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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
४६२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ १ पा. ४ सू. ३

तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्' (बृ० १।४।७) इतीदमेव व्याकृतनामरूपविभिन्नं जगत्प्रागवस्थायां परित्यक्तव्याकृतनामरूपं बीजशक्त्यवस्थमव्यक्तशब्दयोग्यं दर्शयति ॥ २ ॥

तदधीनत्वादर्थवत् ॥ ३ ॥

अत्राह—यदि जगदिदमनभिव्यक्तनामरूपं बीजात्मकं प्रागवस्थमव्यक्तशब्दार्हमभ्युपगम्येत, तदात्मना च शरीरस्याप्यव्यक्तशब्दार्हत्वं प्रतिज्ञायेत, स एव तर्हि प्रधानकारणवाद एवं सत्यापद्येत । अस्यैव जगतः प्रागवस्थायाः प्रधानत्वेनाभ्युपगमादिति । अत्रोच्यते—यदि वयं स्वतन्त्रां, कांचनित्प्रागवस्थां जगतः कारणत्वेनाभ्युपगच्छेम, प्रसञ्जयेम तदा प्रधानकारणवादम् । परमेश्वराधीना त्वियमस्माभिः प्रागवस्था जगतोऽभ्युपगम्यते, न स्वतन्त्रा । सा चावश्याभ्युपगन्तव्या । अर्थवती

भामती

कमित्यनर्थान्तरम् ॥ नन्वेवं सति प्रधानमेवाभ्युपेतं भवति, सुखदुःखमोहात्मकं हि जगदेवम्भूतादेव कारणाद्भवितुमर्हति कारणात्मकत्वात्कार्यस्य । यच्च तस्य सुखात्मकत्वं तत्सत्त्वम् , यच्च तस्य दुःखामकत्वं तद्रजः, यच्च तस्य मोहात्मकत्वं तत्ततः । तथा चान्यक्तं प्रधानमेवाभ्युपेतमिति ॥ २ ॥

शङ्कानिराकरणार्थं सूत्रम्—तदधीनत्वादर्थवत् ।

प्रधानं हि सांख्यानां सेश्वराणामनीश्वराणां वेश्वरात् क्षेत्रज्ञेभ्यो वा वस्तुतो भिन्नं शक्यं निर्वक्तुम् । ब्रह्मणस्त्वियमविद्या शक्तिर्मायाविद्याशब्दवाच्या न शक्या तत्त्वेनान्यत्वेन वा निर्वक्तुम् । इदमेवास्या अव्यक्तत्वं यदनिर्वच्यत्वं नाम । सोऽयमव्याकृतवादस्य प्रधानवादाद्भेदः । अविद्याशक्तेश्चेश्वराधीनत्वं तदाश्रयत्वात् । न च द्रव्यमात्रमशक्तं कार्यायालमिति शक्तेरर्थवत्त्वं, तदिदमुक्तमर्थवदिति । स्यादेतत्—

भामती-व्याख्या

शब्द का व्यवहार—"गोभिः "श्रीणीत मत्सरम्" (ऋ० सं० ९।४६।४) सोम लता के रस को मत्सर कहते हे, क्योंकि वह कुछ मद-कारक होता है, उसको दूध में मिलाने का यहाँ विधान किया गया है। यद्यपि 'श्रीञ् पाके' धातु के लोट् लकार के मध्यमपुरुष-बहुवचन में 'श्रीणीत' शब्द बना है, तथापि यहाँ पकाने में 'श्रीञ्' का प्रयोग न होकर मिलाने, (मिश्रण करने) में माना जाता है]। प्रकृति में 'अव्यक्त' शब्द के व्यवहार का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है—"श्रुतिश्च" तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतं मासीत् (बृह० उ० १।४।७)। अव्याकृत और अव्यक्त-पद पर्याय हैं ॥ २ ॥

शङ्का— यदि इस स्थूल शरीरादि जगत् की प्राग्भावी (सूक्ष्म) अवस्था को अव्यक्त कहा जाता है, तब यही तो सांख्य-सम्मत प्रधानकारणवाद है अर्थात् सुखदुःखमोहात्मक जगत् उसी प्रकार के प्रधान या प्रकृतितत्त्व से ही उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि कार्य और कारण का अभेद (एकस्वभावता) निश्चित है। कारणतत्त्व में जो सुखरूपता है, वही सत्त्व गुण है, जो दुःखरूपता है, वही रजोगुण है, और जो उसमें मोहात्मकत्व है, वही तमो गुण है—इस प्रकार कारण तत्त्व त्रिगुणात्मक प्रधान पदार्थ ही मानना होगा।

समाधान— उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए यह सूत्र रचा गया है—"तदधीनत्वात्" वेदान्त-सिद्धान्त में वह कारण तत्त्व अविद्या शक्ति है, जो कि शक्तिमान् ईश्वर से भिन्न नहीं एवं उस के अधीन है, किन्तु सांख्य चाहे निरीश्वरवादी (कपिल) हो या सेश्वरवादी (पातञ्जल) हो, दोनों के मतों में प्रतिपादित प्रधान तत्त्व ईश्वराधीन नहीं माना जाता, अपि तु जीव और ईश्वर से भिन्न वस्तुसत् और स्वतन्त्र माना जाता है किसी के अधीन नहीं। वेदान्ताभिमत अविद्या शक्ति वह मायापदार्थ है, जिसका न सत्त्वरूप से निर्वचन हो सकता है, न असत्त्वरूप से, अतः वह अनिर्वचनीय है। यही (अनिर्वचनीयत्व

अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४६३

हि सा। न हि तया विना परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वं सिद्ध्यति, शक्तिरहितस्य तस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः। मुक्तानां च पुनरनुत्पत्तिः कुतः? विद्यया तस्या बीजशक्तेर्दाहात्।

भामती

यदि ब्रह्मणोऽविद्याशक्त्या संसारः प्रतीयते हन्त मुक्तानामपि पुनरुत्पादप्रसङ्गः, तस्याः प्रधानवत्तादवस्थ्यात्, तद्विनाशे वा समस्तसंसारोच्छेदस्तन्मूलाविद्याशक्तेः समुच्छेदादित्यत आह ॐ मुक्तानाञ्च पुनः ॐ बन्धस्य ॐ अनुत्पत्तिः ॐ। कुतः ? ॐ विद्यया तस्या बीजशक्तेर्दाहात् ॐ। अयमभिसन्धिः—न वयं प्रधानवदविद्यां सर्वजीवेष्वेकामाचक्ष्महे येनैवमुपालभेमहि किन्त्वियं प्रतिजीवं भिद्यते। तेन यस्यैव जीवस्य विद्योत्पन्ना तस्यैवाविद्याऽपनीयते न जीवान्तरस्य, भिन्नाधिकरणयोर्विद्याविद्ययोर्विरोधात्, तत्कुतः समस्तसंसारोच्छेदप्रसङ्गः। प्रधानवादिनां त्वेष दोषः। प्रधानस्यैकत्वेन तदुच्छेदे सर्वोच्छेदोऽनुच्छेदे वा न कस्यचिदित्यनिर्मोक्षप्रसङ्गः। प्रधानभेदेऽपि चेत्तद्विवेकख्यातिलक्षणाविद्यासदसत्त्वनिबन्धनौ बन्धमोक्षौ तर्हि कृतं प्रधानेन? अविद्यासदसद्भावाभ्यामेव तदुपपत्तेः। न चाविद्योपाधिभेदाधीनो जीवभेदो जीवभेदाधीनश्चाविद्योपाधिभेद इति परस्पराश्रयादुभयासिद्धिरिति साम्प्रतम्, अनादित्वाद्वीजाङ्कुरवदु-


भामती-व्याख्या

ही) इसका अव्यक्तत्व है। वेदान्त के अव्याकृतकारण वाद से सांख्य के अव्यक्तकारणवाद का यह महान् अन्तर है। 'अविद्या ईश्वर के अधीन है। इसका अर्थ है 'अविद्या ईश्वर के आश्रित' है [ यहाँ ईश्वराश्रित का ईश्वरविषयक या ईश्वराधिष्ठित अर्थ है, क्योंकि वाचस्पति मिश्र अविद्या को जीव के आश्रित मानते हैं, जिस का निरूपण पहले ही किया जा चुका है ] । स्वतन्त्र जड़ पदार्थ कोई कार्य करने के योग्य नहीं होता, अतः ईश्वराधिष्ठित अविद्या तत्त्व ही अर्थवान् कहा जाता है—"अर्थवत्"।

शङ्का—यदि ब्रह्म की अविद्या शक्ति से संसार का प्रजनन माना जाता है, तब मुक्त पुरुषों का पुनर्जन्म होना चाहिए, क्योंकि प्रधानतत्त्व के समान ही अविद्या तत्त्व भी अक्षुण्ण बना रहता है। यदि विद्या से अविद्या तत्त्व का उच्छेद मान लिया जाता है, तब समस्त संसार का उच्छेद हो जायगा, क्योंकि संसार के मूलकारणीभूत एक मात्र अविद्या तत्त्व का समुच्छेद हो जाता है।

समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण भाष्यकार करते हैं—"मुक्तानां पुनरनुत्पत्तिः"। मुक्तानां पुरुषाणां बन्धस्य अनुत्पत्तिः। मुक्त पुरुषों के बन्धन की पुनः उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि विद्या के द्वारा उस की बीजभूत अविद्याशक्ति नष्ट हो जाती है। आशय यह है कि हम वेदान्तिगण ) प्रधान तत्त्व के समान अविद्या को सभी जीवों में एक ही नहीं मानते कि उसके नष्ट हो जाने पर सभी जीवों की एक-साथ मुक्ति प्रसञ्जित होती, किन्तु प्रत्येक जीव में अविद्या भिन्न-भिन्न होती है, अतः जिस जीव में विद्या का उदय होता है, उसी जीव की अविद्या का अपनयन होता है, अन्य जीवों की अविद्या का नहीं, क्योंकि भिन्न-भिन्न अधिकरणों में रहनेवाली विद्या और अविद्या का कोई विरोध नहीं होता, तब एक अविद्या का उच्छेद हो जाने पर समस्त संसार का उच्छेद क्योंकर प्रसक्त होगा? यदि कहा जाय कि प्रधानतत्त्व के होने पर भी प्रकृति और पुरुष की अविवेकख्यातिरूप अविद्या की सत्ता और असत्ता पर बन्ध और मोक्ष निर्भर हैं, तब उस प्रधान तत्त्व की क्या आवश्यकता ? अविद्या के सदसद्भाव से ही बन्ध और मोक्ष की उपपत्ति हो जाती है।

शङ्का—अविद्यारूप उपाधि का भेद (नानात्व) होने पर जीवों का भेद एवं जीवों का भेद सिद्ध होने पर अविद्या का भेद सिद्ध होगा—इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त क्यों न होगा?

४६४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. ३

अविद्यात्मिका हि बीजशक्तिरव्यक्तशब्दनिर्देश्या परमेश्वराश्रया मायामयी महासुप्तिः, यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः। तदेतदव्यक्तं क्वचिदाकाशशब्दनिर्दिष्टम्—'एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च' (बृ० ३।८।११) इति श्रुतेः। क्वचिदक्षरशब्दोदितम्, 'अक्षरात्परतः परः' (मु० २।१।२) इति श्रुतेः। क्वचिन्मायेति सूचितम्, 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' (श्वे० ४।१०) इति मन्त्रवर्णात्। अव्यक्ता हि सा माया, तत्त्वान्यत्वनिरूपणस्याशक्यत्वात्। तदिदं 'महतः परमव्यक्तम्' इत्युक्तम्, अव्यक्तप्रभवत्वान्महतः, यदा हैरण्यगर्भी बुद्धिर्महान्, यदा तु जीवो महान्, तदाप्यव्यक्ताधीनत्वाज्जीवभावस्य 'महतः परमव्यक्तम्' इत्युक्तम्। अविद्या ह्यव्यक्तम्। अविद्यावत्त्वेनैव जीवस्य सर्वः संव्यवहारः संततो वर्तते। महतः परत्वमभेदोपचारात्तद्विकारे शरीरे परिकल्प्यते। सत्यपि शरीरवदिन्द्रियादीनां तद्विकारत्वाविशेषे शरीरस्यैवाभेदोपचारादव्यक्तशब्देन ग्रहणम्, इन्द्रियादीनां स्वशब्दैरेव गृहीतत्वात्परिशिष्टत्वाच्च शरीरस्य।

