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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
४८४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ १ पा. ४ सू. ११

यल्लक्षणाश्रयणीया स्यात् । परश्चात्र पञ्चशब्दो जनशब्देन समस्तः पञ्चजना इति, पारिभाषिकेण स्वरेणैकपदत्वनिश्चयात् । प्रयोगान्तरे च 'पञ्चानां त्वा पञ्चजनानाम्' (तै० १।६।२।२) इत्यैकपद्यैकस्वर्यैकविभक्तिकत्वावगमात् । समस्तत्वाच्च न वीप्सा 'पञ्च

भामती

शक्यौ वक्तुमित्याह ॐ परश्चात्र पञ्चशब्द इति ॐ । ननु भवतु समासस्तथापि किमित्यत आह ॐ समस्तत्वाच्च इति ॐ । अपि च वीप्सायां पञ्चकद्वयग्रहणे दशैव तत्त्वानीति न सांख्यस्मृतिप्रत्यभिज्ञानमित्यसमासमभ्युपेत्याह ॐ न पञ्चकद्वयग्रहणं पञ्च पञ्च इति ॐ । न चैका पञ्चसंख्या पञ्चसंख्यान्तरेण शक्या विशेष्टुम् । पञ्चशब्दस्य संख्योपसर्जनद्रव्यवचनत्वेन संख्याया उपसर्जनतया विशेषणेनासयोगादित्यथाह

भामती-व्याख्या

उक्त पूर्वपक्ष में दोषाभिधान किया जाता है—"अयमेवास्मिन् पक्षे दोषः"। अर्थात् मुख्य वृत्ति का परित्याग कर लक्षणा वृत्ति का आश्रयण भी एक दोष ही है। वस्तुतः यहाँ द्वितीय 'पंच' शब्द स्वतन्त्र नहीं, अपितु 'जन' शब्द के साथ समस्त है—'पंचजनः', अतः 'पंच' और 'पंचजनाः' शब्द समानार्थक न होने के कारण उनके सह प्रयोग को वीप्सा नहीं कह सकते ' समस्तत्वाच्च न वीप्सा । [ भाष्यकार ने समास के समर्थन में कहा है—"भाषिकेण स्वरेणैकपदत्वनिश्चयात्"। भाषिक स्वर का स्पष्टीकरण श्रीशबरस्वामी ने प्रश्नोत्तर के द्वारा किया है—"कः पुनभार्षिकः स्वरः ? उच्यते—

छन्दोगा बह्वृचाश्चैव तथा वाजसनेयिनः ।
उच्चनीचस्वरं प्राहुः स वैभाषिक उच्यते ॥ ( शाबर. पृ. २२६२ )

अध्ययन-काल में प्रयुक्त मन्त्र-स्वर को प्रावचनिक स्वर एवं विनियोग-कालीन ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रयुक्त मन्त्र-स्वर को भाषिक स्वर कहते हैं। श्रीशबरस्वामी का भी यही कहना है कि साम, ऋक् और यजुर्वेद के विनियोगदर्शी वैयाकरणों ने जो उदात्तादि स्वरों का विधान किया है, वही भाषिक स्वर है। उक्त मन्त्र में प्रथम 'पंच' शब्द आद्युदात्त और द्वितीय 'पंच' शब्द सर्वानुदात्त है। 'जनाः' शब्द अन्तोदात्त इस लिए है कि 'पंच' शब्द के साथ उसका समास हुआ है, अतः "समासस्य" ( पा. सू. ६।१।२२३ ) इस सूत्र के द्वारा नकारस्थ आकार में उदात्त स्वर का विधान किया एवं "अनुदात्तं पदमेकवर्जम्" ( पा. सू. ६।१।१५८ ) इस सूत्र ने 'पंचजनाः' इस समस्त पद के अन्तिम आकार को छोड़कर शेष सभी स्वरों को अनुदात्त कर दिया। इस प्रकार समास के बिना न तो नकारस्थ आकार उदात्त होता और न समस्यमान द्वितीय 'पंच' शब्द सर्वानुदात्त । समास का घटकीभूत 'पंच' शब्द 'जन' शब्द का विशेषण है, अतः अपने पूर्व-प्रयुक्त 'पंच' शब्द के साथ अन्वित नहीं हो सकता, तब वीप्सा की उपपत्ति क्योंकर होगी ? ]

यदि वीप्सा की उपपत्ति किसी प्रकार कर भी ली जाय, तब भी दो पंचकों को मिला देने पर दश ही तत्त्व बनते हैं, अतः पंचविंशति तत्त्ववादी सांख्य के सिद्धान्त की यहाँ प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती — "न च पंचकद्वयग्रहणं पंच पंच"। एक पंच संख्या को अन्य पंच संख्या का विशेषण नहीं बना सकते, क्योंकि संख्यादि गुण द्रव्यादिरूप गुणी पदार्थों के विशेषण होते हैं, परस्पर उनका विशेष्य-विशेषणभाव सम्बन्ध नहीं होता, जैसा कि महर्षि जैमिनि ने कहा है—"गुणानां परार्थत्वादसम्बन्धः समत्वात् स्यात्" ( जै. सू. ३।१।२२ )। यद्यपि शुक्लादि शब्दों के समान पंचादि शब्द भी द्रव्यादि के उपस्थापक होते हैं, तथापि संख्योपसर्जन द्रव्य के ही वाचक माने जाते हैं, अतः उपसर्जनीभूत संख्या को अन्य संख्या का विशेष्य नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि संख्यादि गुण साक्षात् द्रव्य के परिच्छेदक होते

पञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८५

पंच' इति। न च पञ्चकद्वयग्रहणं पंच पंचेति। नच पंचसंख्याया एकस्याः पंचसंख्यया परया विशेषणं पंच पंचका इति, उपसर्जनस्य विशेषणेनासंयोगात्। नन्वापन्नपञ्चसंख्याका जना एव पुनः पंचसंख्यया विशेष्यमाणाः पंचविंशतिः प्रत्येष्यन्ते। यथा पंच पंचपूल्य इति पंचविंशतिपूलाः प्रतीयन्ते, तद्वत्। नेति ब्रूमः, युक्तं यत्पञ्चपूलीशब्दस्य समाहाराभिप्रायत्वात्प्रतीति सत्यां भेदाकाङ्क्षायां पञ्च पंचपूल्य इति विशेषणम्, इह तु पंच जना इत्यादित एव भेदोपादानात्प्रतीत्यसत्यां

भामती

❀ एकस्याः पञ्चसंख्यायाः इति ❀। तदेवं पूर्वपक्षैकदेशिनि दूषिते परमपूर्वपक्षिणमुत्थापयति ❀ नन्वापन्नपञ्चसंख्याका जना एव इति ❀। अत्र तावद्रूढौ सत्यां न योगः संभवतीति वक्ष्यते, तथापि योगिकं पञ्चजनशब्दमभ्युपेत्य दूषयति ❀ युक्तं यत् पञ्चपूलीशब्दस्य इति ❀। पञ्चपूलित्यत्र यद्यपि पृथक्त्वैकार्थसमवायिनी पञ्चसंख्यावच्छेदिकास्ति तथापीयं समुदायिनोऽवच्छिनत्ति, न समुदायं समासपदगम्यमतस्तस्मिन् कति ते समुदाया इत्यपेक्षायां पदान्तराभिहिता पञ्चसंख्या सम्बध्यते पञ्चेति। पञ्चजना इत्यत्र तु पञ्चसंख्ययोत्पत्तिशिष्टया जनानामवच्छिन्नत्वात्समुदायस्य च पञ्चपूलीवदत्राप्रतीतेर्न पदान्तराभिहिता

भामती-व्याख्या

हैं, क्रिया या गुणादि के नहीं, भाष्यकार शबरस्वामी कहते हैं-''गुणस्तु विशिनष्टि साधनं साक्षाद् द्रव्यं क्रियां प्रति उपकरोति'' (शाबर. पृ. ६९५)। यही भाष्यकार कह रहे हैं-''न एकस्याः पंचसंख्यायाः''।

