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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३९९


भिन्नानम्। कथं ह्येकस्मिन्काले बहूनामुच्चारयतामेक एव सन्गकारो युगपदनेकरूपः

भामती

न च स्वस्तिमत्यादिवद् गव्यक्तिभेदप्रत्ययः स्फुटः प्रत्युच्चारणमस्ति । तथा सति दश गकारानु- बचारयच्चैत्र इति प्रत्ययः स्यात्, न स्याद् दशकृत्व उच्चारयद गकारमिति । न चैष जात्यभिप्रायोऽभ्यासो यथा शतकृत्वस्तित्तिरीनुपायुङ्क्त देवदत्त इति । अत्र हि सोरस्ताडं क्रन्दतोऽपि गकाराभिव्यक्तौ लोकस्यो- च्चारणाभ्यासप्रत्ययस्याविनिवृत्तेः । चोदकः प्रत्यभिज्ञानबाधकमुत्थापयति ॐ कथं ह्येकस्मिन् काले बहूनामुच्चारयताम् इति ॐ । यद्युगपद्विरुद्धधर्मसंसर्गवत् तन्नाना । यथा गवाश्वाविद्विशफेकशफकेशरगल- कम्बलादिमान् । युगपदुदात्तानुदात्तादिविरुद्धधर्मसंसर्गावांश्चायं वर्णः, तस्मान्नाना भवितुमर्हति । न चोदा- त्तादयो व्यञ्जकधर्माः, न वर्णधर्मा इति साम्प्रतम् । व्यञ्जका ह्यस्य वायवः । तेषामश्रावणत्वे कथं तद्धर्माः श्रावणाः स्युः । इदं तावदत्र वक्तव्यं, न हि गुणगोचरमिन्द्रियं गुणिनमपि गोचरयति, मा भूवन् घ्राणरसनश्रोत्राणां गन्धरसशब्दगोचराणां तद्वन्तः पृथिव्युदकाकाशा गोचराः । एवं च मा नाम भूद्वायु-

भामती-व्याख्या

कहते हैं—"नादवृद्धिपरा" (जै० सू० १।१।१७) । अतः गत्वादि जाति की कल्पना व्यर्थ है। जैसे स्वस्तिमती आदि गोव्यक्तियों का भेद-भान नितान्त स्फुट है, वैसा गकारादि व्यक्तियों का प्रत्येक उच्चारण में भेद स्पष्ट प्रतीत नहीं होता । गकारादि व्यक्तियों का भेद मानने पर 'दश गकारानुदचारयत् चैत्रः'—ऐसा अनुभव होना चाहिए किन्तु वहाँ जो 'दशकृत्व उदचार- यद गकारम्'—ऐसा अनुभव होता है, वह नहीं होना चाहिए था । उच्चारणगत अभ्यास (आवृत्ति) के द्वारा उच्चार्यमाण गकार व्यक्ति की एकता अक्षुण्ण रहती है । गत्व जाति के माध्यम से यह उच्चारणभ्यास सम्पन्न क्यों नहीं हो सकता, जैसे 'दशकृत्वः तित्तिरीमुपा- युङ्क्त देवदत्तः'—यहाँ पर एक तित्तिरि व्यक्ति का कई वार उपयोग नहीं हो सकता, अतः तित्तिरिजातीय पक्षियों का उपयोग माना जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि प्रथमतः उच्चारण शब्द का ही होता है, जात्यादिका नहीं । दूसरी बात यह हैं कि कितना भी छाती पीट-पीट कर रोना-धोना कर लिया जाय किन्तु वर्णोच्चारण की आवृत्ति का अनुभव निवृत्त नहीं किया जा सकता ।

आक्षेपवादी वर्णगत एकत्व की साधिका प्रत्यभिज्ञा का बाध प्रस्तुत करता है—"कथं ह्येकस्मिन् काले बहूनामुच्चारयतामेक एव सन् गकारो युगपदनेकरूपः स्यात्" । आशय यह है कि जो पदार्थ एक ही समय विरोधी धर्मों का सम्बन्धी होता है, वह नाना (अनेक) होता है, जैसे गो और अश्व क्रमशः द्विशफ (कटे खुरवाले) और एकशफ, केशर (सटा) और गल-कम्बल (सास्ना.) आदि विरुद्ध धर्मों के सम्बन्धी होने के कारण परस्पर भिन्न हैं। वर्ण भी उदात्त और अनुदात्तादि विरुद्ध धर्मवान् होने के कारण अनेक होते हैं । 'उदात्तादि धर्म वर्ण के न होकर उसके व्यञ्जकीभूत ध्वनि के धर्म हैं'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि वर्णों की व्यञ्जक जो ध्वनि है, वह वायुरूप है, वायु का श्रोत्र से ग्रहण नहीं होता, अतः वायु के धर्मभूत उदात्तादि का श्रावण प्रत्यक्ष क्योंकर होगा ? परिशेषतः उदात्तादि विरुद्ध धर्मों को वर्ण का ही धर्म मानना होगा, अतः गकारादि वर्ण अनेक होते हैं, एक नहीं ।

सिद्धान्ती का अभिप्राय यह है कि किसी गुण का विषय करनेवाले करण (इन्द्रिय) से उस गुण के आधारभूत द्रव्य का नियमतः ग्रहण नहीं होता, जैसे कि घ्राण, रसन और श्रोत्र के क्रमशः गन्ध, रस और शब्दरूप गुण ही विषय होते हैं, उन गुणों के आधारभूत पृथिवी, जल और आकाश द्रव्य नहीं, उसी प्रकार वायवीय ध्वनि के धर्मभूत उदात्तादि धर्मों का श्रोत्र के द्वारा ग्रहण होने पर उसके धर्मीभूत वायुद्रव्य का ग्रहण न होना अनुचित नहीं।

४००ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. २८

स्यात् ? उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च सानुनासिकश्च निरनुनासिकश्चेति । अथवा,—ध्वनिकृतोऽयं प्रत्ययभेदो न वर्णकृत इत्यदोषः । कः पुनरयं ध्वनिनीम ? यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति । प्रत्यासीदतश्च पटुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति । तन्निबन्धनाश्चोदात्तादयो विशेषा न वर्णस्वरूपनिबन्धनाः,


भामती

गोचरं श्रोत्रम् । तद्गुणांस्तूदात्तादीन् गोचरयिष्यति । ते च शब्दसंसर्गग्रहात् शब्दधर्मत्वेनाध्यवसीयन्ते । न च शब्दस्य प्रत्यभिज्ञानावधृतैकत्वस्य स्वरूपत उदात्तादयो धर्माः परस्परविरोधिनोऽपर्यायेण सम्भवन्ति । तस्माद्यथा मुख्यस्यैकस्य मणिकृपाणदर्पणाद्युपधानवशाज्ञानादेशपरिमाणसंस्थानभेदविभ्रमः, एवमेकस्यापि वर्णस्य व्यञ्जकध्वनिनिबन्धनोऽयं विरुद्धनानाधर्मसंसर्गविभ्रमः, न तु स्वाभाविको नानाधर्मसंसर्गः, इति स्थितेऽभ्युपेत्य परिहारमाह भाष्यकारः ❖ अथवा ध्वनिकृतः इति ❖ । अथेति पूर्वपक्षं व्यावर्तयति । भवेतां नाम गुणगुणिनावेकेन्द्रियग्राह्यौ, तथाप्यदोषः । ध्वनीनामपि शब्दवच्छ्रावणत्वात् । ध्वनिस্বরূপं प्रश्नपूर्वकं वर्णेभ्यो निष्कर्षयति ❖ कः पुनरयम् इति ❖ । न चायमनिर्धारितविशेषवर्णत्वसामान्यमात्रप्रत्ययो न तु वर्णातिरिक्ततदभिव्यञ्जकध्वनिप्रत्यय इति साम्प्रतम् । तस्यानुनासिकत्वादिभेदभिन्नस्य गादिव्यक्तिवत्प्रत्यभिज्ञानाभावादप्रत्यभिज्ञायमानस्य चैकत्वाभावेन सामान्याभावानुपपत्तेः । तस्मादवर्णात्मको वैष शब्दः शब्दातिरिक्तो वा ध्वनिः शब्दव्यञ्जकः श्रावणोऽभ्युपेयः । उभयथापि चाक्षु व्यञ्जनेषु च तत्तद्ध्वनिभेदोपधानेनानुनासिकत्वादयोऽवगम्यमानास्तद्धर्मा एव शब्दे प्रतीयन्ते न तु स्वतः शब्दस्य धर्माः । तथा च येषामनुनासिकत्वादयो धर्माः परस्परविरुद्धा भासन्ते भवतु तेषां ध्वनीनामनित्यता ।


भामती-व्याख्या

वायु के धर्मभूत उदात्तादि का ही शब्द में समारोप हो जाता है। उदात्तादि विरुद्ध धर्म वर्णरूप शब्द के स्वाभाविक धर्म न होने के कारण वर्णगत नानात्व सिद्ध नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यभिज्ञारूप प्रत्यक्ष प्रमाण से वर्ण में एकत्व निश्चित है। अतः जैसे एक ही मुखरूप बिम्ब का मणि, कृपाण, दर्पणादि उपाधियों में प्रतिफलित विविध आकार के प्रतिबिम्बों के भेद से भेद अवभासित होता है, वैसे ही व्यङ्ग्यभूत वर्ण में व्यंजकीभूत ध्वनिगत उदात्तादि विरुद्ध धर्मों का विभ्रम मात्र हो जाता है—ऐसा समाधान प्रस्फुरित होने पर भी भाष्यकार आक्षेपवादी के आक्षेप को मान कर भी उक्त आक्षेप का परिहार कर रहे हैं—"अथवा ध्वनिकृतोऽयं प्रत्ययभेदो न वर्णकृत इत्यदोषः"। 'अथवा' शब्द के द्वारा पूर्वपक्ष का निराकरण करते हुए भाष्यकार का आशय यह है कि यदि गुण और गुणी द्रव्य का एक ही इन्द्रिय के द्वारा ग्रहण मान भी लिया जाता है, तब भी प्रकृत में कोई दोष नहीं, क्योंकि शब्द की व्यंजकीभूत ध्वनियां भी शब्द के समान ही श्रावण होती हैं। प्रश्नोत्तर के रूप में वर्णों से अतिरिक्त ध्वनि का स्वरूप आविष्कृत करते हैं—"कः पुनरयं ध्वनिनीम ? यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति"। यदि कहा जाय कि ध्वनि भी वर्णात्मक है, इस दोष के कारण व्यक्तिविशेष स्फुटित नहीं होती, केवल वर्णत्व जाति की ही वहाँ प्रतीति होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि ध्वनियों में अनुनासिकत्वादि के भेद से अनेकत्व होता है, अतः गकारादि वर्णों के समान उनमें प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, अतः एकत्व सिद्ध न हो सकने के कारण ध्वनियों में शब्दत्व ही उपपन्न नहीं होता। अतः ध्वनि या तो अवर्णात्मक शब्द है, अथवा शब्द से भिन्न ही है फिर भी शब्द की व्यंजक और श्रावण है। दोनों रीति से 'अच्' प्रत्याहार-घटक अकारादि स्वरों और हकारादि व्यंजनों में उनकी व्यंजकीभूत ध्वनियों के अनुनासिकत्वादि धर्म ही प्रतीत होते हैं, शब्द में वे स्वाभाविक (अनौपाधिक) नहीं होते। अनुनासिकत्वादि परस्पर-विरुद्ध धर्म जिस ध्वनि तत्त्व के

स्फोटवादनिरसः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् [ ४०१

वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात्। एवं च सति सालम्बना उदात्तादिप्रत्यया भविष्यन्ति। इतरथा हि वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां निर्भेदत्वात्संयोगविभागकृता उदात्तादिविशेषाः कल्पेरन्। संयोगविभागानां चाप्रत्यक्षत्वान्न तदाश्रया विशेषा वर्णेष्वध्यवसातुं शक्यन्त इत्यतो निरालम्बना एवैत उदात्तादिप्रत्ययाः स्युः। अपि च नैवैतदभिनिवेष्टव्यमुदात्तादिभेदेन वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां भेदो भवेदिति। न ह्यन्यस्य भेदेनान्यस्याभिद्यमानस्य भेदो भवितुमर्हति। नहि व्यक्तिभेदेन जातिं भिन्नां मन्यन्ते। वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः संभवात्स्फोटकल्पनानर्थिका। न कल्पयाम्यहं स्फोटम्, प्रत्यक्षमेव त्वेनमवगच्छामि, एकैकवर्णग्रहणाहितसंस्कारायां बुद्धौ झटिति प्रत्यवभास- नादिति चेत्-न, अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात्। एकैकवर्णग्रहणोत्तरकाला हीयमेका

