भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४६३
हि सा। न हि तया विना परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वं सिद्ध्यति, शक्तिरहितस्य तस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः। मुक्तानां च पुनरनुत्पत्तिः कुतः? विद्यया तस्या बीजशक्तेर्दाहात्।
भामती
यदि ब्रह्मणोऽविद्याशक्त्या संसारः प्रतीयते हन्त मुक्तानामपि पुनरुत्पादप्रसङ्गः, तस्याः प्रधानवत्तादवस्थ्यात्, तद्विनाशे वा समस्तसंसारोच्छेदस्तन्मूलाविद्याशक्तेः समुच्छेदादित्यत आह ॐ मुक्तानाञ्च पुनः ॐ बन्धस्य ॐ अनुत्पत्तिः ॐ। कुतः ? ॐ विद्यया तस्या बीजशक्तेर्दाहात् ॐ। अयमभिसन्धिः—न वयं प्रधानवदविद्यां सर्वजीवेष्वेकामाचक्ष्महे येनैवमुपालभेमहि किन्त्वियं प्रतिजीवं भिद्यते। तेन यस्यैव जीवस्य विद्योत्पन्ना तस्यैवाविद्याऽपनीयते न जीवान्तरस्य, भिन्नाधिकरणयोर्विद्याविद्ययोर्विरोधात्, तत्कुतः समस्तसंसारोच्छेदप्रसङ्गः। प्रधानवादिनां त्वेष दोषः। प्रधानस्यैकत्वेन तदुच्छेदे सर्वोच्छेदोऽनुच्छेदे वा न कस्यचिदित्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः। प्रधानभेदेऽपि चेत्तद्विवेकख्यातिलक्षणाविद्यासदसत्त्वनिबन्धनौ बन्धमोक्षौ तर्हि कृतं प्रधानेन? अविद्यासदसद्भावाभ्यामेव तदुपपत्तेः। न चाविद्योपाधिभेदाधीनो जीवभेदो जीवभेदाधीनश्चाविद्योपाधिभेद इति परस्पराश्रयादुभयासिद्धिरिति साम्प्रतम्, अनादित्वाद्वीजाङ्कुरवदु-
भामती-व्याख्या
ही) इसका अव्यक्तत्व है। वेदान्त के अव्याकृतकारण वाद से सांख्य के अव्यक्तकारणवाद का यह महान् अन्तर है। 'अविद्या ईश्वर के अधीन है। इसका अर्थ है 'अविद्या ईश्वर के आश्रित' है [ यहाँ ईश्वराश्रित का ईश्वरविषयक या ईश्वराधिष्ठित अर्थ है, क्योंकि वाचस्पति मिश्र अविद्या को जीव के आश्रित मानते हैं, जिस का निरूपण पहले ही किया जा चुका है ] । स्वतन्त्र जड़ पदार्थ कोई कार्य करने के योग्य नहीं होता, अतः ईश्वराधिष्ठित अविद्या तत्त्व ही अर्थवान् कहा जाता है—"अर्थवत्"।
शङ्का—यदि ब्रह्म की अविद्या शक्ति से संसार का प्रजनन माना जाता है, तब मुक्त पुरुषों का पुनर्जन्म होना चाहिए, क्योंकि प्रधानतत्त्व के समान ही अविद्या तत्त्व भी अक्षुण्ण बना रहता है। यदि विद्या से अविद्या तत्त्व का उच्छेद मान लिया जाता है, तब समस्त संसार का उच्छेद हो जायगा, क्योंकि संसार के मूलकारणीभूत एक मात्र अविद्या तत्त्व का समुच्छेद हो जाता है।
समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण भाष्यकार करते हैं—"मुक्तानां पुनरनुत्पत्तिः"। मुक्तानां पुरुषाणां बन्धस्य अनुत्पत्तिः। मुक्त पुरुषों के बन्धन की पुनः उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि विद्या के द्वारा उस की बीजभूत अविद्याशक्ति नष्ट हो जाती है। आशय यह है कि हम वेदान्तिगण ) प्रधान तत्त्व के समान अविद्या को सभी जीवों में एक ही नहीं मानते कि उसके नष्ट हो जाने पर सभी जीवों की एक-साथ मुक्ति प्रसञ्जित होती, किन्तु प्रत्येक जीव में अविद्या भिन्न-भिन्न होती है, अतः जिस जीव में विद्या का उदय होता है, उसी जीव की अविद्या का अपनयन होता है, अन्य जीवों की अविद्या का नहीं, क्योंकि भिन्न-भिन्न अधिकरणों में रहनेवाली विद्या और अविद्या का कोई विरोध नहीं होता, तब एक अविद्या का उच्छेद हो जाने पर समस्त संसार का उच्छेद क्योंकर प्रसक्त होगा? यदि कहा जाय कि प्रधानतत्त्व के होने पर भी प्रकृति और पुरुष की अविवेकख्यातिरूप अविद्या की सत्ता और असत्ता पर बन्ध और मोक्ष निर्भर हैं, तब उस प्रधान तत्त्व की क्या आवश्यकता ? अविद्या के सदसद्भाव से ही बन्ध और मोक्ष की उपपत्ति हो जाती है।
शङ्का—अविद्यारूप उपाधि का भेद (नानात्व) होने पर जीवों का भेद एवं जीवों का भेद सिद्ध होने पर अविद्या का भेद सिद्ध होगा—इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त क्यों न होगा?