भामती

भयसिद्धेः। अविद्यात्वमात्रेण चैकत्वोपचारोऽव्यक्तमिति, चाव्याकृतमिति चेति। नन्वेवमविद्यैव जगद्बीजमिति कृतमीश्वरेणेत्यत आह ॐ परमेश्वराश्रया इति ॐ। नह्यचेतनं चेतनानधिष्ठितं कार्याय पर्याप्तमिति स्वकार्यं कर्तुं परमेश्वरं निमित्ततयोपादानतया चाश्रयते, प्रपञ्चविभ्रमस्य हीश्वराधिष्ठानत्वमहिग्विभ्रमस्येव रज्ज्वधिष्ठानत्वं तेन यथाऽहिविभ्रमो रज्जुपादान एवं प्रपञ्चविभ्रम ईश्वरोपादानस्तस्माज्जीवाधिकरणाप्यविद्या निमित्ततया विषयतया चेश्वरमाश्रयति इतीश्वराश्रयेत्युच्यते, न त्वाधारतया, विद्यास्वभावे ब्रह्मणि तदनुपपत्तेरिति, अत एवाह ॐ यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः इति ॐ।

भामती-व्याख्या

समाधान—जिस बीज से जो वृक्ष उत्पन्न होता है, उसी वृक्ष से उसी बीज की उत्पत्ति मानने पर ही अन्योन्याश्रयता की प्रसक्ति मानी जाती है, अन्यान्य बीजों से अन्यान्य वृक्षों की उत्पत्ति मानने पर अन्योन्याश्रयता नहीं होती, क्योंकि बीज और वृक्ष का अनादि प्रवाह माना जाता है। ठीक उसी प्रकार अविद्या और जीवों का भेद (अनेकत्व) अनादि होने के कारण उभय की सिद्धि सम्भव हो जाती है। [श्री मण्डन मिश्र ने भी इसी प्रकार की अन्योन्याश्रयता-प्रसक्ति का समाधान किसी पुरातन आचार्य के मत से किया है—"अन्ये तु अनादित्वादुभयोरविद्याजीवयोर्बीजाङ्कुरसन्तानयोरिव नेतरेतराश्रयत्वमप्रकृतिभावमावहतीति वर्णयन्ति, तथा चोक्तम् अविद्योपादानभेदवादिभिः—"अनादिरप्रयोजना चाविद्या।" (ब्र. सि. पृ. १०)]। यद्यपि अविद्याएँ अनेक हैं, तथापि उन सबका अविद्यात्वेन संग्रह विवक्षित होने के कारण 'अव्यक्तम्'—इस प्रकार एकवचनान्त 'अव्यक्त' पद के द्वारा अभिधान किया गया है। 'अव्यक्त' शब्द का अर्थ है—अव्याकृत। यदि अविद्या ही जगत् की बीज शक्ति है, तब ईश्वर की क्या आवश्यकता? इस प्रश्न का उत्तर है—"परमेश्वराश्रया मायामयी महासुप्तिः"। ऐसा कभी सम्भव नहीं कि केवल जड़ पदार्थ किसी चेतन से अधिष्ठित (सञ्चालित) न होकर ही समग्र कार्य का सम्पादन कर ले, अतः जडरूप अविद्या अपना कार्य सम्पादन करने के लिए निमित्त-कारण या उपादानकारण के रूप में परमेश्वर का आश्रय लेती है। प्रपञ्चरूप विभ्रम की अधिष्ठानता ईश्वर में वैसी है, जैसी सर्प-विभ्रम की अधिष्ठानता रज्जु में, अत एव जैसे सर्प-भ्रम का उपादानकारण रज्जु है, वैसे ही प्रपञ्च-विभ्रम का उपादान कारण ईश्वर। फलतः जीवरूप आधार में रहनेवाली अविद्या निमित्त या विषय के रूप में ईश्वर को अपनाने के कारण ही ईश्वराश्रया कही जाती है, ईश्वर वस्तुतः

अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४६५

अन्ये तु वर्णयन्ति — द्विविधं हि शरीरं स्थूलं सूक्ष्मं च । स्थूलं यदिदमुपलभ्यते । सूक्ष्मं यदुत्तरत्र वक्ष्यते—'तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम्' ( बृ० ३।१।१ ) इति । तच्चोभयमपि शरीरमविशेषात्पूर्वत्र रथत्वेन संकीर्तितम् । इह तु सूक्ष्ममव्यक्तशब्देन परिगृह्यते, सूक्ष्मस्याव्यक्तशब्दार्हत्वात् । तदधीनत्वाच्च बन्धमोक्षव्यवहारस्य जीवात्तस्य परत्वम् । यथार्थाधीनत्वादिन्द्रियव्यापारस्येन्द्रियेभ्यः परत्वमर्थानामिति ।

भामती यस्यामविद्यायां सत्यां शेरत इति लय उक्तः, संसारिण इति विक्षेप उक्तः । ॐ अव्यक्ताधीनत्वाज्जीवभावस्य इति ॐ । यद्यपि जीवाव्यक्तयोरनादित्वेनानियतं पौर्वापर्यं तथाप्यव्यक्तस्य पूर्वत्वं विवक्षितवैतदुक्तं ॐ सत्यपि शरीरवदिन्द्रियादीनाम् इति ॐ । गोबलीवर्दपदवदेतत् द्रष्टव्यम् । आचार्यदेशीयमतमाह ॐ अन्ये तु इति ॐ । एतद् दूषयति ॐ तैस्तु इति ॐ । प्रकरणपरिशेष्य-

भामती-व्याख्या अविद्या का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि विद्यात्मक ब्रह्म ( ईश्वर ) में अविद्या का रहना सर्वथा अनुपपन्न है । इसी भाव को ध्वनित करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—"यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवाः" । 'यस्यामविद्यायाम्'—यहाँ सति सप्तमी है, अतः 'जिस अविद्या के रहने पर'—ऐसा अर्थ विवक्षित है। जीवों का जो अपना वास्तविक ब्रह्मरूप है, उसे विस्मरण करके 'शेरते' अर्थात् सुषुप्ति में लीन रहते हैं—इससे लयावस्था और 'संसारिणः'—इस विशेषण के द्वारा 'विक्षेप' अवस्था का अभिधान किया गया है। दो अनादि पदार्थों को प्रत्येक में दूसरे की अधीनता विवक्षित होती है, जैसे—'बीजाधीनो वृक्षः' और 'वृक्षाधीनं बीजम्' । भाष्यकार ने जो कहा है "अव्यक्ताधीनत्वाज्जीवभावस्य"। वहाँ भी अव्यक्त ( अविद्या ) और जीवभाव—दोनों अनादि पदार्थ हैं, पौर्वापर्यरूप को लेकर जीवभाव में अव्यक्ताधीनत्व नहीं कहा जा सकता, तथापि अव्यक्त में पूर्वकालत्व की विवक्षा करके जीवभाव में अव्यक्ताधीनत्व कह दिया है। भाष्यकार ने जो कहा है—"सत्यपि शरीरवदिन्द्रियादीनां तद्विकारत्वाविशेषे शरीरस्यैवाभेदोपचारादव्यक्तशब्देन ग्रहणम्, इन्द्रियाणां स्वशब्दैरेव गृहीतत्वात्, परिशिष्टत्वाच्च शरीरस्य" । यह सब गोबलीवर्दन्न्याय को ध्यान में रख कर कहा है [ जैसे 'गामानय बलीवर्दं चानय'—ऐसे आज्ञावाक्य को सुन कर श्रोता 'गो' पद के द्वारा नर गौ ( बैल ) से अतिरिक्त मादा गौओं (गायों) का ग्रहण कर लेता है, क्योंकि यद्यपि 'गो' पद नर और मादा दोनों प्रकार के गोमण्डल को कहता है, तथापि नर गौ का पृथक् 'बलीवर्द' पद से उल्लेख होने के कारण मादा गौएँ ही शेष रहती हैं, अतः 'गामानय'—यहाँ 'गो' पद से मादा गौओं का ग्रहण न्यायोचित है। वैसे ही "इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः, अर्थेभ्यश्च परं मनः मनसस्तु परा बुद्धिः, बुद्धेरात्मा महान् परः, महतः परमव्यक्तम्"—यहाँ पर यद्यपि 'अव्यक्त' शब्द शरीर, इन्द्रिय और शब्दादि समस्त विकार-वर्ग का बोधक है। तथापि इन्द्रियादि का पृथक् उल्लेख होने के कारण अवशिष्ट शरीर का ही ग्रहण 'अव्यक्त' पद से करना अत्यन्त संगत है ] । वृत्तिकारादि आचार्यों के मत से उक्त दोनों सूत्रों की व्यवस्था का प्रदर्शन किया जाता है—"अन्ये तु वर्णयन्ति"। [ उनका कहना है कि शरीर दो प्रकार का होता है—(१) स्थूल और (२) सूक्ष्म । प्राणियों का यह दृश्यमान शरीर स्थूल शरीर है और सूक्ष्म शरीर आगे चल कर कहा जायगा—"तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम्" ( ब्र. सू. ३।१।१ ) अर्थात् यह जीव देहान्तर की प्राप्ति के अवसर पर भावी स्थूल शरीर ५९

४६६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. ४ सू. ३

तैस्त्वेतद्वक्तव्यम् — अविशेषेण शरीरद्वयस्य पूर्वत्र रथत्वेन संकीर्तितत्वात्समानयोः प्रकृतत्वपरिशिष्टत्वयोः कथं सूक्ष्ममेव शरीरमिह गृह्यते, न पुनः स्थूलमपीति ? आम्नातस्यार्थं प्रतिपत्तुं प्रभवामः, नाम्नातं पर्यनुयोक्तुम् । आम्नातं चाव्यक्तपदं सूक्ष्ममेव प्रतिपादयितुं शक्नोति, नेतरत्, व्यक्तत्वात्तस्येति चेत्, न, एकवाक्यताधीनत्वादर्थप्रतिपत्तेः । न हीमे पूर्वोत्तरे आम्नाते एकवाक्यतामनापद्य कंचिदर्थं प्रतिपादयतः, प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गात् । न चाकाङ्क्षामन्तरेणैकवाक्यताप्रतिपत्ति-


भामती योरुभयत्र तुल्यत्वान्नैकग्रहणनियमहेतुरस्ति । शङ्कते ॥ आम्नातस्यार्थम् इति ॥ अव्यक्तपदमेव स्थूलशरीरव्यावृत्तिहेतुर्व्यक्तत्वात्तस्येति शङ्कार्थः । निराकरोति "नैकवाक्यताधीनत्वात्" इति । प्रकृतहान्यप्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गेनेकवाक्यत्वे सम्भवति न वाक्यभेदो युज्यते । न चाकाङ्क्षां विनेकवाक्यत्वमुभयञ्च प्रकृतमित्युभयं ग्राह्यत्वेनेहाकाङ्क्षितमित्येकाभिधायकमपि पदं शरीरद्वयपरम् । न च मुख्यया वृत्त्याऽतत्परमित्योपचारिकं न भवति । यथोपहन्तृमात्रनिराकरणाकाङ्क्षायां काकपदं प्रयुज्यमानं श्वादि सर्वहन्तृपर


भामती-व्याख्या के आरम्भक सूक्ष्म भूतात्मक सूक्ष्म शरीर से संवलित होकर स्वर्गादि लोकों को जाता है, क्योंकि "वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतौ आपः पुरुषवचसो भवन्ति" (छां. ५।३।३) इस प्रकार के प्रश्न और "पञ्चम्यामाहुतौ आपः पुरुषवचसो भवन्ति" (छां. ५.१।१) इस प्रकार के उत्तर से उसी सूक्ष्म शरीर का वर्णन किया गया है। इन दोनों शरीरों का श्रुति ने रथ के रूप में वर्णन किया है। उन दोनों में सूक्ष्म शरीर का 'अव्यक्त' शब्द के द्वारा ग्रहण किया गया है, क्योंकि वह व्यक्त (स्थूल) नहीं अतः 'अव्यक्त पदास्पद है। इसी सूक्ष्म शरीर के अधीन जीव के बन्ध और मोक्ष हैं, अतः यह् जीव की अपेक्षा 'पर' (श्रेष्ठ) है]।

उक्त वृत्तिकार के मत में दोषाभिधान किया जाता है—"तैस्त्वेतद् वक्तव्यम्"। आशय यह है कि प्रकरण और परिशेष दोनों शरीरों के लिए समान हैं, अतः उनमें से किसी एक का ग्रहण क्योंकर होगा ?