पूर्वपक्ष के एकदेशी को दूषित करके परम पूर्वपक्ष का उत्थापन किया जाता है-''नन्वापन्नपंचसंख्याका जना एव पुनः पंचसंख्यया विशेष्यमाणाः पंचविंशतिः प्रत्येष्यन्ते''। यद्यपि आगे चल कर 'पंचजन' शब्द को रूढ़ मान कर यौगिक नहीं माना गया है। तथापि यहाँ 'पंचजन' शब्द को यौगिक मान कर पूर्वपक्ष पर दूषणाभिधान किया जाता है-''युक्तं यत् पंचपूलीशब्दस्य समाहाराभिप्रायत्वात्' [ 'पंचानां पूलानां समाहारः पंचपूली' । "द्विगोः" ( पा. सू. ४।१।२१ ) इस सूत्र के द्वारा अदन्त 'पंचमूल' शब्द से ङीप् का विधान हो जाता है। खेत में पके गेहूँ, जौ आदि को काट-काट कर जो मुट्ठा बाँधते जाते हैं, उसका नाम पूल या पूला है। पाँच मुट्ठों की एक गाँठ का नाम पंचपूली है। वैसी पाँच पंचपूलियों में पचीस मुट्ठे हो जाते हैं]। यहाँ सिद्धान्ती का कहना यह है कि 'पञ्चपूल' और पञ्चजन' - दोनों शब्द अदन्त हैं। यदि दोनों समाहार के वाचक होते, तब पञ्चपूली के समान ही 'पञ्चजनी'-ऐसा प्रयोग होना चाहिए था, किन्तु वैसा नहीं, अतः यह मानना होगा कि 'पञ्चपूली' का अर्थ जैसे पंचपूल-समाहार है, वैसे पञ्चजन का पञ्चजन-समाहार अर्थ नहीं। कति समाहाराः के समान 'कति पंचपूल्यः' - ऐसी आकांक्षा में 'पंच पंचपूल्यः' - ऐसा प्रयोग सम्भव है, क्योंकि समाहार-घटक 'पंच' शब्द समाहार के घटकीभूत पूलों का विशेषण ( परिच्छेदक ) है, समाहार का नहीं अर्थात् समाहार पदार्थ एक या अपृथक् है और उस समाहार की घटकीभूत प्रत्येक इकाई पृथक् है, अतः उसमें पृथक्त्व और पंचत्व - दोनों रहते हैं। इस प्रकार 'पंचत्व' संख्या पृथक्त्व धर्म के साथ पूलारूप एक ही अर्थ में रहने के कारण पृथक्त्वैकार्थसमवायिनी है, समाहारगत अपृथक्त्वैकार्थसमवायनी नहीं [ वैशेषिकादि द्वित्वादि संख्या को पर्याप्त सम्बन्धेन प्रत्येक में नहीं मानते, किन्तु समवायेन या स्वरूपतः प्रत्येक में अवस्थित मानते हैं ] । समाहारगत संख्या की आकांक्षा को पूरा करने के लिए द्वितीय 'पंच' पद का प्रयोग आवश्यक है- 'पंच पंचपूल्यः' किन्तु 'पंचजनाः' - यहाँ पर एक ही आकांक्षा है-'कति जनाः ?' उस आकांक्षा की शान्ति तो समास-घटक 'पंच' शब्द से ही हो जाती है,

४८६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. ११

भेदाकाङ्क्षायां न पंच पंचजना इति विशेषणं भवेत्। भवदपीदं विशेषणं पंचसंख्याया एव भवेत्, तत्र चोक्तो दोषः। तस्मात्पंच पंचजना इति न पंचविंशतितत्त्वाभिप्रायम्।

अतिरेकाच्च न पंचविंशतितत्त्वाभिप्रायम्। अतिरेको हि भवत्यात्माकाशाभ्यां


भामती

संख्या सम्बध्यते। स्यादेतत्—संख्येयानां जनानां मा भूच्छब्दान्तरवाच्यसंख्यावच्छेदः पञ्चसंख्यायास्तु तयावच्छेदो भविष्यति, न हि साव्यवच्छिन्नेत्यत आह ॐ भवदपीदं विशेषणम् इति ॐ। उक्तोऽत्र दोषः। नह्युपसर्जनं विशेषणेन युज्यते, पञ्च शब्द एव तावत्संख्येयोपसर्जनसंख्यामाह विशेषतस्तु पञ्चजना इत्यत्र समासे। विशेषणापेक्षायां तु न समासः स्यादसामर्थ्यान्नहि भवति ऋद्धस्य राजपुरुष इति समासोऽपि वृत्तिरेव ऋद्धस्य राज्ञः पुरुष इति सापेक्षत्वेनासामर्थ्यादित्यर्थः। ॐ अतिरेकाच्च इति ॐ। अभ्युच्चय-


भामती-व्याख्या

द्वितीय 'पंच' शब्द का प्रयोग क्योंकर होगा ? यद्यपि द्रव्यार्थक पद का विशेषण असमस्त भी होता है और उसके द्वारा अभिहित संख्या भी उस द्रव्य की परिच्छेदिका मानी जाती है। तथापि जनपदार्थ की उत्पत्ति (ज्ञप्ति) के जनकीभूत 'पंचजन'—इस शब्द के पूर्वपद से उपदिष्ट (प्रतिपादित) होने से पंचत्व संख्या समीपतर है, अतः इसी के द्वारा जन पदार्थ का परिच्छेद होगा, पदान्तराभिहित संख्या के द्वारा नहीं [उत्पत्ति-शिष्ट पदार्थ सदैव उत्पन्न-शिष्ट की अपेक्षा प्रबल माना जाता है, जैसे कि चातुर्मास्य नाम की इष्टि के प्रथम पर्व में "तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवी आमिक्षा"—इस वाक्य के द्वारा आमिक्षाद्रव्यक याग का विधान किया गया। खौलते दूध में दही डाल देने से दूध फट कर दो भागों में विभक्त हो जाता है—(१) पनीर या छेना और (२) पानी। पनीर को 'आमिक्षा' और पानी को 'वाजिन' कहते हैं। आमिक्षा-याग-विधान के अनन्तर "वाजिभ्यो वाजिनम्"—यह वाक्य पठित है, इसमें यह सन्देह है कि इस वाक्य के द्वारा पूर्वोक्त आमिक्षा-याग में वाजिनरूप द्रव्यान्तर का विधान किया गया है ? अथवा इस वाक्य के द्वारा वाजिनद्रव्यक कर्मान्तर का ? सिद्धान्त में वार्तिककार ने कहा है—

आमिक्षोत्पद्यमानेन कर्मणा सह युज्यते।
ततो वाक्यान्तरोपात्तमुत्पन्नेन तु वाजिनम्॥ (तं० वा० पृ० ५३७)

जिस वाक्य में आमिक्षा-याग को उत्पत्ति (विधि) होती है, उसी वाक्य में पूर्वपद के द्वारा आमिक्षा का अभिधान होने से आमिक्षा उत्पत्ति-शिष्ट है और उस वाक्य से उत्पन्न (विहित) कर्म के उद्देश्य से वाक्यान्तर के द्वारा वाजिन द्रव्य का विधान किया जाता है, अतः वाजिन उत्पन्न-शिष्ट है। उत्पत्ति-शिष्ट प्रबल होने से पहले ही कर्म के साथ अन्वित हो जाता है। एक द्रव्य से युक्त कर्म में वाजिनरूप द्रव्यान्तर को अवकाश नहीं मिल पाता, अतः "वाजिभ्यो वाजिनम्"—यह वाक्य कर्मान्तर का विधायक है]।