भामती

नहि तेषु प्रत्यभिज्ञानमस्ति । येषु तु वर्णेषु प्रत्यभिज्ञानं न तेषामनुनासिकत्वादयो धर्मा इति नानित्याः । ॐ एवं च सति सालम्बना इति ॐ । यद्येष परस्याग्रहो धर्मिण्यगृह्यमाणे तद्धर्मा न शक्या ग्रहीतुमिति । एवं नामास्तु तथा तुष्यतु परस्तथाप्यदोष इत्यर्थः । तदनेन प्रबन्धेन क्षणिकत्वेन वर्णानामशक्यसङ्गति- ग्रहतया यदवाचकत्वमापादितं वर्णानां तदपाकृतम् । व्यस्तसमस्तप्रकारद्वयासम्भवेन तु यदासञ्जितं तन्निराचिकीर्षुराह ॐ वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः इति ॐ । कल्पनामामृष्यमाण एकदेश्याह ॐ न कल्पयामि इति ॐ । निराकरोति ॐ न, अस्या अपि बुद्धेः इति ॐ । निरूपयतु तावद् गौरित्येकं पदमिति धियमायु- ष्मान् । किमियं पूर्वानुभूतान् गकारादीनेव सामस्त्येनावगाहते, किं वा गकाराद्यतिरिक्तं गवयमिव वराहादिभ्यो विलक्षणम् ? यदि गकारादिविलक्षणमवभासयेत् , गकारादिरूषितः प्रत्ययो न स्यात् । न हि वराहधीर्महिषरूषितं वराहमवगाहते । पदतत्त्वमेकं प्रत्येकमभिव्यञ्जयन्तो ध्वनयः प्रयत्नभेदभिन्नाः

भामती-व्याख्या

स्वाभाविक हैं, उन्हें अनित्य और नाना माना जाता है। ध्वनियों में एकत्व-साधनी प्रत्यभिज्ञा का उदय ही नहीं होता, जिन (वर्णों) में प्रत्यभिज्ञा होती है, उनके अनुनासिकत्वादि धर्म नहीं माने जाते, अतः वे अनित्य नहीं होते।

“एवं च सति सालम्बना एवैते उदात्तादिप्रत्ययाः”—इस भाष्य का आशय यह है कि यदि वादी का यह आग्रह मान भी लिया जाय कि वायुरूप धर्मी का श्रोत्र से ग्रहण न हो सकने पर उसके अनुनासिकत्वादि धर्मों का श्रोत्र से ग्रहण नहीं हो सकता। तथापि प्रकृत में कोई दोष नहीं, क्योंकि ध्वनि तत्त्व को अवर्णात्मक शब्द और श्रावण ही माना जाता है, अतः ध्वनिगत धर्मों की प्रतीति सालम्बन हो जाती है। भाष्यकार ने इस प्रबन्ध के द्वारा वर्णों में आरोपित क्षणिकत्व-प्रयुक्त संगतिग्रहाभाव का अपाकरण कर दिया है। वर्णों में व्यस्त और समस्त—इन दो प्रकारों के सम्भव न हो सकने के कारण जो अवाचकत्व प्रसक्त किया गया, उसका निराकरण किया जाता है—“वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः संभवात् स्फोटकल्पनाऽ- नर्थिका”। स्फोटवादी कहता है कि “न कल्पयामि स्फोटम्, प्रत्यक्षं त्वेनमवगच्छामि”। सिद्धान्ती उसका निराकरण करता है—“न, अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात्”। स्फोटवादी से पूछा जाता है कि आप जो निरूपित करते हैं—“गौरित्येकं पदम्”। यह प्रतीति क्या पूर्वानुभूत गकारादि वर्णों को सामूहिकरूप से ग्रहण करती है ? अथवा जैसे वराह से भिन्न गवय का 'गवयोऽयम्'—यह प्रतीति ग्रहण करती है, वैसे ही पूर्वोक्त प्रतीति क्या गकारादि वर्णों से अतिरिक्त किसी स्फोट तत्त्व का ? यदि गकारादि से भिन्न किसी अन्य तत्त्व का अवगाहन करती है, तब उस प्रतीति में गकारादि वर्णों का भान नहीं होना चाहिए, क्योंकि महिष से भिन्न वराह को विषय करनेवाली प्रतीति में महिष का भान नहीं होता।

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४०२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २८

बुद्धिर्गौरिति समस्तवर्णविषया, नार्थान्तरविषया। कथमेतदवगम्यते ? यतोऽस्यामपि बुद्धौ गकारादयो वर्णा अनुवर्तन्ते, न तु दकारादयः। यदि ह्यस्या बुद्धेर्गकारादिभ्योऽर्थान्तरं स्फोटो विषयः स्यात्ततो दकारादय इव गकारादयोऽप्यस्या बुद्धेर्व्यावर्तेरन्, नतु तथास्ति। तस्मादियमेकबुद्धिर्वर्णविषयैव स्मृतिः। नन्वनेकत्वाद्वर्णानां नैकबुद्धिविषयतोपपद्यत इत्युक्तं - तत्प्रतिब्रूमः—संभवत्यनेकस्याप्येकबुद्धिविषयत्वम्, पङ्क्तिर्वनं सेना शतं सहस्रमित्यादिदर्शनात्। या तु गौरित्येकोऽयं शब्द इति बुद्धिः, सा बहुष्वेव वर्णेष्वेकार्थावच्छेदनिबन्धनेौपचारिकी वनसेनादिवुद्धिष्वदेव। अत्राह-यदि

भामती

तुल्यस्थानकरणनिष्पाद्यतयाऽन्योन्यविसदृशतत्तत्पदव्यञ्जकध्वनिसादृश्येन स्वव्यञ्जनीयस्यैकस्य पदतत्त्वस्य मिथो विसदृशानेकपदसादृश्यान्यापादयन्तः सादृश्योपाधानभेदादेकमप्यभागमपि नानेव भागवदिव भासयन्ति मुखमिवैकं नियतवर्णपरिमाणस्थानसंस्थानभेदमपि मणिकृपाणदर्पणादयोऽनेकमनेकवर्णपरिमाणस्थानसंस्थानभेदम्। एवञ्च कल्पिता एवास्य भागा वर्णा इति चेत्, तत्किमिदानीं वर्णभेदानसत्यपि बाधके मिथ्येति वस्तुमभ्यवसितोऽसि ? एकधीरेव नानारवस्य बाधिकेति चेत्, हन्तास्यां नाना वर्णाः प्रथन्त इति नानावभास एवैकत्वं कस्मान्न बाधते। अथवा वनसेनादिवुद्धिवदेकत्वनानात्वे न विरुद्ध्ये। नो खलु सेनावनबुद्धी गजपदाति तुरगादीनां चम्पकाशोककिंशुकानीनाञ्च भेदमपबाधमाने उदीयेते, अपि तु भिन्नानामेव सतां केनचिदेकेनोपाधिनाऽवच्छिन्नानामेकत्वमापादयतः। न चौपाधिकेनैकत्वेन स्वाभाविकं नानात्वं विरुध्यते, नह्योपचारिकमग्नित्वं माणवकस्य स्वाभाविकनरत्वविरोधि। तस्मात्प्रत्येकवर्णानुभवजनित-

भामती-व्याख्या

शङ्का—प्रत्येक ध्वनि एक पदतत्त्व की अभिव्यक्ति करती हुई उसे अनेक और सावयव-रूप में दर्शाती है, क्योंकि ध्वनियां स्वयं बाह्य और आभ्यन्तर प्रयत्न के भेद से भिन्न होती हैं। 'गङ्गा, औष्ण्यम्, वृक्षः' के समान विसदृश (विजातीय) पदों की व्यञ्जकीभूत ध्वनियों के सदृश होने पर भी ताल्वादि तुल्य स्थान एवं वाग्रूप समान करण से निष्पाद्य होती हैं। अत एव वे (ध्वनियां) अपने व्यञ्जनीय पदतत्त्व में परस्पर विसदृश अनेक पदों की सदृशताएँ आरोपित करती हैं, सादृश्यरूप उपाधि के भेद से भिन्न प्रतीत होती हैं। जैसे मणि, कृपाण, दर्पणादि उपाधियाँ नियत वर्ण, परिमाण और संस्थान विशेषवाले एक ही मुख को अनेक वर्ण, परिमाण और संस्थान के भेद से भिन्न-जैसा झलकाती हैं, वैसे ही कथित व्यञ्जकीभूत ध्वनियाँ एक ही पदतत्त्व को अनेक रूपों में अभिव्यञ्जित करती हैं। इस प्रकार अखण्ड स्फोट तत्त्व के वर्णरूप अवयव कल्पितमात्र हैं, उनके आधार पर ही स्फोट की प्रतीति वर्ण-दूषित होती है।

समाधान—तब क्या किसी बाधक प्रमाण के न होने पर भी अनुभूयमान वर्णों को मिथ्या कहने पर आप (स्फोटवादी) तुले हुए हैं ? पदाद्विगत एकत्व-प्रतीति को ही नानात्व की बाधिका मानने पर वर्णगत नानात्व की प्रतीति को एकत्व का बाधक क्यों नहीं मान लिया जाता ?

अथवा जैसे वन और सेना आदि की प्रतीतियों में औपाधिक और अनौपाधिकरूप से एकत्व और नानात्व का समन्वय देखा जाता है, वैसा ही वर्णों की प्रतीति में भी सम्भव है, क्योंकि 'एकं वनम्, एका सेना'—ये दोनों बुद्धियां क्रमशः गज, वाजी और पदाति (पैदल) के नानात्व एवं चम्पक, अशोक और किंशुकानि वृक्षों के भेद (नानात्व) का बाध करके उत्पन्न नहीं होती हैं। अपितु उनके नानात्व को अक्षुण्ण रखती हुई किसी एक उपाधि से अवच्छिन्न गजादि और चम्पकादि नाना पदार्थों में एकत्व का आपादन करती हैं। न तो

स्फोटवादनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०३

वर्णा एव सामस्त्येनेकबुद्धिविषयतामापद्यमानाः पदं स्युस्ततो जारा राजा कपिः पिक इत्यादिषु पदविशेषप्रतिपत्तिर्न स्यात् । त एव हि वर्णा इतरत्र चेतरत्र च प्रत्यव-भासन्त इति) अत्र वदामः - सत्यपि समस्तवर्णप्रत्यवमर्शे यथा क्रमानुरोधिन्य एव पिपीलिकाः पंक्तिबुद्धिमारोहन्ति, एवं क्रमानुरोधिन एव वर्णाः पदबुद्धिमारोक्ष्यन्ति । तत्र वर्णानामविशेषेऽपि क्रमविशेषकृता पदविशेषप्रतिपत्तिर्न विरुध्यते । वृद्धव्यवहारे चेमे वर्णाः क्रमाद्यनुगृहीता गृहीतार्थविशेषसम्बन्धाः सन्तः स्वव्यवहारेऽप्येकैकवर्ण-ग्रहणानन्तरं समस्तप्रत्यवमर्शिन्यां बुद्धौ तादृशा एव प्रत्यवभासमानास्तं तमर्थमव्य-भिचारेण प्रत्याययिष्यन्तीति वर्णवादिनो लघीयसी कल्पना, स्फोटवादिनस्तु दृष्टहानि-

भामती

भावनानिचयलब्धजन्मनि निखिलवर्णावगाह्नि स्मृतिज्ञान एकस्मिन् भासमानानां वर्णानां तदेकविज्ञान-विषयतया वैकार्थधीहेतुतया वेकत्वमौपचारिकमवगन्तव्यम् । न चैकार्थधीहेतुत्वेनैकत्वमेकत्वेन चैकार्थधी-हेतुभाव इति परस्पराश्रयम् । नह्यर्थप्रत्ययात् पूर्वमेतावन्तो वर्णा एकस्मृतिसमारोहिणो न प्रथन्ते । न च तत्प्रथानान्तरं वृद्धस्यार्थाधीनोन्नीयते, तदुन्नयनाच्च तेषामेकार्थधियं प्रति कारकत्वमेकमवगम्यैकपदत्वाध्यव-सानमिति नान्योन्याश्रयम् । न चैकस्मृतिसमारोहिणां क्रमाक्रमविपरीतक्रमप्रयुक्तानामभेदो वर्णानामिति यथाकथञ्चित् प्रयुक्तेभ्य एतेभ्योऽर्थप्रत्ययप्रसङ्ग इति वाच्यम्, उक्तं हि—

यावन्तो यादृशा ये च पदार्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति ।

ननु पङ्क्तिबुद्धावेकस्यामक्रमायामपि वास्तवो शालादीनामस्ति पङ्क्तिरिति तथैव प्रथा युक्ता,

भामती-व्याख्या

औपाधिक एकत्व स्वाभाविक नानात्व का विरोधी होता है और न माणवक में गौण अग्नित्व धर्म स्वाभाविक मनुष्यत्व का ही बाधक होता है। फलतः प्रत्येक वर्ण के अनुभव से जनित संस्कारों के द्वारा उत्पादित समस्तवर्णावगाहिनी एक ही स्मृति में भासमान नाना वर्णों में स्मृतिरूप एक ज्ञान की विषयता अथवा एकार्थज्ञान की हेतुता होने के कारण एकत्व का औपचारिक भान मानना चाहिए। वर्णों में एकार्थज्ञान-हेतुत्वेन एकत्व और एकत्व के द्वारा एकार्थज्ञान-हेतुत्व की कल्पना से अन्योऽन्याश्रयता की जो प्रसक्ति दी गई, वह उचित नहीं, क्योंकि एकार्थज्ञान-हेतुत्व के बिना ही वर्णों में स्मृतिरूप एकज्ञान की विषयता के द्वारा एकत्व का भान हो जाता है। नाना वर्णों का भान होने पर गृहीतसंगतिक वृद्ध पुरुषों के द्वारा अर्थावबोध उन्नीत नहीं होता - ऐसा नहीं, किन्तु होता है, अतः एकार्थज्ञान को वर्णों में एक कारणता का बोध करके एकपदत्व का अध्यवसान (निश्चय) होता है, अतः किसी प्रकार का अन्योऽन्याश्रय प्रसक्त नहीं होता।

