भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 457

ब्रह्मज्ञाने शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३९

( छा० ५।११।७ ) इत्यपि प्रदर्शितैवोपनयनप्राप्तिर्भवति। शूद्रस्य संस्काराभावोऽभिलप्यते, 'शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिः' ( मनु० १०।४ ) इत्येकजातित्वस्मरणात्। 'न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति' (मनु० १०।१२६) इत्यादिभिश्च ॥ ३६ ॥

तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ ३७ ॥

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः । यत्सत्यवचनेन शूद्रत्वाभावे निर्धारिते जाबालं गौतम उपनेतुमनुशासितुं च प्रववृते, 'नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहरोपत्वा नेष्ये न सत्यादगाः' (छा० ४।४।५) इति श्रुतिलिङ्गात् ॥ ३७ ॥

भामती

वेत्यपि प्रदर्शितैवोपनयनप्राप्तिः ॐ । प्राप्तिपूर्वकत्वात् प्रतिषेधस्य येषामुपनेयनं प्राप्तं तेषामेव तन्निषिध्यते। तच्च द्विजातीनामिति द्विजातय एव निषिद्धोपनयना अधिक्रियन्ते न शूद्र इति ॥ ३६ ॥

सत्यकामो ह वै जाबालः प्रमीतपितृकः स्वां मातरं जवालामपृच्छत् । अहमाचार्यकुले ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि, तद् ब्रवीतु भवती किङ्गोत्रोऽहमिति । साऽब्रवीत् — त्वज्जनकपरिचरणपरतया नाहमज्ञासिषं यद्गोत्रं तवेति । स त्वाचार्यं गौतममुपससाद । उपसद्योवाच — हे भगवन् ब्रह्मचर्यमुपेयां त्वयीति । स होवाच, नाविज्ञातगोत्र उपनीयत इति किङ्गोत्रोऽसीति । अथोवाच सत्यकामो नाहं वेद स्वं गोत्रं, स्वां मातरं जबालामपृच्छं, सापि न वेदेति । तदुपश्रुत्याभ्यधाद् गौतमः — नाद्विजन्मन आर्जवं युक्तमीदृशं वचस्तेनास्मिंश्च शूद्रत्वसम्भावनास्तीति त्वां द्विजातिजन्मानमुपनेष्य इत्युपनेतुमनुशासितुं च जाबालं गौतमः प्रवृत्तः । तेनापि शूद्रस्य नाधिकार इति विज्ञायते ॐ न सत्यादगाः इति ॐ । न सत्यमतिक्रान्तवानसीति ॥ ३७ ॥

भामती-व्याख्या

शालादि ऋषियों का उपनयन किए बिना ही उन्हें वैश्वानर-विद्या का उपदेश किया। उसी प्रकार उपनयन संस्कार-रहित शूद्र का भी ब्रह्म-विद्या में अधिकार मानना होगा।

समाधान—महाशालादि ब्राह्मण थे, अतः उनका उपनयन प्राप्त था, किन्तु उनकी अपेक्षा राजा की जाति हीन थी, अतः हीन जाति के द्वारा उच्च जाति का उपनयन निषिद्ध माना गया। शूद्र का उपनयन प्राप्त ही नहीं कि उसका निषेध होता, निषेध सदैव प्राप्तिपूर्वक ही होता है। यदि शूद्र का उपनयन प्रसक्त होता, तब भी उसका वहाँ निषेध नहीं होता, क्योंकि शूद्र की अपेक्षा क्षत्रिय जाति हीन नहीं, उन्नत मानी गई है। फलतः ब्रह्म-विद्या में यदि अनुपनीत का अधिकार है, तो द्विजाति का ही, शूद्र का नहीं ॥ ३६ ॥

छान्दोग्य उपनिषत् (४।४।१) में एक उपाख्यान आता है कि सत्यकाम नाम का एक बालक था, उसके पिता का देहान्त हो चुका था। वह अपनी 'जबाला' नाम की माता से कहने लगा कि मैं आचार्य के पास ब्रह्मचर्य धारण करना चाहता हूँ, अतः आप यह बता दें कि मैं किस गोत्र का हूँ? जबाला ने उत्तर दिया कि मैं तुम्हारे पिता की सेवा में तल्लीन रही, तुम्हारा गोत्र न जान सकी। सत्यकाम आचार्य गौतम की शरण में गया और प्रार्थना की कि भगवन् मैं आप से ब्रह्मचर्य-दीक्षा लेना चाहता हूँ। गौतम ने कहा—जिसके गोत्र का ज्ञान नहीं होता, उसका उपनयनादि नहीं किया जाता, अतः तुम्हारा गोत्र क्या है? सत्यकाम ने उत्तर दिया कि मैं अपना गोत्र नहीं जानता। मैंने अपनी 'जबाला' नाम की माता से पूछा था, वह भी नहीं जानती थी। आचार्य गौतम ने सत्यकाम से कहा कि तुम्हारे-जैसा निष्छल और स्पष्ट वक्ता अब्राह्मण नहीं हो सकता, अतः तुम्हारा उपनयन अवश्य करेंगे। शीघ्र ही आचार्य ने सत्यकाम का उपनयन करके वेदाध्ययन करना आरम्भ कर दिया। इस कथानक से भी यही सिद्ध होता है कि शूद्र का अधिकार वेद-विद्या में नहीं। उक्त श्रुति में जो गौतम