शङ्का—'पञ्चजन' यहाँ 'पञ्चत्व' संख्या का परिच्छेद्य (संख्येय) जो जनपदार्थ है, वह अन्य (समासाघटक) पद के द्वारा प्रतिपादित संख्या का परिच्छेद्य यदि नहीं हो सकता, तब उसकी परिच्छेदकीभूत पंचत्व संख्या को पदान्तराभिहित पंचत्व संख्या का परिच्छेद्य मान लेना चाहिए, क्योंकि वह किसी संख्यान्तर से परिच्छेद्य नहीं, फलतः पंच पंचकाः'—ऐसा प्रयोग सम्भव हो जाता है।

समाधान—भाष्यकार उक्त शङ्का का अनुवाद करते हुए निराकरण का स्मरण दिला रहे हैं—"भवदपि इदं विशेषणं पंचसंख्याया एव भवेत्, तत्र चोक्तो दोषः।" अर्थात् यह कहा जा चुका है कि "उपसर्जनस्य विशेषणेनासंयोगात्"।"पञ्चजनाः"—इस समस्त पद में 'पंच'

पञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८७

पंचविंशतिसंख्यायाः। आत्मा तावदिह प्रतिष्ठां प्रत्याधारत्वेन निर्दिष्टः, यस्मिन्निति सप्तमीसूचितस्य 'तमेव मन्य आत्मानम्' इत्यात्मत्वेनानुकर्षणात्। आत्मा च चेतनः पुरुषः। स च पंचविंशतावन्तर्गत एवेति न तस्यैवाधारत्वमाधेयत्वं च युज्यते। अर्थान्तरपरिग्रहे च तत्त्वसंख्यातिरेकः सिद्धान्तविरुद्धः प्रसज्येत तथा 'आकाशश्च प्रतिष्ठितः' इत्याकाशस्यापि पंचविंशतावन्तर्गतस्य न पृथगुपादानं न्याय्यम्। अर्थान्तरपरिग्रहे चोक्तं दूषणम्। कथं च संख्यामात्रश्रवणे सत्यश्रुतानां पंचविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहः प्रतीयेत? जनशब्दस्य तत्त्वेष्वरूढत्वात्। अर्थान्तरोपसंग्रहेऽपि संक्योपपत्तेः। कथं तर्हि पंच पंचजना इति? उच्यते—'दिक्संख्ये संज्ञायाम्' (पा० सू० २।१।५०) इति विशेषणस्मरणात्संज्ञायामेव पंचशब्दस्य जनशब्देन समासः। ततश्च


भामती

मात्रम्। यदि सत्त्वरजस्तमांसि प्रधानेनेकीकृत्याकाशा तत्त्वेभ्यो व्यतिरिच्यते, तदा सिद्धान्तव्याकोपः। अथ तु सत्त्वरजस्तमांसि मिथो भेदेन विवक्ष्यन्ते, तथापि वस्तुतत्त्वव्यवस्थापने आधारत्वेनात्मा निष्कृष्यतामाधेयान्तरेभ्यस्त्वाकाशस्याधेयस्य व्यतिरेचनमनर्थकमिति गमयितव्यम्। ॐ कथञ्च संख्यामात्रश्रवणे सति इति ॐ। दिक्संख्ये संज्ञायामिति संज्ञायां समासस्मरणात् पञ्चजनशब्दस्तावदयं क्वचित्प्ररूढः। न च रूढौ सत्यामवयवप्रसिद्धेर्ग्रहणं सापेक्षत्वात्, निरपेक्षत्वाच्च रूढेः। तद्यदि रूढौ मुख्योऽर्थः प्राप्यते ततः स एव ग्रहीतव्योऽथ त्वसौ न वाक्ये सम्बन्धार्हः पूर्वोत्तरवाक्यविरोधी वा ततो रूढ्यपरित्यागेनैव वृत्त्यन्तरेणार्थान्तरं कल्पयित्वा वाक्यमुपपादनीयम्। यथा श्येनेनाभिचरन् यजेतेति श्येनशब्दः शकुनि-


भामती-व्याख्या

शब्द विशेषण और 'जन' शब्द विशेष्य है। विशेषणीभूत 'पंच' शब्द का अन्य पंच विशेषण से सापेक्ष हो जाता है, सापेक्ष पद असमर्थ माना जाता है और समास सदैव समर्थ पदों में ही होता है, जैसा कि “समर्थः पदविधिः” (पा० सू० २।१।१) इस सूत्र में भाष्यकार ने कहा है—'सापेक्षमसमर्थं भवति' (महाभाष्य० पृ० २।११)। जैसे कि 'ऋद्धस्य राजपुरुषः' यहाँ पर विशेषणीभूत 'राज' शब्द का 'ऋद्ध' विशेषण होने के कारण 'पुरुष' पद के साथ उस का समास नहीं होता, अपि तु 'ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः'—ऐसा वाक्य ही रह जाता है।

सूत्रस्थ 'नानाभावात्' शब्द की व्याख्या करने के पश्चात् 'अतिरेकात्' पद की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है—'अतिरेकाच्च न पंचविंशतितत्त्वाभिप्रायम्'। यस्मिन् पंच पंचजनाः' आकाशश्च प्रतिष्ठितः' यहाँ 'पंच पंचजनाः'—इस वाक्य के द्वारा पचीस तत्त्वों का ग्रहण करने और आकाश की पृथक् गिनती करने पर अभिमत पचीस संख्या से अतिरिक्त छब्बीस तत्त्व हो जाते हैं और 'यस्मिन्' शब्द से आधारभूत आत्मा का आहित पचीस तत्त्वों से पृथक्करण करने पर सत्ताईस तत्त्व हो जाते हैं। 'अतिरेकात्' यह हेत्वन्तर यहाँ पृथक् प्रयत्न-साध्य नहीं, अपि तु 'नानात्वात्'—इस हेतु की खोज में किए जानेवाले प्रयत्न से ही अतिरेक्ताच्च' इस का लाभ भी हो जाता है, अतः यह हेतु-प्रयोग केवल अभ्युच्चयमात्र है [एक तथ्य की गवेषणा में अपने-आप अनुनिष्पन्न पदार्थों को अभ्युच्चय कहा गया है—'अभ्युच्चयो यदिदमिह भवतीति विज्ञानेऽपरमपि भवतीति विज्ञानम्' (शाबर पृ० १७९१)]।

“कथं च संख्यामात्रश्रवणे सत्यश्रुतानां पंचविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहः प्रतीयेत्” इस भाष्य का आशय यह है कि 'पंचजनाः'—यहाँ पर “दिक्संख्ये संज्ञायाम्” (पा. सू. २।१।५०) इस सूत्र के द्वारा समास सम्पन्न किया गया है। इस सूत्र का कहना है कि दिशा और संख्या के वाचक शब्दों का उत्तर पदों के साथ तभी समास होता है, जब कि समस्त पद किसी पदार्थ की संज्ञा हो, जैसे—'दक्षिणाग्निः', 'सप्तर्षयः'। इसी प्रकार, पंचजन' शब्द भी किसी

४८८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. १२

रूढत्वाभिप्रायेणैव केचित्पंचजना नाम विवक्ष्यन्ते, न सांख्यतत्त्वाभिप्रायेण । ते कतीत्यस्यामाकांक्षायां पुनः पंचेति प्रयुज्यते । पंजजना नाम ये केचित्ते च पंचैवेत्यर्थः । सप्तर्षयः सप्तेति यथा ॥ ११ ॥

के पुनस्ते पंचजना नामेति ? तदुच्यते—

प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १२ ॥

'यस्मिन्पञ्च पञ्चजनाः' इत्यत उत्तरस्मिन्मन्त्रे ब्रह्मस्वरूपनिरूपणाय प्राणादयः पञ्च निर्दिष्टाः—'प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः' इति । तेऽत्र वाक्यशेषगताः संनिधानात्पञ्चजना विवक्ष्यन्ते । कथं

