भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदेवताया ब्रह्मविद्यायामधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२५
भामती
ॐ अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि इति ॐ । देवतामुद्दिश्य हविरवमृश्य च तद्विषयस्वत्वत्याग इति यागशरीरम् । न च चेतस्यानालिखिता देवतोद्देष्टुं शक्या, न च रूपरहिता चेतसि शक्यते आलेखितुमिति यागविधिनेव तद्रूपापेक्षिणा यावद्गम्यमपरेभ्योऽपि मन्त्रार्थवादेभ्यस्तद्रूपमवगतं तदभ्युपेयते । रूपान्तरकल्पनायां मानाभावात् । मन्त्रार्थवादयोरत्यन्तपरोक्षवृत्तिप्रसङ्गाच्च । यथा हि 'व्रात्यो व्रात्यस्तोमेन यजेत' इति व्रात्यस्वरूपापेक्षायां 'यस्य पिता पितामहो वा सोमं न पिबेत् स व्रात्य' इति सिद्धवद् व्रात्यस्वरूपमवगतं व्रात्यस्तोमविध्यपेक्षितं सद्गिधिप्रमाणकं भवति, यथा वा स्वर्गस्वरूपमलौकिकं स्वर्गकामो यजेतेति विधिनापेक्षितं सदर्थवादतोऽवगम्यमानं विधिप्रमाणकम् , तथा देवतारूपमपि । ननूद्देशो रूपज्ञानमपेक्षते न पुनः रूपसत्तामपि, देवतायाः समारोपेणापि च रूपज्ञानमुपपद्यते इति
भामती-व्याख्या
पर वाक्य-भेद हो ही जाता है। फलतः विधि वाक्य से अर्थवाद वाक्य भिन्न है। विधि और अर्थवादरूप दोनों भिन्न वाक्य अपने-अपने वाक्यार्थों का बोध जब करा चुकते हैं, तब उत्थापित आकाङ्क्षा के द्वारा दोनों का परस्पर अन्वय होता है यह सिद्ध हो गया।
"अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीनां स्वरूपम्"— इस भाष्य का आशय यह है कि देवता के उद्देश्य से द्रव्य (हवि) का निर्देश करते हुए द्रव्यगत स्वत्व का मानस त्याग ही याग कहलाता है। [ "यजतिचोदना द्रव्यदेवताक्रियं समुदाये कृतार्थत्वात्" (जै. सू. ४।२।२७) की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है—"द्रव्यं देवतामुद्दिश्य त्यज्यते, तस्य च क्रिया, यया क्रियया तयोः सम्बन्धो भवति"। वार्तिककार ने याग और होम का स्वरूप बताते हुए कहा है—देवतोद्देशेन स्वत्वत्यागमात्रं यागः, देवतोद्दिश्यत्यज्यमानस्वत्वद्रव्यप्रक्षेपो जुहोतिः" (तं. वा. पृ. ९८१)]। देवता को तभी उद्देश किया जा सकता है, जब कि मन में उसका आलेख (रेखाङ्कन) हो। रूप-रहित पदार्थ का चित्त में आलेख कभी नहीं हो सकता, अतः याग-विधि के द्वारा ही देवता का वह रूप स्वीकृत किया जाता है, जो विधेय-स्तुतिपरक अर्थवाद वाक्यों से अवगत होता है। उससे भिन्न रूपान्तर की कल्पना में कोई प्रमाण नहीं। किसी प्रकार यदि रूपान्तर की कल्पना करते हैं, तब देवता के स्वरूप का रेखाङ्कन करनेवाले मन्त्र और अर्थवाद वाक्य अत्यन्त उपेक्षित और निरर्थक-से हो जाते हैं। जैसे "व्रात्यो वा व्रात्यस्तोमेन यजेत" [अपने कर्मों और संस्कारों से रहित द्विज व्रात्य कहलाता है, उसके लिए प्रायश्चित्त के रूप में व्रात्यस्तोम नाम के एकाह क्रतु का विधान 'लाट्यायन' (८।६), 'ताण्ड्य' (१७।२।१) और 'कात्यायन' (१७।४।१) इत्यादि शास्त्रों में किया गया है। सब व्रात्य चार प्रकार के माने गए हैं—(१) हीनाचार, (२) निन्दित, (३) कनिष्ठ और (४) ज्येष्ठ। व्रात्यस्तोम भी चार ही होते हैं। उनमें से प्रथम स्तोम का अधिकारी हीनाचार, द्वितीय का निन्दित, तृतीय का कनिष्ठ और चतुर्थ का ज्येष्ठ अधिकारी माना जाता है]। इन व्रात्यस्तोमों के विधि वाक्य को अपना कर्म-विधान सम्पन्न करने के लिए "यस्य पिता पितामहो वा सोमं न पिबेत्, स व्रात्यः"—इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित व्रात्य के स्वरूप की अपेक्षा है, अतः उस व्रात्य के स्वरूप में विधि-वाक्य ही मौलिक प्रमाण माना जाता है। अथवा जैसे "स्वर्गकामो यजेत"— इस विधि के द्वारा अलौकिक स्वर्ग-स्वरूप अपेक्षित है। वह किसी अर्थवाद से अवगत होने पर भी विधिप्रमाणक ही माना जाता है। वैसे ही अर्थवादादि से अवगत देवता-स्वरूप भी विधिप्रमाणक ही माना जाता है।
शङ्का—यह जो कहा गया कि यागरूप स्वत्व-त्याग किसी देवता के उद्देश्य से किया
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