शङ्का—वाक्य के घटकीभूत नाना वर्णों की एक स्मृति हो सकती है, किन्तु उनका क्रम एक ही रहे—यह आवश्यक नहीं, व्युत्क्रम भी हो सकता है, अतः व्युत्क्रम से स्मर्यमाण वर्णों के द्वारा भी अभिलषित अर्थावबोध होना चाहिए।

समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करते हुए श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—

यावन्तो यादृशा ये च पदार्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्याः ते तथैवावबोधकाः ॥ (श्लो. वा. पृ. ५२७)

अर्थात् संगति-ग्रहण-काल में जिस क्रम विशेष से युक्त वर्ण अर्थ प्रत्यायन में समर्थ माने जाते हैं, वे उसी क्रम से युक्त होकर अवबोधक माने जाते हैं, व्युत्क्रम से नहीं।

शङ्का—बहुत-से शाल वृक्षों की पंक्ति एक है। यद्यपि उक्त पंक्ति में स्वतः कोई क्रम

४०४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २८

दृष्टकल्पना च, वर्णाश्चेमे क्रमेण गृह्यमाणाः स्फोटं व्यञ्जयन्ति स स्फोटोऽर्थं व्यनक्तीति

भामती

न च तथेह वर्णानां नित्यानां विभूनां चास्ति वास्तवः क्रमः, प्रत्ययोपाधिस्तु भवेत्, स चैक इति कुतस्त्यः क्रम एषामिति चेत्, न; एकस्यामपि स्मृतौ वर्णरूपवत्क्रमवत्पूर्वानुभूततापरामर्शात् । तथाहि—जारा- राजेति पदयोः प्रत्ययन्त्योः स्मृतिधियोस्तत्त्वेऽपि वर्णानां क्रमभेदात्पदभेदः स्फुटतरं चकास्ति । तथा च नाक्रमविपरीतक्रमप्रयुक्तानामविशेषः स्मृतिबुद्धावेकस्यां वर्णानां क्रमप्रयुक्तानाम् । यथाहूः—

पदावधारणोपायान् बहूनिच्छन्ति सूरयः । क्रमन्यूनारिक्तत्त्वस्वरवाक्यस्मृतिश्रुतीः ॥ इति ।

शेषमतिरोहितार्थम् । दिङ्मात्रमत्र सूचितं, विस्तरस्तु तत्त्वविन्दाववगन्तव्य इति । अलं वा

भामती-व्याख्या

नहीं, तथापि उस पंक्ति के घटकीभूत शाल वृक्ष अनेक अनित्य और अविभु हैं, अतः उनमें क्रम अवश्य है, उनकी उसी क्रम से पंक्ति-बुद्धि में प्रथा ( भान ) भी उचित है। किन्तु वर्ण नित्य हैं, अतः उनका कालिक और विभु हैं, अतः उनका दैशिक क्रम सम्भव नहीं। उनका स्वाभाविक क्रम न होने पर भी प्रतीतिरूप उपाधि का क्रम माना जा सकता था, किन्तु स्मृति-रूप प्रतीति भी एक ही मानी जाती है, तब वर्णों में क्रम का भान क्योंकर होगा ?

समाधान—यद्यपि उनकी स्मृतिरूप प्रतीति एक है, तथापि अनुभूतियाँ नाना और क्रमिक हैं, अतः स्मरण ज्ञान में जैसे वर्णों के समान ही उनके क्रम की अनुभूतता परामृष्ट होती है, जैसे—'जारा' और 'राजा' इन दोनों पदों की स्मृतियाँ दो हैं, उनमें वर्णों का क्रम अवश्य स्मृतिजनकीभूत अनुभव के सम्पर्क से प्रतिभात होता है, अत एव उन दोनों पदों का भेद अत्यन्त स्फुटरूप में प्रस्फुरित होता है। उन दोनों पदों का भेद केवल क्रम-भेद पर ही आधृत है, वर्ण-भेद पर नहीं, क्योंकि वर्णों का कोई भेद नहीं। फलतः स्मृति एक होने पर भी अनुक्रम और विक्रम से उच्चरित वर्णोंवाले पदों में अविशेषता न रह कर विशेषता आ जाती है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—

पदावधारणोपायान् बहूनिच्छन्ति सूरयः । क्रमन्यूनातिरिक्तत्वस्वरवाक्यस्मृतिश्रुतीः ॥ ( श्लो. वा. पृ. ८६६ )

[ वर्णों का भेद न होने पर भी पदो का भेद क्योंकर होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि 'जारा', 'राजा'—इत्यादि पदों के भेद-बोधक बहुत-से उपाय होते हैं, जैसे—(१) अश्व-अश्वकर्णादि में क्रम का न्यूनाधिकभाव, (२) 'इन्द्रशत्रुः' इत्यादि स्थल पर बहुव्रीहि समास है ? अथवा षष्ठी-तत्पुरुष ? इस संशय का निर्णायक स्वर-भेद है, क्योंकि बहुव्रीहि और तत्पुरुषादि समासों के स्वर-भेद का प्रतिपादन व्याकरण में किया गया है। (३) 'पचते' इत्यादि पद सुबन्त ( चतुर्थ्यन्त ) हैं ? अथवा क्रिया-पद ? इस प्रश्न के उत्तर में वाक्य 'एकवाक्यतापन्न पदान्तर के प्रयोग ) को निर्णायक माना है, अर्थात् 'पचते दक्षिणां देहि'—ऐसे वाक्यों में 'पचते' पद चतुर्थ्यन्त और 'ओदनं पचते'—इत्यादि वाक्यों में क्रिया-पद है। (४) 'अश्वस्त्वं देवदत्त' इत्यादि स्थलों पर 'अश्वः' पद घोड़े का वाचक न होकर क्रिया-पद कैसे बना ? इस प्रश्न का उत्तर स्मृति ( व्याकरणरूप स्मृति प्रमाण ) से दिया जाता है कि 'टुओश्वि गतिवृद्ध्योः' धातु का लुङ् लकार में मध्यमैकवचनान्त प्रयोग है । (५) 'उद्भिदा यजेत'—इत्यादि स्थलों पर 'उद्भिदा यागेन' इस प्रकार सामानाधिकरण्य श्रुति के द्वारा 'उद्भिद्' पद में याग-वाचकता निर्णीत होती है ]। शेष भाष्य सुगम है। पूर्वोत्तर मीमांसा-सम्मत शब्दतत्त्व का यहाँ दिग्दर्शनमात्र किया गया है, इस विषय का विस्तार तत्त्वविन्दु

स्फोटवादनिरसः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०५

गरीयसी कल्पना स्यात् । अथापि नाम प्रत्युच्चारणमन्येऽन्ये वर्णाः स्युः, तथापि प्रत्यभिज्ञालम्बनभावेन वर्णसामान्यानामवश्याभ्युपगन्तव्यत्वाद्या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया रचिता सा सामान्येषु संचारयितव्या । ततश्च नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यविरुद्धम् ॥ २८ ॥

अत एव च नित्यत्वम् ॥ २९ ॥

स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिभिः स्थिते वेदस्य नित्यत्वे देवादिव्यक्तिप्रभवाभ्युपगमेन तस्य विरोधमाशङ्क्य 'अतः प्रभवात्' इति परिहृत्येदानों तदेव वेदनित्यत्वं स्थितं द्रढयति—अत एव च नित्यत्वमिति । अत एव नियताकृतेर्देवादेर्जगतो वेदशब्दप्रभवत्त्वाद्देशब्दे नित्यत्वमपि प्रत्येत्तव्यम् । तथा च मन्त्रवर्णः—'यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्' (ऋ० सं० १०।७१।३) इति स्थितामेव वाचमनुविन्नां दर्शयति । वेदव्यासश्चैवमेव स्मरति—'युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासान्महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवा' इति ॥ २९ ॥

भामती

नैयायिकैर्विवादेन, सन्त्वनित्या एव वर्णास्तथापि गत्वाद्यवच्छेदेनैव सङ्गतिग्रहोऽनादिश्च व्यवहारः सेत्स्यतीत्याह ॐ अथापि नाम इति ॐ ॥ २८ ॥

ननु प्राच्यामेव मीमांसायां वेदस्य नित्यत्वं सिद्धं तत् किं पुनः साध्यत इत्यत आह ॐ स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादेव हि स्थिते वेदस्य नित्यत्वे इति ॐ । नह्यनित्याज्जगदुत्पत्तुमर्हति तस्याप्युत्पत्तिमत्त्वेन सापेक्षत्वात् । तस्मान्नित्यो वेदो जगदुत्पत्तिहेतुत्वाद् , ईश्वरवदिति सिद्धमेव नित्यत्वमनेन दृढीकृतम् । शेषमतिरोहितार्थम् ॥ २९ ॥

भामती-व्याख्या

के आरम्भ में ही किया गया है। नैयायिकों के साथ विवाद न करके यदि वर्णात्मक शब्द को अनित्य भी मान लिया जाय, तब भी कोई दोष नहीं, क्योंकि गकारादि वर्णों में प्रत्यभिज्ञायमान गत्वादि जातियों को सभी नित्य मानते हैं। उन्हीं जातियों में गोत्वादि की वाच्यता या वाचकतावच्छेदकता मान कर अनादि व्यवहार का निर्वाह किया जा सकता है—ऐसा भाष्यकार कह रहे हैं—"अथापि नाम प्रत्युच्चारणमन्येऽन्ये वर्णाः स्युः, तथापि या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया रचिता, सा सामान्येषु सञ्चारयितव्या" ॥ २८ ॥

श्री शबरस्वामी ने कहा है—"यच्चैते पदसंघाताः पुरुषकृता दृश्यन्ते इति । परिहृतं तदस्मरणादिभिः" (शाबर. पृ. ९९) इस भाष्य को ध्यान में रख कर कहा गया है—'स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिति स्थिते वेदस्य नित्यत्वे' । अर्थात् पूर्व मीमांसा के वेदअपौरुषेयत्वाधिकरण में ही वेदों की नित्यता सिद्ध कर दी गई थी, इस उत्तर मीमांसा के देवताधिकरण में पूर्वपक्षी की ओर से वेद-नित्यत्व का विरोध उठाते हुए कहा गया कि जिन विग्रहधारी देवताओं को ज्ञान में अधिकार दिया जाता है, वे अनित्य हैं और उनकी उत्पत्ति वैदिक शब्दों से मानी गई है, कादाचित्क कार्य का कारण भी कादाचित्क या अनित्य ही होता है, अतः वेदों को नित्य मानना तर्क-संगत नहीं। इस विरोध का परिहार करते हुए सिद्धान्ती ने कहा—"अतः प्रभवात्" । अर्थात् जातिरूप नित्य शब्द से व्यक्तिरूप अनित्य देवताओं का प्रभव (जन्म) माना जाता है। अनित्य कार्य का कारण भी अनित्य होता है—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि अनित्य शब्द का कारण आकाश एवं अनित्य जगत् का कारण ईश्वर नित्य ही माना गया है। प्रत्युत यह नियम अवश्य है कि अनित्य कारण से जगत् की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, अन्यथा उत्पादक-परम्परा-कल्पना-प्रयुक्त अनवस्था प्रसक्त होगी।

४०६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३०

समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्स्मृतेश्च ॥ ३० ॥

अथापि स्यात्—यदि पश्वादिव्यक्तिवद्देवादिव्यक्तयोऽपि संतत्यैवोत्तपद्येरन्निरु- ध्येरंश्च ततोऽभिधानाभिधेयाभिधातृव्यवहाराविच्छेदात्संबन्धनित्यत्वेन विरोधः शब्दे परिह्रियेत। यदा तु खलु सकलं त्रैलोक्यं परित्यक्तनामरूपं निर्लेपं प्रलीयते, प्रभवति चाभिनवमिति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति, तदा कथमविरोध इति ? तत्रेदमुभिधीयते— समाननामरूपत्वादिति। तदापि संसारस्यानादित्वं तावदभ्युपगन्तव्यम्। प्रतिपाद-