भामती

विशेषे निरूढवृत्तिस्तदपरित्यागेनैव निपत्यादानसादृश्येनार्थवादिकेन क्रतुविशेषे वर्तते, तथा पञ्चजनशब्दोऽवयवार्थयोगानपेक्ष एकस्मिन्नपि वर्तते यथा सप्तर्षिशब्दो वसिष्ठ एकस्मिन् सप्तसु च वर्तते । न चैष तत्त्वेषु रूढः पंचविंशतिसंख्यानुरोधेन तत्त्वेषु वर्त्तयितव्यः । रूढौ सत्यां पंचविंशतेरेव संख्याया अभावात् कथं तत्त्वेषु वर्तते ॥ ११ ॥

एवञ्च के ते पञ्चजना इत्यपेक्षायां किं वाक्यशेषगताः प्राणादयो गृह्यन्तामुत पंचविंशतिस्तत्त्वानीति विशये तत्त्वानामप्रामाणिकत्वात् प्राणादीनाञ्च वाक्यशेषे श्रवणात्तत्परित्यागे श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात्प्राणादय एव पञ्चजनाः । न च काण्वमाध्यन्दिनयोर्विरोधान्न प्राणादीनां वाक्यशेषगतानामपि ग्रहणमिति साम्प्रतं, विरोधेऽपि तुल्यबलतया षोडशिग्रहणाग्रहणवद्विकल्पोपपत्तेः ।

भामती-व्याख्या

अर्थ की संज्ञा माननी होगी । संज्ञा शब्द रूढ होता है, यौगिक नहीं, अतः 'जन' शब्द की अवयव-व्युत्पत्ति के द्वारा तत्त्वपरता उचित नहीं, अपितु अवयवार्थ-सापेक्ष यौगिक शब्द की अपेक्षा तन्निरपेक्ष रूढ शब्द के द्वारा किसी मुख्य अर्थ का ग्रहण करना होगा । यदि उस अर्थ का प्रकृत वाक्य के साथ कोई सम्बन्ध नहीं बनता, या पूर्वोत्तर वाक्यों से विरोध होता है, तब रूढि शक्ति का परित्याग न करते हुए अन्य वृत्ति के द्वारा अर्थान्तर की कल्पना करके वाक्य का उपपादन करना होगा, जैसे—"श्येनेनाभिचरन् यजेत” ( षड्विंश. ३।८ ) यहाँ 'श्येन' शब्द 'बाज' पक्षी में रूढ है, अतः उस अर्थ का परित्याग न करते हुए "यथा वै श्येनो निपत्यादत्ते एवमयं द्विषन्तं भ्रातृव्यं निपादत्ते" ( षड्विश. ३।८ ) इस अर्थवाद में प्रतिपादित श्येन के स्वभाव का साम्य अपना कर 'श्येन' शब्द यागविशेष का वाचक माना जाता है । उसी प्रकार 'पंचजन' शब्द भी अवयवार्थ-निरपेक्ष किसी एक अर्थ का भी वाचक वैसे ही हो सकता है, जैसे कि 'सप्तर्षि' शब्द वसिष्ठादि सात ऋषियों का भी बोधक होता है और अकेले वसिष्ठ का भी । 'पञ्चजन' शब्द तत्त्वों में कहीं रूढ नहीं माना जाता कि पञ्चविंशति संख्या के अनुरोध पर वह सांख्याभिमत तत्त्वार्थक मान लिया जाय । 'पंचजन' शब्द जब रूढ है, तब 'पंच' शब्द को पृथक् संख्या-परक नहीं माना जा सकता, तब संख्या के सम्बन्ध से तत्त्वार्थक क्योंकर होगा ॥ ११ ॥

जब कि 'पंचजन' शब्द तत्त्वार्थक नहीं हो सकता, तब 'के ते पंचजनाः'—ऐसी आकांक्षा होने पर क्या वाक्य-शेषगत प्राणादि का ग्रहण किया जाय ? अथवा सांख्याभिमत पंचविंशति तत्त्वों का ? ऐसा संशय होने पर निर्णय-सूत्र प्रस्तुत किया गया है—"प्राणादयो वाक्यशेषात्" । अर्थात् पंचविंशति तत्त्वों की अप्रामाणिकता स्थिर हो चुकी है और प्राणादि वाक्य-शेष में प्रतिपादित हैं, अतः प्राणादि का परित्याग करने में श्रुत-हानि और तत्त्वों की

पञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८९

पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः ? तत्त्वेषु वा कथं जनशब्दप्रयोगः ? समाने तु प्रसिद्धयतिक्रमे वाक्यशेषवशात्प्राणादय एव ग्रहीतव्या भवन्ति। जनसंबन्धाच्च प्राणादयो जनशब्दभाजो भवन्ति । जनवचनश्च पुरुषशब्दः प्राणेषु प्रयुक्तः—'ते वा एते पंच ब्रह्मपुरुषाः' ( छा० ३।१३।६ ) इत्यत्र । 'प्राणो ह पिता प्राणो ह माता' (छा० ७।१५।१) इत्यादि च ब्राह्मणम् । समासयलाच्च समुदायस्य रूढत्वमविरुद्धम् । कथं पुनरसति


भामती

न चेयं वस्तुस्वरूपकथाऽपि तूपासनानुष्ठानविधिर्मनसैवानुद्रष्टव्यमिति विधिश्रवणात् ॐ कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोग इति ॐ । जनवाचकः शब्दो जनशब्दः, पंचजनशब्द इति यावत् । तस्य कथं प्राणादिष्वजनेषु प्रयोग इति व्याख्येयम् । अन्यथा तु प्रत्यस्तमितावयवार्थे समुदायशब्दार्थे जनशब्दार्थो नास्तीत्यपर्यनुयोग एव । रूढपरित्यागेनैव वृत्त्यन्तरं दर्शयति ॐ जनसम्बन्धाच्च इति ॐ । जनशब्दभाजः, पञ्चजनशब्दभाजः । ननु सत्यामवयवप्रसिद्धौ समुदायशक्तिकल्पनमनुपपन्नं, सम्भवति च पञ्चविंशत्यां तत्त्वेष्ववयवप्रसिद्धिरित्यत आह ॐ समासयलाच्च इति ॐ । स्यादेतत्—समासवलाच्चेद्रूढिरास्थीयते, हन्त न


भामती-व्याख्या

कल्पना में अश्रुत कल्पना प्रसक्त होती है, अतः प्राणादि-पंचक का ही 'पञ्चजनाः' शब्द से ग्रहण करना चाहिए। यह जो आक्षेप किया गया था कि काण्व और माध्यन्दिन शाखा के वाक्य-शेषों का परस्पर विरोध है, क्योंकि एक वाक्य-शेष में ज्योति को लेकर पंच संख्या पूरी की गई और दूसरे में अन्न (पृथिवी) को लेकर। उसका समाधान यह है कि समानबलवाले दो वाक्यों का विरोध उपस्थित होने पर विकल्प मान लिया जाता है, जैसे—"अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति" (मै० सं० ७।६) और "नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति"—यहाँ षोडशी का ग्रहण किया भी जा सकता है और नहीं भी। दोनों अवस्थाओं में कर्म विगुण नहीं होता। प्रकृत में भी वस्तु-स्वरूप का कथन नहीं कि विकल्प असम्भव हो जाता। यहाँ उपासनानुष्ठान का विधि-वाक्य उपलब्ध होता है—"मनसैवानुद्रष्टव्यम्" (बृह० ४।४।१९)।

"कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः"—इस भाष्य का अर्थ इस प्रकार है—'जनवाचकः शब्दो जनशब्दः अर्थात् 'पञ्चजन' शब्द का यहाँ जनशब्दत्वेन ग्रहण किया गया है। प्रस्तुत प्रश्न की पूरी व्याख्या इस प्रकार हो जाती है कि जो शब्द 'जन' का वाचक है, उसका जन से भिन्न प्राणादि अर्थों में प्रयोग क्यों कर होगा? अर्थात् नहीं हो सकता। अन्यथा [ भाष्यस्थ 'जन' शब्द से 'पञ्चजन' शब्द ग्रहण न कर केवल उसके अवयवरूप 'जन' शब्द का ग्रहण करने पर ] "कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः ? "—यह आक्षेप असंगत या अनुक्तोपालम्भमात्र हो जाता है, क्योंकि सिद्धान्ती की ओर से कभी नहीं कहा गया कि केवल 'जन' शब्द का प्रयोग प्राणादि में होता है, अपि तु सिद्धान्ती ने तो अवयवार्थ का सर्वथा परित्याग करके केवल समुदायभूत 'पञ्चजन' शब्द को प्राणादिपरक माना है, अतः 'प्राणादिरूप समुदायर्थ में अवयवरूप 'जन' शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता'—यह आक्षेप पर्यवसित होता है, जो कि अनुचित है। प्रकृत में रूढि शक्ति का परित्याग न करते हुए वृत्त्यन्तर (लक्षणा वृत्ति) का निमित्त प्रदर्शित किया जाता है—"जनसम्बन्धाच्च प्राणादयो जनशब्दभाजो भवन्ति"। यहाँ भी 'जनशब्दभाजः' का अर्थ 'पञ्चजनशब्दभाजः'—ऐसा ही करना चाहिए।

जब कि पञ्चविंशति तत्त्वों में अवयवार्थता लोक-प्रसिद्ध (क्लृप्त) है, तब समुदाय शक्ति की कल्पना क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है—"समासबलाच्च समुदायस्य रूढत्वमविरुद्धम्"। लोक-प्रसिद्धि की उपेक्षा करके यदि रूढार्थ की कल्पना की जाती है, तब

६२

४९० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. १३

प्रथमप्रयोगे रूढिः शक्याऽऽश्रयितुम् ? शक्योद्भिदादिवदित्याह—प्रसिद्धार्थसंनिधाने ह्यप्रसिद्धार्थः शब्दः प्रयुज्यमानः समभिव्याहारात्तद्विषयो नियम्यते, यथा 'उद्भिदा यजेत', 'यूपं छिनत्ति', 'वेदिं करोति' इति । तथाऽयमपि पंचजनशब्दः समासान्त्वाख्यानादवगतसंज्ञाभावः संज्ञाकांक्षी वाक्यशेषसमभिव्याहृतेषु प्राणादिषु वर्तिष्यते । कैश्चित्तु देवाः पितरो गन्धर्वा असुरा रक्षांसि च पंच पंचजना व्याख्याताः । अन्यैश्च


भामती

दृष्टस्तर्हि तस्य प्रयोगोऽश्वकर्णादिवद् वृक्षादिषु । तथा च लोकप्रसिद्धयभावात्न रूढिरित्याक्षिपति ॐ कथं पुनरसतीति ॐ । जनेषु तावत् पञ्चजनशब्दस्य प्रथमः प्रयोगो लोकेषु दृष्ट इत्यसति प्रथमप्रयोग इत्यसिद्धमिति स्वकीयस्तयानभिधायाभ्युपेत्य प्रथमप्रयोगाभावं समाधत्ते ॐ शक्योद्भिदादिवद् इति ॐ । आचार्यदेशीयानां मतभेदेष्वपि न पञ्चविंशतिस्तत्त्वानि सिध्यन्ति । परमार्थतस्तु पञ्चजना वाक्यशेषगता एवेत्याशयवानाह ॐ कैश्चित् तु इति ॐ । शेषमतिरोहितार्थम् ॥ १२-१३ ॥


भामती-व्याख्या

जैसे 'अश्वकर्ण' शब्द की प्रसिद्धि वृक्षादि में होती है, वैसे ही 'पञ्चजन' शब्द की प्रसिद्धि पञ्चविंशति तत्त्वों में क्यों है ? एवं जिस अर्थ में जिस शब्द का प्रयोग लोकप्रसिद्ध नहीं, उस अर्थ में उस शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता, क्योंकि शाब्दिक मर्यादा के प्रखर पारखी आचार्यों का कहना है कि “लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः” (ब्र० सि० पृ० ८२) इस आक्षेप का समाधान कोई आचार्य इस प्रकार करता है—'शक्या उद्भिदादिवत्' । [ आशय यह है कि एकमात्र लोक-व्यवहार ही शब्द-शक्ति का निर्णायक नहीं, अपितु प्रसिद्धार्थक पदों का समभिव्याहार या सन्निधान भी तात्पर्य-निश्चायक होता है, जैसा कि महर्षि जैमिनि ने “प्रसिद्धसन्निधानम्” (जै. सू. ९।४।२५) ऐसा कह कर सूचित किया है । शबरस्वामी भी कहते हैं—“प्रसिद्धस्य सन्निधौ यदभिधीयते, तत्तथैव” (शबर० पृ० १७८०) वार्तिककारने भी कहा है—

पदमज्ञातसन्दिग्धं प्रसिद्धैरपृथक्श्रुति ।
निर्णायते निरूढं तु न स्वार्थादपनीयते ॥ (तं. वा. पृ. ३२५)

“उद्भिदा यजेत पशुकामः” (तै० ब्रा० १९।७।३) यहाँ सन्देह किया गया है कि 'उद्भिद्' पद क्या किसी कर्म की संज्ञा है ? अथवा कर्म के उद्देश्य से किसी साधन (द्रव्य) का समर्पक ? पूर्वपक्षी ने कहा कि लोक-व्यवहार से उद्भिद्' पद याग के साधनोभूत किसी द्रव्य में रूढ प्रतीत नहीं होता, अतः 'उद्भिद्यत भूमिरनेन'—इस योग-व्युत्पत्ति से अवगत खनित्र (फावड़ा) आदि द्रव्य का विधान ज्योतिष्टोमनामक कर्म में करना चाहिए । सिद्धान्ती ने कहा कि अप्रसिद्धार्थक पद के अर्थ का निर्णय प्रसिद्धार्थक पद की सन्निधि से होता है । प्रकृत में 'यजेत' शब्द का अर्थ है—'यागेन भावयेत्' अतः पूरा वाक्य 'उद्भिदा यागेन भावयेत्'— ऐसा बनता है । दोनों तृतीयान्त पदों का अभिन्न अर्थ में तात्पर्य पर्यवसित होता है । 'याग' शब्द कर्म में प्रसिद्ध है, अतः 'उद्भिद्' पद भी कर्मविशेष की संज्ञा है । जैसे प्रसिद्धार्थक 'याग' पद की सन्निधि से 'उद्भिद्' पद कर्म-विशेष का बोधक है, वैसे ही सन्निहित वाक्य शेष के आधार पर 'पञ्चजन' शब्द प्राणादिपरक निर्णीत होता है ] । कतिपय आचार्यों ने देव, पितर, गन्धर्व, असुर और राक्षस'—इन पाँचों का ग्रहण 'पंचजन' शब्द से किया है एवं अन्य आचार्यों ने ब्राह्मणादि चार वर्ण और निषाद—इनको पंचजन कहा है । कहीं-कहीं 'पांचजन्या विशा' (ऋ. सं. ८।५३।७) इस प्रकार 'प्रजा' का वाचक

अजाशब्दस्य मायापरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् [ ४९१

चत्वारो वर्णा निषादपंचमाः परिगृह्यीताः। क्वचिच्च 'यत्पंचजन्या विशा' (ऋ० सं० ८।५३।७) इति प्रजापरः प्रयोगः पंचजनशब्दस्य दृश्यते। तत्परिग्रहेऽपीह न कश्चिद्विरोधः। आचार्यस्तु न पञ्चविंशतेस्तत्त्वानामिह प्रतीतिरस्तीत्येवंपरतया 'प्राणादयो वाक्यशेषात्' इति जगाद ॥ १२ ॥

भवेयुस्तावत्प्राणादयः पंचजना माध्यंदिनानाम्, येऽन्नं प्राणादिष्वामनन्ति। काण्वानां तु कथं प्राणादयः पंचजना भवेयुर्येऽन्नं प्राणादिषु नामनन्तीति ? अत उत्तरं पठति—