शङ्का—श्रुति-घटक 'अव्यक्त' शब्द का समुचित अर्थ हमें करना चाहिए, उस पर 'स्थूल शरीर का अव्यक्त पद के द्वारा अभिधान क्योंकर हो गया ?' ऐसा आक्षेप नहीं किया, जा सकता, फलतः 'अव्यक्त' शब्द व्यक्तेतर केवल सूक्ष्म शरीर का ही अभिधायक है।

समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—"न, एकवाक्यताधीनत्वादर्थप्रतिपत्तेः"। अर्थात् "शरीरं रथमेव तु" (कठो. १।३।३) और महतः परम व्यक्तम्" (कठो. १।३।११) इन पूर्वापरोक्त दोनों वाक्यों की एकवाक्यता के विना 'अव्यक्त' शब्द का सहसा अर्थ नहीं किया जा सकता। 'अव्यक्त' शब्द का केवल सूक्ष्म शरीर अर्थ करने पर प्रकृत शरीरमात्र (सूल और सूक्ष्म-दोनों शरीरों) का हान (अग्रहण) और अप्रकृत (केवल सूक्ष्म शरीर) का ग्रहण प्रसक्त होता है, अतः ऐसे अप्रसङ्ग (प्रसङ्ग की निवृत्ति) के द्वारा पूर्वोत्तर वाक्यों की जब एकवाक्यता हो सकती है, तब वाक्य-भेद युक्ति-संगत नहीं माना जाता, जैसा कि वार्तिककार ने कहा है—"सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदो न युज्यते" (श्लो. वा. पृ. १३१)। दो वाक्यों की एकवाक्यता परस्पर की आकांक्षा के बिना नहीं होती, आकांक्षा प्रकृत की होती है और प्रकृत है शरीरमात्र (उभय शरीर), अतः दोनों शरीर ही यहाँ अव्यक्तपदास्पदत्वेन आकांक्षित हैं, फलतः केवल सूक्ष्मशरीर का वाचक 'अव्यक्त' पद दोनों शरीरों का बोधक है। 'अव्यक्त' पद यदि शरीर-द्वय का मुख्य (अभिधा) वृत्ति से वाचक नहीं होता, एतावता औपचारिक (लक्षणा वृत्ति से शरीर-द्वय का बोधक)

अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४६७

रस्ति । तत्राविशिष्टायां शरीरद्वयस्य ग्राह्यत्वाकाङ्क्षायां यथाकाङ्क्षं संबन्धेऽनभ्युपगम्य- मान एकवाक्यतैव बाधिता भवति, कुत आम्नातस्यार्थप्रतिपत्तिः ? न चैवं मन्त- व्यम् -- दुःशोधत्वात्सूक्ष्मस्यैव शरीरस्येह ग्रहणं, स्थूलस्य तु दृष्टबीभत्सतया सुशोध- त्वादग्रहणमिति । यतो नैवेह शोधनं कस्यचिद्विवक्ष्यते । न ह्यत्र शोधनविधायि किंचिदा- ख्यातमस्ति । अनन्तरनिर्दिष्टत्वात्तु किं तद्विष्णोः परमं पदमितीदमिह विवक्ष्यते । तथा- हीदमस्मात्परमिदमस्मात्परमित्युक्त्वा 'पुरुषान्न परं किंचिद्' इत्याह । सर्वथापि त्वा- नुमानिकनिराकरणोपपत्तेस्तथा नामास्तु, न नः किंचिच्छिद्यते ॥ ३ ॥

भामती

विज्ञायते । यथाहूः काकेभ्यो रक्ष्यतामन्नमिति बालोऽपि नोदितः । उपघातप्रधानत्वान्न श्वादिभ्यो न रक्षति ॥ इति ।

ननु न शरीरद्वयस्यात्राकाङ्क्षा, किन्तु दुःशोधत्वात् सूक्ष्मस्यैव शरीरस्य, न तु षाट्कौशिकस्य स्थूलस्य, तद्धि दृष्टबीभत्सतया सुकरं वैराग्यविषयत्वेन शोधयितुमित्यत आह ॐ न चैवं मन्तव्यम् इति ॐ । विष्णोः परमं पदमवगमयितुं परं पदमत्र प्रतिपाद्यत्वेन प्रस्तुतं न तु वैराग्याय शोधनमित्यर्थः । अलं वा विवादेन भवतु सूक्ष्मशरीरं परिशोध्यं तथापि न सांख्याभिमतमत्र प्रधानं परमित्यभ्युपेत्याह । ॐसर्वथापि तु इतिॐ ॥ ३ ॥

भामती-व्याख्या

भी नहीं हो सकता—ऐसा नहीं, अपितु उपचारतः अशक्यार्थ के संग्राहक पदों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जैसे कि अन्न के घातक प्राणीमात्र के निवर्तन की आकांक्षा से प्रयुक्त 'काकेभ्यो रक्ष्यतामन्नम्'—इस वाक्य में 'काक' पद काककुकुरादि समस्त अन्नोप- घातक प्राणियों का संग्राहक माना जाता है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं— काकेभ्यो रक्ष्यतामन्नमिति बालोऽपि चोदितः । उपघातकप्रधानत्वान्न श्वादिभ्यो न रक्षति ॥ (तं. वा. पृ. ७१३ )

वाक्यपदीकार भी कहते हैं— काकेभ्यो रक्ष्यतां सर्पिरिति बालोऽपि चोदितः । उपघातपरे वाक्ये न श्वादिभ्यो न रक्षति ॥ (वाक्य. पृ. ४२)

शङ्का—प्रकृत में दोनों शरीरों की आकांक्षा नहीं, अपितु केवल सूक्ष्म शरीर ही अपेक्षित है। क्योंकि शरीरों का शोधन (अनात्मत्व-निश्चय) ही यहाँ अपेक्षित है, सूक्ष्म शरीर का शोधन या विवेक ही विशेष दुष्कर है, षाट्कौशिक शरीर का शोधन कठिन नहीं [माता से प्राप्त लोम, लोहित और मांस तथा पिता से प्राप्त स्नायु, अस्थि और मज्जा—इन छः पदार्थों को षट्कोश कहते हैं, स्थूल शरीर के ये ही मौलिक पदार्थ हैं, अतः स्थूल शरीर षाट्कोशिक कहा जाता है, इसमें अनात्मत्व-निश्चय सुकर है], क्योंकि यह तो देखने में ही इतना बीभत्स लगता है कि साधारण व्यक्ति को भी इससे वैराग्य एवं इसमें अनात्मत्व का निश्चय सहज में ही हो जाता है।

समाधान—उक्त शङ्का का निरास करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि "न चैवं मन्तव्यम्, यतो नैवेह शोधनं कस्यचिद् विवक्ष्यते"। अर्थात् यहाँ पर शरीर-शोधन का कोई प्रसङ्ग ही नहीं और न शोधन का विधायक कोई पद है। सर्वोपरि अवस्थित वैष्णव परम पद का बोध कराने के लिए एक सोपान के रूप में ही शरीर का ग्रहण किया गया है वैराग्यो- त्पादनार्थ शोधन की यहाँ कोई अपेक्षा नहीं। अथवा इस विवाद को समाप्त करते हुए यदि

४६८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ १ पा. ४ सू. ५

ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ ४ ॥

ज्ञेयत्वेन च सांख्यैः प्रधानं स्मर्यते गुणपुरुषान्तरज्ञानात्कैवल्यमिति वदद्भिः। न हि गुणस्वरूपमज्ञात्वा गुणेभ्यः पुरुषस्यान्तरं शक्यं ज्ञातुमिति। क्वचिच्च विभूतिविशेषप्राप्तये प्रधानं ज्ञेयमिति स्मरन्ति। न चेदमिहाव्यक्तं ज्ञेयत्वेनोच्यते। पदमात्रं ह्यव्यक्तशब्दः। नेहाव्यक्तं ज्ञातव्यमुपासितव्यं चेति वाक्यमस्ति। न चानुपदिष्टपदार्थज्ञानं पुरुषार्थमिति शक्यं प्रतिपत्तुम्। तस्मादपि नाव्यक्तशब्देन प्रधानमभिधीयते। अस्माकं तु रथरूपकक्लृप्तशरीराद्यनुसरणेन विष्णोरेव परमं पदं दर्शयितुमयमुपन्यास इत्यनवद्यम् ॥ ४ ॥

वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ ५ ॥

अत्राह सांख्यः—'ज्ञेयत्वावचनात्' इत्यसिद्धम्, कथम् ? श्रूयते ह्युत्तरत्राव्यक्तशब्दोदितस्य प्रधानस्य ज्ञेयत्ववचनम्—'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥' (का० १।३।१५) इति। अत्र हि यादृशं शब्दादिहीनं प्रधानं महतः परं स्मृतौ निरूपितं, तादृशमेव निचाय्यत्वेन निर्दिष्टं, तस्मात्प्रधानमेवेदं, तदेव चाव्यक्तशब्दनिर्दिष्टमिति। अत्र ब्रूमः—नेह प्रधानं निचाय्यत्वेन निर्दिष्टम्। प्राज्ञो हीह परमात्मा निचाय्यत्वेन निर्दिष्ट इति गम्यते। कुतः ? प्रकरणात्। प्राज्ञस्य हि प्रकरणं विततं वर्तते, 'पुरुषान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः' इत्यादिनिर्देशात्, 'एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते' इति च दुर्ज्ञातत्ववचनेन तस्यैव ज्ञेयत्वाकाङ्क्षणात्। 'यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः' इति च तज्ज्ञानायैव वागादिसंयमस्य विहितत्वात्, मृत्युमुखप्रमोक्षणफलत्वाच्च। नहि प्रधानमात्रं निचाय्य मृत्युमुखात्प्रमुच्यत इति सांख्यैरिष्यते। चेतनात्मविज्ञानाद्धि मृत्युमुखात्प्रमुच्यत इति तेषामभ्युपगमः। सर्वेषु वेदान्तेषु प्राज्ञस्यैवात्मनोऽशब्दादिधर्मत्वमभिलप्यते। तस्मान्न प्रधानस्यात्र ज्ञेयत्वमव्यक्तशब्दनिर्दिष्टत्वं वा ॥ ५ ॥

भामती

इतोऽपि नायमव्यक्तशब्दः सांख्याभिमतप्रधानपरः। सांख्यैः खलु प्रधानाद्विवेकेन पुरुषं निःश्रेयसाय ज्ञातुं वा विभूतये वा प्रधानं ज्ञेयत्वेनोपक्षिप्यते, न चेह जानीयादिति वोपासीतेति वा विधिविभक्तिश्रुतिरस्ति, अपि त्वव्यक्तपदमात्रं, न चैतावता सांख्यस्मृतिप्रत्यभिज्ञानं भवतीति भावः ॥ ४ ॥

ज्ञेयत्वावचनस्यासिद्धिमाशङ्क्य तत्सिद्धिप्रदर्शनार्थं सूत्रम्। निगद्व्याख्यातमेव भाष्यम् ॥ ५ ॥

भामती-व्याख्या

यह मान भी लिया जाता है कि परिशोधनीय सूक्ष्म शरीर ही यहाँ अव्यक्त पदास्पद है। तथापि सांख्याभिमत प्रधान तत्त्व सर्वोपरि सिद्ध नहीं होता ॥ ३ ॥

'अव्यक्त' शब्द की सांख्याभिमत प्रधानपरकता के निराकरण में एक युक्ति यह भी है कि जैसे सांख्याचार्य "गुणपुरुषान्तरज्ञानात् कैवल्यम्" इत्यादि वाक्यों के द्वारा त्रिगुणात्मक प्रधान का कहीं मोक्षार्थ-ज्ञेयत्वेन और कहीं ऐश्वर्य प्राप्त्यर्थ-उपास्यत्वेन स्मरण किया करते हैं, किन्तु अव्यक्त पदार्थ का कहीं भी वैसा स्मरण नहीं करते, तब 'अव्यक्त' शब्दमात्र के सुनने से प्रधान तत्त्व की प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती ॥ ४ ॥

अव्यक्तगत ज्ञेयत्व के अवचन (अनभिधान) की आशङ्कित असिद्धि का निराकरण करने के लिए सूत्रकार कहता है—"वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात्"। इस सूत्र का भाष्य इतना सुगम है कि पढते ही अर्थावबोध हो जाता है कि "अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं

अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् | हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ४६९

त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥ ६ ॥

इतश्च न प्रधानस्याव्यक्तशब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं वा । यस्मात्त्रयाणामेव पदार्था-

भामती

वरप्रदानोपक्रमा हि मृत्युनचिकेतःसंवादवाक्यप्रवृत्तिरासमाप्तेः कठवल्लीनां लक्ष्यते । मृत्युनंचिके- केतसे कुपितेन पित्रा प्रहिताय तुष्टस्त्रीन् वरान् प्रददौ, नचिकेतास्तु प्रथमेन वरेण पितुः सौमनस्यं वव्रे, द्वितीयेनाग्निविद्यां, तृतीयेनात्मविद्याम् , वराणामेष वरस्तृतीय इति वचनात् । न तु तत्र वरप्रदाने प्रधानगोचरे स्तः प्रश्नप्रतिवचने । तस्मात्कठवल्लीह्वग्निसंज्ञोऽपरमात्मपरैव वाक्यप्रवृत्तिर्न त्वप्रक्रान्तप्रधानपरा भवितुमर्हतीत्याह ॐ इतश्च न प्रधानस्याव्यक्तशब्दवाच्यत्वम् इति ॐ । हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं

भामती-व्याख्या

निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यत” ( कठो० २।३।१५ ) इत्यादि वाक्यों में जो अव्यक्त तत्त्व का निचाय्यत्वेन ( ज्ञेयत्वेन ) उल्लेख माना जाता है, वह संगत नहीं, क्योंकि वहाँ प्राज्ञात्मा ( परमेश्वर ) का प्रकरण है, अतः वही ज्ञेयत्वेन श्रुत है, अव्यक्ततत्त्व नहीं ॥ ५ ॥

