भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थवादानामुपयोगः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२३
भामती
यथा देवताविग्रहादौ तत्र द्वारतोऽपि विषयः प्रतीयमानो न शक्यस्त्यक्तुम् । न च गुणवादेन नेतुं, को हि मुख्ये सम्भवति गौणमाश्रयेदतिप्रसङ्गात् । तथा सत्यनधिगतं विग्रहमपि प्रतिपादयद् वाक्यं भिद्येतेति चेत् । अद्धा भिन्नमेवैतद्वाक्यं, तथा सति तात्पर्यभेदोऽपीति चेत्, न, द्वारतोऽपि तदवगतौ तात्पर्यान्तरकल्पनाया अयोगात् । न च यत्र यस्य न तात्पर्यं तस्य तत्राप्रामाण्यं तथा सति विशिष्टपरं वाक्यं विशेषणेऽप्रमाणमिति विशिष्टपरमपि न स्यात्, विशेषणाविषयत्वात् । विशिष्टविषयत्वेन तु तदाक्षेपे परस्पराश्रयत्वम् । आक्षेपादिशेषणप्रतिपत्तौ सत्यां विशिष्टविषयत्वं विशिष्टविषयत्वाच्च तदाक्षेपः । तस्माद्विशिष्टप्रत्ययपरेभ्योऽपि पदेभ्यो विशेषणानि प्रतीयमानानि तस्यैव वाक्यस्य विषयत्वेनानिच्छताप्यभ्युपेयानि यथा, तथाऽन्यपरेभ्योऽप्यर्थवादवाक्येभ्यो देवताविग्रहादयः प्रतीयमाना असति प्रमाणान्तरविरोधे न युक्तास्त्यक्तुं, न हि मुख्यार्थसम्भवे गुणवादो युज्यते । न च भूतार्थमप्यपौरुषेयं वचो मानान्तरापेक्षं स्वार्थे येन मानान्तरासम्भवे भवेदप्रमाणमित्युक्तम् ।
स्यादेतत्—तात्पर्यभेदेऽपि यदि वाक्यभेदः कथं तर्ह्यर्थैकत्वादेकं वाक्यम् । न, तत्र तत्र यथास्वं तत्तत्पदार्थविशिष्टैकपदार्थप्रतीतिपर्यवसानसम्भवात् । स तु पदार्थान्तरविशिष्टः पदार्थ एकः क्वचिद् द्वारभूतः क्वचिद् द्वारीत्येतावन् विशेषः ।
भामती-व्याख्या
सामञ्जस्य किया जाता है ।
जहाँ पर अर्थवाद वाक्यों का कोई प्रमाणान्तर विरोधी नहीं होता, वहाँ द्वारभूत अर्थ में भी गौणी वृत्ति नहीं अपनाई जाती, जैसे देवता-विग्रहादि के प्रतिपादक अर्थवाद वाक्य । ऐसे स्थल पर मुख्यार्थ का परित्याग नहीं किया जाता, क्योंकि प्रमाणान्तर-विरोधरूप निमित्त के बिना मुख्यार्थ का त्याग कर देने पर अतिप्रसङ्ग उपस्थित होता है । अर्थवाद वाक्य यदि प्रमाणान्तरानधिगत देव-विग्रहादि के भी प्रतिपादक माने जाते हैं, तब वाक्यभेदापत्ति क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि ऐसे स्थल पर वाक्य-भेद माना ही जाता है । यदि वाक्य-भेद है, तब उन वाक्यों के तात्पर्य का भी भेद क्यों नहीं ? देवता-विग्रहादि की सिद्धि जब अर्थवादों के द्वारभूत अर्थ के द्वारा हो जाती है, तब उनमें तात्पर्य मानना व्यर्थ है । द्वारभूत अर्थ में जिस वाक्य का तात्पर्य नहीं, उसका उसमें प्रामाण्य नहीं होगा ? यदि यहाँ प्रामाण्य नहीं माना जाता, तब विशिष्टार्थ-परक वाक्य के अविषयीभूत विशेषणात्मक अर्थ में भी प्रामाण्य क्योंकर होगा ? 'विशिष्टार्थपरकं वाक्यं विशेषणविषयकम्, विशिष्टार्थविषयकत्वात्'—ऐसा अनुमान करने पर अन्योन्याश्रयता होती है, क्योंकि आक्षेप या अनुमान के द्वारा विशेषण की प्रतिपत्ति होने पर विशिष्टविषयकत्व और विशिष्टविषयकत्व के द्वारा विशेषणविषयकत्व की सिद्धि होती है । अतः विशिष्टार्थपरक वाक्यों के द्वारा प्रतीयमान विशेषणभूत अर्थों में जैसे उन वाक्यों की विषयता मानी जाती है, वैसे ही अन्यपरक अर्थवाद वाक्यों के द्वारा प्रतीयमान विग्रहादि का प्रमाणान्तर से विरोध न होने पर परित्याग नहीं किया जा सकता । मुख्यार्थ की उपपत्ति होने पर गौण अर्थ नहीं अपनाया जाता—यह कहा जा चुका है । भूतार्थविषयक अपौरुषेय वाक्य भी मानान्तर-सापेक्ष नहीं होते कि उनका मानान्तरानपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य समाप्त हो जाता ।
तात्पर्य की एकता होने पर भी यदि वाक्य-भेद माना जाता है. तब महर्षि जैमिनि ने उनमें जो एकत्व का प्रतिपादन किया है—"अर्थैकत्वादेकं वाक्यं साकाङ्क्षं चेद्विभागे स्यात्" (जै. सू. २।१।४६ ) । वह उपपन्न क्योंकर होगा ? इस शङ्का का समाधान यह है कि वहाँ पर भी तत्तत्पदार्थ-विशिष्ट एकपदार्थ की प्रतीति में पर्यवसान माना जा सकता है। वह पदार्थान्तर से विशिष्ट पदार्थ कहीं द्वारभूत होता है और कहीं द्वारी ( मुख्य )—यह अन्य बात है ।