भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४२२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३३

भामती ऽनपेक्षत्वादित्युक्तम् । नन्वेवं मानान्तरविरोधेऽपि कस्माद् गुणवादो भवति यावता शब्दविरोधे मानान्तर- मेव कस्मान्न बाध्यते । वेदान्तैरिवाद्वैतविषयैः प्रत्यक्षादयः प्रपञ्चगोचराः कस्माद्धार्थवादवद्वेदान्ता अपि गुणवादेन न नीयन्ते । अत्रोच्यते—लोकानुसारतो द्विविधो हि विषयः शब्दानाम् , द्वारतश्च तात्पर्यतश्च । यथैकस्मिन् वाक्ये पदानां पदार्था द्वारतो वाक्यार्थश्च तात्पर्यतो विषयः । एवं वाक्यद्वयैकवाक्यतायामपि यथेयं देवदत्तीया गौः क्रेतव्येत्येकं वाक्यमेषा बहुक्षीरेत्यपरं, तदस्य बहुक्षीरत्वप्रतिपादनं द्वारम् । तात्पर्यं तु क्रेतव्येति वाक्यान्तरार्थे । तत्र यद् द्वारतस्तत्प्रमाणान्तरविरोधेऽन्यथा नीयते । यथा विषं भक्षयेति वाक्यं माऽस्य गृहे भुङ्क्ष्वेति वाक्यान्तरार्थपरं सत् । यत्र तु तात्पर्यं तत्र मानान्तरविरोधे पौरुषेयमप्रमाणमेव भवति । वेदान्तास्तु पौर्वापर्यपर्यालोचनया निरस्तसमस्तभेदप्रपञ्चब्रह्मप्रतिपादनपरा अपौरुषेयतया स्वतःसिद्धतात्त्विकप्रमाणभावाः सन्तस्तात्त्विकप्रमाणभावात् प्रत्यक्षादीनि प्रच्याव्य सांव्यावहारिकेतस्मिन् व्यवस्थापयन्ति । न चादित्यो वै यूप इति वाक्यमादित्यस्य यूपत्वप्रतिपादनपरमपि तु यूपस्तुतिपरम् । तस्मात्प्रमाणान्तरविरोधे द्वारभूतो विषयो गुणवादेन नीयते, यत्र तु प्रमाणान्तरं विरोधकं नास्ति

भामती-व्याख्या व्युत्पत्ति की ही अपेक्षा होती है, प्रमाणान्तर की नहीं, क्योंकि दोनों प्रमाण परस्पर निरपेक्ष होकर ही प्रमेय-प्रवण माने जाते हैं, यह कहा जा चुका है। शङ्का—प्रमाणान्तर का विरोध रहने पर भी वाक्यों को अत्यन्त अप्रमाण न मानकर गौणी वृत्ति क्यों अपनाई जाती है ? प्रमाणान्तर के विरोध पर शब्द को गौणी वृत्ति अप- नाने के लिए क्यों विवश किया जाता है, प्रमाणान्तर का ही विरोधी शब्द के द्वारा वैसे ही बाध क्यों नहीं मान लिया जाता, जैसे अद्वैतविषयक प्रत्यक्षादि प्रमाणों का बाध होता है ? अथवा प्रमाणान्तर-विरुद्ध अर्थवाद वाक्यों में जैसे गुणवाद माना जाता है, वैसे प्रत्यक्षादि से विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक वेदान्त वाक्यों में गुणवाद क्यों नहीं लागू किया जाता ? समाधान — लौकिक व्यवहार के आधार पर शब्दों की द्विविध प्रवृत्ति मानी जाती है—(१) द्वार ( साधन) रूपेण और (२) तात्पर्यतः । जैसे एक ही वाक्य में पदों के पदार्थ और वाक्यार्थ — दोनों ही विषय माने जाते हैं, द्वाररूपेण पदार्थ और तात्पर्य रूपेण वाक्यार्थ । अर्थात् पद अपने पदार्थ-स्मरण के द्वारा वाक्यार्थ के बोधक होते हैं। वैसे ही दो वाक्यों की एकवाक्यता में भी माना जाता है, जैसे- 'इयं देवदत्तीया गौः क्रेतव्या' और 'एषा बहुक्षीरा' यहाँ पर बहुक्षीरत्वादि का प्रतिपादन द्वारमात्र है, परमतात्पर्य तो क्रयण की कर्तव्यता में ही होता है। उनमें द्वारभूत पदार्थों का यदि प्रमाणान्तर से विरोध उपस्थित होता है, तब गौणादि वृत्तियों के द्वारा शब्दों का अन्यथा-नयन किया जाता है, 'विषं भक्षय'—इस वाक्य का तात्पर्य 'मा अस्य गृहे भुङ्क्ष्व'—इस वाक्य के विषयीभूत अर्थ में ही प्रमाणान्तर का विरोध उपस्थित होता है, वहाँ पौरुषेय वाक्य तो अत्यन्त अप्रमाण हो जाते हैं, किन्तु वेदान्त- वाक्यों का पौर्वापर्य की आलोचना से द्वैत-प्रपञ्च-रहित ब्रह्म तत्त्व में ही परम तात्पर्य निश्चित होता है। अपौरुषेय होने के कारण वेदान्त वाक्यों का प्रामाण्य स्वतःसिद्ध है, अतः इस प्रमाणभाव से गिरा कर प्रत्यक्षादि द्वैतविषयक प्रमाण वेदान्त-वाक्यों का अन्यथा-नयन नहीं कर सकते, प्रत्युत वेदान्त के अनुरोध पर प्रत्यक्षादि प्रमाणों का केवल व्यावहारिक सत्ता के बोधन में ही तात्पर्य पर्यवसित होता है । "आदित्यो वै यूपः" (तै. ब्रा. २।१।५) यह वाक्य आदित्य में यूपत्व (यूपरूपता) का विधायक नहीं, अपितु यूप की स्तुति ही करता है कि यूप पर घृत का लेप कर देने से धूप में वह आदित्य के समान तेजस्वी और चमकीला हो जाता है। इस प्रकार प्रमाणान्तर से विरुद्धार्थक अर्थवाद वाक्यों का गौणी वृत्ति के द्वारा

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