भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४६६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. ४ सू. ३

तैस्त्वेतद्वक्तव्यम् — अविशेषेण शरीरद्वयस्य पूर्वत्र रथत्वेन संकीर्तितत्वात्समानयोः प्रकृतत्वपरिशिष्टत्वयोः कथं सूक्ष्ममेव शरीरमिह गृह्यते, न पुनः स्थूलमपीति ? आम्नातस्यार्थं प्रतिपत्तुं प्रभवामः, नाम्नातं पर्यनुयोक्तुम् । आम्नातं चाव्यक्तपदं सूक्ष्ममेव प्रतिपादयितुं शक्नोति, नेतरत्, व्यक्तत्वात्तस्येति चेत्, न, एकवाक्यताधीनत्वादर्थप्रतिपत्तेः । न हीमे पूर्वोत्तरे आम्नाते एकवाक्यतामनापद्य कंचिदर्थं प्रतिपादयतः, प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गात् । न चाकाङ्क्षामन्तरेणैकवाक्यताप्रतिपत्ति-


भामती योरुभयत्र तुल्यत्वान्नैकग्रहणनियमहेतुरस्ति । शङ्कते ॥ आम्नातस्यार्थम् इति ॥ अव्यक्तपदमेव स्थूलशरीरव्यावृत्तिहेतुर्व्यक्तत्वात्तस्येति शङ्कार्थः । निराकरोति "नैकवाक्यताधीनत्वात्" इति । प्रकृतहान्यप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गेनेकवाक्यत्वे सम्भवति न वाक्यभेदो युज्यते । न चाकाङ्क्षां विनेकवाक्यत्वमुभयञ्च प्रकृतमित्युभयं ग्राह्यत्वेनेहाकाङ्क्षितमित्येकाभिधायकमपि पदं शरीरद्वयपरम् । न च मुख्यया वृत्त्याऽतत्परमित्योपचारिकं न भवति । यथोपहन्तृमात्रनिराकरणाकाङ्क्षायां काकपदं प्रयुज्यमानं श्वादि सर्वहन्तृपर


भामती-व्याख्या के आरम्भक सूक्ष्म भूतात्मक सूक्ष्म शरीर से संवलित होकर स्वर्गादि लोकों को जाता है, क्योंकि "वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतौ आपः पुरुषवचसो भवन्ति" (छां. ५।३।३) इस प्रकार के प्रश्न और "पञ्चम्यामाहुतौ आपः पुरुषवचसो भवन्ति" (छां. ५.१।१) इस प्रकार के उत्तर से उसी सूक्ष्म शरीर का वर्णन किया गया है। इन दोनों शरीरों का श्रुति ने रथ के रूप में वर्णन किया है। उन दोनों में सूक्ष्म शरीर का 'अव्यक्त' शब्द के द्वारा ग्रहण किया गया है, क्योंकि वह व्यक्त (स्थूल) नहीं अतः 'अव्यक्त पदास्पद है। इसी सूक्ष्म शरीर के अधीन जीव के बन्ध और मोक्ष हैं, अतः यह् जीव की अपेक्षा 'पर' (श्रेष्ठ) है]।

उक्त वृत्तिकार के मत में दोषाभिधान किया जाता है—"तैस्त्वेतद् वक्तव्यम्"। आशय यह है कि प्रकरण और परिशेष दोनों शरीरों के लिए समान हैं, अतः उनमें से किसी एक का ग्रहण क्योंकर होगा ?

शङ्का—श्रुति-घटक 'अव्यक्त' शब्द का समुचित अर्थ हमें करना चाहिए, उस पर 'स्थूल शरीर का अव्यक्त पद के द्वारा अभिधान क्योंकर हो गया ?' ऐसा आक्षेप नहीं किया, जा सकता, फलतः 'अव्यक्त' शब्द व्यक्तेतर केवल सूक्ष्म शरीर का ही अभिधायक है।

समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—"न, एकवाक्यताधीनत्वादर्थप्रतिपत्तेः"। अर्थात् "शरीरं रथमेव तु" (कठो. १।३।३) और महतः परम व्यक्तम्" (कठो. १।३।११) इन पूर्वापरोक्त दोनों वाक्यों की एकवाक्यता के विना 'अव्यक्त' शब्द का सहसा अर्थ नहीं किया जा सकता। 'अव्यक्त' शब्द का केवल सूक्ष्म शरीर अर्थ करने पर प्रकृत शरीरमात्र (सूल और सूक्ष्म-दोनों शरीरों) का हान (अग्रहण) और अप्रकृत (केवल सूक्ष्म शरीर) का ग्रहण प्रसक्त होता है, अतः ऐसे अप्रसङ्ग (प्रसङ्ग की निवृत्ति) के द्वारा पूर्वोत्तर वाक्यों की जब एकवाक्यता हो सकती है, तब वाक्य-भेद युक्ति-संगत नहीं माना जाता, जैसा कि वार्तिककार ने कहा है—"सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदो न युज्यते" (श्लो. वा. पृ. १३१)। दो वाक्यों की एकवाक्यता परस्पर की आकांक्षा के बिना नहीं होती, आकांक्षा प्रकृत की होती है और प्रकृत है शरीरमात्र (उभय शरीर), अतः दोनों शरीर ही यहाँ अव्यक्तपदास्पदत्वेन आकांक्षित हैं, फलतः केवल सूक्ष्मशरीर का वाचक 'अव्यक्त' पद दोनों शरीरों का बोधक है। 'अव्यक्त' पद यदि शरीर-द्वय का मुख्य (अभिधा) वृत्ति से वाचक नहीं होता, एतावता औपचारिक (लक्षणा वृत्ति से शरीर-द्वय का बोधक)