भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४६२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. ४ सू. ३ |
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तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्' (बृ० १।४।७) इतीदमेव व्याकृतनामरूपविभिन्नं जगत्प्रागवस्थायां परित्यक्तव्याकृतनामरूपं बीजशक्त्यवस्थमव्यक्तशब्दयोग्यं दर्शयति ॥ २ ॥
तदधीनत्वादर्थवत् ॥ ३ ॥
अत्राह—यदि जगदिदमनभिव्यक्तनामरूपं बीजात्मकं प्रागवस्थमव्यक्तशब्दार्हमभ्युपगम्येत, तदात्मना च शरीरस्याप्यव्यक्तशब्दार्हत्वं प्रतिज्ञायेत, स एव तर्हि प्रधानकारणवाद एवं सत्यापद्येत । अस्यैव जगतः प्रागवस्थायाः प्रधानत्वेनाभ्युपगमादिति । अत्रोच्यते—यदि वयं स्वतन्त्रां, कांचनित्प्रागवस्थां जगतः कारणत्वेनाभ्युपगच्छेम, प्रसञ्जयेम तदा प्रधानकारणवादम् । परमेश्वराधीना त्वियमस्माभिः प्रागवस्था जगतोऽभ्युपगम्यते, न स्वतन्त्रा । सा चावश्याभ्युपगन्तव्या । अर्थवती
भामती
कमित्यनर्थान्तरम् ॥ नन्वेवं सति प्रधानमेवाभ्युपेतं भवति, सुखदुःखमोहात्मकं हि जगदेवम्भूतादेव कारणाद्भवितुमर्हति कारणात्मकत्वात्कार्यस्य । यच्च तस्य सुखात्मकत्वं तत्सत्त्वम् , यच्च तस्य दुःखामकत्वं तद्रजः, यच्च तस्य मोहात्मकत्वं तत्ततः । तथा चान्यक्तं प्रधानमेवाभ्युपेतमिति ॥ २ ॥
शङ्कानिराकरणार्थं सूत्रम्—तदधीनत्वादर्थवत् ।
प्रधानं हि सांख्यानां सेश्वराणामनीश्वराणां वेश्वरात् क्षेत्रज्ञेभ्यो वा वस्तुतो भिन्नं शक्यं निर्वक्तुम् । ब्रह्मणस्त्वियमविद्या शक्तिर्मायाविद्याशब्दवाच्या न शक्या तत्त्वेनान्यत्वेन वा निर्वक्तुम् । इदमेवास्या अव्यक्तत्वं यदनिर्वच्यत्वं नाम । सोऽयमव्याकृतवादस्य प्रधानवादाद्भेदः । अविद्याशक्तेश्चेश्वराधीनत्वं तदाश्रयत्वात् । न च द्रव्यमात्रमशक्तं कार्यायालमिति शक्तेरर्थवत्त्वं, तदिदमुक्तमर्थवदिति । स्यादेतत्—
भामती-व्याख्या
शब्द का व्यवहार—"गोभिः "श्रीणीत मत्सरम्" (ऋ० सं० ९।४६।४) सोम लता के रस को मत्सर कहते हे, क्योंकि वह कुछ मद-कारक होता है, उसको दूध में मिलाने का यहाँ विधान किया गया है। यद्यपि 'श्रीञ् पाके' धातु के लोट् लकार के मध्यमपुरुष-बहुवचन में 'श्रीणीत' शब्द बना है, तथापि यहाँ पकाने में 'श्रीञ्' का प्रयोग न होकर मिलाने, (मिश्रण करने) में माना जाता है]। प्रकृति में 'अव्यक्त' शब्द के व्यवहार का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है—"श्रुतिश्च" तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतं मासीत् (बृह० उ० १।४।७)। अव्याकृत और अव्यक्त-पद पर्याय हैं ॥ २ ॥
शङ्का— यदि इस स्थूल शरीरादि जगत् की प्राग्भावी (सूक्ष्म) अवस्था को अव्यक्त कहा जाता है, तब यही तो सांख्य-सम्मत प्रधानकारणवाद है अर्थात् सुखदुःखमोहात्मक जगत् उसी प्रकार के प्रधान या प्रकृतितत्त्व से ही उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि कार्य और कारण का अभेद (एकस्वभावता) निश्चित है। कारणतत्त्व में जो सुखरूपता है, वही सत्त्व गुण है, जो दुःखरूपता है, वही रजोगुण है, और जो उसमें मोहात्मकत्व है, वही तमो गुण है—इस प्रकार कारण तत्त्व त्रिगुणात्मक प्रधान पदार्थ ही मानना होगा।
समाधान— उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए यह सूत्र रचा गया है—"तदधीनत्वात्" वेदान्त-सिद्धान्त में वह कारण तत्त्व अविद्या शक्ति है, जो कि शक्तिमान् ईश्वर से भिन्न नहीं एवं उस के अधीन है, किन्तु सांख्य चाहे निरीश्वरवादी (कपिल) हो या सेश्वरवादी (पातञ्जल) हो, दोनों के मतों में प्रतिपादित प्रधान तत्त्व ईश्वराधीन नहीं माना जाता, अपि तु जीव और ईश्वर से भिन्न वस्तुसत् और स्वतन्त्र माना जाता है किसी के अधीन नहीं। वेदान्ताभिमत अविद्या शक्ति वह मायापदार्थ है, जिसका न सत्त्वरूप से निर्वचन हो सकता है, न असत्त्वरूप से, अतः वह अनिर्वचनीय है। यही (अनिर्वचनीयत्व