भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८१

विंशतिसंख्यया यावन्तः संख्येया आकाङ्क्ष्यन्ते तावन्त्येव च तत्त्वानि सांख्यैः

भामती

तत्र पौर्वापर्यपर्यालोचनया काण्वमाध्यन्दिनवाक्ययोर्विरोधात् । एकत्र हि ज्योतिषा पञ्चत्वमन्नेनेतरत्र । न च षोडशिग्रहणाग्रहणद्विकल्पसम्भवः, अनुष्ठानं हि विकल्प्यते न वस्तु । वस्तुतत्त्वकथा चेयं नानुष्ठानकथा, विध्यभावात् । तस्मात्कानिचिदेव तत्त्वानीह पञ्च प्रत्येकं पञ्चसंख्यायोगीनि पञ्चविंशतितत्त्वानि भवन्ति । सांख्यैश्च प्रकृत्यादीनि पञ्चविंशति तत्त्वानि स्मर्यन्ते इति तान्येवानेन मन्त्रेणोच्यन्त इति नाशब्दं प्रधानादि । न चाधारत्वेनात्मनो व्यवस्थानात् स्वात्मनि चाधाराधेयभावस्य विरोधाद् आकाशस्य च व्यतिरेचनात् त्रयोविंशतिर्जना इति स्यान्न पञ्च पञ्चजना इति वाच्यम्, सत्यप्याकाशात्मनोर्व्यतिरेचने मूलप्रकृतिभागैः सत्त्वरजस्तमोभिः पञ्चविंशतिसंख्योपपत्तेः । तथा च सत्याकाशात्मभ्यां सप्तविंशतिसंख्यायां पञ्चविंशति तत्त्वानीति स्वसिद्धान्तव्याकोप इति चेत् । न, मूलप्रकृतित्वमात्रेणैकीकृत्य सत्त्वरजस्तमांसि पञ्चविंशतितत्त्वोपपत्तेः । हिरुग्भावेन तु तेषां सप्तविंशतित्वाविरोधात्तस्मान्नाशाब्दी सांख्यस्मृतिरिति

भामती-व्याख्या

प्रतिष्ठित है, केवल छः पदार्थ ही नहीं। फलतः 'पंचजन' शब्द को रूढ न होकर यौगिक ही मानना होगा । 'जन' शब्द को कथंचित् तत्त्वार्थक माना जा सकता है।

फिर भी यदि सन्देह हो कि क्या वाक्य-शेषगत प्राणादि पाँच पदार्थ यहाँ विवक्षित हैं ? अथवा उनसे भिन्न कोई अन्य तत्त्व ? प्राणादि पाँच पदार्थों का ग्रहण करने पर काण्व शाखीय उपनिषत् और माध्यन्दिन शाखीय उपनिषत् के वाक्यों में विरोध उपस्थित होता है, क्योंकि एक उपनिषत् में ज्योति को लेकर पाँच संख्या की पूर्ति की गई है और दूसरी उपनिषत् में अन्न ( पृथिवी ) को लेकर [ उत्तरभावी सूत्रों में इस का विश्लेषण आ रहा है ] । “अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति” (मै. सं. ४।७।६) “नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति” ( ) इसके समान दोनों विरोधी अर्थों का विकल्पात्मक समन्वय यहाँ नहीं किया जा सकता, क्योंकि क्रिया या प्रयोग में विकल्प होता है, वस्तु में विकल्प नहीं हो सकता । प्रकृत में वस्तु तत्त्व का प्रतिपादन किया जाता है, अनुष्ठान का नहीं, क्योंकि अनुष्ठान का बोधक कोई विधि वाक्य यहाँ उपब्ध नहीं। परिशेषतः कोई ऐसे पाँच तत्त्वों का अभिधान करना होगा, जिनमें प्रत्येक तत्त्व पञ्चात्मक हो । इस प्रकार सब मिलाकर पचीस तत्त्व सम्पन्न हो जाते हैं । सांख्य-दर्शन में प्रकृत्यादि पञ्चविंशति तत्त्व प्रतिपादित हैं। वे ही उक्त श्रुति में अभिहित हैं, अतः प्रधान ( प्रकृति ) तत्त्व को अशब्द ( अप्रामाणिक ) नहीं कहा जा सकता ।

शङ्का- '१ मूल प्रकृति + ७ महदादि + १६ विकृति + १ पुरुष या आत्मा' इन सांख्याभिमत पचीस तत्त्वों का प्रतिपादन “यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः” ( बृह० उ० ४।४।१७ ) इस श्रुति के द्वारा सम्भव नहीं, क्योंकि इस श्रुति में आत्मा को पचीस तत्त्वों का आधार माना गया है, पचीस तत्त्वों के अन्तर्गत नहीं, क्योंकि आधार-आधेयभाव एक ( अभिन्न ) तत्त्व में सम्भव नहीं, अतः पचीस आधेय तत्त्वों में से पुरुष या आत्मा को निकाल देने पर चौबीस तत्त्व शेष रहते हैं एवं आकाश को भी पचीस से भिन्न गिनाया गया है, अतः आकाश को भी निकाल देने पर तेईस तत्त्व ही शेष रह जाते हैं, अतः 'पञ्च पञ्चजनाः' का अर्थ तेईस करना होगा, जो कि न तो सम्भव है और न सांख्य-पक्ष का उपस्थापक ।

समाधान- आत्मा और आकाश को घटा देने पर भी मूल प्रकृति के स्थान पर सत्त्व, रज और तम - इन तीन गुणों की गणना कर लेने पर पचीस तत्त्वों का लाभ हो जाता है। आत्मा और आकाश को आधेय पचीस तत्त्वों से निकाल कर सभी तत्त्वों का आकलन करने पर सब सत्ताईस तत्त्व हो जाते हैं, तब सांख्य-सिद्धान्त से विरोध उपस्थित क्यों नहीं

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