ज्योतिषेकेषामसत्यन्ने ॥ १३ ॥

असत्यपि काण्वानामन्ने ज्योतिषा तेषां पञ्चसंख्या पूर्यत। तेऽपि हि 'यस्मिन् पञ्च पञ्चजनाः' इत्यतः पूर्वस्मिन्मन्त्रे ब्रह्मस्वरूपनिरूपणायैव ज्योतिरधीयते—'तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिः' इति। कथं पुनरुभयेषामपि तुल्यवदिदं ज्योतिः पठ्यमानां समानमन्त्रगतया पञ्चसंख्यया केषांचिद् गृह्यते केषांचिन्नेति ? अपेक्षाभेदादित्याह। माध्यंदिनानां हि समानमन्त्रपठितप्राणादिपञ्चजनलाभान्नास्मिन्मन्त्रान्तरपठिते ज्योतिष्यपेक्षा भवति। तदलाभात् काण्वानां भवत्यपेक्षा। अपेक्षाभेदाच्च समानेऽपि मन्त्रे ज्योतिषो ग्रहणाग्रहणे। यथा समानेऽप्यतिरात्रे वचनभेदात्षोडशिनो ग्रहणाग्रहणे, तद्वत्। तदेवं न तावत् श्रुतिप्रसिद्धिः काचित्प्रधानविषयास्ति। स्मृतिन्यायप्रसिद्धी तु परिहरिष्येते ॥ १३ ॥


( ४ कारणत्वाधिकरणम्। सू० १४-१५ )

कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १४ ॥

प्रतिपादितं ब्रह्मणो लक्षणम्। प्रतिपादितं च ब्रह्मविषयं गतिसामान्यं वेदान्तवाक्यानाम्। प्रतिपादितं च प्रधानस्याशब्दत्वम्।

भामती

अथ समन्वयलक्षणे केयमकाण्डे विरोधाविरोधचिन्ता ? भविता हि तस्याः स्थानमविरोधलक्षणमित्यत आह ॐ प्रतिपादितं ब्रह्मणो लक्षणमिति ॐ । अयमर्थः नानेकशाखागततत्तद्वाक्यालोचनया वाक्यार्थावगमे पर्यवसिते सति प्रमाणान्तरविरोधेन वाक्यार्थावगतेरप्रामाण्यामाशङ्कयाविरोधव्युत्पादनेन प्राप्तप्रामाण्यव्यवस्थापनमविरोधलक्षणार्थः, प्रासङ्गिकं तु तत्र सृष्टिविषयाणां वाक्यानां परस्परमविरोधप्रतिपादनम्, न तु लक्षणार्थः। तत्प्रयोजनं च तत्रैव प्रतिपादयिष्यते। इह तु वाक्यानां सृष्टिप्रतिपादकानां परस्प-


भामती-व्याख्या

'पञ्चजनाः' शब्द देखा जाता है। इस प्रकार आचार्यजनों का मत-भेद रहने पर भी 'पंचजन' शब्द से पञ्चविंशति तत्त्वों की कभी भी सिद्धि नहीं हो सकती। परमार्थतः वाक्यशेषगत प्राणादि ही यहाँ पञ्चजन हैं, इस आशय को मन में रख कर कहा है—'कैश्चित्तु इत्यादि'। शेष भाष्य सुगम है ॥ १२-१३ ॥


संगति—इससे पहले (१) ब्रह्म का लक्षण किया गया, (२) सभी वेदान्त-वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय प्रतिपादित हुआ एवं (३) सांख्याभिमत प्रधानतत्त्व की अशब्दता (अनागमिकता) सिद्ध की गई। संस्थापित सिद्धान्तों पर उद्भावित कतिपय विरोधों का समाधान इस अधिकरण में किया जाता है। यहाँ जो यह शङ्का होती है कि इस समन्वयाध्याय के

४९२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. १४

तत्रेदमपरमाशङ्क्यते—न जन्मादिकारणत्वं ब्रह्मणो ब्रह्मविषयं वा गतिसामान्यं वेदान्तवाक्यानां प्रतिपत्तुं शक्यम् । कस्मात् ? विगानदर्शनात् । प्रतिवेदान्तं ह्यन्यान्या सृष्टिरुपलभ्यते, क्रमादिवैचित्र्यात् । तथा हि—क्वचित् , आत्मन आकाशः संभूतः' ( तै० २।१ ) इत्याकाशादिका सृष्टिराम्नायते । क्वचित्तेज आदिका—'तत्तेजोऽसृजत' इति । क्वचित्प्राणादिका—'स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम्' ( प्र० ६।४ ) इति क्वचिदक्रमेणैव लोकानामुत्पत्तिराम्नायते—'स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मर- मापः' ( ऐ० उ० ४।१।२ ) इति । तथा क्वचिदसत्पूर्विका सृष्टिः पठ्यते—'असद्वा इदमग्र आसीत्ततो वै सद्जायत' ( तै० २।७ ) इति । 'असदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासी- त्सत्समभवत्' ( छा० ३।१९।१ ) इति च । क्वचिदसद्वादनिनिराकरणेन सत्पूर्विका प्रक्रिया प्रतिज्ञायते—'तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत्' इत्युपक्रम्य 'कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत्' ( छा० ६।२।१,२ ) इति । क्वचित् स्वयंकर्तृकैव व्याक्रिया जगतो निगद्यते—'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्ना- मरूपाभ्यामेव व्याक्रियत' ( बृ० १।४।७ ) इति । एवमनेकधा विप्रतिपत्तेर्वस्तुनि च विकल्पस्यानुपपत्तेर्न वेदान्तवाक्यानां जगत्कारणावधारणपरता न्याय्या । स्मृतिन्याय-

भामती

सविरोधे ब्रह्मणि जगद्योनौ न समन्वयः सेद्धुमर्हति । तथा च न जगत्कारणत्वं ब्रह्मणो लक्षणं, न च तत्र गतिसामान्यम्, न च तत्सिद्धये प्रधानस्याशब्दत्वप्रतिपादनं, तस्माद्वाक्यानां विरोधाविरोधाभ्यामुक्ता- क्षेपसमाधानाभ्यां समन्वय एवोपपाद्यत इति समन्वय लक्षणे सङ्गतमिदमधिकरणम् ।

वाक्यानां कारणे कार्ये परस्परविरोधतः ।
समन्वयो जगद्योनौ न सिध्यति परात्मनि ॥

भामती-व्याख्या

साथ इस अधिकरण की संगति क्या ? विरोधाविरोध-चिन्ता के लिए तो द्वितीय अविरोधा- ध्याय की रचना की गई है। उस शङ्का का निराकरण किया गया है—'प्रतिपादितं ब्रह्मणो लक्षणमित्यादि'। आशय यह है कि अविरोध लक्षण (द्वितीयाध्याय) का प्रयोजन यह है कि अनेक शाखाओं या एक शाखा के सम्बन्धित वाक्यों की आलोचना से अधिगत वाक्यार्थ पर प्रमाणान्तरों के द्वारा उद्भावित विरोध के माध्यम से जो प्रकृत वाक्यार्थ-ज्ञान में अप्रामाण्य की शङ्का की जाती है, उसका परिहार करते हुए प्रामाण्य व्यवस्थापित करना। वहाँ सृष्टि- विषयक वाक्यों का जो परस्पर-अविरोध प्रतिपादित है वह केवल आनुषङ्गिक है, अविरोधा- ध्याय का मुख्य प्रतिपाद्य नहीं। किन्तु यहाँ सृष्टि-प्रतिपादक वाक्यों का परस्पर-विरोध होने पर सभी वाक्यों का एक ब्रह्म में समन्वय नहीं सिद्ध होता और ब्रह्म में जगत् की कारणता पर्यवसित नहीं होती। ब्रह्म-लक्षण की अनुपपत्ति के साथ-साथ गति-सामान्य [ सभी वेदान्त- वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय ] एवं सांख्याभिमत प्रधानगत अशाब्दता की सिद्धि भी नहीं होती। फलतः वाक्यों के विरोधाविरोध या आक्षेप-समाधान की शैली अपना कर समन्वयरूप मुख्य प्रयोजन की जो सिद्धि की जाती है, वह सर्वथा प्रथम (समन्वय) अध्याय से संगत है।

संशय—परस्पर-विरोधी सृष्टि-वाक्यों का जगतकारणीभूत ब्रह्म में समन्वय हो सकता है? अथवा नहीं ?

