भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३९२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. २८

शब्दे नित्यार्थसंबन्धिनि शब्दव्यवहारयोग्यार्थव्यक्तिनिष्पत्तिः । 'अतः प्रभवः' इत्युच्यते, कथं पुनरवगम्यते शब्दात्प्रभवति जगदिति ? प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् । प्रत्यक्षं श्रुतिः, प्रामाण्यं प्रत्यनपेक्षत्वात् । अनुमानं स्मृतिः, प्रामाण्यं प्रति सापेक्षत्वात् । ते हि शब्दपूर्वां सृष्टिं दर्शयतः । एत इति वै प्रजापतिर्देवानसृजतासृग्रमिति मनुष्यानिन्दव इति पितॄंस्तिरःपवित्रमिति ग्रहानाशव इति स्तोत्रं विश्वानीति शस्त्रमभिसौभगेत्यन्याः प्रजाः' इति श्रुतिः । तथाऽन्यत्रापि 'स मनसा वाचं मिथुनं समभवत्' (बृ० १।२।४) इत्यादिना तत्र तत्र शब्दपूर्विका सृष्टिः श्राव्यते । स्मृतिरपि - 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयं‌भुवा । आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥' इति । उत्सर्गोऽप्ययं वाचः संप्रदायप्रवर्तनात्मको द्रष्टव्यः, अनादिनिधनाया अन्यादृशस्योत्सर्गस्या-

भामती

इममेवार्थमाक्षेपसमाधानाभ्यां विभजते ॐ ननु जन्माद्यस्य यतः इति ॐ । ते निगदव्याख्याते । किमिदानीं स्वयम्भुवा वाङ् निर्मिता कालिदासादिभिरिव कुमारसम्भवादि, तथा च तदेव प्रमा-णान्तरापेक्षवाक्यत्वादप्रामाण्यमापतितमित्यत आह ॐ उत्सर्गोऽप्ययं वाचः सम्प्रदायप्रवर्त्तनात्मक इति ॐ । सम्प्रदायो गुरुशिष्यपरम्परयाऽध्ययनम् । एतदुक्तं भवति -- स्वयम्भुवो वेदकर्तृत्वेऽपि न कालिदासाविवत्

भामती-व्याख्या

शब्द सनातन हैं, उनके द्वारा तत्तज्जातीय पदार्थों का आकार जो प्रजापति की बुद्धि में अवतरित होता है, वैसे पदार्थ की सृष्टि वह करता है। वसु आदि देवताओं की रचना मान लेने पर भी शब्द और उसके अर्थ का सम्बन्ध अनित्य नहीं प्रसक्त होता, क्योंकि वसुत्वादि जाति या उपाधि के साथ वसु आदि शब्दों का सम्बन्ध नित्य ही रहता है। पाचकत्वादि उपाधियाँ भी पाकत्वरूप नित्य धर्म से अवच्छिन्न होकर नित्य ही मानी जाती हैं। इसी बात की अभिव्यक्ति आक्षेप समाधानपूर्वक की जाती है— “ननु जन्माद्यस्य यतः” । [ अर्थात् जगत् में शब्द-प्रभवत्व को सुनकर आक्षेपवादी ने कहा कि पहले जन्मादि-सूत्र में विश्व को ब्रह्म से प्रसूत बताया गया है, तब उसमें शब्दप्रभवत्व क्योंकर बनेगा ? दूसरी बात यह भी है कि वसु आदि देवताओं को शब्द-जन्य मान लेने पर कथित विरोध का परिहार क्योंकर होगा ? इस आक्षेप के समाधान में कहा गया है कि घटादि के समान वसु आदि शरीरों की उत्पत्ति मान लेने पर भी घटत्त्वादि जातियों के साथ जैसे घटादि शब्दों का सम्बन्ध नित्य ही रहता है, वैसे ही वसुत्वादि जातियों के साथ 'वसु' आदि शब्दों का सम्बन्ध नित्य ही बन जाता है। वसुत्वादि जातियों का प्रतिपादन मन्त्र, अर्थवादादि वाक्यों के द्वारा किया जाता है। इसी प्रकार देवादि जगत् में शब्दप्रभवत्व का प्रतिपादन पूर्वोक्त ब्रह्मप्रभवत्व का विरोधी नहीं, क्योकि ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है और शब्दादि निमित्त कारण माने जाते हैं, उपादान कारण नहीं। वाचकात्मक, शब्द नित्य स्थिर है, उसके अनुरूप जाति की अभिव्यक्ति के लिए व्यक्तियों का निर्माण किया जाना असंगत नहीं ] ।

शङ्का—यह जो वेदों के विषय में कहा गया है कि “अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा । आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥” यहाँ जिज्ञासा होती है कि क्या प्रजापति ने वेदों की रचना वैसे ही की जैसे कालिदासादि महाकवियों ने कुमारसम्भवादि ग्रन्थों की रचना की ? यदि ऐसा ही है तब वेदों में अनपेक्षत्वरूप प्रामाण्य नहीं रहता— 'वेदा न प्रमाणम्, प्रमाणान्तरसापेक्षवाक्यत्वात्, कुमारसम्भवादिवत्' ।

समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए भाष्यकार कहते हैं— “उत्सर्गो-प्ययं वाचः सम्प्रदायप्रवर्तनात्मको द्रष्टव्यः” । अर्थात् स्वयम्भु भगवान् के द्वारा जो वेदों का