भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८३

कस्मात् ? नानाभावात् । नाना ह्येतानि पंचविंशतितत्त्वानि । नैषां पंचशः पंचशः साधारणो धर्मोऽस्ति, येन पञ्चविंशतेरन्तराले पराः पञ्च पञ्चसंख्या निविशेरन् । न ह्येकनिबन्धनमन्तरेण नानाभूतेषु द्वित्वादिकाः संख्या निविशन्ते । अथोच्येत पञ्चविंश- तिसंख्येवेयमवयवद्वारेण लक्ष्यते, यथा ‘पञ्च सप्त च वर्षाणि न ववर्ष शतक्रतुः’ इति द्वादशवार्षिकीमनावृष्टिं कथयन्ति, तद्वदिति । तदपि नोपपद्यते, अयमेवास्मिन्पक्षे दोषो


भामती

त्रानाभावात् । नाना ह्येतानि पञ्चविंशतितत्त्वानि नैषां पञ्चशः पञ्चशः साधारणधर्मोऽस्ति ॐ । न खलु सत्त्वरजस्तमोमहदहङ्काराणामेकः क्रिया वा गुणो वा द्रव्यं वा जातिर्वा धर्मः पञ्चतन्मात्रादिभ्यो व्यावृत्तः सत्त्वादिषु चानुगतः कश्चिदस्ति : नापि पृथिव्यप्तेजोवायुघ्राणानां, नापि रसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रवाचां, नापि पाणिपादपायूपस्थमनसां, येनैकेनासाधारणेनोपगृहीताः पञ्च पञ्चका भवितुमर्हन्ति । पूर्वपक्षैकदेशिनमुत्था- पयति ॐ अथोच्येत पञ्चविंशतिसंख्येवेयम् इति ॐ । यद्यपि परस्यां संख्यायामवान्तरसंख्या द्वित्वादिका नास्ति, तथापि तत्पूर्व तस्याः सम्भवात् पौर्वापर्यलक्षणया प्रत्यासत्त्या परसंख्योपलक्षणार्थं पूर्वसंख्योपन्य- स्यत इति । दूषयति ॐ अयमेवास्मिन् पक्षे दोषः इति ॐ । न च पञ्चशब्दो जनशब्देन समस्तोऽसमस्तः


भामती-व्याख्या

सिद्धान्त—सांख्याभिमत पचीस संख्या का यथाकथञ्चित् उपसंग्रह (लाभ) कर लेने पर भी प्रधानादि पदार्थों में श्रुतिमत्त्व (शाब्दत्व या श्रुतिप्रमाण-सिद्धत्व) सम्भव नहीं, क्योंकि ‘नानाभावात्’ । सारांश यह है कि “पञ्च पञ्चजनाः” इस शब्द के साथ सामञ्जस्य स्थापित करने के लिए सांख्यीय पचीस तत्त्वों को इस प्रकार पाँच पञ्चकों में विभाजित करना होगा—(१) सत्त्व, रजः, तमः, महत् अहंकार । (२) पृथिवी, जल, तेज, वायु, घ्राण । (३) रसन, चक्षु, त्वक्, श्रोत्र, वाक् । (४) पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, मन । (५) शब्दादि-तन्मात्रा-पञ्चक । किन्तु पञ्चकों के रूप में यह विभाजन तभी सम्भव होगा, जब कि प्रत्येक पंचक के घटकीभूत पाँचों तत्त्वों में रहनेवाला कोई एक साधारण धर्म हो । वह यहाँ सम्भव नहीं, क्योंकि पाँचों तत्त्वों में नाना (अनेक) धर्म रहते हैं, अतः प्रत्येक पंचकता का अवच्छेद- कीभूत कोई क्रिया या गुण या द्रव्य या जाति अथवा कोई धर्म ऐसा उपलब्ध नहीं होता, जो दूसरे पंचक के घटक तत्त्वों में अवृत्ति और केवल स्वकीय तत्त्वों में वर्तमान हो । फलतः पंच-पंचकों की उपपत्ति नहीं हो सकती ।

पूर्वपक्ष के किसी एकदेशा की ओर से विशेष पूर्वपक्ष प्रस्तुत किया जाता है—“अथोच्येत पंचविंशति संख्येवेयमवयवद्वारा लक्ष्यते” । यद्यपि यहाँ पंचविंशति संख्या का वाचक पद न होने के कारण मुख्य वृत्ति से महासंख्या का लाभ न होने पर भी अवान्तर संख्या-वाचक पद की महा संख्या में लक्षणा हो जाती है, जैसे—“पंच सप्त च वर्षाणि न ववर्ष शतक्रतुः” इस वाक्य के द्वारा बारह वर्ष की अनावृष्टि का जहाँ प्रतिपादन किया जाता है, वहाँ पंच और सप्तरूप अवान्तर संख्याओं के द्वारा द्वादशरूप महा संख्या का लाभ किया जाता है। वैसे ही “पंच पंचजनाः”—यहाँ पर भी ‘पंच-पंच’ शब्द की लक्षणा पंचविंशति में की जाती है। यद्यपि शतत्वादि महासंख्या के आधार में द्वित्वादि अवान्तर संख्या नहीं रहती, अतः दोनों सहचरित न होने के कारण उनमें लक्ष्य-लक्षणभाव सम्भव नहीं । तथापि लक्ष्य-लक्षणभाव के लिए नियत सहचार की ही अपेक्षा नहीं, हाँ, कोई सम्बन्ध अवश्य अपेक्षित है। महासंख्या की अवान्तर संख्या कारण होती है, अतः महासंख्या की उत्पत्ति के पूर्व उसी आधार में अवान्तर संख्या अवश्य रहती है, फलतः अवान्तर संख्या से जनित होने के कारण अवान्तर संख्या-वाचक शब्द की महासंख्या में लक्षणा सुकर है।