इस अधिकरण का विषय-वाक्य जिस उपनिषत् का है, उसकी किसी भी वल्ली ( उपाध्याय ) में सांख्याभिमत प्रधानतत्त्व का प्रतिपादन उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि समग्र कठ उपनिषत् नचिकेता और यम का संवादात्मक ग्रन्थ है, जिस का आरम्भ यम के द्वारा वर-प्रदान के रूप में होता है—

तिस्रो रात्रीर्यदवासीगृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥

[ यम देव ने कहा—हे नचिकेता ? तू बिना कुछ खाए-पिए मेरे द्वार पर तीन रात पड़ा रहा है, अतः तीन रात्रियों के बदले मुझ से तीन वर माँग ले, जिस से कि मैं उऋण हो सकूँ और मेरा कल्याण हो ] । यह नचिकेता वही है, जिसकी धृष्टता पर उस का पिता वाजश्रवस ( अन्नदानादि में अग्रणी उद्दालक ऋषि ) क्रुद्ध होकर उस ( नचिकेता ) को यमराज के पास प्रेषित कर देता है और यमराज उस पर प्रसन्न होकर वर देता है।

नचिकेता पहला वर माँगता है—“शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमः” [ मेरे ( नचिकेता के ) पिता उद्दालक का उद्वेग और क्रोध शान्त हो जाय एवं मेरे ( नचिकेता के ) प्रति उसका पूर्ववत् सौमनस्य ( वत्सलभाव ) जागृत हो ] । द्वितीय वर के द्वारा अग्नि-विज्ञान माँगता है— 'स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् [ हे यम ! आप स्वर्ग-प्राप्ति की साधनभूत अग्नि का ज्ञान रखते हैं। मैं श्रद्धा और विनय के साथ प्रार्थना करता हूँ कि वह विज्ञान मुझे प्रदान करें ] । तृतीय वर में आत्मविद्या की माँग रखी—

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥

[ मनुष्य के मर जाने पर जो यह सन्देह किया जाता है कि कुछ लोग कहते हैं कि आत्मा नहीं मरता, अपि तु जन्मान्तर में भी वही बना रहता है और कुछ लोगों का कहना है कि मनुष्य के मर जाने पर कुछ भी शेष नहीं रहता। ऐसे सन्देहास्पद आत्मा का तत्त्वावबोध मुझे कराएँ ] । प्रधान ( सांख्याभिमत प्रकृति ) के विषय में न तो कोई वर-प्रदान ही किया गया है और प्रश्नोत्तर ही उपलब्ध होते हैं, अतः कठोपनिषत् के प्रतिपाद्य तीन ही विषय हैं—अग्नि, जीव और परमात्मा । इन से अतिरिक्त किसी प्रधानादि विषय को लेकर वहाँ वाक्यों की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती— 'यस्मात् त्रयाणामेव पदार्थानामग्निजीवपरमात्मनां वरप्रदानसामर्थ्यात्' । 'हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्'

४७० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. ६

नामग्निजीवपरमात्मनामस्मिन्ग्रन्थे कठवल्लीषु वरप्रदानसामर्थ्याद्वक्तव्यतयोपन्यासो दृश्यते । तद्विषय एव च प्रश्नः । नातोऽन्यस्य प्रश्न उपन्यासो वाऽस्ति । तत्र तावत् 'स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम्' (का० १।१।१३) इत्यग्निविषयः प्रश्नः । 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः॥' (का० १।१।२०) इति जीवविषयः प्रश्नः । 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥' (का० १।२।१४) इति परमात्मविषयः । प्रतिवचनमपि 'लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।' (का० १।१।१५) इत्यग्निविषयम् । 'हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्' (का० २।५।६,७) इति । व्यवहितं जीवविषयम् । 'न जायते म्रियते वा विपश्चित्' (का० १।२।१८) इत्यादिबहुप्रपञ्चं परमात्मविषयम् । नैवं प्रधानविषयः प्रश्नोऽस्ति, अपृष्टत्वाच्चानुपन्पसनीयत्वं तस्येति । अत्राह-योऽयमात्मविषयः प्रश्नो येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीति, किं स एवायम् 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्माद्' इति पुनरनुकृष्यते ? किंवा ततोऽन्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्यत इति ? किंचातः स एवायं प्रश्नः पुनरनुकृष्यत इति यद्युच्येत, द्वयोरात्मविषययोः प्रश्नयोरेकताऽपत्तेरग्निविषय आत्मविषयश्च द्वावेव प्रश्नावित्यतो न वक्तव्यं त्रयाणां

भामती

ब्रह्म सनातनमित्यनेन व्यवहितं जीवविषयं यथा तु मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतमत्यादिप्रतिवचनमिति योजना । अत्राह चोदकः किं जीवपरमात्मनोरेक एव प्रश्नः किं वाऽन्यो जीवस्य येयं प्रेते मनुष्य इति प्रश्नोऽन्यश्च परमात्मनोऽन्यत्र धर्मादित्यादिः ? एकत्वे सूत्रविरोधः 'त्रयाणाम् इति' । भेदे तु सौमनस्यावाप्त्यग्न्य्यात्मज्ञानविषयवरत्रयप्रदानान्तर्भावोऽन्यत्र धर्मादित्यादेः प्रश्नस्य । तुरीयवरान्तरकल्पनायां वा

भामती-व्याख्या

( कठो० २।२।६ ) यह परमात्मपरक वाक्य जीवविषयक प्रश्न और प्रतिवचन का व्यवधायक है, इसका स्पष्टीकरण भाष्यकार करते हैं- "इतिव्यवहितजीवविषयम्"। उसका तात्पर्य यह है कि "इत्यनेन परमात्मविषयकप्रतिवचनस्य प्रतिज्ञावाक्येन व्यवहितं जीवविषयकं प्रतिवचनम्- 'यथा तु मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम इत्यादि [अर्थात् पहले जीवविषयक प्रश्न है- "येयं प्रेते विचिकित्सा" (कठ०, १।१।२०) । इसके अनन्तर परमात्मविषयक प्रतिवचन का प्रतिज्ञा-वाक्य है-"हन्त ते कथयिष्यामि" (कठो. २।२।६) ओर इसके पश्चात् है जीवविषयक प्रतिवचन-यथा तु मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम्" (कठो. २।२।६) । इस प्रकार जीवविषयक प्रश्न और प्रतिवचन निरन्तर (अव्यवहित) न होकर सान्तर (व्यवहित) हो जाते हैं]।

शङ्का-भाष्यकार ने जो कहा है "अत्राह"। वहाँ प्रश्न उठता है-'क:?' उसका उत्तर है- 'आक्षेप्ता' अर्थात् आक्षेपवादी शङ्का करता है कि क्या जीवात्मा और परमात्मा को लेकर एक ही प्रश्न किया गया है? अथवा "येयं प्रेते मनुष्य" यह जीवविषयक प्रश्न अन्य है और "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात्"-यह परमात्म-विषयक प्रश्न अन्य? यदि अन्य प्रश्न नहीं, अपितु एक ही है, तब नचिकेता के सब मिला कर दो ही प्रश्न बनते हैं, तीन नहीं, फिर तो 'त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः" (ब्र. सू. १।४।६) इस सूत्र का विरोध उपस्थित होता है, क्योंकि इस सूत्र में तीन प्रश्नों का होना निर्दिष्ट है। यदि आत्मविषयक प्रश्न से परमात्म-

अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७१

प्रश्नोपन्यासाविति । अथान्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्यत इत्युच्येत, ततो यथैव वरप्रदानव्यतिरेकेण प्रश्नकल्पनायामदोषः, एवं प्रश्नव्यतिरेकेणापि प्रधानोपन्यासकल्पनायामदोषः स्यादिति । अत्रोच्यते—नैवं वयमिह वरप्रदानव्यतिरेकेण प्रश्नं कञ्चित्कल्पयामः, वाक्योपक्रमसामर्थ्यात् । वरप्रदानोपक्रमा हि मृत्युनाचिकेतःसंवादरूपा वाक्यप्रवृत्तिरासमाप्तेः कठवल्लीनां लक्ष्यते । मृत्युः किल नचिकेतसे पित्रा प्रहिताय त्रीन्वरान्प्रददौ । नचिकेताः किल तेषां प्रथमेन वरेण पितुः सौमनस्यं वव्रे, द्वितीयेनाग्निविद्याम्, तृतीयेनात्मविद्याम्, 'येयं प्रेते' इति 'वराणामेष वरस्तृतीयः' ( का० १।१।२० ) इति लिङ्गात् । तत्र यद्यन्यत्र धर्मादित्यन्योऽयमपूर्वः प्रश्न उत्थाप्येत, ततो वरप्रदानव्यतिरेकेणापि प्रश्नकल्पनाद्वाक्यं बाध्येत । ननु प्रष्टव्यभेदादपूर्वोऽयं प्रश्नो भवितुमर्हति । पूर्वो हि प्रश्नो जीवविषयः, येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्यस्तिनास्तीतिविचिकित्साभिधानात् । जीवश्च धर्मादिगोचरत्वान्नान्यत्र धर्मादिति प्रश्नमर्हति प्राज्ञस्तु धर्माद्यतीतत्वादन्यत्र धर्मादिति प्रश्नमर्हति । प्रश्नच्छाया च न समाना लक्ष्यते, पूर्वस्यास्तित्वनास्तित्वविषयत्वादुत्तरस्य धर्माद्यतीतवस्तुविषयत्वात् । तस्मात्प्रत्यभिज्ञानाभावात्प्रश्नभेदः । न पूर्वस्यैवोत्तरत्रानुकर्षणमिति चेत्, न, जीवप्राज्ञयोरेकत्वाभ्युपगमात् । भवेत्प्रष्टव्यभेदात्प्रश्नभेदो यद्यन्यो जीवः प्राज्ञात्स्यात् । न त्वन्यत्वमस्ति । तत्त्वमसीत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यः । इह च 'अन्यत्र धर्माद्' इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनं 'न जायते म्रियते वा विपश्चिद्' इति जन्ममरणप्रतिषेधेन प्रतिपाद्यमानं शारीरपरमेश्वरयोरभेदं दर्शयति । सति हि प्रसङ्गे प्रतिषेधो भागी भवति । प्रसङ्गश्च जन्ममरणयोः शरीरसंस्पर्शार्थाच्छारीरस्य भवति, न परमेश्वरस्य । तथा—'स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥' ( का० २।४।४ ) इति स्वप्नजागरितदृशो जीवस्यैव महत्त्वविभुत्वविशेषणस्य मननेन शोकविच्छेदं दर्शयन्न प्राज्ञादन्यो जीव इति दर्शयति । प्राज्ञविज्ञानाद्धि


भामती

तृतीय इति श्रुतिबाधप्रसङ्गः । वरप्रदानान्तर्भावे प्रश्नस्य तद्वत् प्रधानाख्यानमप्यन्तर्भूतं वरप्रदानेऽस्तु महतः परमव्यक्तमित्याक्षेपः ।

परिहरति ॐ अत्रोच्यते नैवं वयमिह इति ॐ । वस्तुतो जीवपरमात्मनोरभेदात् प्रष्टव्याभेदेनेक एव प्रश्नः । अत एव प्रतिवचनमप्येकं, सूत्रं त्ववास्तवभेदाभिप्रायम् । वास्तवश्च जीवपरमात्मनोरभेदस्तत्र


भामती-व्याख्या

विषयक प्रश्न को भिन्न माना जाता है, तब चार प्रश्न हो जाते हैं, क्योंकि परमात्मविषयक प्रश्न का ( १ ) सौमनस्य-प्राप्ति, ( २ ) अग्नि और ( ३ ) जीव--इन तीन विषयों के वर-प्रदान में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । परमात्मविषयक ज्ञान को चौथा वर-प्रदान मानने पर 'वराणामेष वरस्तृतीयः'—यह श्रुति-वाक्य विरुद्ध या बाधितार्थक हो जाता है । यदि तीन वरों से भिन्न परमात्मविषयक चतुर्थ वर-प्रदान की कल्पना की जाती है, तब उसी प्रकार प्रधान ( प्रकृति ) के प्रतिपादन को भी उक्त चार वर-प्रदानों से अतिरिक्त पाँचवाँ वर-प्रदान माना जा सकता है । फलतः 'महतः परमव्यक्तम्'—इत्यादि पदावलि का पर्यवसान साङ्ख्याभिमत प्रधान ( प्रकृति ) तत्त्व के प्रतिपादन में क्यों नहीं माना जा सकता ?

