भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४६४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. ३ |
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अविद्यात्मिका हि बीजशक्तिरव्यक्तशब्दनिर्देश्या परमेश्वराश्रया मायामयी महासुप्तिः, यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः। तदेतदव्यक्तं क्वचिदाकाशशब्दनिर्दिष्टम्—'एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च' (बृ० ३।८।११) इति श्रुतेः। क्वचिदक्षरशब्दोदितम्, 'अक्षरात्परतः परः' (मु० २।१।२) इति श्रुतेः। क्वचिन्मायेति सूचितम्, 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' (श्वे० ४।१०) इति मन्त्रवर्णात्। अव्यक्ता हि सा माया, तत्त्वान्यत्वनिरूपणस्याशक्यत्वात्। तदिदं 'महतः परमव्यक्तम्' इत्युक्तम्, अव्यक्तप्रभवत्वान्महतः, यदा हैरण्यगर्भी बुद्धिर्महान्, यदा तु जीवो महान्, तदाप्यव्यक्ताधीनत्वाज्जीवभावस्य 'महतः परमव्यक्तम्' इत्युक्तम्। अविद्या ह्यव्यक्तम्। अविद्यावत्त्वेनैव जीवस्य सर्वः संव्यवहारः संततो वर्तते। महतः परत्वमभेदोपचारात्तद्विकारे शरीरे परिकल्प्यते। सत्यपि शरीरवदिन्द्रियादीनां तद्विकारत्वाविशेषे शरीरस्यैवाभेदोपचारादव्यक्तशब्देन ग्रहणम्, इन्द्रियादीनां स्वशब्दैरेव गृहीतत्वात्परिशिष्टत्वाच्च शरीरस्य।
भामती
भयसिद्धेः। अविद्यात्वमात्रेण चैकत्वोपचारोऽव्यक्तमिति, चाव्याकृतमिति चेति। नन्वेवमविद्यैव जगद्बीजमिति कृतमीश्वरेणेत्यत आह ॐ परमेश्वराश्रया इति ॐ। नह्यचेतनं चेतनानधिष्ठितं कार्याय पर्याप्तमिति स्वकार्यं कर्तुं परमेश्वरं निमित्ततयोपादानतया चाश्रयते, प्रपञ्चविभ्रमस्य हीश्वराधिष्ठानत्वमहिग्विभ्रमस्येव रज्ज्वधिष्ठानत्वं तेन यथाऽहिविभ्रमो रज्जुपादान एवं प्रपञ्चविभ्रम ईश्वरोपादानस्तस्माज्जीवाधिकरणाप्यविद्या निमित्ततया विषयतया चेश्वरमाश्रयति इतीश्वराश्रयेत्युच्यते, न त्वाधारतया, विद्यास्वभावे ब्रह्मणि तदनुपपत्तेरिति, अत एवाह ॐ यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः इति ॐ।
भामती-व्याख्या
समाधान—जिस बीज से जो वृक्ष उत्पन्न होता है, उसी वृक्ष से उसी बीज की उत्पत्ति मानने पर ही अन्योन्याश्रयता की प्रसक्ति मानी जाती है, अन्यान्य बीजों से अन्यान्य वृक्षों की उत्पत्ति मानने पर अन्योन्याश्रयता नहीं होती, क्योंकि बीज और वृक्ष का अनादि प्रवाह माना जाता है। ठीक उसी प्रकार अविद्या और जीवों का भेद (अनेकत्व) अनादि होने के कारण उभय की सिद्धि सम्भव हो जाती है। [श्री मण्डन मिश्र ने भी इसी प्रकार की अन्योन्याश्रयता-प्रसक्ति का समाधान किसी पुरातन आचार्य के मत से किया है—"अन्ये तु अनादित्वादुभयोरविद्याजीवयोर्बीजाङ्कुरसन्तानयोरिव नेतरेतराश्रयत्वमप्रकृतिभावमावहतीति वर्णयन्ति, तथा चोक्तम् अविद्योपादानभेदवादिभिः—"अनादिरप्रयोजना चाविद्या।" (ब्र. सि. पृ. १०)]। यद्यपि अविद्याएँ अनेक हैं, तथापि उन सबका अविद्यात्वेन संग्रह विवक्षित होने के कारण 'अव्यक्तम्'—इस प्रकार एकवचनान्त 'अव्यक्त' पद के द्वारा अभिधान किया गया है। 'अव्यक्त' शब्द का अर्थ है—अव्याकृत। यदि अविद्या ही जगत् की बीज शक्ति है, तब ईश्वर की क्या आवश्यकता? इस प्रश्न का उत्तर है—"परमेश्वराश्रया मायामयी महासुप्तिः"। ऐसा कभी सम्भव नहीं कि केवल जड़ पदार्थ किसी चेतन से अधिष्ठित (सञ्चालित) न होकर ही समग्र कार्य का सम्पादन कर ले, अतः जडरूप अविद्या अपना कार्य सम्पादन करने के लिए निमित्त-कारण या उपादानकारण के रूप में परमेश्वर का आश्रय लेती है। प्रपञ्चरूप विभ्रम की अधिष्ठानता ईश्वर में वैसी है, जैसी सर्प-विभ्रम की अधिष्ठानता रज्जु में, अत एव जैसे सर्प-भ्रम का उपादानकारण रज्जु है, वैसे ही प्रपञ्च-विभ्रम का उपादान कारण ईश्वर। फलतः जीवरूप आधार में रहनेवाली अविद्या निमित्त या विषय के रूप में ईश्वर को अपनाने के कारण ही ईश्वराश्रया कही जाती है, ईश्वर वस्तुतः