भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 485, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४६७
रस्ति । तत्राविशिष्टायां शरीरद्वयस्य ग्राह्यत्वाकाङ्क्षायां यथाकाङ्क्षं संबन्धेऽनभ्युपगम्य- मान एकवाक्यतैव बाधिता भवति, कुत आम्नातस्यार्थप्रतिपत्तिः ? न चैवं मन्त- व्यम् -- दुःशोधत्वात्सूक्ष्मस्यैव शरीरस्येह ग्रहणं, स्थूलस्य तु दृष्टबीभत्सतया सुशोध- त्वादग्रहणमिति । यतो नैवेह शोधनं कस्यचिद्विवक्ष्यते । न ह्यत्र शोधनविधायि किंचिदा- ख्यातमस्ति । अनन्तरनिर्दिष्टत्वात्तु किं तद्विष्णोः परमं पदमितीदमिह विवक्ष्यते । तथा- हीदमस्मात्परमिदमस्मात्परमित्युक्त्वा 'पुरुषान्न परं किंचिद्' इत्याह । सर्वथापि त्वा- नुमानिकनिराकरणोपपत्तेस्तथा नामास्तु, न नः किंचिच्छिद्यते ॥ ३ ॥
भामती
विज्ञायते । यथाहूः काकेभ्यो रक्ष्यतामन्नमिति बालोऽपि नोदितः । उपघातप्रधानत्वान्न श्वादिभ्यो न रक्षति ॥ इति ।
ननु न शरीरद्वयस्यात्राकाङ्क्षा, किन्तु दुःशोधत्वात् सूक्ष्मस्यैव शरीरस्य, न तु षाट्कौशिकस्य स्थूलस्य, तद्धि दृष्टबीभत्सतया सुकरं वैराग्यविषयत्वेन शोधयितुमित्यत आह ॐ न चैवं मन्तव्यम् इति ॐ । विष्णोः परमं पदमवगमयितुं परं पदमत्र प्रतिपाद्यत्वेन प्रस्तुतं न तु वैराग्याय शोधनमित्यर्थः । अलं वा विवादेन भवतु सूक्ष्मशरीरं परिशोध्यं तथापि न सांख्याभिमतमत्र प्रधानं परमित्यभ्युपेत्याह । ॐसर्वथापि तु इतिॐ ॥ ३ ॥
भामती-व्याख्या
भी नहीं हो सकता—ऐसा नहीं, अपितु उपचारतः अशक्यार्थ के संग्राहक पदों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जैसे कि अन्न के घातक प्राणीमात्र के निवर्तन की आकांक्षा से प्रयुक्त 'काकेभ्यो रक्ष्यतामन्नम्'—इस वाक्य में 'काक' पद काककुकुरादि समस्त अन्नोप- घातक प्राणियों का संग्राहक माना जाता है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं— काकेभ्यो रक्ष्यतामन्नमिति बालोऽपि चोदितः । उपघातकप्रधानत्वान्न श्वादिभ्यो न रक्षति ॥ (तं. वा. पृ. ७१३ )
वाक्यपदीकार भी कहते हैं— काकेभ्यो रक्ष्यतां सर्पिरिति बालोऽपि चोदितः । उपघातपरे वाक्ये न श्वादिभ्यो न रक्षति ॥ (वाक्य. पृ. ४२)
शङ्का—प्रकृत में दोनों शरीरों की आकांक्षा नहीं, अपितु केवल सूक्ष्म शरीर ही अपेक्षित है। क्योंकि शरीरों का शोधन (अनात्मत्व-निश्चय) ही यहाँ अपेक्षित है, सूक्ष्म शरीर का शोधन या विवेक ही विशेष दुष्कर है, षाट्कौशिक शरीर का शोधन कठिन नहीं [माता से प्राप्त लोम, लोहित और मांस तथा पिता से प्राप्त स्नायु, अस्थि और मज्जा—इन छः पदार्थों को षट्कोश कहते हैं, स्थूल शरीर के ये ही मौलिक पदार्थ हैं, अतः स्थूल शरीर षाट्कोशिक कहा जाता है, इसमें अनात्मत्व-निश्चय सुकर है], क्योंकि यह तो देखने में ही इतना बीभत्स लगता है कि साधारण व्यक्ति को भी इससे वैराग्य एवं इसमें अनात्मत्व का निश्चय सहज में ही हो जाता है।
समाधान—उक्त शङ्का का निरास करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि "न चैवं मन्तव्यम्, यतो नैवेह शोधनं कस्यचिद् विवक्ष्यते"। अर्थात् यहाँ पर शरीर-शोधन का कोई प्रसङ्ग ही नहीं और न शोधन का विधायक कोई पद है। सर्वोपरि अवस्थित वैष्णव परम पद का बोध कराने के लिए एक सोपान के रूप में ही शरीर का ग्रहण किया गया है वैराग्यो- त्पादनार्थ शोधन की यहाँ कोई अपेक्षा नहीं। अथवा इस विवाद को समाप्त करते हुए यदि