भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

पञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८५

पंच' इति। न च पञ्चकद्वयग्रहणं पंच पंचेति। नच पंचसंख्याया एकस्याः पंचसंख्यया परया विशेषणं पंच पंचका इति, उपसर्जनस्य विशेषणेनासंयोगात्। नन्वापन्नपञ्चसंख्याका जना एव पुनः पंचसंख्यया विशेष्यमाणाः पंचविंशतिः प्रत्येष्यन्ते। यथा पंच पंचपूल्य इति पंचविंशतिपूलाः प्रतीयन्ते, तद्वत्। नेति ब्रूमः, युक्तं यत्पञ्चपूलीशब्दस्य समाहाराभिप्रायत्वात्प्रतीति सत्यां भेदाकाङ्क्षायां पञ्च पंचपूल्य इति विशेषणम्, इह तु पंच जना इत्यादित एव भेदोपादानात्प्रतीत्यसत्यां

भामती

❀ एकस्याः पञ्चसंख्यायाः इति ❀। तदेवं पूर्वपक्षैकदेशिनि दूषिते परमपूर्वपक्षिणमुत्थापयति ❀ नन्वापन्नपञ्चसंख्याका जना एव इति ❀। अत्र तावद्रूढौ सत्यां न योगः संभवतीति वक्ष्यते, तथापि योगिकं पञ्चजनशब्दमभ्युपेत्य दूषयति ❀ युक्तं यत् पञ्चपूलीशब्दस्य इति ❀। पञ्चपूलित्यत्र यद्यपि पृथक्त्वैकार्थसमवायिनी पञ्चसंख्यावच्छेदिकास्ति तथापीयं समुदायिनोऽवच्छिनत्ति, न समुदायं समासपदगम्यमतस्तस्मिन् कति ते समुदाया इत्यपेक्षायां पदान्तराभिहिता पञ्चसंख्या सम्बध्यते पञ्चेति। पञ्चजना इत्यत्र तु पञ्चसंख्ययोत्पत्तिशिष्टया जनानामवच्छिन्नत्वात्समुदायस्य च पञ्चपूलीवदत्राप्रतीतेर्न पदान्तराभिहिता

भामती-व्याख्या

हैं, क्रिया या गुणादि के नहीं, भाष्यकार शबरस्वामी कहते हैं-''गुणस्तु विशिनष्टि साधनं साक्षाद् द्रव्यं क्रियां प्रति उपकरोति'' (शाबर. पृ. ६९५)। यही भाष्यकार कह रहे हैं-''न एकस्याः पंचसंख्यायाः''।

पूर्वपक्ष के एकदेशी को दूषित करके परम पूर्वपक्ष का उत्थापन किया जाता है-''नन्वापन्नपंचसंख्याका जना एव पुनः पंचसंख्यया विशेष्यमाणाः पंचविंशतिः प्रत्येष्यन्ते''। यद्यपि आगे चल कर 'पंचजन' शब्द को रूढ़ मान कर यौगिक नहीं माना गया है। तथापि यहाँ 'पंचजन' शब्द को यौगिक मान कर पूर्वपक्ष पर दूषणाभिधान किया जाता है-''युक्तं यत् पंचपूलीशब्दस्य समाहाराभिप्रायत्वात्' [ 'पंचानां पूलानां समाहारः पंचपूली' । "द्विगोः" ( पा. सू. ४।१।२१ ) इस सूत्र के द्वारा अदन्त 'पंचमूल' शब्द से ङीप् का विधान हो जाता है। खेत में पके गेहूँ, जौ आदि को काट-काट कर जो मुट्ठा बाँधते जाते हैं, उसका नाम पूल या पूला है। पाँच मुट्ठों की एक गाँठ का नाम पंचपूली है। वैसी पाँच पंचपूलियों में पचीस मुट्ठे हो जाते हैं]। यहाँ सिद्धान्ती का कहना यह है कि 'पञ्चपूल' और पञ्चजन' - दोनों शब्द अदन्त हैं। यदि दोनों समाहार के वाचक होते, तब पञ्चपूली के समान ही 'पञ्चजनी'-ऐसा प्रयोग होना चाहिए था, किन्तु वैसा नहीं, अतः यह मानना होगा कि 'पञ्चपूली' का अर्थ जैसे पंचपूल-समाहार है, वैसे पञ्चजन का पञ्चजन-समाहार अर्थ नहीं। कति समाहाराः के समान 'कति पंचपूल्यः' - ऐसी आकांक्षा में 'पंच पंचपूल्यः' - ऐसा प्रयोग सम्भव है, क्योंकि समाहार-घटक 'पंच' शब्द समाहार के घटकीभूत पूलों का विशेषण ( परिच्छेदक ) है, समाहार का नहीं अर्थात् समाहार पदार्थ एक या अपृथक् है और उस समाहार की घटकीभूत प्रत्येक इकाई पृथक् है, अतः उसमें पृथक्त्व और पंचत्व - दोनों रहते हैं। इस प्रकार 'पंचत्व' संख्या पृथक्त्व धर्म के साथ पूलारूप एक ही अर्थ में रहने के कारण पृथक्त्वैकार्थसमवायिनी है, समाहारगत अपृथक्त्वैकार्थसमवायनी नहीं [ वैशेषिकादि द्वित्वादि संख्या को पर्याप्त सम्बन्धेन प्रत्येक में नहीं मानते, किन्तु समवायेन या स्वरूपतः प्रत्येक में अवस्थित मानते हैं ] । समाहारगत संख्या की आकांक्षा को पूरा करने के लिए द्वितीय 'पंच' पद का प्रयोग आवश्यक है- 'पंच पंचपूल्यः' किन्तु 'पंचजनाः' - यहाँ पर एक ही आकांक्षा है-'कति जनाः ?' उस आकांक्षा की शान्ति तो समास-घटक 'पंच' शब्द से ही हो जाती है,

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