भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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४८४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ १ पा. ४ सू. ११

यल्लक्षणाश्रयणीया स्यात् । परश्चात्र पञ्चशब्दो जनशब्देन समस्तः पञ्चजना इति, पारिभाषिकेण स्वरेणैकपदत्वनिश्चयात् । प्रयोगान्तरे च 'पञ्चानां त्वा पञ्चजनानाम्' (तै० १।६।२।२) इत्यैकपद्यैकस्वर्यैकविभक्तिकत्वावगमात् । समस्तत्वाच्च न वीप्सा 'पञ्च

भामती

शक्यौ वक्तुमित्याह ॐ परश्चात्र पञ्चशब्द इति ॐ । ननु भवतु समासस्तथापि किमित्यत आह ॐ समस्तत्वाच्च इति ॐ । अपि च वीप्सायां पञ्चकद्वयग्रहणे दशैव तत्त्वानीति न सांख्यस्मृतिप्रत्यभिज्ञानमित्यसमासमभ्युपेत्याह ॐ न पञ्चकद्वयग्रहणं पञ्च पञ्च इति ॐ । न चैका पञ्चसंख्या पञ्चसंख्यान्तरेण शक्या विशेष्टुम् । पञ्चशब्दस्य संख्योपसर्जनद्रव्यवचनत्वेन संख्याया उपसर्जनतया विशेषणेनासयोगादित्यथाह

भामती-व्याख्या

उक्त पूर्वपक्ष में दोषाभिधान किया जाता है—"अयमेवास्मिन् पक्षे दोषः"। अर्थात् मुख्य वृत्ति का परित्याग कर लक्षणा वृत्ति का आश्रयण भी एक दोष ही है। वस्तुतः यहाँ द्वितीय 'पंच' शब्द स्वतन्त्र नहीं, अपितु 'जन' शब्द के साथ समस्त है—'पंचजनः', अतः 'पंच' और 'पंचजनाः' शब्द समानार्थक न होने के कारण उनके सह प्रयोग को वीप्सा नहीं कह सकते ' समस्तत्वाच्च न वीप्सा । [ भाष्यकार ने समास के समर्थन में कहा है—"भाषिकेण स्वरेणैकपदत्वनिश्चयात्"। भाषिक स्वर का स्पष्टीकरण श्रीशबरस्वामी ने प्रश्नोत्तर के द्वारा किया है—"कः पुनभार्षिकः स्वरः ? उच्यते—

छन्दोगा बह्वृचाश्चैव तथा वाजसनेयिनः ।
उच्चनीचस्वरं प्राहुः स वैभाषिक उच्यते ॥ ( शाबर. पृ. २२६२ )

अध्ययन-काल में प्रयुक्त मन्त्र-स्वर को प्रावचनिक स्वर एवं विनियोग-कालीन ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रयुक्त मन्त्र-स्वर को भाषिक स्वर कहते हैं। श्रीशबरस्वामी का भी यही कहना है कि साम, ऋक् और यजुर्वेद के विनियोगदर्शी वैयाकरणों ने जो उदात्तादि स्वरों का विधान किया है, वही भाषिक स्वर है। उक्त मन्त्र में प्रथम 'पंच' शब्द आद्युदात्त और द्वितीय 'पंच' शब्द सर्वानुदात्त है। 'जनाः' शब्द अन्तोदात्त इस लिए है कि 'पंच' शब्द के साथ उसका समास हुआ है, अतः "समासस्य" ( पा. सू. ६।१।२२३ ) इस सूत्र के द्वारा नकारस्थ आकार में उदात्त स्वर का विधान किया एवं "अनुदात्तं पदमेकवर्जम्" ( पा. सू. ६।१।१५८ ) इस सूत्र ने 'पंचजनाः' इस समस्त पद के अन्तिम आकार को छोड़कर शेष सभी स्वरों को अनुदात्त कर दिया। इस प्रकार समास के बिना न तो नकारस्थ आकार उदात्त होता और न समस्यमान द्वितीय 'पंच' शब्द सर्वानुदात्त । समास का घटकीभूत 'पंच' शब्द 'जन' शब्द का विशेषण है, अतः अपने पूर्व-प्रयुक्त 'पंच' शब्द के साथ अन्वित नहीं हो सकता, तब वीप्सा की उपपत्ति क्योंकर होगी ? ]

यदि वीप्सा की उपपत्ति किसी प्रकार कर भी ली जाय, तब भी दो पंचकों को मिला देने पर दश ही तत्त्व बनते हैं, अतः पंचविंशति तत्त्ववादी सांख्य के सिद्धान्त की यहाँ प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती — "न च पंचकद्वयग्रहणं पंच पंच"। एक पंच संख्या को अन्य पंच संख्या का विशेषण नहीं बना सकते, क्योंकि संख्यादि गुण द्रव्यादिरूप गुणी पदार्थों के विशेषण होते हैं, परस्पर उनका विशेष्य-विशेषणभाव सम्बन्ध नहीं होता, जैसा कि महर्षि जैमिनि ने कहा है—"गुणानां परार्थत्वादसम्बन्धः समत्वात् स्यात्" ( जै. सू. ३।१।२२ )। यद्यपि शुक्लादि शब्दों के समान पंचादि शब्द भी द्रव्यादि के उपस्थापक होते हैं, तथापि संख्योपसर्जन द्रव्य के ही वाचक माने जाते हैं, अतः उपसर्जनीभूत संख्या को अन्य संख्या का विशेष्य नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि संख्यादि गुण साक्षात् द्रव्य के परिच्छेदक होते

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