पूर्वपक्ष

वाक्यानां कारणे कार्ये परस्परविरोधतः ।
समन्वयो जगद्योनौ न सिध्यति परात्मनि ॥

सृष्टिभेदेऽपि स्रष्टुरभेदः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४९३

प्रसिद्धिभ्यां तु कारणान्तरपरिग्रहो न्याय्य इति ।
एवं प्राप्ते ब्रूमः—सत्यपि प्रतिवेदान्तं सृज्यमानेष्वाकाशादिषु क्रमाद्द्वारके विगाने न स्रष्टरि किंचिद्विगानमस्ति । कुतः ? यथाव्यपदिष्टोक्तेः यथाभूतो ह्येकस्मिन्


भामती

सदेव सोम्येदमग्र आसीदित्यादीनां कारणविषयाणामसद्वा इदमग्र आसीदित्यादिभिर्वाक्यैः कारण-विषयेविरोधः, कार्यविषयाणामपि विभिन्नक्रमाक्रमोत्पत्तिप्रतिपादकानां विरोधः । तथा कानिचिद-न्यकर्तृकां जगदुत्पत्तिमाचक्षते वाक्यानि, कानिचित् स्वयंकर्तृकाम् । सृष्ट्या च तत्कार्येण तत्कारणतया ब्रह्म लक्षितम् । सृष्टिविप्रतिपत्तौ तत्कारणतायां ब्रह्मलक्षणे विप्रतिपत्तौ सत्यां भवति तल्लक्ष्ये ब्रह्म-ण्यपि विप्रतिपत्तिः । तस्माद् ब्रह्मणि समन्वयाभावान्न समन्वयगम्यं ब्रह्म, वेदान्तास्तु कर्त्रादिप्रतिपादनेन कर्मविधिपरतयोपचरितार्था अविवक्षितार्था वा जपोपयोगिन इति प्राप्तम् । क्रमादीत्यादिग्रहणेनाक्रमो गृह्यते ।

एवं प्राप्त उच्यते —

सर्गक्रमविवादेऽपि न स स्रष्टरि विद्यते ।
सतस्त्वसद्ग्रहो भक्त्या निराकार्यतया क्वचित् ॥

न तावदस्ति सृष्टिकमे विगानं, श्रुतीनामविरोधात् । तथाहि—अनेक शिल्पपटुर्यवदातो देवदत्तः प्रथमं चक्रदण्डादि करोत्यथ तदुपकरणः कुंभं कुंभोपकरणस्त्वाहृत्येदकम्, उदकोपकरणश्च संयवनेन गोधूमकणिकानां करोति पिण्डं, पिण्डोपकरणस्तु पचति घृतपूर्ण, तवस्य देवदत्तस्य सर्वत्रैतस्मिन् कर्तृत्वा-


भामती-व्याख्या

कारणविषयक और कार्यविषयक वाक्यों का परस्पर-विरोध है, जैसे कि “सदेव सोम्य ! इदमग्र आसीत्” (छां. ६।२।१) और “असद्वा इदमग्र आसीत्” (तं. २।७) इत्यादि वाक्य 'सत्' और 'असत्' कारण के प्रतिपादक होने से परस्पर-विरुद्ध हैं। इसी प्रकार कार्य (सृष्टि) के प्रतिपादक वाक्यों की भी एकवाक्यता नहीं, क्योंकि “कुतस्तु खलु सोम्येवं स्यात्” (छां. ६।२।२) इत्यादि वाक्य जगत् को अन्यकर्तृक और “तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्, तन्नाम-रूपाभ्यां व्याक्रियते” (बृह. उ. १।४।७) इत्यादि वाक्य जगत् को स्वयंकर्तृक कहते हैं। सृष्टि का क्रम भी विविधरूप में अभिहित है। इसी सृष्टि के द्वारा ब्रह्म का तटस्थ लक्षण किया गया है—“जन्माद्यस्य यतः” (ब्र. सू. १।१।२)। सृष्टि में विप्रतिपत्ति होने पर सृष्टिकारणत्व-रूप ब्रह्म-लक्षण में विप्रतिपत्ति और विप्रतिपन्न लक्षण के द्वारा ब्रह्मरूप लक्ष्यार्थ में भी विप्रतिपत्ति हो जाती है। जब ब्रह्म में वेदांत-वाक्यों का समन्वय नहीं होता, तब समन्वय-गम्य ब्रह्म क्योंकर होगा ? वेदान्त-वाक्यों का सार्थक्य तो कर्मकाण्ड में अपेक्षित कर्त्ता-भोक्तारूप जीवात्मा का प्रतिपादन कर कर्म-विधिपरता में अथवा जप की उपयोगिता में हो जाता है। “क्रमादिवैचित्र्यात्” इस भाष्य में आदि' पद के द्वारा अक्रम (यौगपद्य) का ग्रहण किया जाता है।

समाधान —

सर्गक्रमविवादेऽपि न स स्रष्टरि विद्यते ।
सतस्त्वसद्ग्रहो भक्त्या निराकार्यतया क्वचित् ॥

सृष्टि-क्रम में किसी प्रकार का विगान (विरोध) नहीं, क्योंकि सभी श्रुतियाँ अविरु-द्धार्थक हैं। जैसे कि अनेक शिल्पों में कुशल देवदत्त भी पहले दण्ड-चक्रादि साधन पदार्थों का संग्रह करता है, उस सामग्री की सहायता से घट का निर्माण करता है, घट में जल भर लाता है, जल से गेहूँ का आटा गून्ध कर पूड़ी के पेड़े बनाता है, उन्हें बेल कर घी में पूड़ियाँ छानता

४९४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. १४

वेदान्ते सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सर्वात्मैकोऽद्वितीयः कारणत्वेन व्यपदिष्टस्तथाभूत एव वेदान्तान्तरेष्वपि व्यपदिश्यते । तद्यथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० २।१) इति । अत्र तावज्ज्ञानशब्दे परेण च तद्विशेषेण कामयितृत्ववचनेन चेतनं ब्रह्म न्यरूपयत्,

भामती

च्छक्यं वक्तुं देवदत्ताच्चक्रादि सम्भूतं तस्माच्चक्रादेः कुम्भादीति। शक्यञ्च देवदत्तात् कुम्भः समुद्भूतस्तस्मादुदकाहरणादीत्यादि । नह्यस्यासम्भवः सर्वत्रास्मिन् कार्य्यजाते क्रमवत्यपि देवदत्तस्य साक्षात्कर्त्तुरनुस्यूतत्वात्तथेहापि । यद्यप्याकाशादिक्रमेणैव सृष्टिरस्तथाप्याकाशानलानिलादौ तत्र तत्र साक्षात् परमेश्वरस्य कर्तृत्वान्नच्छक्यं वक्तुं परमेश्वरादाकाशः सम्भूत इति, शक्यं च वक्तुं परमेश्वरादनलः सम्भूत इत्यादि । यदि त्वाकाशाद्वायुर्वायोस्तेज इत्युक्त्वा तेजसो वायुर्वायोराकाश इति ब्रूयाद्भवद्विरोधो न चैतदस्ति । तस्मादभूषामविवादः श्रुतीनाम् । एवं 'स इमान् लोकानसृजत' इत्यक्रमाभिधायिन्यपि श्रुतिरविरुद्धा । एषा हि स्वव्यापारमभिधानक्रमेण कुर्वंती नाभिधेयानां क्रमं निरुणद्धि, ते तु यथाक्रमावस्थिता एवाक्रमेणोच्यन्ते । यथा क्रमवन्ति ज्ञानानि जानातीति । तदेवमविगानम् । अभ्युपेत्य तु विगानमुच्यते सृष्टौ खल्वेतद्विगानम् । स्रष्टा तु सर्ववेदान्तवाक्येष्वनुस्यूतः परमेश्वरः प्रतीयते नात्र श्रुतिविगानं मात्रयाप्यस्ति । न च सृष्टिविगानं स्रष्टरि तदधीननिरूपणे विगानमावहतीति वाच्यम्, नह्येष स्रष्टृत्वमात्रेणोच्यतेऽपि तु सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्यादिना रूपेणोच्यते स्रष्टा । तच्चास्य रूपं सर्ववेदान्तवाक्यानुगतम् । तज्ज्ञानं च

