भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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४३८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३६

रजयत' इति च क्षत्रपतित्वावगमात्क्षत्रियत्वमस्यावगन्तव्यम् । तेन क्षत्रियेणाभिप्रतारिणा सह समानायां विद्यायां संकीर्तनं जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वं सूचयति । समानानामेव हि प्रायेण समभिव्याहारा भवन्ति । क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाच्च जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः । अतो न शूद्रस्याधिकारः ॥ ३५ ॥

संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ ३६ ॥

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः, यद्विद्याप्रदेशेषूपनयनादयः संस्काराः परामृश्यन्ते -- 'तं होपनिन्ये' (श० ब्रा० ११।५।३।१३) । 'अधीहि भगव इति होपससाद' (छा० ७।१।१) 'ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः' (प्र० १।१) इति च । 'तान्हानुपनीयैव'


भामती

कापेयानां याज्यो भवति यदि चैत्ररथः स्यात्, समानान्वयानां हि प्रायेण समानान्वया याजका भवन्ति । तस्माच्चैत्ररथत्वादभिप्रतारी काक्षसेनिः क्षत्रियः । तत्समभिव्याहाराच्च जानश्रुतिः क्षत्रियः सम्भाव्यते । इतश्च क्षत्रियो जानश्रुतिरित्याह ॐ क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाच्च ॐ । क्षत्तृप्रेषणे चार्थसम्भारे च तादृशि तस्य वदान्यप्रकृष्टस्यैश्वर्यं प्रायेण क्षत्रियस्य दृष्टं युधिष्ठिरादिवदिति ॥ ३५ ॥

न केवलमुपनीताध्ययनविधिपरामर्शन न शूद्रस्याधिकारः किन्तु तेषु तेषु विद्योपदेशप्रदेशेषूपनयनसंस्कारपरामर्शात् शूद्रस्य तदभावाभिधानाद् ब्रह्मविद्यायामनधिकार इति । नन्वनुपनीतस्यापि ब्रह्मोपदेशः श्रूयते तान् हानुपनीयैवेति । तथा शूद्रस्यानुपनीतस्यैवाधिकारो भविष्यतीत्यत आह ॐ तान् हानुपनीयै-


भामती-व्याख्या

था—यह बात इसके याजक कापेय के सम्बन्ध से अवगत होती है, क्योंकि याजकगण प्रायः अपने समान वंशवालों को यजन कराते हैं। यह अभिप्रतारी चित्ररथ से अन्य होकर ही कापेयगणों का यजमान हो सकता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि अभिप्रतारी चैत्ररथी होने के कारण क्षत्रिय था। इसका सम्बन्ध जिस संवर्ग-विद्या से जोड़ा गया है, उसी विद्या से जानश्रुति भी जुड़ा हुआ है। इस प्रकार समभिव्याहाररूप लिङ्ग (सामर्थ्य) प्रमाण के द्वारा जानश्रुति का क्षत्रिय होना निश्चित होता है। केवल इतने से ही नहीं, क्षत्ता (अपने सारथि) को रैक्य के अन्वेषण के लिए भेजता है, युधिष्ठिर के समान सैकड़ों गौएँ, काञ्चन और मणिमय हारों का दान करता है, अतः निश्चितरूप से जानश्रुति क्षत्रिय था—"क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाच्च जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः"। फलतः जानश्रुति को 'शूद्र' शब्द गौणी वृत्ति (शोकवत्त्वरूप गुण के सम्बन्ध) से ही कह सकता है, मुख्य वृत्ति से नहीं कि वैदिक विद्या में शूद्र का अधिकार सिद्ध हो जाता ॥ ३५ ॥

"अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत तमध्यापयीत"—इत्यादि वाक्यों से सूचित उपनीत व्यक्ति के अध्ययन-विधान का परामर्श ही शूद्राधिकार का विरोधी नहीं, अपितु अनेकत्र ब्रह्म-विद्या के उपदेश-प्रदेशों में उपनयनादि संस्कारों का परामर्श किया गया है, वे संस्कार शूद्र के होते नहीं, अतः ब्रह्म-विद्या में शूद्र का अधिकार नहीं—"इतश्च न शूद्रस्याधिकारः, यद् विद्याप्रदेशेषूपनयनादयः संकाराः परामृश्यन्ते—'तं होपनिन्ये" (शत. ब्रा. ११।३।१३), "अधीहि भगव इति होपससाद" (छां. ७।१।१)। तम् उपनिन्ये (उपनीतवान्) यहाँ उपनयन और 'अधीहि भगव'--यहाँ अध्ययनाध्यापन का उल्लेख किया गया है, क्योंकि 'अधीहि'—इस मन्त्र-पद से विवक्षित है—अध्यापय।

शङ्का—उपनयन संस्कार से रहित व्यक्ति को भी ब्रह्म-विद्या का उपदेश किया गया है—"तान् हानुपनीयैवैतदुवाच" (छां. ५।११।७) अर्थात् महाराज अश्वपति ने प्राचीन-

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