समाधान—भाष्यकार उक्त शङ्का का समाधान करते हैं—"अत्रोच्यते नैवं वयमिह वर-प्रदानव्यतिरेकेण प्रश्नं कंचित् कल्पयामः।" आशय यह है कि जीव और परमात्मा का वस्तुतः अभेद होने के कारण दोनों का एक ही प्रश्न में समावेश हो जाता है, अत एव

४७२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. ६

शोकविच्छेद इति वेदान्तसिद्धान्तः। तथाऽग्रे - 'यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥' (का० २।४।१०) इति जीवप्राज्ञभेददृष्टिमपवदति। तथा जीवविषयस्यास्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्यानन्तरम् 'अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व' इत्यारभ्य मृत्युना तैस्तैः कामैः प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता यदा न चचाल, तदैनं मृत्युरभ्युदयनिःश्रेयसविभागप्रदर्शनेन विद्याविद्याविभागप्रदर्शनेन च 'विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त' (का० १।२।४) इति प्रशस्य प्रश्नमपि तदीयं प्रशंसन्नुदुवाच- 'तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति॥' (का० १।२।१२) इति, तेनापि जीवप्राज्ञयोरभेद एवेह विवक्षित इति गम्यते। यत्प्रश्ननिमित्तां च प्रशंसां महतीं मृत्योः प्रत्यपद्यत नचिकेताः, यदि तं विहाय प्रशंसानन्तरमन्यमेव प्रश्नमुपक्षिपेदस्थान एव सा सर्वा प्रशंसा प्रसारिता स्यात्। तस्मात् 'येयं प्रेते'

भामती

तत्र श्रुत्युपन्यासेन भगवता भाष्यकारेण दर्शितः। ॐ तथा जीवविषयस्यास्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्येत्यादि ॐ। येयं प्रेत इति हि नचिकेताः प्रश्नमुपश्रुत्य तत्तत्कामविषयप्रलोभं चास्य प्रतीत्य मृत्युर्विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्य इत्यादिना नचिकेतसं प्रशस्य प्रश्नमपि तदीयं प्रशंसंस्तस्मिन् प्रश्ने ब्रह्मैवोत्तरमुवाच। ॐ तं दुर्दर्शम् इति ॐ। यदि पुनर्जोवात्प्राज्ञो भिद्येत जीवगोचरः प्रश्नः प्राज्ञगोचरं चोत्तरमिति किं केन सङ्गच्छेत? अपि च यद्विषयं प्रश्नमुपश्रुत्य मृत्युर्नैव प्रशंसितो नचिकेता यदि तमेव भूयः पृच्छेत्तदुत्तरे चावदध्यात् ततः प्रशंसा वृथार्था स्यात् प्रश्नान्तरे त्वसावस्थाने प्रसारिता सत्यदृष्टार्था स्यादित्याह ॐ यत्प्रश्नः इति ॐ। यस्मिन् प्रश्नो यत्प्रश्नः। शेषमतिरोहितार्थम् ॥ ६ ॥

भामती-व्याख्या

प्रतिवचन भी एक ही है। सूत्रकार ने जो तीन प्रश्नों का निर्देश किया है, वह जीव और परमात्मा के औपाधिक भेद को मन में रख कर किया है। जीव और परमात्मा का वास्तविक अभेद है—यह भगवान् भाष्यकार ने 'तत्त्वमसि' (छां. ६।८।७) इत्यादि श्रुति प्रमाणों का उपन्यास करके सिद्ध किया है। 'तथा जीवविषयस्यास्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्येत्यादि' भाष्य के द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि नचिकेता के 'येयं प्रेते विचिकित्सा'—इस प्रश्न को सुन कर यम देव ने चिरजीवन, पुत्रपौत्र, विविध धन-धान्यादि के विविध प्रलोभन दिए "विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा नचिकेता की प्रशंसा की, इतना ही नहीं, नचिकेता के जीवविषयक प्रश्न की भी प्रशंसा की और उसके उत्तर में परमात्मा (ब्रह्म) का स्वरूप प्रस्तुत किया—'तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टम्' (कठो. १।२।१२)। यदि जीव से प्राज्ञात्मा (ब्रह्म) भिन्न है, तब जीवविषयक प्रश्न के उत्तर में प्राज्ञ की चर्चा संगत क्योंकर होगी? दूसरी बात यह भी है कि जिस विषय का प्रश्न सुनकर यम ने नचिकेता की प्रशंसा की यदि उसी विषय का प्रश्न वह दुबारा करता है और उसका उत्तर सुनने की उत्सुकता दिखाता है, तब उसकी प्रशंसा दृष्टार्थक होती है, अन्यथा विषयान्तर का प्रश्न करने पर प्रशंसा अदृष्टार्थक हो जाती है—ऐसा भाष्यकार कह रहे हैं—यत्प्रश्ननिमित्तां च प्रशंसां महतीं मृत्योः प्रत्यपद्यत नचिकेताः।' 'यत्प्रश्न' पद में सप्तमी समास है—'यस्मिन् (विषये) प्रश्नः यत्प्रश्नः' अर्थात् जिस विषय का प्रश्न सुनकर यमदेव ने नचिकेता की महती प्रशंसा की, उस विषय को छोड़ कर अन्यविषयक प्रश्न की कल्पना की जाती है, तब वह प्रशंसा नितान्त अनुचित हो जाती है। फलतः जीवविषयक 'येयं प्रेते'—इस प्रश्न का ही 'अन्यत्र धर्मात्'—यहाँ अनुवर्तन होता है। शेष भाष्य अत्यन्त सुगम है॥६॥

प्रधानस्याशब्दत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७३

इत्यस्यैव प्रश्नस्यैतदनुकर्षणम् ‘अन्यत्र धर्माद्’ इति। यत्त प्रश्नच्छायावैलक्षण्यमुक्तं, तद्दूषणम्, तदीयस्यैव विशेषस्य पुनः पृच्छ्यमानत्वात्। पूर्वत्र हि देहादिव्यतिरि- क्तस्यात्मनोऽस्तित्वं पृष्टम्, उत्तरत्र तु तस्यैवासंसारित्वं पृच्छ्यत इति, यावद्ध- विद्या न निवर्तते तावद्धर्मादिगोचरत्वं जीवस्य जीवत्वं च न निवर्तते। तन्निवृत्तौ तु प्राज्ञ एव तत्त्वमसीति श्रुत्या प्रत्याय्यते। न चाविद्यावत्त्वे तदपगमे च वस्तुनः कश्चि- द्विशेषोऽस्ति। यथा कश्चित्संतमसे पतितां कांचिद्रज्जुमहिं मन्यमानो भीतो वेपमानः पलायते, तं चापरो ब्रूयान्मा भैषीर्नायमही रज्जुरेवेति। स च तदुपश्रुत्याहिकृतं भयमुत्सृजेद्वेपथुं पलायनं च। न त्वहिबुद्धिकाले तदपगमकाले च वस्तुनः कश्चिद्विशेषः स्यात्। तथैवैतदपि द्रष्टव्यम्। ततश्च ‘न जायते म्रियते वा’ इत्येवमाद्यपि भवत्यस्ति- त्वप्रश्नस्य प्रतिवचनम्। सूत्रं त्वविद्याकल्पितजीवप्राज्ञभेदापेक्षया योजयितव्यम्। एकत्वेऽपि ह्यात्मविषयस्य प्रश्नस्य प्रायणावस्थायां देहव्यतिरिक्तास्तित्वमात्रविचिकि- त्सनात् कर्तृत्वादिसंसारस्वभावानपोहनाच्च पूर्वस्य पर्यायस्य जीवविषयत्वमुत्प्रेक्ष्यते। उत्तरस्य तु धर्माद्यत्ययसंकीर्तनात्प्राज्ञविषयत्वमिति। ततश्च युक्ताऽग्निजीवपरमात्म- कल्पना। प्रधानकल्पनायां तु न वरप्रदानं न प्रश्नो न प्रतिवचनमिति वैषम्यम् ॥ ६ ॥

महद्वच्च ॥ ७ ॥

यथा महच्छब्दः सांख्यैः सत्तामात्रेऽपि प्रथमजे प्रयुक्तो न तमेव वैदिकेऽपि प्रयोगेऽभिधत्ते। ‘बुद्धेरात्मा महान्परः’ (का० १।३।१०), ‘महान्तं विभुमात्मानम्’ (का० १।२।२२), ‘वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्’ (श्वे० ३।८) इत्येवमादावात्मशब्द- प्रयोगादिभ्यो हेतुभ्यः। तथाऽव्यक्तशब्दोऽपि न वैदिके प्रयोगे प्रधानमभिधातुमर्हति। अतश्च नास्यानुमानिकस्य शब्दवत्त्वम् ॥ ७ ॥

भामती

अनेन सांख्यप्रसिद्धेवैदिकप्रसिद्धया विरोधान्न सांख्यप्रसिद्धिर्वेदे आदर्तव्येत्युक्तम्। सांख्यानां महत्तत्त्वं सत्तामात्रं पुरुषार्थक्रियाक्षमं सतस्य भावः सत्ता तन्मात्रं महत्तत्त्वमिति। या या पुरुषार्थक्रिया शब्दाद्युपभोगलक्षणा च सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिलक्षणा च सा सर्वा महति बुद्धौ समाप्यत इति महत्तत्त्वं सत्तामात्रमुच्यत इति ॥ ७ ॥

भामती-व्याख्या

पहले सूत्रों में कहा गया था कि 'अव्यक्त' शब्द की सांख्याचार्य-प्रसिद्ध रूढि वेदान्त में अनुपयुक्त है, और इस सूत्र के द्वारा यह कहा जाता है कि 'अव्यक्त' शब्द की सांख्य-मत- प्रसिद्धि वैसे ही वेदान्त-प्रसिद्धि से बाधित है, जैसे 'महत्' शब्द की [फलतः यह अनुमान यहाँ विवक्षित है—'अव्यक्तशब्दो न सांख्यस्मृतिप्रसिद्धार्थगोचरः, वैदिक शब्दत्वात्, महच्छब्दवत्]। सांख्य दर्शन-प्रयुक्त 'महत्' शब्द का अर्थ है—'सत्तामात्र' : बौद्धदर्शनकारों ने परमार्थसत् का लक्षण करते हुए कहा है—"अर्थक्रियासमर्थं यत् तदत्र परमार्थसत्" (प्र. वा. पृ० १७५)। अर्थक्रिया नाम है प्रयोजन या पुरुषार्थ का, वह सांख्य-दृष्ट्या भोग और मोक्ष भेद से दो प्रकार का होता है—(१) शब्दादि समस्त विषयों का उपभोग और (२) प्रकृति- पुरुष की विवेक-ख्याति। दोनों प्रकार की अर्थक्रिया बुद्धि ही किया करती है—

सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धिः।
सैव च विशिनष्टि पुनः प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम् ॥ (सां. का. ३६)

६०

४७४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. ८

( २ चमसाधिकरणम् । सू० ८—१० ) चमसवदविशेषात् ॥ ८ ॥

पुनरपि प्रधानवाद्यशब्दत्वं प्रधानस्यासिद्धमित्याह । कस्मात् ? मन्त्रवर्णात् — ‘अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’ (श्वे० ४।५) इति । अत्र हि मन्त्रे लोहितशुक्लकृष्णशब्दै रजःसत्त्वतमांस्यभिधीयन्ते । लोहितं रजः, रञ्जनात्मकत्वात् । शुक्लं सत्त्वं, प्रकाशात्मकत्वात् । कृष्णं तमः, आवरणात्मकत्वात् । तेषां साम्यावस्थाऽवयवधर्मैरव्यपदिश्यते लोहितशुक्लकृष्णेति । न जायत इति चाजा स्यात् , ‘मूलप्रकृतिरविकृतिः’


भामती

अजाशब्दो यद्यपि छागायां रूढस्तथाप्यध्यात्मविद्याधिकारान्न तत्र वर्तितुमर्हति । तस्माद्रूढेरसम्भवाद्योगेन वर्तयितव्यः । तत्र किं स्वतन्त्रं प्रधानमनेन मन्त्रवर्णेनानूद्यतामुत पारमेश्वरी मायाशक्तिस्तेजोऽबन्नव्याक्रियाकारणमुच्यताम् ? किं तावत् प्राप्तं ? प्रधानमेवेति । तथाहि—यादृशं प्रधानं सांख्यैः स्मर्यते तादृशमेवास्मिन्मन्त्रेऽनानतिरिक्तं प्रतीयते, सा हि प्रधानलक्षणा प्रकृतिर्न जायत इत्यजा च एका च लोहितशुक्लकृष्णा च । यद्यपि लोहितत्वादयो वर्णा न रजःप्रभृतिषु सन्ति, तथापि लोहितं कुसुम्भादि रञ्जयति


भामती-व्याख्या

इस प्रकार सांख्य-सम्मत महत् पदार्थ ही सत् या अर्थक्रियाकारी सिद्ध होता है। यह सत्ता या सत्त्व इस लिए कहलाता है कि वह प्रकृतिगत सत्त्वगुण का विकार है ] । किन्तु “बुद्धेरात्मा महान् परः” ( कठ० १।३।१० ) इत्यादि श्रुति-वाक्यों में 'महत्' पद का अर्थ बुद्धि नहीं अपि तु चैतन्य पुरुष है, क्योंकि 'आत्म' शब्द के प्रयोग का सामञ्जस्य जडात्मिका बुद्धि में सम्भव नहीं ॥ ७ ॥

विषय“अजमेकां लोहितशुक्लकृष्णाम्” ( श्वेता० ४।४ ) इस श्रुति का 'अजा' शब्द विचारणीय है।

संशय—उक्त श्रुति में प्रयुक्त 'अजा' को लेकर सन्देह होता है कि यद्यपि 'अजा' शब्द लोक-वेद-व्यवहारतः छाग ( बकरी ) में रूढ है [ लोक और वेद में बकरी के लिए यद्यपि ङीषन्त 'छागी' शब्द का प्रयोग अधिक हुआ है, तथापि शांखायन ( ७।१० ) और शतपथ ( ३।३।३।४ ) आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में टाबन्त 'छागा' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है ] । तथापि अध्यात्मविद्या का प्रकरण होने के कारण यहाँ 'अजा' शब्द छागी का बोधक नहीं हो सकता, अतः रूढ़ि का परित्याग कर एवं यौगिक शक्ति का सहारा लेकर किसी अर्थ का आविष्कार करना होगा। तब 'न जायते इत्यजा'—ऐसी व्युत्पत्ति के अनुसार 'अजा' शब्द के द्वारा सांख्यसम्मत प्रधान ( प्रकृति ) का ग्रहण किया जाय ? अथवा तेज, जल और पृथिवी की संवलितावस्थारूप पारमेश्वरी शक्ति ( माया ) ?

