भर कुशा) को वेदी में बिछाकर उसके ऊपर जुहू आदि पात्र रखे जाते हैं। उस प्रस्तर को यजमान इसलिए कह दिया गया है कि उससे यजमान के कार्य (यागानुष्ठान) की सिद्धि होती है, अतः प्रस्तर उतना ही श्रेष्ठ और उपादेय है, जितना कि यजमान। [जैसे 'सिंहो माणवकः'—यहाँ 'सिंह' पद की स्वशक्यार्थगत शूरत्वरूप गुण के सम्बन्ध से माणवक में वृत्ति (प्रवृत्ति) मानी जाती है, अतः इस वृत्ति का नाम गौणी वृत्ति कहा जाता है। वैसे ही 'यजमानः प्रस्तरः'— यहाँ पर यजमान में जो याग-साधनत्व गुण है, उसके सम्बन्ध से 'यजमान' पद की प्रस्तर में प्रवृत्ति का नाम गौणी वृत्ति है। तत्सिद्धि-पेटिका में इतना ही प्रदर्शित किया गया है और अर्थवादाधिकरण में जो अर्थवाद-वाक्यों की विधि-वाक्य के साथ एकवाक्यता सिद्ध की गई है, वह यहाँ लक्षितलक्षणा के द्वारा सम्पन्न होती है, क्योंकि "अभिधेयाविनाभूते प्रतीति- र्लक्षणोच्यते" (तं० वा० पृ० ३५४) इसके अनुसार 'यजमान' पद का जो अभिधेय (शक्य) अर्थ है—यजमानत्व, उससे अविनाभूत है—याग-साधनत्व और याग-साधनत्व का अविनाभूत प्रशस्तत्व है, जिसकी आधारता यहाँ प्रस्तर में विवक्षित है। "प्रस्तरं बर्हिष उत्तरं सादयति" (तै. सं. २।६।५) इस विधि वाक्य के द्वारा प्रस्तर का विधान किया जाता है, विधेयार्थ की प्रशंसा करके ही अर्थवाद वाक्य विधि वाक्य से एकवाक्यतापन्न होते हैं, अतः यहाँ 'यजमान' पद के द्वारा लक्षित की लक्षणा प्राशस्त्य में होने के कारण लक्षितलक्षणा कही जाती है। वस्तुतः जैसे 'द्विरेफ' पद की लक्षणा दो रकारों से घटित 'भ्रमर' पद में होती है और 'भ्रमर' पद का अभिधेय भौंरा होता है, अतः 'द्विरेफो गुञ्जति'—यहाँ लक्षित-लक्षणा मानी जाती है, वैसे ही प्रायः सर्वत्र अर्थवाद वाक्यों की 'प्रशस्तम्', पद में लक्षणा करके 'प्रशस्तत्वाद् विधे- यम्'—ऐसी पदैकवाक्यता विवक्षित होती है, फलतः लक्षितलक्षणा पर्यवसित हो जाती है ]। जहाँ पर अर्थवाद वाक्यों का प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से संवाद (समर्थन) प्राप्त होता है, वहाँ पर विवक्षित पदार्थ में प्रमाणान्तर के समान ही अर्थवाद वाक्य भी प्रमाण माना जा सकता है, क्योंकि किसी-किसी वस्तु की सिद्धि में प्रत्यक्ष और अनुमान—दोनों प्रमाण परस्पर निरपेक्ष होकर जैसे प्रवृत्त हो जाते हैं, वैसे ही प्रमाणान्तर और अर्थवाद वाक्य— दोनों ही एक ही अर्थ के साधक माने जाते हैं किन्तु प्रमाता की दृष्टि में वैसे स्थल पर अर्थ- वाद वाक्य को अनुवादक माना जाता है, क्योंकि प्रमाता व्यक्ति जब तक अव्युत्पन्न (अगृहीतशक्तिक) है, तब तक शब्द के द्वारा अर्थावबोध नहीं कर सकता, प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा वह जैसे पदार्थों की अवगति करता है, वैसे शब्द के द्वारा नहीं, वहाँ