भामती

शङ्कापवोत्तरत्वात् सूत्रस्य शङ्कापदानि पठति ॐ अथापि स्याद् इति ॐ। अभिधानाभिधेयाविच्छेदे हि सम्बन्ध्नित्यत्वं भवेत्। एवमध्यापकाध्येतृपरम्पराविच्छेदे वेदस्य नित्यत्वं स्यात्। निरन्वयस्य तु तु जगतः प्रबिलयेऽत्यन्तासत्क्षापूर्वस्योत्पावेऽभिधानाभिधेयावत्यन्तमुच्छिन्नान्निविति किमाश्रयः सम्बन्धः स्यात् ? अध्यापकाध्येतृसन्तानविच्छेदे च किमाश्रयो वेदः स्यात् ? न च जीवास्तद्वासनावासिताः सन्तीति वाच्यम्, अन्तःकरणाद्युपाधिकल्पिता हि ते तद्विच्छेदे न स्थातुमर्हन्ति। न च ब्रह्मणिस्तद्वासना, तस्य विद्यात्मनः शुद्धस्वभावस्य तदयोगात्। ब्रह्मणश्च सृष्टाद्यवान्तःकरणादयस्तदवच्छिन्नाश्च जीवाः प्रादुर्भ- वन्तो न पूर्वकर्माविद्यावासनावन्तो भवितुमर्हन्ति, अपूर्वत्वात्। तस्माद्विरुद्धमिवं शब्दार्थसम्बन्धवेद- नित्यत्वं सृष्टिप्रलयाभ्युपगमेनेति। अभिधातृग्रहणेनाध्यापकाध्येतारावुक्तौ। शङ्कां निराकर्तुं सूत्रमवतार- यति ॐ तत्रेदमुभिधीयते समाननामरूपत्वाद् इति ॐ, यद्यपि महाप्रलयसमये नान्तःकरणादयः समुदाचर- द्वृत्तयः सन्ति, तथापि स्वकारणेऽनिर्व्वाच्यायामविद्यायां लीनाः सूक्ष्मेण शक्तिरूपेण कर्मविक्षेपकाविद्या- वासनाभिः सहावतिष्ठन्त एव। तथा च स्मृतिः—

भामती-व्याख्या

फलतः जगत्प्रभवत्वरूप हेतु के द्वारा केवल कथित विरोध का परिहार ही नहीं किया जाता, अपितु प्रसाधित वेद-नित्यत्व का दृढीकरण भी किया जाता है—“अत एव च नित्यत्वम्”। इससे यह अनुमान पर्यवसित होता है—“नित्यो वेदः, जगदुत्पत्तिहेतुत्वाद्, ईश्वरवत्” ।। २९।।

यह तीसवाँ सूत्र जिस शङ्का का समाधान है, वह शङ्का प्रस्तु। की जाती है—“अथापि स्यात्”। यदि वाचक और वाच्य—दोनों अविच्छिन्न हैं, तब उनका सम्बन्ध भी नित्य होगा। इसी प्रकार अध्यापक और अध्येताओं की परम्परा का अविच्छेद होने पर वेद में नित्यत्व रहेगा। यदि बौद्ध-सिद्धान्त के अनुसार जगत् का निरन्वय विनाश, अत्यन्त असत् जगत् का उत्पाद एवं वाचक और वाच्य दोनों का अत्यन्त उच्छेद माना जाता है, तब वाच्यवाचक- भावरूप सम्बन्ध का आधार क्या रहेगा ? अध्यापक और अध्येताओं की परम्परा का विच्छेद मानने पर वेद का आश्रय कौन रहेगा ? अध्ययनवासनाओं से युक्त जीवों की सत्ता भी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि जीव तो अन्तःकरणरूप उपाधि से कल्पित होते हैं, अन्तःकरण का अभाव होने पर वे क्योंकर अवस्थित रह सकेंगे ? ब्रह्म में भी वे अध्ययन-संस्कार नहीं रह सकते, क्योंकि नित्य, शुद्ध, बुद्ध और असङ्ग ब्रह्म में उनके अवस्थान की सम्भावना ही नहीं। ब्रह्म से सृष्टि के आरम्भ में नूतन अन्तःकरणादि उपाधियाँ उत्पन्न होती है, उनसे अवच्छिन्न होकर उत्पन्न होते हुए जीव पूर्व कर्माजित वासनाओं से युक्त नहीं हो सकते, क्योंकि वे नूतन हैं, पूर्व जन्म में थे ही नहीं। फलतः शब्दार्थ-सम्बन्ध और वेद का नित्यत्व मानना सृष्टि-प्रलय की प्रक्रिया से अत्यन्त विरुद्ध ही है। भाष्य में 'अभिधातृ' शब्द के द्वारा अध्यापक और अध्येता—इन दोनों का ग्रहण किया गया है।

उक्त शङ्का का निराकरण करने के लिए अग्रिम सूत्र का अवतरण किया जाता है— “तत्रेदमुभिधीयते समाननामरूपत्वादिति”। यद्यपि महाप्रलय में अन्तःकरणादि सक्रिय नहीं

वेदानामन[ादित्वम् ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्४०७

यिष्यति चाचार्यः संसारस्यानादित्वम्- 'उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च' (ब्र० २।१।३६) इति। अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः प्रलयप्रभवश्रवणेऽपि पूर्वप्रबोधवदुत्तर-प्रबोधेऽपि व्यवहारान्न कश्चिद्विरोधः एवं कल्पान्तरप्रभवप्रलययोरपीति द्रष्टव्यम्। स्वापप्रबोधयोश्च प्रलयप्रभवौ श्रूयेते - 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं

भामती

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ इति ।

ते चावधिं प्राप्य परमेश्वरेच्छाप्रचोदिताः, यथा कूर्मदेहलीनीनाम्यङ्गानि ततो निःसरन्ति, यथा वा वर्षापाये प्रावृमुद्भावनि मण्डूकशरीराणि तद्वासनावासिततया घनघनाघनासारावसेकसुहितानि पुनर्मण्डूकदेहभावमनुभवन्ति । तथा पूर्ववासनावशात्पूर्वसमाननामरूपाण्युपपद्यन्ते । एतदुक्तं भवति- यद्यपीश्वरात्प्रभवः संसारमण्डलस्य, तथापीश्वरः प्राणभृत्कर्माविद्यासहकारी तदनुरूपमेव सृजति । न च सर्गप्रलयप्रवाहस्यानादितामन्तरेणैतदुपपद्यते इति सर्गप्रलयाभ्युपगमेऽपि संसारानादिता न विरुध्यत इति । तदिदमुक्तम् ॐ उपपद्यते, चाप्युपलभ्यते च आगमत इति ॐ । स्यादेतत् - भवत्वनादिता संसारस्य, तथापि महाप्रलयान्तरिते कुतः स्मरणं वेदानामित्यत आह ॐ अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः इति ॐ । यद्यपि प्राणमात्रावशेषतातन्निःशेषते सुषुप्तप्रलयावस्थयोर्विशेषः, तथापि कर्मविक्षेपसंस्कार-

भामती-व्याख्या

होते, तथापि अपने कारणीभूत अनादि और अनिर्वचनीय अविद्या में कर्म-प्रवर्तक भ्रान्तिज वासनाओं के साथ सूक्ष्मरूपेण अवस्थित रहते ही हैं, जैसा कि स्मृतिकारों ने कहा है—

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ( मनु. १।५ )

[ अर्थात् यह समस्त जगत् अपने मूल कारण तमोरूप अज्ञान में विलीन, अप्रज्ञात (अप्रत्यक्ष), अलक्षण (अनुन्मेय), तर्क की पहुँच से बाहर, शब्द के द्वारा भी अज्ञेय और प्रसुप्त (कार्याक्षम) के समान था ]। वे (प्रसुप्त जगत् के घटकीभूत अन्तःकरणादि पदार्थ) अपनी प्रसुप्तावस्था की अवधि (सीमा) पार कर परमेश्वर की इच्छा से अनुप्राणित हो सृष्टिकालीन नाम-रूप के समान नाम-रूप में वैसे ही प्रकट हो जाते हैं, जैसे कच्छुए के शरीर में सिमटे अङ्ग समय पाकर शरीर से बाहर निकल आते हैं, अथवा वर्षा के समाप्त होने पर मेढकों के सूखे एवं पृथिवी की दरारों में चिपके शरीर घनघोर वर्षा के समय सजीव से होकर टरटराने लगते हैं। आशय यह है कि यद्यपि इस संसार-मण्डल का प्रभव ईश्वर से होता है, तथा ईश्वर प्राणियों की अविद्या, कामना और वासनाओं की सहायता से संसार की प्रत्येक इकाई को वही नाम और रूप देता है, जो विगत कल्प में प्रचलित नाम-रूप के समान ही होता है। सृष्टि-प्रलय-प्रवाह की अनादिता के बिना यह सब कुछ सम्भव नहीं, अतः संसार की सृष्टि एवं प्रलय मान लेने पर भी अनादिता विरुद्ध नहीं, केवल इतना ही नहीं, "उपपद्यते चाप्युपलभ्यते चागमतः" मान लेते हैं—संसार की अनादिता, किन्तु महाप्रलय का मध्य में व्यवधान आ जाने पर पूर्वाधीत वेदों का स्मरण क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है— "अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः" । यद्यपि सुषुप्ति में केवल प्राण रहता है और प्रलय में वह भी नहीं, तथापि कर्म-विक्षेप संस्कारों से युक्त अविद्या का अवस्थान सुषुप्ति और प्रलय-

०८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३०

विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः (कौ० ३।३) इति। स्यादेतत् — स्वापे पुरुषान्तरव्यवहाराविच्छेदात्स्वयं च सुप्तप्रबुद्धस्य पूर्वप्रबोधव्यवहारानुसंधानसंभवादविरुद्धम्। महाप्रलये तु सर्वव्यवहारोच्छेदाज्जन्मान्तरव्यवहारवच्च कल्पान्तरव्यवहारस्यानुसंधातुमशक्यत्वाद्वैषम्यमिति। नैष दोषः, सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये परमेश्वरानुग्रहादीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तेः। यद्यपि प्राकृताः प्राणिनो न जन्मान्तरव्यवहारमनुसंदधाना दृश्यन्त इति, तथापि न प्राकृतवदीश्वराणां भवितव्यम्। यथा हि प्राणित्वाविशेषेऽपि मनुष्यादिस्तम्बपर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्यादिप्रतिबन्धः परेण परेण भूयान्भवन्दृश्यते, तथा मनुष्यादि-

भामती

सहितलयलक्षणाविद्यावशेषतासाम्येन स्वापप्रलयावस्थयोर्भेद इति द्रष्टव्यम्। ननु नापर्यायेण सर्वेषां सुषुप्तावस्था, केषाञ्चित्सदा प्रबोधात्, तेभ्यश्च सुप्तोत्थितानां ग्रहणसम्भवात् प्रायणकालविप्रकर्षयोश्च वासनोच्छेदकारणयोरभावेन सत्यां वासनायां स्मरणोपपत्तेः शब्दार्थसम्बन्धवेदव्यवहारानुच्छेदो युज्यते। महाप्रलयस्त्वपर्यायेण प्राणभृन्मात्रवर्ती प्रायणकालविप्रकर्षौ च तत्र संस्कारमात्रोच्छेदहेतू स्तः, इति कुतः सुषुप्तवत्पूर्वप्रबोधव्यवहारवदुत्तरप्रबोधव्यवहार इति चोदयति ॐ स्यादेतत् स्वापः इति ॐ। परिहरति ॐ नैष दोषः। सत्यपि व्यवहारोच्छेदिनि इति ॐ। अयमभिसन्धिः—न तावत्प्रायणकालविप्रकर्षौ सर्वसंस्कारोच्छेदकौ, पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुसन्धानाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तेः। मनुष्यजन्मवासनानां चानेकजात्यन्तरसहस्रव्यवहितानां पुनर्मनुष्यजातिसंवर्तकेन कर्मणाऽभिव्यक्त्यभावप्रसङ्गात्। तस्मान्निकृष्टधियामपि यत्र सत्यपि प्रायणकालविप्रकर्षौ पूर्ववासनानुवृत्तिः, तत्र कैव कथा परमेश्वरानुग्रहेण धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यातिशयसम्पन्नानां हिरण्यगर्भप्रभृतीनां महाधियाम्। यथा वा आ च मनुष्येभ्य आ च कृमिभ्यो ज्ञानादीनामनुभूयते निकर्षः। एवमा मनुष्येभ्य एवा च भगवतो हिरण्यगर्भाज्ज्ञानादीनां

भामती-व्याख्या

दोनों में समानरूप से रहता है, इसी समानता को लेकर स्वाप और प्रलय का अभेद व्यवहृत हुआ है।

शङ्का—खण्ड प्रलय में एक ही समय सभी प्राणियों की सुषुप्ति अवस्था नहीं आती, किन्तु कुछ प्राणियों की सुषुप्ति में भी अन्य प्राणी जागते रहते हैं, उनसे ही सुप्तोत्थित प्राणी वेदों का ग्रहण कर सकते हैं, वासनाओं के नाशक काल का व्यवधान न होने के कारण संस्कार और स्मरण की परम्परा विच्छिन्न नहीं होती, शब्दार्थ-सम्बन्धरूप वेद-व्यवहार का अनुच्छेद रह जाता है किन्तु महाप्रलय में सभी प्राणियों का एक साथ प्रायण हो जाने के कारण संस्कार-मात्र का उच्छेद हो जाता है, अतः प्रलय से पूर्व जैसी स्वाप-प्रबोध की धारा थी, वैसी प्रलय के पश्चात् क्योंकर सम्भव होगी ? भाष्य के शब्दों में वही शङ्का है—"स्यादेतत् स्वापे पुरुषान्तरव्यवहारानुच्छेदात्"