पूर्वपक्ष—यहाँ 'अजा' शब्द से सांख्य-सम्मत प्रधान तत्त्व का ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि सांख्याचार्यों ने प्रधान तत्त्व का जो स्वरूप अपने दर्शन में अभिहित किया है, ज्यों-का-त्यों उक्त श्रुति में प्रतीत होता है। वह प्रधानरूप प्रकृति अनादि है, उत्पन्न नहीं होती, अतः अजा ( जन्म-रहिता ) कही जाती है, एक है और लोहितशुक्लकृष्णरूपा है। यद्यपि रजोगुणादि में लोहितत्वादि ( रक्तत्वादि वर्ण नहीं होते, तथापि जैसे कुसुम्भ ( वर्रें का फूल ) आदि स्वयं रक्त ( लाल ) होकर अपने सम्पर्क में आनेवाले वस्त्रादि को अभिरञ्जित कर ( लाल बना ) देते हैं, वैसे ही रजोगुणादि अपने सम्बन्धित कार्यादि को रजोगुणात्मक बना

अजांशब्दस्य मायापरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७५

इत्यभ्युपगमात् । नन्वजाशब्दश्छागायां रूढः । बाढम्, सा तु रूढिरिह नाश्रयितुं शक्या, विद्याप्रकरणात् । सा च बह्वीः प्रजास्त्रैगुण्यान्विता जनयति । तां प्रकृतिमन

भामती

रजोऽपि रञ्जयतीति लोहितम् । एवं प्रसन्नं पाथः शुक्लं सत्त्वमपि प्रसन्नमिति शुक्लम् । एवमावरकं मेघादि कृष्णं तमोऽप्यावरकमिति कृष्णम् । परेणापि नाव्याकृतस्य स्वरूपेण लोहितत्वादियोग आस्थेयः, किन्तु तत्कार्यस्य तेजोऽबन्नस्य रोहितत्वादि कारण उपचरणीयम् । कार्यसारूप्येण वा कारणे कल्पनीयं तदस्माकमपि तुल्यम् । 'अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः' इति स्वात्मभेदश्रवणात् सांख्यस्मृतेरेवात्र मन्त्रवर्णे प्रत्यभिज्ञानं न त्वव्याकृतप्रक्रियायाः । तस्यामेकात्म्याभ्युपगमेनात्मभेदाभावात् । तस्मात् स्वतन्त्रं प्रधानं नाशब्दमिति प्राप्तम् । ॐ तेषां साम्यावस्था अवयवधर्मैरिति ॐ । अवयवाः प्रधानस्यैकस्य सत्त्वरजस्तमांसि तेषां धर्मा लोहितत्वादयस्तैरिति । ॐ प्रजास्त्रैगुण्यान्विताः इति ॐ । सुखदुःखमोहात्मिकाः । तथाहि — मैत्रदारेषु नर्मदायां मैत्रस्य सुखं तत् कस्य हेतोस्तं प्रति सत्त्वसमुद्भू-

भामती-व्याख्या

देते हैं। जैसे स्वच्छ जल शुक्ल कहलाता है, वैसे सत्त्वगुण भी स्वच्छ होने से शुक्ल कहा जाता है। इसी प्रकार प्रकाश के अवरोधक मेघादि को कृष्ण कहते हैं, तमोगुण भी सत्त्वादि का अवरोधक है, अतः कृष्ण कहा गया है । रजोगुणादि में लोहितत्वादि उपचार केवल सांख्याचार्यों को ही नहीं करना पड़ता, अपि तु वेदान्तियों को भी अपनी अव्याकृत माया में लोहितत्वादि का उपचार मानना पड़ता है, क्योंकि माया में भी स्वरूपतः लोहितत्वादि का योग सम्भव नहीं, अपि तु उसके कार्यभूत तेज, जल और पृथिवी में वर्तमान लोहितत्वादि मायारूप कारण में उपचरित होते हैं। अथवा तेज आदि रूप कार्य (जन्य) पदार्थों में लोहितत्वादि को देखकर उनके जनकीभूत प्रधानतत्त्व में वस्तुतः लोहितत्वादि के सत्त्व की कल्पना (अनुमिति) हो जाती है; क्योंकि उपादान कारण और कार्य का वेदान्त-मत में सारूप्य माना जाता है। यह सब कुछ हम सांख्यवादी भी कर सकते हैं। उक्त श्रुति में वेदान्त-सिद्धान्त की प्रत्यभिज्ञा नहीं होती, क्योंकि वेदान्ती 'आत्मा' एक ही मानते हैं, किन्तु उक्त श्रुति में बद्ध और मुक्त आत्माओं का भेद (आत्मनानात्व) प्रतिपादित है—"अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः" (श्वेता० ४।५) । अतः उक्त श्रुति में सांख्य-दर्शन का ही प्रत्यभिज्ञान होता है, वेदान्त-सम्मत अव्याकृतवाद का नहीं। फलतः स्वतन्त्र (किसी चेतन तत्त्व से अधिष्ठित न होकर) प्रधान (प्रकृति) ही जगत् का कारण है, ब्रह्म नहीं और 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्र० सू० १।१।५) इस सूत्र के द्वारा जो प्रकृति को अशब्द (प्रमाण-रहित) कह कर सांख्य-मत का खण्डन किया गया, वह अनुचित है, क्योंकि उक्त श्रुतिरूप शब्द प्रमाण के द्वारा सांख्य-मत प्रमाणित है।

"तेषां साम्यावस्थाऽवयवधर्मैर्लोहितशुक्लकृष्णैति व्यपदिश्यते"—इस भाष्य का अर्थ यह है कि यद्यपि उक्त श्रुति में प्रधानादि शब्दों के द्वारा प्रकृति का प्रतिपादन नहीं किया गया, तथापि रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है, वह एक है उसके रजोगुणादि अवयव हैं। उनके जो लोहितत्वादि धर्म हैं, उनको प्रवृत्ति-निमित्त मानकर प्रकृति का 'लोहितशुक्लकृष्णा' शब्द के द्वारा अभिधान किया गया है। "सा च बह्वीः त्रैगुण्यान्विता जनयति"। उस अजा (प्रकृति) का प्रत्येक प्रजा (कार्य) सुख, दुःख और मोह—इन तीन गुणों से समन्वित होती है। इस तथ्य का स्पष्टीकरण इस दृष्टान्त के द्वारा हो जाता है कि 'मैत्र' नाम के पुरुष की रूपयौवन-सम्पन्न 'नर्मदा' नाम की पत्नी है, उसको देखकर उसका पति सुख-विभोर हो जाता है, क्योंकि अपने पति के लिए वह सुखरूप (सत्त्वात्मक) है।

४७६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. ८

एकः पुरुषो जुषमाणः प्रीयमाणः सेवमानो वाऽनुशेते । तामेवाविद्ययाऽऽत्मत्वेनोपगम्य सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकतया संसरति । अन्यः पुनरजः पुरुष उत्पन्नविवेकज्ञानो विरक्तो जहात्येनां प्रकृतिं भुक्तभोगां कृतभोगापवर्गां परित्यजति, मुच्यत इत्यर्थः । तस्माच्छ्रुतिमूलैव प्रधानादिकल्पना कापिलानामिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः—नानेन मन्त्रेण श्रुतिमत्त्वं सांख्यवादस्य शक्यमाश्रयितुम् । न ह्ययं मन्त्रः स्वातन्त्र्येण कंचिदपि वादं

भामती

वात् । तथा च तत्सपत्नीनां दुःखं तत्कस्य हेतोस्ततः प्रति रजःसमुद्भवात् । तथा चैत्रस्य तामविन्दतो मोहो विषादः स कस्य हेतोस्तं प्रति तमःसमुद्भवात् । नर्मदया च सर्वे भावा व्याख्याताः। तदिदं त्रैगुण्यान्वितत्वं प्रजानाम् । अनुशेत इति व्याचष्टे ॐ तामेवाविद्यया इति ॐ । विषया हि शब्दादयः प्रकृतिविकारास्त्रैगुण्येन सुखदुःखमोहात्मान इन्द्रियमनोऽहङ्कारप्रणालिकया बुद्धिसत्त्वमपसंक्रामन्ति । तेन तद्बुद्धिसत्त्वं प्रधानविकारः सुखदुःखमोहात्मकं शब्दादिरूपेण परिणमते । चितिशक्तिस्त्वपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमापि बुद्धिसत्त्वादात्मनो विवेकमबुध्यमाना बुद्धिवृत्त्यैव विपर्यासनाविद्यया वृत्तिस्थान् सुखादीन् आत्मन्यभिमन्यमाना सुखादिमतीव बभूव । तदिदमुक्तं सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकतया संसरत्येकः । सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिसमुन्मूलितनिखिलवासनाविद्यानुबन्धस्त्वन्यो जहात्येनां प्रकृतिं तदिदमुक्तम् ॐ अन्यः पुनः इति ॐ । भुक्तभोगामिति व्याचष्टे ॐकृतभोगापवर्गाम्ॐ । शब्दाद्युपलब्धिर्भोगः । गुणपुरुषान्यताख्यातिरपवर्गः । अपवृज्यते हि तया पुरुष इति ।

एवं प्राप्तेऽभिधीयते न तावदजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य इत्येतदात्म-

भामती-व्याख्या

उसी को देखकर उसकी सपत्नियां दुःखी होती हैं, क्योंकि उनके प्रति वह रजोगुणात्मक है । चैत्रादि पड़ोसी व्यक्तियों को जिन्हें वह स्त्री प्राप्त नहीं होती, दूर से देख-देख कर मोह होता है, क्योंकि उनके प्रति वह तमोरूप होती है । इसी प्रकार प्रत्येक प्राकृत पदार्थ त्रिगुणात्मक है ।

श्रुतिगत 'अनुशेते' शब्द की व्याख्या की जा रही है—"तामेवाविद्ययाऽऽत्मत्वेनोपगम्य सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकतया संसरति"। अर्थात् प्रकृति के विकारभूत शब्दादि विषय त्रैगुण्यसमन्वित होने के कारण सुख-दुःख-मोहात्मक होते हैं। वे इन्द्रिय, मन और अहंकार के माध्यम से बुद्धिगत सत्त्व में संक्रान्त हो जाते हैं, अतः बुद्धिगत सत्त्व सुख-दुःख-मोह-समन्वित होने के कारण शब्दादिरूपेण परिणत होता है । इसके विपरीत चैतन्य पुरुष सुखादि से असंक्रान्त होने के कारण अपरिणामी होता है फिर भी बुद्धिगत सत्त्व से विवेक-ज्ञान न होने के कारण चिदात्मा बुद्धि-सत्त्व को अपना स्वरूप और उसके सुखादि को अपना ही धर्म मानकर अपने को सुखादिमान् मान लेता है ! जो पुरुष सत्त्व और पुरुष की विवेक-ख्याति के द्वारा निखिल वासनाओं से युक्त अविद्या के सम्बन्ध का विच्छेद कर डालता है, वह पुरुष इस प्रकृति का परित्याग कर देता है, भाष्यकार यही कह रहे हैं—"अन्यः पुनरजः पुरुषः" । श्रुतिगत "भुक्तभोगाम्"—इस विशेषण की व्याख्या है—"कृतभोगापवर्गाम्"। शब्दादि विषयों की उपलब्धि का नाम भोग एवं सत्त्व और पुरुष की अन्यता ( भेद ) की ख्याति का नाम अपवर्ग है [ यहाँ मोक्षार्थक 'अपवर्ग' पद मोक्ष के साधनोभूत सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के लिए प्रयुक्त हुआ है ] क्योंकि इस अन्यताख्याति के द्वारा ही पुरुष अपवृक्त ( मुक्त ) होता है ।

