भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४६५

अन्ये तु वर्णयन्ति — द्विविधं हि शरीरं स्थूलं सूक्ष्मं च । स्थूलं यदिदमुपलभ्यते । सूक्ष्मं यदुत्तरत्र वक्ष्यते—'तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम्' ( बृ० ३।१।१ ) इति । तच्चोभयमपि शरीरमविशेषात्पूर्वत्र रथत्वेन संकीर्तितम् । इह तु सूक्ष्ममव्यक्तशब्देन परिगृह्यते, सूक्ष्मस्याव्यक्तशब्दार्हत्वात् । तदधीनत्वाच्च बन्धमोक्षव्यवहारस्य जीवात्तस्य परत्वम् । यथार्थाधीनत्वादिन्द्रियव्यापारस्येन्द्रियेभ्यः परत्वमर्थानामिति ।

भामती यस्यामविद्यायां सत्यां शेरत इति लय उक्तः, संसारिण इति विक्षेप उक्तः । ॐ अव्यक्ताधीनत्वाज्जीवभावस्य इति ॐ । यद्यपि जीवाव्यक्तयोरनादित्वेनानियतं पौर्वापर्यं तथाप्यव्यक्तस्य पूर्वत्वं विवक्षितवैतदुक्तं ॐ सत्यपि शरीरवदिन्द्रियादीनाम् इति ॐ । गोबलीवर्दपदवदेतत् द्रष्टव्यम् । आचार्यदेशीयमतमाह ॐ अन्ये तु इति ॐ । एतद् दूषयति ॐ तैस्तु इति ॐ । प्रकरणपरिशेष्य-

भामती-व्याख्या अविद्या का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि विद्यात्मक ब्रह्म ( ईश्वर ) में अविद्या का रहना सर्वथा अनुपपन्न है । इसी भाव को ध्वनित करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—"यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः" । 'यस्यामविद्यायाम्'—यहाँ सति सप्तमी है, अतः 'जिस अविद्या के रहने पर'—ऐसा अर्थ विवक्षित है। जीवों का जो अपना वास्तविक ब्रह्मरूप है, उसे विस्मरण करके 'शेरते' अर्थात् सुषुप्ति में लीन रहते हैं—इससे लयावस्था और 'संसारिणः'—इस विशेषण के द्वारा 'विक्षेप' अवस्था का अभिधान किया गया है। दो अनादि पदार्थों को प्रत्येक में दूसरे की अधीनता विवक्षित होती है, जैसे—'बीजाधीनो वृक्षः' और 'वृक्षाधीनं बीजम्' । भाष्यकार ने जो कहा है "अव्यक्ताधीनत्वाज्जीवभावस्य"। वहाँ भी अव्यक्त ( अविद्या ) और जीवभाव—दोनों अनादि पदार्थ हैं, पौर्वापर्यरूप को लेकर जीवभाव में अव्यक्ताधीनत्व नहीं कहा जा सकता, तथापि अव्यक्त में पूर्वकालत्व की विवक्षा करके जीवभाव में अव्यक्ताधीनत्व कह दिया है। भाष्यकार ने जो कहा है—"सत्यपि शरीरवदिन्द्रियादीनां तद्विकारत्वाविशेषे शरीरस्यैवाभेदोपचारादव्यक्तशब्देन ग्रहणम्, इन्द्रियाणां स्वशब्दैरेव गृहीतत्वात्, परिशिष्टत्वाच्च शरीरस्य" । यह सब गोबलीवर्दन्न्याय को ध्यान में रख कर कहा है [ जैसे 'गामानय बलीवर्दं चानय'—ऐसे आज्ञावाक्य को सुन कर श्रोता 'गो' पद के द्वारा नर गौ ( बैल ) से अतिरिक्त मादा गौओं (गायों) का ग्रहण कर लेता है, क्योंकि यद्यपि 'गो' पद नर और मादा दोनों प्रकार के गोमण्डल को कहता है, तथापि नर गौ का पृथक् 'बलीवर्द' पद से उल्लेख होने के कारण मादा गौएँ ही शेष रहती हैं, अतः 'गामानय'—यहाँ 'गो' पद से मादा गौओं का ग्रहण न्यायोचित है। वैसे ही "इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः, अर्थेभ्यश्च परं मनः मनसस्तु परा बुद्धिः, बुद्धेरात्मा महान् परः, महतः परमव्यक्तम्"—यहाँ पर यद्यपि 'अव्यक्त' शब्द शरीर, इन्द्रिय और शब्दादि समस्त विकार-वर्ग का बोधक है। तथापि इन्द्रियादि का पृथक् उल्लेख होने के कारण अवशिष्ट शरीर का ही ग्रहण 'अव्यक्त' पद से करना अत्यन्त संगत है ] । वृत्तिकारादि आचार्यों के मत से उक्त दोनों सूत्रों की व्यवस्था का प्रदर्शन किया जाता है—"अन्ये तु वर्णयन्ति"। [ उनका कहना है कि शरीर दो प्रकार का होता है—(१) स्थूल और (२) सूक्ष्म । प्राणियों का यह दृश्यमान शरीर स्थूल शरीर है और सूक्ष्म शरीर आगे चल कर कहा जायगा—"तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम्" ( ब्र. सू. ३।१।१ ) अर्थात् यह जीव देहान्तर की प्राप्ति के अवसर पर भावी स्थूल शरीर ५९