समाधान—उक्त शङ्का का परिहार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"नैष दोषः"। सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये परमेश्वरानुग्रहाद् हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानोपपत्तेः"। अभिप्राय यह है कि प्रायण (मृत्यु) और काल का व्यवधान—ये दोनों समस्त संस्कारों के उच्छेदक नहीं होते, अन्यथा योगसूत्रोक्त पुनः मनुष्यजाति-संवर्तक कर्मों के द्वारा संस्कारों की अभिव्यक्ति क्योंकर होगी ? जब कि निकृष्ट योनी के प्राणियों के मरण और प्रलय का व्यवधान रहने पर भी संस्कार अक्षुण्ण रहता है, तब ईश्वर के कृपापात्र धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यरूप अतिशय से युक्त हिरण्यगर्भादि महान् आत्माओं की बात ही क्या ? अथवा जैसे मनुष्यों से लेकर कीट-पतङ्गादि निकृष्ट प्राणियों में ज्ञान का निकर्ष

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०९

ष्वेव हिरण्यगर्भपर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्याद्यभिव्यक्तिरपि परेण परेण भूयसी भवतीत्येतच्छ्रु-
तिस्मृतिवादेष्वसकृदनुश्रूयमाणं न शक्यं नास्तीति वदितुम् । ततश्चातीतकल्पानुष्ठित-
प्रकृष्टज्ञानकर्मणामीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां वर्तमानकल्पादौ प्रादुर्भवतां परमेश्वरा-
नुगृहीतानां सुप्तप्रतिबुद्धवत्कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तिः । तथा च श्रुतिः—
'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये' ( श्वे० ६।१८ )
इति । स्मरन्ति च शौनकादयः 'मधुच्छन्दः-
प्रभृतिभिर्ऋषिभिर्दाशतय्यो दृष्टाः'
इति । प्रतिवेदं चैवमेव काण्डर्ष्यादयः स्मर्यन्ते ।
श्रुतिरप्यृषिज्ञानपूर्वकमेव मन्त्रेणानुष्ठानं दर्शयति—यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैव-
तब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गर्तं वा प्रतिपद्यते'
( सर्वानु० परि० )
इत्युपक्रम्य 'तस्मादेतानि मन्त्रे मन्त्रे विद्याद् इति । प्राणिनां च
सुखप्राप्तये धर्मो विधीयते। दुःखपरिहाराय चाधर्मः प्रतिषिध्यते । दृष्टानुभविकसुखदुः-


भामती

प्रकर्षोऽपि सम्भाव्यते । तथा च तदभिवदन्तो वेदस्मृतिवादाः प्रामाण्यमप्रत्यूहमश्नुवते । एवं चात्र भवतां हिरण्यगर्भादीनां परमेश्वरानुगृहीतानामुपपद्यते कल्पान्तरसम्बन्धिनिखिलव्यवहारानुसन्धानमिति । सुगममन्यत् ।

स्यादेतत्—अस्तु कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानं तेषामस्यां तु सृष्टावन्य एव वेदाः, अन्य एव चैषामर्थाः, अन्य एव वर्णाश्रमाः । धर्माच्चानर्थोऽर्थश्चाधर्मात् । अनर्थश्चेप्सितोऽर्थश्चानीप्सितोऽपूर्वत्वात् सर्गस्य । तस्मात्कृतमत्र कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानेन, अकिञ्चित्करत्वात् । तथा च पूर्वव्यवहारोच्छेदा-दुच्छिन्नार्थसम्बन्धश्च वेदश्चानित्यो प्रसज्येयातामित्यत आह ॐ प्राणिनां च सुखप्राप्तये इति ॐ । यथावस्तु-स्वभावसामर्थ्यं हि सर्गः प्रवर्तते, न तु स्वभावसामर्थ्यमन्यथयितुमर्हति । न हि जातु सुखं तत्त्वेन जिहा-स्यते, दुःखं चोपाधित्स्यते । न च जातु धर्माधर्मयोः सामर्थ्यविपर्ययो भवति, न हि मृत्पिण्डाद् पटः,


भामती-व्याख्या

(न्यूनत्व) देखा जाता है, वैसे ही मनुष्यों से लेकर भगवान् हिरण्यगर्भ तक उत्तरोत्तर ज्ञान का प्रकर्ष भी सम्भावित है, अतः श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में असकृत् श्रूयमाण उत्तरोत्तर ज्ञानादि का प्रकर्ष मानकर वेद-सम्प्रदाय का प्रामाण्य व्यवस्थित किया जा सकता है ।

**शङ्का—**मान लेते हैं कि कल्पान्तराधीत वेद का स्मरण हिरण्यगर्भादि को होता है किन्तु इस वर्तमान सृष्टि में वेद और उनके अर्थ अन्य ही हैं, वर्णाश्रमादि भी भिन्न हैं, धर्म से पाप और अधर्म से पुण्य का प्रसव होता है। आज हिंसादि अनर्थभूत कर्म अभीष्ट और श्रौत-स्मार्त कर्मरूप उपादेय पदार्थ भी अनिष्ट और अनुपादेय माने जाते हैं। सृष्टि की विलक्षणता नितान्त प्रसिद्ध है। अतः कल्पान्तराधीत वेद का स्मरण यहाँ किस काम का ? इस प्रकार पूर्वप्रचलित व्यवहार का उच्छेद हो जाने से शब्दार्थ-सम्बन्ध एवं वेद—दोनों अनित्य क्यों न होंगे ?

**समाधान—**उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि "प्राणिनां सुखप्राप्तये धर्मो विधीयते, दुःखपरिहाराय चाधर्मः प्रतिषिध्यते"। आशय यह है कि वस्तुओं के स्वभाव और सामर्थ्य के अनुरूप ही सृष्टि प्रवृत्त होती है। वस्तु के स्वभाव और सामर्थ्य का अन्यथाकरण कभी नहीं किया जा सकता, क्योंकि सुख को सुखरूपेण त्याज्य और दुःख को दुःखरूपेण कभी उपादेय नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार धर्म और अधर्म भी अपने स्वभाव और सामर्थ्य के विपरीत नहीं किए जा सकते। क्या कभी मृत्तिका-पिण्ड से पट और

५२

४१० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ १ पा. ३ सू. ३०

खविषयौ च रागद्वेषौ भवतः, न विलक्षणविषयावित्यतो धर्माधर्मफलभूतोत्तरा सृष्टिनिष्पद्यमाना पूर्वसृष्टिसदृइयेव निष्पद्यते । स्मृतिश्च भवति - तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ (म.भा. शां. १२।८५) हिंस्त्राऽहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥' (म.भा. शां. २५।७) इति ।

प्रलीयमानमपि चेदं जगच्छक्त्यवशेषमेव प्रलीयते । शक्तिमूलमेव च प्रभवति; इतरथाऽऽकस्मिकत्वप्रसङ्गात् । न चानेकाकाराः शक्तयः शक्याः कल्पयितुम् । ततश्च विच्छिद्य विच्छिद्याप्युद्भवतां भूर्यादलोकप्रवाहाणां, देवतिर्यङ्मनुष्यलक्षणानां च प्राणिनिकायप्रवाहाणां, वर्णाश्रमधर्मफलव्यवस्थानां चानादौ संसारे नियतत्वमिन्द्रि- यविषयसंबन्धनियतत्ववत्प्रत्येतव्यम् । न हीन्द्रियविषयसंबन्धादेर्व्यवहारस्य प्रतिसर्ग- मन्यथात्वं षष्ठेन्द्रियविषयकल्पं शक्यमुत्प्रेक्षितुम् । अतश्च सर्वकल्पानां तुल्यव्यवहार- त्वात्कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानक्षमत्वाच्चेश्वराणां समाननामरूपा एव प्रतिसर्ग विशेषाः प्रादुर्भवन्ति । समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावपि महासर्गमहाप्रलयलक्षणायां जगतोऽभ्युपगम्यमानायां न कश्चिच्छब्दप्रामाण्यादिविरोधः । समाननामरूपतां च श्रुतिस्मृती दर्शयतः - 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः' (ऋ० सं० १०।१९०।३) इति । यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सूर्याचन्द्रमः- प्रभृति जगत्क्लृप्तं तथास्मिन्नपि कल्पे परमेश्वरोऽकल्पयदित्यर्थः । तथा 'अग्निर्वा अकामयत । अन्नादो देवानां स्यामिति । स एतमग्नये कृत्तिकाभ्यः पुरोडाशमष्टाकपालं निरवपत्' (तै० ब्रा० ३।१।४।१) इति नक्षत्रेष्टिविधौ योऽग्निर्भिरवपद्यस्मै वाऽग्नय निरवपत्तयोः समाननामरूपतां दर्शयतीत्येवंजातीयका श्रुतिरिहोदाहर्तव्या ।

भामती घटश्च तन्तुभ्यो जायते । तथा सति वस्तुसामर्थ्य नियमाभावात् सर्वं सर्वस्माद्द्भवेदिति पिपासुरपि दहन- माहृत्य पिपासामुपशमयेत् , शीतातों वा तोयमाहृत्य शीतातिमिति । तेन सृष्टयन्तरेऽपि ब्रह्महत्यादिरन- र्थहेतुरेवार्थहेतुश्च यागादिरित्यानुपूर्व्यं सिद्धम् । एवं च य एव वेदा अस्मिन् कल्पे त एव कल्पान्तरे त एव चैषामर्थास्त एव च वर्णाश्रमाः । दृष्टसाधर्म्यसम्भवे तद्वैधर्म्यकल्पनमनुमानागमविरुद्धम् । आगमाश्चेह भूयांसो भाष्यकारेण दर्शिताः । श्रुतिस्मृतिपुराणाख्यास्तद्बाधकोपोऽन्यथा भवेत् ॥

भामती-व्याख्या तन्तुओं से घट उत्पन्न होता है ? यदि हो जाय, तब वस्तुओं के सामर्थ्य का कोई नियम नहीं रह जाता, फिर तो अग्नि से प्यास और हिम से ठिठुरन दूर होनी चाहिए। फलतः अन्य सृष्टियों के समान ही इस सृष्टि में भी ब्रह्महत्यादि कर्म अनर्थ के एवं अश्वमेधादि याग अर्थ के ही जनक होते हैं-यह सिद्ध हो जाता है। जो वेद कल्पान्तर में प्रचलित था, वही इस कल्प में भी है, वे ही उनके अर्थ और वे ही वर्णाश्रम हैं। दृष्ट पदार्थों की समानधर्मता जब अदृष्ट पदार्थों में बाधित नहीं, तब उनके वैधर्म्य की कल्पना अनुमान और आगमादि प्रमाणों से बाधित हो जाती है। आगमाश्च भूयांसो भाष्यकारेण दर्शिताः । श्रुतिस्मृतिपुराणाख्याः तद्बाधकापोऽन्यथा भवेत् ॥

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४११

स्मृतिरपि— ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः । शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः ॥ यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्याये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ यथाभिमानिनोऽतीतास्तुल्यास्ते सांप्रतैरपि । देवा देवैरतीतैर्हि रूपैर्नामभिरेव च ॥' (वायुपु. ९।५७-६५) इत्येवंजातीयका द्रष्टव्या ॥ ३० ॥

मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ॥ ३१ ॥ इह देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामस्त्यधिकार इति यत्प्रतिज्ञातं तत्पर्यावर्त्यते । देवादीनामनधिकारं जैमिनिराचार्यो मन्यते । कस्मात् ? मध्वादिष्वसंभवात् । ब्रह्मविद्यायामधिकाराभ्युपगमे हि विद्यात्वाविशेषान्मध्वादिविद्यास्वप्यधिकारोऽभ्युपगम्येत । न चैवं संभवति । कथम् ? 'असौ वा आदित्यो देवमधु' ( छा० ३।१।१) इत्यत्र मनुष्या आदित्यं मध्वध्यासेनोपासीरन् । देवादिषु ह्युपासकेष्वभ्युपगम्यमानेष्वादित्यः कमन्यमादित्यमुपासीत ? पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्युपक्रम्य वसवो रुद्रा

भामती तस्मात् सुष्ठूक्तं ॐ समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावपि अविरोध इति ॐ । 'अग्निर्वा अकामयत' इति भाविनीं वृत्तिमाश्रित्य यजमान एवाग्निरुच्यते । नह्यग्नेर्देवतान्तरमग्निरस्ति ॥ ३० ॥ ब्रह्मविद्यास्वधिकारं देवर्षीणां ब्रुवाणः प्रष्टव्यो जायते—किं सर्वासु ब्रह्मविद्यास्वविशेषेण सर्वेषां किम्वा कासुचिदेव केषाञ्चित् ? यद्यविशेषेण सर्वासु, ततो मध्वादिविद्यास्वसम्भवः । ॐ कथम् ? असौ वाऽऽदित्यो देवमध्वित्यत्र हि मनुष्या आदित्यं मध्वध्यासेनोपासीरन् ॐ । उपास्योपासकभावो हि भेदाधिष्ठानो न स्वात्मन्यादित्यस्य देवतायाः सम्भवति । न चादित्यान्तरमस्ति । प्राचामादित्यानामस्मिन् कल्पे क्षीणाधिकारत्वात् । ॐ पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्युपक्रम्य इति ॐ । अयमर्थः—असौ वा आदित्यो