सिद्धान्त—पहली बात तो यह है कि "अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते, जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः"—यह वाक्य आत्मनानात्व का प्रतिपादक नहीं, अपितु लोक-सिद्ध आत्मनानात्व का अनुवाद करके बन्ध और मोक्ष का प्रतिपादन करता है । वह अनूद्यमाव

अजाशब्दस्य मायापरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७७

समर्थयितुमुत्सहते, सर्वत्रापि यया कयाचित्कल्पनयाऽजातत्वादिसंपादनोपपत्तेः सांख्य- वाद एवेहाभिप्रेत इति विशेषावधारणकारणाभावात् । चमसवत् । यथा हि 'अर्वा- ग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः' (बृ० २।२।३) इत्यस्मिन्मन्त्रे स्वातन्त्र्येणायं नामासौ चमसोऽभिप्रेत इति न शक्यते निरूपयितुम् । सर्वत्रापि यथाकथंचिदवर्वाग्बिलत्वादि- कल्पनोपपत्तेः । एवमिहाप्यविशेषः 'अजामेकाम्' इत्यस्य मन्त्रस्य । नास्मिन्मन्त्रे प्रधानमेवाजाऽभिप्रेतेति शक्यते नियन्तुम् ॥ ८ ॥

तत्र तु 'इदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः' इति वाक्यशेषाच्चमस- विशेषप्रतिपत्तिर्भवति । इह पुनः केयमजा प्रतिपत्तव्येति ? अत्र ब्रूमः—

ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके ॥ ९ ॥

परमेश्वरादुत्पन्ना ज्योतिःप्रमुखा तेजोजन्नलक्षणा चतुर्विधस्य भूतग्रामस्य प्रकृतिभूतेयमजा प्रतिपत्तव्या । तुशब्दोऽवधारणार्थः । भूतत्रयलक्षणैवेयमजा विज्ञेया, न गुणत्रयलक्षणा । कस्मात् ? तथा ह्येके शाखिनस्तेजोजन्नानां परमेश्वरादुत्पत्तिमा- म्नाय तेषामेव रोहितादिरूपतामामनन्ति—'यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं

भामती

भेदप्रतिपादनपरमपि तु सिद्धमात्मभेदमनूद्य बन्धमोक्षौ प्रतिपादयतीति । स चानूदितो भेदः — 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा' इत्यादिश्रुतिभिरात्मैकत्वप्रतिपादनपराभिविरोधात्काल्पनिकोधवतिष्ठते । तथा च न सांख्यप्रक्रियायाः प्रत्यभिज्ञानमित्यजावाक्यं चमसवाक्यवदरिप्लवमानं न स्वतन्त्रप्रधाननिश्चयाय पर्याप्तं, तदिदमुक्तं सूत्रकृता — “चमसवदविशेषादिति” ॥ ८ ॥ उत्तरसूत्रमवतारयितुं शङ्कते ॐतत्र त्विदं तच्छिर इतिॐ । सूत्रमवतारयति ॐ अत्र ब्रूमः ॐ। सर्वशाखाप्रत्ययमेकं ब्रह्मेति स्थितौ शाखान्तरोक्तरोहितादिगुणयोगिनी तेजोजन्नलक्षणा जरायुजाण्डजस्वेद- जोद्भिज्जचतुर्विधभूतग्रामप्रकृतिभूतेयमजा प्रतिपत्तव्या । रोहितशुक्लकृष्णमिति रोहितादिरूपतया तस्या

भामती-व्याख्या

आत्मनानात्व "एको देवः सर्वभूतेषु गूढः" (श्वेता. ६।११) इत्यादि आत्मैकत्व-प्रतिपादक श्रुति-वाक्यों से बाधित होकर काल्पनिक मात्र रह जाता है। फलतः उक्त श्रुति में सांख्य- प्रक्रिया का प्रत्यभिज्ञान सम्भव नहीं, अतः अजा-घटित वाक्य चमस-घटित वाक्य के समान अनिश्चिताार्थक होने के कारण स्वतन्त्र प्रकृतिवाद का निर्णायक नहीं हो सकता, सूत्रकार यही कर रहे हैं—“चमसवदविशेषात्” ॥ ८ ॥ उत्तरभावी सूत्र का अवतरण प्रस्तुत करने के लिए सन्देह किया जाता है—“तत्र त्विदं तच्छिर एव ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः”। अर्थात् दृष्टान्त-स्थल पर वाक्य-शेष के द्वारा शिरःकपालरूप चमस-विशेष का निश्चय किया जाता है, किन्तु उक्त श्रुति में 'अजा' पद वेदान्त-सम्मत विशेष अर्थ का समर्पक क्योंकर होगा ? उक्त सन्देह के समाधान में उत्तरभावी सूत्र को अवतरित किया जाता है—“अत्र ब्रूमः”। दार्शन्तिक-स्थल पर निर्णायक "यदग्ने रोहितं रूपम्" (छां. ६।४।१) यह वाक्यशेष यद्यपि अन्य शाखा का है, तथापि शाखान्तराधि- करण में कहा गया है—“एकं वा संयोगरूपचोदनाख्याविशेषात्” (जै. सू. २।४।२९) अर्थात् विभिन्न शाखाओं के समान-प्रकरण-पठित वाक्यों की एकवाक्यता में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं माना जाता। प्रकृत में सभी शाखाओं का मुख्य प्रतिपाद्य ब्रह्म वस्तु है। उसी की एक लोहितादि गुण-योगिनी, तेजोजलान्नस्वरूप, जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नाम के चतुर्विध प्राणियों की जननी ज्योति (माया शक्ति) यहाँ अभिहित है—

४७८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. १९

तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्य' इति, तान्येवेह तेजोबन्नानि प्रत्यभिज्ञायन्ते रोहितादिशब्द- सामान्यात्। रोहितादीनां च शब्दानां रूपविशेषेषु मुख्यत्वान्नाङ्कत्वाच्च गुणविषय- त्वस्य। असंदिग्धेन च संदिग्धस्य निगमनं न्याय्यं मन्यन्ते। तथेहापि 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति । किंकारणं ब्रह्म' (श्वे० १।१) इत्युपक्रम्य 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवा- त्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' (श्वे० १।३) इति पारमेश्वर्याः शक्तेः समस्तजगद्विधायिन्या वाक्योपक्रमेऽवगमात्। वाक्यशेषेऽपि 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' इति 'यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः' (श्वे० ४।१०, ११) इति च तस्या एवावगमान्न

भामती

एवं प्रत्यभिज्ञानान्न तु सांख्यपरिकल्पिता प्रकृतिः, तस्या अप्रामाणिकतया श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गा- द्ब्रह्माविना च रोहिताद्युपचारस्य सति मुख्यार्थसम्भवेऽयोगात् तदिदमुक्तं ॐ रोहितादीनां शब्दानाम् इति ॐ । अजापदस्य च समुदायप्रसिद्धिपरित्यागेन न जायत इत्यवयवप्रसिद्धाश्रयणे दोषप्रसङ्गात् । अत्र तु रूपककल्पनया समुदायप्रसिद्धेरेवानपेक्षायाः स्वीकारात्। अपि चायमपि श्रुतिकलापोऽस्मद्दर्शना- नुगुणो न सांख्यस्मृत्यनुगुण इत्याह ॐ तथेहापि इति ॐ । ॐ किंकारणं ब्रह्मेत्युपक्रम्य इति ॐ । ब्रह्म- स्वरूपं तावज्जगत्कारणं न भवति विशुद्धत्वात्तस्य यथाहुः —

पुरुषस्य च शुद्धस्य नाशुद्धा विकृतिर्भवेत्

इत्याशयवतीयं श्रुतिः : पृच्छति ॐकिंकारणंॐ यस्य ब्रह्मणो जगदुत्पत्तिस्तत् किकारणं ब्रह्मेत्यर्थः। ते ब्रह्मविदो ध्यानयोगेनात्मानं गताः प्राप्ता अपश्यन्निति योजना। ॐ यो योनिं योनिम् इति ॐ । अविद्या

भामती-व्याख्या

लोहितशुक्लकृष्णम्” (श्वेता. ४।५)। यदि इस ज्योति को अशब्द या अप्रामाणिक माना जाता है, “तब यदग्ने रोहितं रूपम्” (छां. ६।४।१) इत्यादि वाक्यों में श्रुत तत्त्व का बाध और अश्रुत (प्रधान) तत्त्व की कल्पना करनी पड़ेगी। अग्न्यादि में जब मुख्यत: लोहितत्वादि का समन्वय हो जाता है, तब रञ्जनात्मक रजोगुणादि की कल्पना संगत नहीं कही जा सकती, यहो सब कुछ ध्यान में रख कर भाष्यकार कह रहे हैं— “रोहितादीनां शब्दानां रूपविशेषेषु मुख्यत्वात्”। ‘अजा’ शब्द समुदाय (रूढि) शक्ति के द्वारा इसी मायारूप ज्योति का अभिधायक है, अतः रूढि शक्ति का परित्याग करके अवयव-शक्ति के द्वारा अर्थान्तर का प्रतिपादक नहीं हो सकता। माया रूप रूढ अर्थ का परित्याग करके ‘न जायते इत्यजा’— ऐसा अवयवार्थ का आश्रयण करने पर “रूढिर्योगमपहरति”—इस सहज-सिद्ध नियम का उल्लंघन होगा। प्रसिद्ध माया को अजा (छागी) के रूप में प्रस्तुत जो रूपकालङ्कार अभिनीत किया गया है, उसका सामञ्जस्य करने के लिए ‘अजा’ शब्द के रूढ अर्थ का ग्रहण करना आवश्यक है, क्योंकि रूढ अर्थ अवयवादि की शक्ति से निरपेक्ष होकर शीघ्र उपस्थित हो जाता है।

दूसरी बात यह भी है कि प्रकरण के अनुरोध पर उक्त सभी श्रुतियों का समन्वय हमारे वेदान्त-दर्शन के अनुरूप ही होता है, यह कहा जा रहा है—“तथेहापि ब्रह्मवादिनो वदन्ति”। निश्चितार्थक वाक्य की सहायता से सन्दिग्धार्थक वाक्य का नयन किया जाता है। प्रकृत में सन्देह किया गया—“किंकारणं ब्रह्म?” अर्थात् जगत् का कारण जो ब्रह्म कहा जाता है, वह किंकारणं (किसहायकं) अर्थात् वह ब्रह्म शुद्ध है, अशुद्ध कार्य का स्वतः कारण नहीं होता, अतः किस तत्त्व की सहायता से अशुद्ध जगत् का कारण बनता है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है—“ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्” (श्वेता. १।३)। अर्थात् ब्रह्मवेत्ताओं ने अपने ध्यानरूप योग के द्वारा उस दैवी शक्ति (माया)

अजाशब्दस्य मायापरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७९

स्वतन्त्रा काचित्प्रकृतिः प्रधानं नामाजामन्त्रेणाम्नायत इति शक्यते वक्तुम्। प्रकरणात्तु सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा नामरूपयोः प्रागवस्थानेनापि मन्त्रेणाम्नायत इत्युच्यते। तस्याश्च स्वविकारविषयेण त्रैरूप्येण त्रैरूप्यमुक्तम् ॥ ९ ॥

कथं पुनस्तेजोबन्नात्मना त्रैरूप्येण त्रिरूपाऽजा प्रतिपत्तुं शक्यते ? यावता न तावत्तेजोऽबन्नेष्वजाकृतिरस्ति। न च तेजोबन्नानां जातिश्रवणादजातिनिमित्तोऽप्यजाशब्दः संभवतीति । अत उत्तरं पठति -

कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १० ॥

नायमजाकृतिनिमित्तोऽजाशब्दः। नापि यौगिकः। किं तर्हि ? कल्पनोपदेशोऽयम्। अजारूपकक्लृप्तिस्तेजोबन्नलक्षणायाश्चराचरयोनेरुपदिश्यते। यथा हि लोके यदृच्छया काचिदजा रोहितशुक्लकृष्णवर्णा स्याद्बहुबर्करा सरूपबर्करा च, तां च कश्चिदजो जुषमाणोऽनुशयीत, कश्चिच्चैनां भुक्तभोगां जह्यात्, एवमियमपि तेजोबन्नलक्षणा भूतप्रकृतिस्त्रिवर्णा बहु सरूपं चराचरलक्षणं विकारजातं जनयति, अविदुषा च क्षेत्रज्ञेनोपभुज्यते, विदुषा च परित्यज्यत इति। न चेदमाशङ्कितव्यम् — एकः क्षेत्रज्ञोऽ-


भामती

शक्तिर्योनिः सा च प्रतिजीवं नानेत्युक्तमतो वीप्सोपपन्ना। शेषमतिरोहितार्थम् ॥ ९ ॥

सूत्रान्तरमवतारयितुं शङ्कते ॐ कथं पुनः इति ॐ। अजाकृतिर्जातिस्तेजोबन्नेषु नास्ति। न च तेजोबन्नानां जन्मश्रवणादजन्मनिमित्तोऽप्यजाशब्दः संभवतीत्याह ॐ न च तेजोऽबन्नानाम् इति ॐ।

