भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४८२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. ११

संख्यायन्ते — 'मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः' (सांख्यका० ३) इति । तया श्रुतिप्रसिद्ध्या पञ्चविंशति-संख्यया तेषां स्मृतिप्रसिद्धानां पञ्चविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहात्प्राप्तं पुनः श्रुतिमत्त्वमेव प्रधानादीनाम् ।

ततो ब्रूमः, — न संख्योपसंग्रहादपि प्रधानादीनां श्रुतिमत्त्वं प्रत्याशा कर्त्तव्या ।

भामती

प्राप्ते । मूलप्रकृतिः प्रधानम् । नासावन्यस्य विकृतिरपि तु प्रकृतिरेव तदिदमुक्तं ॐ मूला इति । महदहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणि प्रकृतिश्च विकृतिश्च । तथाहि--महत्त्वमहङ्कारस्य तत्त्वान्तरस्य प्रकृति-र्मूलप्रकृतेस्तु विकृतिः । एवमहङ्कारतत्त्वं महतो विकृतिः, प्रकृतिश्च तदेव तामसं सत् पञ्चतन्मात्राणाम् । तदेव सात्त्विकं सत् प्रकृतिरेकादशेन्द्रियाणाम् । पञ्चतन्मात्राणि चाहङ्कारस्य विकृतिराकाशादीनां पञ्चानां प्रकृतिस्तदिदमुक्तं महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकश्च विकारः षोडशसंख्यावच्छिन्नो गणो विकार एव । पञ्चभूतान्यतन्मात्राण्येकादशेन्द्रियाणीति षोडशको गणः । यद्यपि पृथिव्यादयो गोघटादीनां प्रकृतिस्तथापि न ते पृथिव्यादिभ्यस्तत्त्वान्तरमिति न प्रकृतिः । तत्त्वान्तरोपादानत्वं चेह प्रकृतित्वमभिमतं नोपादानमात्रत्वमित्यविरोधः । पुरुषस्तु कूटस्थनित्योऽपरिणामो न कस्यचित्प्रकृतिर्नापि विकृतिरिति ।

एवं प्राप्तेऽभिधीयते — ॐ न संख्योपसंग्रहादपि प्रधानादीनां श्रुतिमत्त्वाशङ्का कर्तव्या । कस्मा-

भामती-व्याख्या

होता ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि सत्त्वादि तीन गुणों का मूलप्रकृतित्वेन एकरूप में संग्रह कर लेने पर पचीस तत्त्वों की उपपत्ति हो जाती है, उसके पृथग्भाव की विवक्षा होने पर श्रुति-प्रतिपादित सत्ताईस संख्या की भी उपपत्ति हो जाती है। सांख्याचार्यों ने अपने पचीस तत्त्व इस प्रकार गिनाए हैं—

मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृति विकृतयः सप्त ।
षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ ( सा० का० ३ )

'मूलप्रकृति' शब्द से 'प्रधान' तत्त्व विवक्षित है, जो कि अन्य किसी तत्त्व का विकार नहीं, केवल प्रकृति ही है—यह 'मूल' पद के द्वारा कहा गया है। महत्तत्त्व, अहंकार, शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ—ये सात तत्त्व किसी की प्रकृति भी हैं और किसी के विकार भी अर्थात् महत्तत्त्व अपने से पृथक् तत्त्वरूप अहंकार की प्रकृति और प्रधानसंज्ञक मूल प्रकृति का विकार है; अहंकार तत्त्व महत्तत्त्व का विकार और ग्यारह इन्द्रियों के सहित पाँच तन्मात्राओं की प्रकृति है, अन्तर केवल इतना है कि तामस अहंकार पाँच तन्मात्राओं एवं सात्त्विक अहंकार इन्द्रियों का जनक होता है; पाँच तन्मात्राएँ अहंकार के विकार एवं आकाशादि पाँच महाभूतों की प्रकृति (जनक) हैं, यह कहा गया—"महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकश्च विकारः" । षोडश संख्या से अवच्छिन्न समूह केवल विकार है, पञ्च महाभूतों और एकादश इन्द्रियों के समूह को 'षोडशकः' कहा गया है। यद्यपि पृथिव्यादि भूत भी घट, पट और वृक्षादि शरीरों के जनक होने से उनकी प्रकृति भी हैं, अतः उन्हें विकृतिमात्र नहीं कहा जा सकता । तथापि घटादि को पृथिव्यादिरूप ही माना जाता है, उनसे भिन्न अन्य तत्त्व नहीं, फलतः पृथिव्यादि भूत अपने से भिन्न किसी तत्त्व की प्रकृति न होने के कारण विकृतिमात्र हैं । यहाँ प्रकृतित्व का लक्षण तत्त्वान्तरोपादानत्व ही विवक्षित है, उपादानत्वमात्र नहीं । पुरुष तत्त्व कूटस्थ, नित्य, अपरिणामी होने के कारण न तो किसी तत्त्व की प्रकृति ( परिणामी उपादान कारण ) हो सकता है और न किसी की विकृति ( परिणाम ) यही कहा गया है—"न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः" ।