भामती-व्याख्या यह जो कहा गया है कि "अग्निर्वा अकामयत ।" यहाँ अग्नि देवता के उस भावी जन्म को ध्यान में रख कर कहा गया है कि जब अग्नि देवता अपने भावी जन्म में अग्नि नाम का यजमान बनता है, तब वह उक्त कामना एवं कामना के अनुरूप कर्म करता है, जिसमें देवता उस यजमान से भिन्न होता हुआ भी अग्नि नामवाला ही होता है ॥ ३० ॥ जो वादी ब्रह्मविद्या में देवताओं और ऋषियों को अधिकार प्रदान कर रहा है, उससे यह पूछा जाना चाहिए कि क्या सभी प्रकार की ब्रह्म-विद्याओं में सभी को अधिकार है ? अथवा किसी ब्रह्म-विद्या में ही किसी को ही अधिकार है ? यदि सभी में सभी को अधिकार है, तब मध्वादि-विद्याओं में असम्भव हो जाता है, क्योंकि "असौ वा आदित्यो देवमधु" ( छां. ३।१।१) यहाँ मनुष्य तो आदित्य देवता की मधु-बुद्धि से उपासना कर सकता है, किन्तु स्वयं आदित्य देवता किस अन्य आदित्य की उपासना करेगा ? उपास्योपासकभाव सदैव उपास्य और उपासक के भेद की अपेक्षा करता है, अतः आदित्य देवता ही उपासक और वही उपास्य क्योंकर होगा ? उपास्यभूत आदित्य से भिन्न और कोई आदित्य देवता है ही नहीं। पूर्व कल्प के जो आदित्यादि देवता इस समय मनुष्यरूप में हैं, वे देवतारूपता का अधिकार खो बैठे हैं, वे देवता ही नहीं माने जा सकते। "पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्युपक्रम्य"—इत्यादि भाष्य ग्रन्थ

४१२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३१

भादित्या मरुतः साध्याश्च पञ्च देवगणाः क्रमेण तत्तदमृतमुपजीवन्तीत्युपदिश्य ‘स य

भामती

देवमध्विति देवानां मोदनान्मध्विव मधु । भ्रामरमधुसारूप्यान्माहात्म्य श्रुतिः । ‘तस्य मधुनो द्यौरेव तिरश्चीनवंशः । अन्तरिक्षं मध्वपूपः’ । आदित्यस्य हि मधुनोऽपूपः पटलमन्तरिक्षमाकाशं तत्रावस्थानात् । यानि च सोमाज्यपयःप्रभृतीत्यग्नो हूयन्ते तान्यादित्यरश्मिभिरग्निसंवलितैस्तप्तन्नपाकामृतीभावमापन्नान्यादित्यमण्डलम्ऋङ्मन्त्रमधुपैर्नीयन्ते । यथा हि भ्रमराः पुष्पेभ्य आहृत्य मकरन्दं स्वस्थानमानयन्त्येवमृङ्मन्त्रभ्रमराः प्रयोगसमवेतार्थस्मारणाविभक्तऋग्वेवविहितभ्यः कर्मकुसुमेभ्य आहृत्य तन्निष्पन्नमकरन्दमादित्यमण्डलं लोहिताभिरस्य प्राचीनरश्मिनाडीभिरानयन्ति, तदमृतं वसव उपजीवन्ति । तथास्यादित्यमधुनो दक्षिणाभिः रश्मिनाडीभिः शुक्लाभिर्यजुर्वेदविहितकर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नो हुतं सोमादि पूर्ववदमृतभावमापन्नं यजुर्वेद मन्त्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति, तदेतदमृतं रुद्रा उपजीवन्ति । तथास्यादित्यमधुनः प्रतीचीभी रश्मिनाडीभिः कृष्णाभिः सामवेदविहितकर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नौ हुतं सोमादि पूर्ववदमृतभावमापन्नं साममन्त्रस्तोत्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति, तदमृतमादित्या उपजीवन्ति । अथास्यादित्यमधुन उदीचीभिरतिकृष्णाभिः रश्मिनाडीभिरथर्ववेदविहितभ्यः कर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नौ हुतं सोमादिपूर्ववदमृतभावमापन्नमथर्वाङ्गिरसमन्त्रभ्रमरा, तथाश्वमेधवाचःस्तोम-कर्मकुसुमादितिहासपुराणमन्त्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति । अश्वमेधे वाचःस्तोमे च पारिप्लवं शंसन्तीति श्रवणादितिहासपुराणमन्त्राणामध्यक्षस्ति प्रयोगः । तदमृतं मरुत उपजीवन्ति । अथास्य या आदित्यमधुन ऊर्ध्वा रश्मिनाड्यो गोप्यास्ताभिरुपासनभ्रमराः प्रणवकुसुमादाहत्यादित्यमण्डल-

भामती-व्याख्या

का आशय यह है कि "असौ वादित्यो देवमधु"—इस वाक्य के द्वारा आदित्य को देवताओं का मधु इस लिए कहा गया है कि वह देवताओं के मोद का हेतु है, जैसा कि इस वाक्य का भाष्य करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"देवानां मोदनान्मध्विव मधु असौ आदित्यः" (छां. पृ. १३२) । भ्रामर [ भ्रमर अर्थात् मधु-मक्खियों के बनाए गए शहद ] की समानता श्रुति ने दिखाई है—तस्य मधुनो द्यौरेव तिरश्चीनवंशः, अन्तरिक्षं मध्वपूपः" । अर्थात् जैसे किसी तिरछे बाँसादि के सहारे मधु-मक्खियाँ अपना शहद का छत्ता लगाती है, ऐसे स्वर्गरूप तिरछे बाँस में लगा हुआ यह अन्तरिक्ष (आकाश) मधु का अपूप (छत्ता) और उसमें अवस्थित आदित्य शहद है । जितने भी सोम-रस, आज्य (घृत) और दुग्धादि हवि द्रव्य अग्नि में आहुत होते हैं, वे अमृतरूप से परिणत होकर रश्मिरूपी मधुपों (मधु-सञ्चय करने वाली मक्खियों) के द्वारा आदित्य-मण्डल में पहुँचाए जाते हैं । जैसे शहद की मक्खियाँ फूलों से मकरन्द (पुष्प-रस) लाकर शहद के छत्ते में सञ्चित करती है, वैसे ही ऋचारूपी मक्खियाँ कर्मरूपी पुष्पों से कर्म-फलरूप अमृत लाकर आदित्य-मण्डल में सञ्चित करती हैं । मन्त्रों का लक्षण किया जाता है—"प्रयोगसमवेतार्थस्मारकाः मन्त्राः", अतः कर्म के प्रयोग (अनुष्ठान) में विनियुक्त आदित्यादि देवताओं का मन्त्र ही स्मरण दिलाते हैं, [ जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"मन्त्रस्य हि एतत् प्रयोजनं यत् स्मारयति क्रियां साधनं वा" (शाबर. पृ. १४१८) ] । आदित्य-मण्डल की (१) पूर्व दिशा में अवस्थित लाल रश्मियों के द्वारा सञ्चित अमृत का उपभोग वसुसंज्ञक देवगण, (२) दक्षिण दिशा की श्वेत किरणों के द्वारा आनीत यजुर्वेदीय कर्म-फलरूप अमृत का उपभोग रुद्रगण, (३) पश्चिम दिशा की कृष्ण किरणों के द्वारा आहृत सामवेदीय कर्मों के फलरूप अमृत का सेवन आदित्यगण एवं (४) उत्तर दिशा की अत्यन्त कृष्ण रश्मियों के द्वारा आनीत अथर्ववेदीय कर्म के फलरूप अमृत एवं इतिहास पुराणादिरूप रश्मियों के द्वारा आनीत अश्वमेध और वाचःस्तोमसंज्ञक कर्मों के फलरूप अमृत का आसेवन मरुद्गण करते हैं । अश्वमेध और वाचःस्तोम नाम के एकाह क्रतु में "पारिप्लवं

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४१३

एतद्देवामृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति' इत्यादिना वस्वाद्युपजीव्यान्यमृतानि विजानतां वस्वादिमहिमप्राप्तिं दर्शयति। वस्वादयस्तु कान्यान्यन्त्वस्वादीनमृतोपजीविनो विजानीयुः ? कं वाऽन्यं वस्वादिमहिमानं प्रेप्स्युः ? तथा अग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पादः' ( छा० ३।१८।२ ), 'वायुर्वाव संवर्गः' (छा० ४।३।१) 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' ( छा० ३।१९।१ ) इत्यादिषु देवतात्मोपासनेषु न तेषामेव देवतात्मनामधिकारः संभवति । तथा 'इमावेव गोतमभरद्वाजौ चायमेव गोतमोऽयं भरद्वाजः ( बृ० २।२।४ ) इत्यादिष्वृषिसंबन्धेषूपासनेषु न तेषामेवर्षीणामधिकारः संभवति ॥ ३१ ॥


कुतश्च देवादीनामधिकारः ?

भामती

मानयन्ति, तदमृतमुपजीवन्ति साध्याः। ता एता आदित्यमध्यपाश्याः पञ्च रोहितादयो रश्मिनाड्य ऋगादिसम्बद्धाः क्रमेणोपविष्येति योजना। एतदेवामृतं दृष्ट्वोपलभ्य यथास्वं समस्तैः करणैर्यशस्तेज-इन्द्रियसाकल्यवीर्य्यान्नाद्यान्यमृतं तदुपलब्ध्यादित्ये तृप्यन्ति। तेन खल्वमृतेन देवानां वस्वादीनां मोदनं विवक्षवादित्यो मधुः। एतदुक्तं भवति—न केवलमुपास्योपासकभाव एकस्मिन् विरुध्यते, अपितु ज्ञातृज्ञेयभावश्च प्राप्यप्रापकभावश्चेति । ॐ तथाग्निः पादः इति ॐ । अधिदेवतं खल्वाकाशे ब्रह्मदृष्टिविधानार्थं मुक्तम्। आकाशस्य हि सर्वगतत्वं रूपविहीनत्वं च ब्रह्मणा सारूप्यं, तस्य चैतस्याकाशस्य ब्रह्मणश्चत्वारः पादा अग्न्यादयोऽग्निः पाद इत्यादिना दर्शिताः। यथा हि गोः पादा न गवा वियुज्यन्ते, एवमग्न्यादयोऽपि नाकाशेन सर्वगतेनेत्याकाशस्य पादास्तदेवमाकाशस्य चतुष्पदो ब्रह्मदृष्टिं विधाय स्वरूपेण वायुं संवर्गगुणकमुपास्यं विधातुं महीकरोति । ॐ वायुर्वाव संवर्गः ॐ तथा स्वरूपेणैवादित्यं ब्रह्मदृष्ट्योपास्यं विधातुं महीकरोति ॐ आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ॐ उपदेशः। अतिरोहितार्थमन्यत् ॥ ३१ ॥

भामती-व्याख्या

शंसन्ति" का विधान किया गया है, अर्थात् जब तक उस कर्म का समय पूरा न हो, तब तक वेद, पुराण धर्मशास्त्र और इतिहासादि जो भी कण्ठस्थ हो निरन्तर पारिप्लव (अव्यवस्थित) रूप से बोलते रहना चाहिए। इस प्रकार कर्मानुष्ठान-काल में वेद-मन्त्रों के समान इतिहास और पुराणादि के वाक्य भी विनियुक्त हैं। आदित्यरूप मधु की गोप्य ऊर्ध्वगामी रश्मियों के द्वारा जो प्रणवरूपी फूलों से जो अमृत लाया जाता है, उसका साध्यगण उपभोग करते हैं। इस प्रकार आदित्य की पाँच प्रकार की ऋगादि-सम्बन्धित रश्मियों के द्वारा आनीत अमृत वसु आदि देवगणों को मुदित करता है, अतः अमृत के आधारभूत आदित्य गोलक को देव-मधु कहा जाना सर्वथा उचित है। कहने का अभिप्राय यह है कि केवल उपास्य-उपासकभाव ही एक तत्त्व में विरुद्ध नहीं होता, [अपितु ज्ञातृ-ज्ञेयभाव और प्राप्य-प्रापकभाव भी विरुद्ध होता है। अर्थात् आदित्य-मण्डल में वसु आदि देवताओं के द्वारा जो मधुरूपता का ध्यान किया जाता है, उसका फल बताया गया है—वसु आदि देवताओं के स्वरूप की प्राप्ति, किन्तु वसु आदि देवता ही उपासक और उपास्य एवं प्रापक और प्राप्य नहीं हो सकते]।

उसी प्रकार अग्नि, वायु, आदित्य और दिशा में आकाशरूप ब्रह्म के पादों की भावना का इस लिए ध्यान विहित है कि जैसे गो के पाद गौ से बाहर नहीं होते, वैसे ही अग्नि आदि पदार्थ भी आकाश से बाहर नहीं। वायु में संवर्गरूपता की और आदित्य में ब्रह्म की भावना का उपदेश किया गया है। यहाँ भी उन्हीं उपास्यभूत देवताओं को अधिकार क्योंकर होगा ? "इमावेव गोतमभरद्वाजौ अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजः" (बृह. उ. २।२।४) यहाँ पर दो कर्ण, दो नेत्र, दो नासिका और एक वाणी—इन सात इन्द्रियों में सप्त ऋषियों का