सूत्रमवतारयति ॐ अत उत्तरं पठति ॐ। ननु किं छागा लोहितशुक्लकृष्णैव ? यादृशीनामपि छागानामुपलम्भादित्यत आह ॐ यदृच्छया इति ॐ। बहुबर्करा बहुशावा। शेषं निगदव्याख्यातम् ॥१०॥


भामती-व्याख्या

का दर्शन किया, जिसका सहयोग पा कर ब्रह्म इस त्रिगुणात्मक प्रपञ्च का कारण बन जाता है। "योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः" ( श्वेता० ४।११ ) इस श्रुति में 'योनिं-योनिम्'— ऐसा वीप्सा का प्रयोग इस लिए किया है कि जो अविद्या शक्ति जगत् की योनि कही जाती है, वह जीव के भेद से भिन्न होती है, एक नहीं। शेष भाष्य सुबोध है ॥ ९ ॥

दसवें सूत्र को अवतरित करने के लिए शङ्का की जाती है— "कथं पुनः"। शङ्कावादी का आशय यह है कि यहाँ 'अजा' शब्द का प्रवृत्ति-निमित्त 'अजात्व' जाति है? अथवा अवयवार्थ ? तेज, जल और पृथिवी में 'अजात्व' आकृति (जाति) नहीं रहती, अतः 'अजा' शब्द को 'जातिप्रवृत्ति-निमित्तक नहीं कह सकते। जन्माभावरूप अवयवार्थ भी 'अजा' शब्द का प्रवृत्ति-निमित्त नहीं हो सकता— "न च तेजोऽबन्नानां जातिश्रवणात्"। अर्थात् श्रुतियों के द्वारा तेज आदि की जाति ( जन्म ) का प्रतिपादन किया है, अतः 'न जायते'— ऐसा अवयवार्थ भी वहाँ सम्भव नहीं ।

उक्त शङ्का का निराकरण सूत्र के द्वारा किया जाता है— "अत उत्तरं पठति— कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः"। अर्थात् यहाँ 'अजा' शब्द न तो जातिप्रवृत्तिनिमित्तक है और न यौगिक, अपितु रूपक-कल्पना के द्वारा प्रयुक्त हुआ है। यद्यपि लोक में सभी अजाएँ ( बकरियाँ ) लोहितशुक्लकृष्णात्मक नहीं होतीं, तथापि यदृच्छा से जो बकरी वैसी चित्रा होती है, उसी का प्रकृत में रूपक प्रस्तुत किया गया है। बहुबर्करा का अर्थ है कि बहुत बच्चोंवाली बकरी ॥ १० ॥

४८० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. ११

नुशेतेऽन्यो जहातीत्यतः क्षेत्रज्ञभेदः पारमार्थिकः परेषामिष्टः प्राप्नोतीति । न हीयं क्षेत्रज्ञभेदप्रतिपिपादयिषा, किन्तु बन्धमोक्षव्यवस्थाप्रतिपिपादयिषा त्वेषा । प्रसिद्धं तु भेदमनूद्य बन्धमोक्षव्यवस्था प्रतिपाद्यते । भेदस्तूपाधिनिमित्तो मिथ्याज्ञानकल्पितो न पारमार्थिकः, 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा' इत्यादि- श्रुतिभ्यः । मध्वादिवत्, यथा आदित्यस्यामधुनो मधुत्वम् ( छा० ३।१ ), वाचश्चा- धेनोधेनुत्वम् ( बृ० ५।८ ), द्युलोकादीनां चानग्नीनामग्नित्वम् ( बृ० ८।२।९ ) इत्येवं- जातीयकं कल्प्यते, एवमिदमनजाया अजात्वं कल्प्यत इत्यर्थः । तस्मादविरोधस्तेजोऽ- बन्नेष्वजाशब्दप्रयोगस्य ॥ १० ॥

( ३ संख्योपसंग्रहाधिकरणम् । सू० ११-१३ ) न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥ ११ ॥

एवं परिहृतेऽप्यजामन्त्रे पुनरन्यस्मान्मन्त्रात्सांख्यः प्रत्यवतिष्ठते । 'यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृतम्' (बृ. ४।४।१७) इति । अस्मिन्मन्त्रे पञ्च पञ्चजना इति पञ्चसंख्याविषयाऽपरा पञ्चसंख्या श्रूयते, पञ्चशब्दद्वयदर्शनात् । त एते पञ्चपञ्चकाः पञ्चविंशतिः संपद्यन्ते । तथा पञ्च-

भामती

अवान्तरसङ्गतिमाह एवं परिहृतेऽपि इति । पञ्चजना इति हि समासार्थः पञ्चसंख्यया सम्बध्यते । न च दिक् संख्ये संज्ञायामिति समासविधानान्मनुषेषु निरूढोऽयं पञ्चजनशब्द इति वाच्यम्, तथा सति पञ्च मनुजा इति स्यात् । एवं चात्मनि पञ्चमनुजानामाकाशस्य च प्रतिष्ठानमिति निस्ता- त्पर्यम्, सर्वस्यैव प्रतिष्ठानात् । तस्माद्रूढेरसम्भवात्तत्त्यागेनात्र योग आस्थेयः । जनशब्दश्च कथञ्चित्तत्त्वेषु व्याख्येयः । तत्रापि किं पञ्च प्राणादयो वाक्यशेषगता विवक्ष्यन्ते उत तदतिरिक्ता अन्य एव वा केचित् ?

भामती-व्याख्या

अवान्तर संगति - 'अजा मन्त्र' में सांख्य-मतोद्भावन निराकृत हो जाने पर भी अन्य मन्त्र के माध्यम से सांख्य-सिद्धान्त का उद्भावन किया जाता है।

विषय - "यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः" (बृह. उ. ४।४।१७) यह वाक्य विचारणीय है।

संशय - उक्त श्रुति सांख्याभिमत पञ्चविंशति तत्त्व की प्रतिपादिका है? अथवा प्राणादि पाँच पदार्थों की ?

पूर्वपक्ष - 'पञ्च पञ्चजनाः' यहाँ पर 'जन' शब्द 'मनुष्य' में रूढ न होकर 'जायते इति जनः'—इस प्रकार कार्य मात्र का वाचक है, अतः 'जन' शब्द का स्वार्थ में तात्पर्य न होने के कारण 'पञ्च पञ्चकाः'—इस अर्थ में तात्पर्य पर्यवसित होता है, जिसका अर्थ है पाँच पंचक या पचीस तत्त्व।

यद्यपि "दिक्संख्ये संज्ञायाम्" (पा० सू० २।१।५०) इस सूत्र के द्वारा संख्या-वाचक शब्द के साथ संज्ञा (रूढ) शब्दों का ही समास होता है, अतः 'सप्तर्षयः' के समान 'पंचजन' शब्द भी पंचभूत-जनित मनुष्य की संज्ञा ही है, केवल संख्या का वाचक नहीं। तथापि वैसा मानने पर 'पंच पंचजनाः' इस वाक्य का अर्थ होता है—'पंच मनुष्या'। तब पूरे वाक्य का अर्थ करना होगा—'आत्मा में पाँच मनुष्य और एक आकाश—ये छः पदार्थ ही प्रतिष्ठित हैं। ऐसे अर्थ में श्रुति का कभी तात्पर्य नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा में तो समस्त विश्व

पञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८१

विंशतिसंख्यया यावन्तः संख्येया आकाङ्क्ष्यन्ते तावन्त्येव च तत्त्वानि सांख्यैः

भामती

तत्र पौर्वापर्यपर्यालोचनया काण्वमाध्यन्दिनवाक्ययोर्विरोधात् । एकत्र हि ज्योतिषा पञ्चत्वमन्नेनेतरत्र । न च षोडशिग्रहणाग्रहणद्विकल्पसम्भवः, अनुष्ठानं हि विकल्प्यते न वस्तु । वस्तुतत्त्वकथा चेयं नानुष्ठानकथा, विध्यभावात् । तस्मात्कानिचिदेव तत्त्वानीह पञ्च प्रत्येकं पञ्चसंख्यायोगीनि पञ्चविंशतितत्त्वानि भवन्ति । सांख्यैश्च प्रकृत्यादीनि पञ्चविंशति तत्त्वानि स्मर्यन्ते इति तान्येवानेन मन्त्रेणोच्यन्त इति नाशब्दं प्रधानादि । न चाधारत्वेनात्मनो व्यवस्थानात् स्वात्मनि चाधाराधेयभावस्य विरोधाद् आकाशस्य च व्यतिरेचनात् त्रयोविंशतिर्जना इति स्यान्न पञ्च पञ्चजना इति वाच्यम्, सत्यप्याकाशात्मनोर्व्यतिरेचने मूलप्रकृतिभागैः सत्त्वरजस्तमोभिः पञ्चविंशतिसंख्योपपत्तेः । तथा च सत्याकाशात्मभ्यां सप्तविंशतिसंख्यायां पञ्चविंशति तत्त्वानीति स्वसिद्धान्तव्याकोप इति चेत् । न, मूलप्रकृतित्वमात्रेणैकीकृत्य सत्त्वरजस्तमांसि पञ्चविंशतितत्त्वोपपत्तेः । हिरुग्भावेन तु तेषां सप्तविंशतित्वाविरोधात्तस्मान्नाशाब्दी सांख्यस्मृतिरिति

भामती-व्याख्या

प्रतिष्ठित है, केवल छः पदार्थ ही नहीं। फलतः 'पंचजन' शब्द को रूढ न होकर यौगिक ही मानना होगा । 'जन' शब्द को कथंचित् तत्त्वार्थक माना जा सकता है।

फिर भी यदि सन्देह हो कि क्या वाक्य-शेषगत प्राणादि पाँच पदार्थ यहाँ विवक्षित हैं ? अथवा उनसे भिन्न कोई अन्य तत्त्व ? प्राणादि पाँच पदार्थों का ग्रहण करने पर काण्व शाखीय उपनिषत् और माध्यन्दिन शाखीय उपनिषत् के वाक्यों में विरोध उपस्थित होता है, क्योंकि एक उपनिषत् में ज्योति को लेकर पाँच संख्या की पूर्ति की गई है और दूसरी उपनिषत् में अन्न ( पृथिवी ) को लेकर [ उत्तरभावी सूत्रों में इस का विश्लेषण आ रहा है ] । “अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति” (मै. सं. ४।७।६) “नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति” ( ) इसके समान दोनों विरोधी अर्थों का विकल्पात्मक समन्वय यहाँ नहीं किया जा सकता, क्योंकि क्रिया या प्रयोग में विकल्प होता है, वस्तु में विकल्प नहीं हो सकता । प्रकृत में वस्तु तत्त्व का प्रतिपादन किया जाता है, अनुष्ठान का नहीं, क्योंकि अनुष्ठान का बोधक कोई विधि वाक्य यहाँ उपब्ध नहीं। परिशेषतः कोई ऐसे पाँच तत्त्वों का अभिधान करना होगा, जिनमें प्रत्येक तत्त्व पञ्चात्मक हो । इस प्रकार सब मिलाकर पचीस तत्त्व सम्पन्न हो जाते हैं । सांख्य-दर्शन में प्रकृत्यादि पञ्चविंशति तत्त्व प्रतिपादित हैं। वे ही उक्त श्रुति में अभिहित हैं, अतः प्रधान ( प्रकृति ) तत्त्व को अशब्द ( अप्रामाणिक ) नहीं कहा जा सकता ।

शङ्का- '१ मूल प्रकृति + ७ महदादि + १६ विकृति + १ पुरुष या आत्मा' इन सांख्याभिमत पचीस तत्त्वों का प्रतिपादन “यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः” ( बृह० उ० ४।४।१७ ) इस श्रुति के द्वारा सम्भव नहीं, क्योंकि इस श्रुति में आत्मा को पचीस तत्त्वों का आधार माना गया है, पचीस तत्त्वों के अन्तर्गत नहीं, क्योंकि आधार-आधेयभाव एक ( अभिन्न ) तत्त्व में सम्भव नहीं, अतः पचीस आधेय तत्त्वों में से पुरुष या आत्मा को निकाल देने पर चौबीस तत्त्व शेष रहते हैं एवं आकाश को भी पचीस से भिन्न गिनाया गया है, अतः आकाश को भी निकाल देने पर तेईस तत्त्व ही शेष रह जाते हैं, अतः 'पञ्च पञ्चजनाः' का अर्थ तेईस करना होगा, जो कि न तो सम्भव है और न सांख्य-पक्ष का उपस्थापक ।

समाधान- आत्मा और आकाश को घटा देने पर भी मूल प्रकृति के स्थान पर सत्त्व, रज और तम - इन तीन गुणों की गणना कर लेने पर पचीस तत्त्वों का लाभ हो जाता है। आत्मा और आकाश को आधेय पचीस तत्त्वों से निकाल कर सभी तत्त्वों का आकलन करने पर सब सत्ताईस तत्त्व हो जाते हैं, तब सांख्य-सिद्धान्त से विरोध उपस्थित क्यों नहीं

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