४१४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३२

ज्योतिषि भावाच्च ॥ ३२ ॥

यदिदं ज्योतिर्मण्डलं द्युस्थानमहोरात्राभ्यां बम्भ्रमज्जगद्वभासयति, तस्मिन्नादित्यादयो देवतात्ववचनाः शब्दाः प्रयुज्यन्ते । लोकप्रसिद्धेर्वाक्यशेषप्रसिद्धेश्च । न च ज्योतिर्मण्डलस्य हृदयादिना विग्रहेण चेतनतयाऽर्थित्वादिना वा योगोऽवगन्तुं शक्यते, मृदादिवदचेतनत्वावगमात् । एतेनाग्न्यादयो व्याख्याताः । स्यादेतत्, —

भामती

यद्युच्येत नाविशेषेण सर्वेषां देवादीनां सर्वासु ब्रह्मविद्यास्वधिकारः किन्तु यथासम्भवमिति । तत्रेदमभ्युपतिष्ठते ज्योतिषि भावाच्च लौकिको ह्यादित्यादिशब्दप्रयोगप्रत्ययो ज्योतिर्मण्डलादिषु दृष्टो न चैतेषामस्ति चैतन्यं, नह्येतेषु देवदत्तादिवत्तदनुरूपा दृश्यन्ते चेष्टाः । ॐ स्यादेतन्मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्य इति ॐ । तत्र जगृभ्माते दक्षिणमिन्द्रहस्तमिति च, काशिरिन्द्र इदिति च । काशिर्मुष्टिः । तथा 'तुविग्रीवो वपोदरः सुबाहुरन्धसो मदे । इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते' इति विग्रहवत्त्वं देवताया मन्त्रार्थवादा अभिवदन्ति । तथा हविर्भोजनं देवताया दर्शयन्ति । अद्धीन्द्र पिब च प्रस्थितस्येत्यादयः । तथैशानम्—'इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत्पर्वतानाम् । इन्द्रो वृधाम् इन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमं योगे हव्य इन्द्रः' इति । तथा 'ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुष' इति । तथा वरिवसितारं प्रति देवतायाः

भामती-व्याख्या

ध्यान विहित है। इस ऋषि-सम्बन्धी उपासना में उन्हीं ऋषियों को अधिकार कैसे हो सकेगा ? ॥ ३१ ॥

'सामान्यतः सभी देवताओं और सभी ऋषियों को सभी प्रकार की ब्रह्म-विद्याओं में अधिकार नहीं, किन्तु यथासम्भव उपास्य और उपासक का जहाँ भेद है, वहाँ ही अधिकार दिया जा सकता है—"ज्योतिषि भावाच्च"। अर्थात् प्रत्यक्षतः अनुभूयमान ज्योतिर्मण्डल को ही आदित्य नाम से अभिहित किया जाता है, 'आदित्य' शब्द से जनित प्रतीति भी उसी लौकिक ज्योतिर्मण्डल को ही विषय करती है किन्तु यह ज्योतिर्मण्डल चेतन नहीं जड़मात्र है। इसमें देवदत्तादि के समान किसी प्रकार की चेष्टा नहीं पाई जाती। यह किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक कर्म नहीं कर सकता।

शङ्का—मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लोक-प्रसिद्धि के द्वारा देवताओं में विग्रहवत्त्व और चैतन्यादि का प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि "जगृभ्माते दक्षिणमिन्द्रहस्तम्" (ऋ. सं. १०।४७।१) अर्थात् हे इन्द्र ! हमने आपका दक्षिण हाथ पकड़ा है। "इमे चिदिन्द्र रोदसी अपारे यत् संगृभ्णा मघवन् काशिरित् ते।" (ऋ. सं. ३।३०।५) अर्थात् हे मघवन् ! तू यदि इन द्यु और पृथिवी को पकड़ता है, तब ये तेरी मुट्ठी में समा जाते हैं। "तुविग्रीवो वपोदरः सुबाहुरन्धसो मदे । इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते" (ऋ. सं. ८।१७।८) अर्थात् स्थूल ग्रीवा, मोटे पेट और विशाल बाहुवाले इन्द्र ने सोमरस से मद-मत्त होकर वृत्रासुर का वध कर डाला। ये मन्त्र देवताओं के विग्रह का प्रतिपादन करते हैं। हवि का भक्षण भी वे कहते हैं—'अद्धीन्द्र। पिव च प्रस्थितस्य" (ऋ. सं. १०।११६।७) अर्थात् हे इन्द्र ! प्रस्थित (यजमान के द्वारा प्रदत्त) सोमरस का पान करो। देवताओं का ऐश्वर्य भी प्रतिपादित है—"इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत् पर्वतानाम् । इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः ॥" (ऋ. सं. १०।८९।१०)। अर्थात् इन्द्र स्वर्ग, पाताल, वृधा (स्थावर) मेधिर (जङ्गम) के योग-क्षेम में समर्थ है, अतः इन्द्र हवि-समर्पित करने के योग्य है। इसी "ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः" (ऋ. सं. ७।३२।२२)। अर्थात् हे इन्द्र ! आप इस स्थावर और जङ्गम जगत् के शासक और

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४१५

मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमादयमदोष इति, नेत्युच्यते, नहि तावल्लोको नाम किञ्चित्स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति । प्रत्यक्षादिभ्य एव ह्यविचारितविशेषेभ्यः प्रमाणेभ्यः प्रसिद्धयन्नर्थो लोकात्प्रसिध्यतीत्युच्यते । न चात्र प्रत्यक्षादीनामन्यतमं प्रमाणमस्ति । इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्त्वात्प्रमाण-


भामती

प्रसादं प्रसन्नायाश्च फलदानं दर्शयति आहुतिभिरेव देवाम् हुतावः प्रीणाति तस्मै प्रीता इषमूर्जं च यच्छन्ति' इति । 'तृप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयति' इति च । धर्मशास्त्रकारा अप्याहुः— ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः । इति ।

पुराणवचांसि च भूयांसि देवताविग्रहादिपञ्चकप्रपञ्चमाचक्षते । लौकिका अपि देवताविग्रहादिपञ्चकं स्मरन्ति चोपचरन्ति च । तथाहि- यमं दण्डहस्तमालिखन्ति, वरुणं पाशहस्तम्, इन्द्रं वज्रहस्तम् । कथयन्ति च देवता हविर्भुज इति । तथेशनामिमामाहुः--देवग्रामो देवक्षेत्रमिति । तथास्याः प्रसादं च प्रसन्नायाश्च फलदानमाहुः-प्रसन्नोऽस्य पशुपतिः पुत्रोऽस्य जातः । प्रसन्नोऽस्य धनदो धनमनेन लब्धमिति । तदेतत् पूर्वपक्षी दूषयति ॐ नेत्युच्यते । न हि तावल्लोको नाम इति ॐ । न खलु प्रत्यक्षादिव्यतिरिक्तो लोको नाम प्रमाणान्तरमस्ति, किन्तु प्रत्यक्षादिमूला लोकप्रसिद्धिः सत्यतामश्नुते, तदभावे त्वन्धपरम्परावनमूलाभावाद्विप्लवते । न चात्र विग्रहादौ प्रत्यक्षादीनामन्यतममस्ति प्रमाणम् । न चेतिहासादिविमूलं भवितुमर्हति तस्यापि पौरुषेयत्वेन प्रत्यक्षाद्यपेक्षणात् । प्रत्यक्षादीनां चात्राभावादित्याह ॐ इतिहासपुराणमपि इति ॐ । ननूक्तं मन्त्रार्थवादेभ्यो विग्रहादिपञ्चकप्रसिद्धिरित्यत आह ॐ अर्थवादा


भामती-व्याख्या

स्वर्दृशं ( दिव्य दृष्टि-सम्पन्न ) हैं, हम आप की स्तुति करते हैं। यह मन्त्र भी देवताओं के ऐश्वर्य का प्रकाशक है। देवता अपने उपासक पर प्रसन्न हो वर-प्रदान करता है—"आहुतिभिरेव देवान् हुतादः प्रीणाति तस्मै प्रीता इषमूर्जं च यच्छन्ति" ( तै. सं. ५।४।४।१ ) अर्थात् देवतागण यजमान पर प्रसन्न होकर उसको अन्न और बल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार "तृप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयति"—यह मन्त्र भी तृप्ति आदि का अभिधायक है।

धर्मशास्त्रों में भी कहा है—"ते तृप्ताः तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः" । पुराणों में तो देवताओं के विग्रहादि-पञ्चक पर पुष्कल प्रकाश डाला गया है। [(१) विग्रह ( शरीर ), (२) हविर्भक्षण, (३) ऐश्वर्य, (४) प्रसन्नता और (५) फल-दातृत्व—ये देवता के विग्रहादिपञ्चक कहे जाते हैं ] । लौकिक-व्यवहार में भी देवताओं को विग्रहादि से युक्त ही माना जाता है, जैसे कि यमराज का चित्र लोग बनाते हैं—एक विकराल पुरुष आँखें फाड़े खड़ा है, उसके एक हाथ में सुदृढ़ मोटा दण्ड है। वरुण देवता के हाथ में पाश, इन्द्र के हाथ में वज्र दिखाया जाता है। लोग कहते भी हैं कि देवगण हवि का भक्षण करते हैं। देवता के प्रभुत्व का वर्णन करते हैं—'देवग्रामोऽयम्', 'देवक्षेत्रमिदम्'। इसी प्रकार देवता की प्रसन्नता और फल-दातृता का बखान भी किया जाता है—'प्रसन्नोऽस्य पशुपतिः', 'पुत्रोऽस्य जातः' । प्रसन्नोऽस्य धनदः, धनमनेन लब्धम्' ।

पूर्वपक्षी कथित पक्ष पर दोषाभिधान करता है—"नेत्युच्यते, न हि तावल्लोको नाम किञ्चित् स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति"। आशय यह है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों के आधार पर ही टिकी लोक-प्रसिद्धि यथार्थ मानी जाती है, स्वतन्त्र नहीं। जिस लोक-प्रसिद्धि में प्रत्यक्षादि का बल नहीं होता, वह एक अन्ध-परम्परामात्र रह जाती है, इतर प्रमाणों के द्वारा वह विप्लुत (बाधित) हो जाती है। देवता के विग्रहादि में प्रत्यक्षादि प्रमाण सम्भावित नहीं। इतिहासादि को भी देव-विग्रहादि का साधक नहीं मान सकते, क्योंकि इतिहासादि ग्रन्थ पुरुष-रचित होने के कारण प्रत्यक्षादि-सापेक्ष ही होते हैं और विग्रहादि में प्रत्यक्षादि का

४१६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३२

न्तरं मूलमाकाङ्क्षति। अर्थवादा अपि विधिनेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थाः सन्तो न पार्थग्- र्थ्येन देवादीनां विग्रहादिसद्भावे कारणभावं प्रतिपद्यन्ते। मन्त्रा अपि श्रुत्यादिविनि- युक्ताः प्रयोगसमवायिनोऽभिधानार्था न कस्यचिदर्थस्य प्रमाणमित्याचक्षते। तस्माद्-

भामती

अपि इति ॐ । विध्युद्देशेनैकवाक्यतामापद्यमाना अर्थवादा विधिविषयप्राशस्त्यलक्षणापरा न स्वार्थे प्रमाणं भवितुमर्हन्ति । 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ' इति हि शाब्दन्यायविदः, प्रमाणान्तरेण तु यत्र स्वार्थोऽपि सम्पद्यते यथा वायोः क्षेपिष्ठत्वम् । तत्र प्रमाणान्तरवशात्सोऽभ्युपेयते न तु शब्दसामर्थ्यात् । यत्र तु न प्रमाणान्तरमस्ति यथा विग्रहादिपञ्चके सोऽर्थः शब्दादेवावगन्तव्यः । अतत्परश्च शब्दो न तदवगमयितुमलमिति तदवगमायास्य तत्रापि तात्पर्यमभ्युपेतव्यम् । न चैकं वाक्यमुभयपरं भवतीति, वाक्यं भिद्येत । न च सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदो युज्यते । तस्मात्प्रमाणान्तरानधिगता विग्रहादिमत्ता-ऽन्यपराच्छब्दादवगन्तव्येति मनोरथमात्रमित्यर्थः । मन्त्राश्च व्रीह्यादिवच्छ्रुत्यादिविधिभिस्तत्र तत्र विनियुज्य- मानाः प्रमाणभावाननुप्रवेशिनः कथमुपयुज्यन्तां तेषु तेषु कर्मस्वेत्यपेक्षायां दृष्टे प्रकारे सम्भवति नादृष्ट-

भामती-व्याख्या

अभाव है, यही कहा जाता है—"इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्वात् प्रमाणान्तरं मूलमाकां-क्षति"। यह जो कहा गया कि मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों के द्वारा विग्रहादि-पञ्चक अवगत होता है, उसका खण्डन किया जाता है—"अर्थवादा अपि विधिनेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थाः"। महर्षि जैमिनि ने अर्थवादवाक्यों के स्वतन्त्र प्रामाण्य का निराकरण करते हुए कहा है—"विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै. सू. १।२।७) अर्थात् विधि-वाक्य के साथ एकवाक्यतापन्न होकर अर्थवाद वाक्य विधेय की प्रशंसा और निषेध्य पदार्थ की निन्दामात्र में पर्यवसित होते हैं, स्वाभिधेय अर्थ में प्रमाण ही नहीं होते, क्योंकि सर्व-सम्मत न्याय है कि "यत्परः शब्दः, स शब्दार्थः"। अर्थात् जिस पदार्थ में जिस शब्द का तात्पर्य अवसित होता है, वह शब्द उसी अर्थ का अभिधान किया करता है, अन्य अर्थ का नहीं। यदि अन्य अर्थ किसी प्रमाणान्तर से समर्थित होता है, तब वह प्रमाणान्तर ही उस अर्थ में प्रमाण माना जाता है, अर्थवाद वाक्य नहीं, जैसे "वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता" (तै. सं. २।१।१) इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा ध्वनित वायु का शीघ्रगामित्व प्रत्यक्ष प्रमाण से समर्थित है, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण ही उस अर्थ में प्रमाण माना जाता है, अर्थवाद वाक्य नहीं। किन्तु अर्थवाद के द्वारा ध्वनित जिस विग्रहादि-पञ्चकरूप अर्थ में कोई प्रमाणान्तर भी नहीं, वह अर्थ केवल अर्थवाद-वाक्य से प्रमाणित हो सकता था। जब कि अर्थवाद वाक्य का उसमें तात्पर्य ही नहीं, तब वह, उससे प्रमाणित क्योंकर होगा। एक ही अर्थवाद वाक्य विधेयार्थ की प्रशंसा भी करे और विग्रहादि-पञ्चक का प्रतिपादन भी—ऐसा मानने पर वाक्य-भेद हो जाता है—"अर्थभेदाद् वाक्यभेदः" (शाबर. पृ. ७८६)। वाक्य-भेद एक ऐसा दोष है, जिसे यथासम्भव नहीं होने देना चाहिए—"सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदश्च नेष्यते" (श्लो. वा. पृ. १३५)। फलतः देवता में विग्रहादिमत्ता अन्यार्थपरक अर्थवाद वाक्य से प्रमाणित होगी—यह मनोरथ मात्र है।

इसी प्रकार मन्त्र वाक्य भी विग्रहादि को प्रमाणित नहीं कर सकते, क्योंकि वे स्वयं श्रुति, लिङ्गादि प्रमाणों के द्वारा वैसे ही किसी अर्थ में विनियुक्त होते हैं, जैसे "व्रीहिभिर्य-जेत"—यहाँ तृतीया विभक्तिरूप श्रुति के द्वारा व्रीहि का याग में विनियोग होता है। वे किसी अर्थ में प्रमाण ही नहीं माने जाते। 'मन्त्राः कर्मसु कथं विनियुज्यन्ताम्'—इस प्रकार की कैमर्थ्याकांक्षा में दृष्ट प्रकार सम्भव होने पर अदृष्ट-कल्पना उचित नहीं होती। इस प्रकार तो

देवादेर्ज्ञानेऽधिकारः ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्४१७

भावो देवादीनामधिकारस्य ॥ ३२ ॥
भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ ३३ ॥

तुशब्दः पूर्वपक्षं व्यावर्तयति । बादरायणस्त्वाचार्यो भावमधिकारस्य देवादीनामपि मन्यते । यद्यपि मध्वादिविद्यासु देवतादिव्यामित्रास्वसंभवोऽधिकारस्य, तथाप्यस्ति हि शुद्धायां ब्रह्मविद्यायां संभवः । अर्थित्वसामर्थ्याप्रतिषेधाद्यपेक्षत्वादधिकारस्य । न च क्वचिदसंभव इत्येतावता यत्र संभवस्तत्राप्यधिकारोऽपोद्येत । मनुष्याणामपि न सर्वेषां ब्राह्मणादीनां सर्वेषु राजसूयादिष्वधिकारः संभवति । तत्र यो न्यायः सोऽत्रापि भविष्यति । ब्रह्मविद्यां च प्रकृत्य भवति दर्शनं श्रौतं देवाद्यधिकारस्य सूचकम्—'तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम्' (बृ० १।४।१०) इति । 'ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्' इति । 'इन्द्रो ह वै देवानामाभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणाम्' (छा० ८।७।२) इत्यादि च । स्मार्तमपि गन्धर्वयाज्ञवल्क्यसंवादादि । यदप्युक्तं—ज्योतिषि भावाच्चेति । अत्र ब्रूमः—ज्योतिरादिविषया अपि आदित्यादयो देवतावचनाः शब्दाश्चेतनावन्तमैश्वर्याद्युपेतं तं तं देवतात्मानं समर्पयन्ति, मन्त्रार्थवादादिषु तथाव्यवहारात् । अस्ति ह्यैश्वर्ययोगाद्देवतानां ज्योतिराद्या-


भामती

कल्पनोचिता । दृष्टश्च प्रकारः प्रयोगसमवेतार्थस्मरणं, स्मृत्वा चानुतिष्ठन्ति बल्यनुष्ठातारः पदार्थान् । औत्सर्गिकी चार्थपरता पदानामित्यपेक्षितप्रयोगसमवेतार्थस्मरणातत्पर्याणां मन्त्राणां नानधिगते विग्रहादावपि तात्पर्यं युज्यत इति न तेभ्योऽपि तत्सिद्धिः । तस्माद् देवताविग्रहवत्तादिभावग्राहकप्रमाणाभावात् प्राप्ता षष्ठप्रमाणगोचरतास्येति प्राप्तम् ॥ ३२ ॥

एवं प्राप्तेऽभिधीयते—भावन्तु बादरायणोऽस्ति हि—

ॐ तुशब्दः पूर्वपक्षं व्यावर्तयति ॐ इत्यादि, ॐ भूतधातोरित्यादिष्वचेतनत्वमभ्युपगम्यते ॐ इत्यन्तमतिरोहितार्थम् । ॐ मन्त्रार्थवादादिव्यवहाराद् इति ॐ । आदिग्रहणेनेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणि


भामती-व्याख्या

यही है कि मन्त्रों से कर्मानुष्ठान में अपेक्षित क्रिया और उसके साधनीभूत देवतादि का स्मरण करके ही कर्मानुष्ठान सम्भव होता है । पदों में पदार्थपरता का होना एक औत्सर्गिक नियम है, अतः मन्त्र वाक्य का प्रयोग-समवेतार्थ के स्मरण को छोड़ कर विग्रहादि-पञ्चकरूप अनधिगतार्थ में तात्पर्य नहीं माना जा सकता, अतः मन्त्रादि के द्वारा भी देव-विग्रहादि की सिद्धि नहीं हो सकती । फलतः सद्भाव-साधक प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों के द्वारा जब विग्रहादि की सिद्धि नहीं हो सकी, तब अनुपलब्धिरूप छठे प्रमाण के द्वारा उनका अभाव ही सिद्ध होता है ॥ ३२ ॥

कथित पूर्व पक्ष का निराकरण किया जाता है—"भावं तु बादरायणोऽस्ति हि" । सूत्रस्थ 'तु' शब्द के द्वारा पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति करते हुए आचार्यवर बादरायण का कहना है कि ब्रह्मविद्या में देवताओं के अधिकार का सद्भाव है । यह जो कहा गया कि लोक-प्रसिद्ध ज्योतिर्मण्डल में ही 'आदित्य' पद का प्रयोग होता है, ज्योतिर्मण्डल चेतन नहीं, जड़मात्र है, अतः आदित्य उपासना कर ही नहीं सकता कि उसे अधिकार दिया जाय । वह कहना संगत नहीं, क्योंकि प्रसिद्ध ज्योतिर्मण्डल को आदित्य न कह कर उसके अधिष्ठातृ देव को आदित्य कहते हैं, वह चेतन है, जड़ नहीं । मन्त्र और अर्थवादादि वाक्यों में वैसा ही व्यवहार देखा जाता है । 'मन्त्रार्थवादादि'—यहाँ 'आदि' शब्द के द्वारा इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र का

५३

४१८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३३

तमभिश्वावस्थातुं, यथेष्टं च तं तं विग्रहं ग्रहीतुं सामर्थ्यम् । तथा हि श्रूयते सुब्रह्म- ण्यार्थवादे—मेधातिथेर्मेषेति । 'मेधातिथिं ह काण्वायनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार' ( षड्विंश० ब्रा० १।१ ) इति । स्मर्यते च—आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह' इति । मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते 'मृदब्रवीदापोऽब्रुवन्' इत्या- दिदर्शनात् । ज्योतिरादेस्तु भूतघातोरादित्यादिष्वचेतनत्वमभ्युपगम्यते । चेतना- स्त्वधिष्ठातारो देवतात्मानो मन्त्रार्थवादादिव्यवहारादित्युकम् । यदप्युक्तं - मन्त्रार्थ- वादयोरन्यार्थत्वान्न देवताविग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यमिति । अत्र ब्रूमः-प्रत्ययाप्रत्ययौ हि सद्भावासद्भावयोः कारणं, नान्यार्थत्वमनन्यार्थत्वं वा । तथाह्यन्यार्थमपि प्रस्थितः पथि पतितं तृणपर्णाद्यस्तीत्येव प्रतिपद्यते ।

अत्राह-विषम उपन्यासः । तत्र हि तृणपर्णादिविषयं प्रत्यक्षं प्रवृत्तमस्ति, येन तदस्तित्वं प्रतिपद्यते । तत्र पुनर्विध्युद्देशैकवाक्यभावेन स्तुत्यर्थेऽर्थवादे न पार्थग्- र्थ्येन वृत्तान्तविषया प्रवृत्तिः शक्याऽध्यवसातुम् । नहि महावाक्येऽर्थप्रत्यायकेऽवा- न्तरवाक्यस्य पृथक्प्रत्यायकत्वमस्ति यथा 'न सुरां पिबेत्' इति नञ्वति वाक्ये पद- त्रयसंबन्धात्सुरापानप्रतिषेध एवैकोऽर्थोऽवगम्यते, न पुनः सुरां पिबेदिति पदद्वय-


भामती

गृह्णन्ते । मन्त्रादीनां व्यवहारः प्रवृत्तिस्तस्य दर्शनादिति । पूर्वपक्षमनुभाषते । ॐ यदप्युक्तम् इति ॐ । एकदेशिमतेन तावत्परिहरति ॐ अत्र ब्रूमः इति ॐ । तदेतत् पूर्वपक्षिणमुत्थाप्य दूषयति ॐ अत्राह ॐ पूर्वपक्षी । शाब्दी खल्वियं गतिः । यत्तात्पर्याधीनवृत्तित्वं नाम नह्यन्यपरः शब्दोऽन्यत्र प्रमाणं भवितु- मर्हति । नहि श्वित्रिनिमार्जनपरं श्वेतो धावतीति वाक्यम् , इतः सारमेयवेगवद्गमनं गमयितुमर्हति । न च नञ्वति महावाक्येऽवान्तरवाक्यार्थो विधिरूपः शक्योऽवगन्तुम् । न च प्रत्ययमात्रात्सोऽप्यर्थोऽस्य भवति,


भामती-व्याख्या

ग्रहण किया गया है। 'मन्त्रादि-व्यवहार' का अर्थ है—मन्त्रादि वाक्यों की अर्थ-बोधन में प्रवृत्ति, वह अनुभव-सिद्ध है।

पूर्व-पक्ष का अनुवाद किया जाता है—"यदप्युक्तं मन्त्रार्थवादयोरन्यार्थत्वान्न देवता- विग्रहादिप्रकाशनसामर्थ्यम्"। इस पूर्वपक्ष का वेदान्त के एकदेशी आचार्य के मत से परिहार किया जाता है—"अत्र ब्रूमः"। इस एकदेशी आचार्य के मत का पूर्वपक्षी के माध्यम से खण्डन किया जाता है—"अत्राह पूर्वपक्षी"। यह शाब्दी मर्यादा है कि जिस शब्द का जिस अर्थ में तात्पर्य है, उस शब्द की उसी अर्थ में वृत्तिता (अभिधेयता) मानी जाती है, अत एव अन्यपरक शब्द अन्य अर्थ में प्रमाण नहीं हो सकता, जैसे कि 'श्वेतो धावति'—इस वाक्य में 'श्वेतः' शब्द के दो अर्थ होते हैं—( १ ) श्वेत कुष्ठवाला व्यक्ति और ( २ ) 'श्वा इतः'—ऐसा छेद करने पर कुत्ता इधर—ऐसा अर्थ होता है। उसी प्रकार 'धावु गतिशुद्ध्योः' धातु से निष्पन्न 'धावति' क्रिया पद के भी दो अर्थ होते हैं ( १ ) धोता है और ( २ ) दौड़ता है। 'श्वेत कुष्ठवाला (श्वित्री) व्यक्ति अपना कुष्ठ धोता है'—इस अर्थ के बोधक 'श्वेतो धावति'—इस वाक्य के द्वारा 'कुत्ता इधर दौड़ रहा है'—ऐसा अर्थ नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार "नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति'—इस महावाक्य का षोडशिग्रहण-कर्त्तव्यतारूप अवान्तर वाक्यार्थ में तात्पर्य पर्यवसित नहीं हो सकता । 'किसी वाक्य को सुनने के अनन्तर किसी अर्थ की जैसे-तैसे प्रतीति हो गई'—एतावता उस अर्थ में उस वाक्य का तात्पर्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रतीति भ्रमात्मक भी हो सकती हैं। शब्द प्रमाण ही वक्ता के तात्पर्य की अपेक्षा करता है, प्रत्यक्षादि प्रमाण नहीं, क्योंकि जो व्यक्ति जलाहरण के उद्देश्य से