भामती-व्याख्या

है। इन सभी कार्यों के सम्पादन में देवदत्त कर्त्ता है, अतः यह कह सकते हैं कि देवदत्त से चक्रादि सामग्री और चक्रादि सामग्री से घट सम्भूत (उत्पन्न) हुआ एवं ऐसा भी कहा जा सकता है कि देवदत्त से घट उत्पन्न हुआ और घट से जलाहरण किया जाता है। ऐसा कहना असम्भव कदापि नहीं, क्योंकि समस्त क्रमिक कार्य-कलाप का साक्षात् कर्त्ता देवदत्त सर्वत्र अनुस्यूत है। वैसे ही यहाँ भी सभी प्रकार से कहा जा सकता है। यद्यपि सृष्टि सदैव आकाशादि-क्रम से होती है, तथापि आकाश, वायु और तेज आदि कार्यों का साक्षात् परमेश्वर ही कर्त्ता है, अतः यह कहा जा सकता है 'परमेश्वराद् आकाशः सम्भूतः', परमेश्वराद् वायुः सम्भूतः, परमेश्वरात् तेजः सम्भूतम्' । यदि आकाश से वायु और वायु से तेज संभूत हुआ-ऐसा कह कर तेज से वायु और वायु से आकाश संभूत हुआ-ऐसा कहा जाता, तब अवश्य विरोध उपस्थित होगा । किन्तु ऐसा कहीं नहीं कहा गया है, अतः इन श्रुतियों में किसी प्रकार का विरोध नहीं। इसी प्रकार 'स इमान् लोकानसृजत'—ऐसा उपक्रम कर सर्ग-प्रतिपादिका श्रुति विरुद्ध नहीं मानी जाती, क्योंकि यह श्रुति अभिधान-क्रम से अपना व्यापार करती हुई अभिज्ञान क्रम का विरोध कभी भी नहीं करती । अभिधेय पदार्थ तो यथाक्रम अवस्थित होकर युगपत् वैसे ही कहे जाते हैं, जैसे 'क्रमवन्ति ज्ञानानि जानाति' । इस प्रकार के प्रतिपादन को विगान कदापि नहीं कहा जा सकता ।

श्रुतियों के विगान (विरुद्धार्थ-प्रतिपादन) को स्वीकार कर लेने पर भी यह कहा जा सकता है कि यह विगान केवल सृष्टि के विषय में है, स्रष्टा आत्मा तो सभी वेदान्त-वाक्यों में अनुस्यूत परमेश्वर ही है। इसके विषय में श्रुतियों का किसी प्रकार का भी विवाद नहीं । यदि सृष्टि में विवाद या विगान है, तब सृष्टि के अधीन ही जिस स्रष्टा का निरूपण होता है, उस में विवाद क्यों न होगा ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि स्रष्टा परमेश्वर का निरूपण केवल सृष्टि के अधीन नहीं, क्योंकि तटस्थ लक्षण में सृष्टि की अपेक्षा होने पर भी स्वरूप लक्षण में उसकी कदापि अपेक्षा नहीं—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० २।१।१) इत्यादि वाक्यों के द्वारा स्वरूपतः परमेश्वर का निरूपण किया जाता है, सृष्टि के माध्यम से नहीं।

सृष्टिभेदेऽपि स्रष्टुरभेदः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४९५

अपरप्रयोज्यत्वेनेश्वरं कारणमब्रवीत् । तद्विषयेणैव परेणात्मशब्देन शरीरादिकोशपरं- परया चान्तरनुप्रवेशनेन सर्वेषामन्तः प्रत्यगात्मानं निरधारयत् । ‘बहु स्यां प्रजायेय’ (तै० २।६) इति चात्मविषयेण बहुभवनानुशंसनेन सृज्यमानानां विकाराणां स्रष्टुरभेद- मभाषत । तथा ‘इदं सर्वमसृजत । यदिदं किंच’ (तै० २।६ ) इति समस्तजगत्सृष्टि- निर्देशेन प्राक्सृष्टेरद्वितीयं स्रष्टारमाचष्टे । तदत्र यल्लक्षणं ब्रह्म कारणत्वेन विज्ञातं, तल्लक्षणमेवान्यत्रापि विज्ञायते - ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’, ‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति । तत्तेजोऽसृजत’ ( छा० ६।२।१, ३ ) इति । तथा ‘आत्मा वा इद- मेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजै’ ( ऐ० उ० ४।१।१, २ ) इति च, एवंजातीयकस्य कारणस्वरूपनिरूपणपरस्य वाक्यजातस्य प्रतिवेदान्त- मविगीतार्थत्वात् । कार्यविषयं तु विगानं दृश्यते- क्वचिदाकाशादिका सृष्टिः क्वचित्तेजादिकेत्येवंजातीयकम् । नच कार्यविषयेण विगानेन कारणमपि ब्रह्म सर्व- वेदान्तेष्वविगीतमधिगम्यमानमविवक्षितं भवितुमर्हतीति शक्यते वक्तुम्, अतिप्रस- ङ्गात् । समाधास्यति चाचार्यः कार्यविषयमपि विगानं ‘न वियदश्रुतेः’ ( ब्र० सू० २।३।१) इत्यारभ्य भवेदपि कार्यस्य विगीतत्वमप्रतिपाद्यत्वात् । न ह्ययं सृष्ट्यादिप्रपंच प्रतिपिपादयिषितः । नहि तत्प्रतिबद्धः कश्चित्पुरुषार्थो दृश्यते श्रूयते वा । न च कल्पयितुं शक्यते, उपक्रमोपसंहाराभ्यां तत्र तत्र ब्रह्मविषयैर्वाक्यैः साकमेकवाक्यतया गम्यमा- नत्वात् । दर्शयति च सृष्ट्यादिप्रपंचस्य ब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थताम्- ‘अन्नेन सोम्य शुङ्गे- नापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूल-

भामती

फलवत्, 'ब्रह्मविदाप्नोति परं' 'तरति शोकमात्मवित्' इति श्रुतेः । सृष्टिज्ञानस्य तु न फलं श्रूयते तेन फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गमिति सृष्टिज्ञानं स्रष्टृब्रह्मज्ञानाङ्गं तदनुगुणं सद्ब्रह्मज्ञानावतारोपायतया व्याख्येयम् । तथा च श्रुतिः - 'अन्नेन सोम्य शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छ' इत्यादिका । शुङ्गेनाग्रेण कार्येणेति यावत् । तस्मान्न सृष्टिप्रतिपत्तिः स्रष्टरि विप्रतिपत्तिमावहति । अपि तु गुणे त्वन्याय्यकल्पनेति तदनु- गुणतया व्याख्येया । यच्च कारणे विगानमसद्वा इदमग्र आसीदिति, तदपि तदप्येष श्लोको भवतीति

भामती-व्याख्या

यह स्वरूप तो सभी वेदान्त वाक्यों में अनुस्यूत है, उसी का ज्ञान पुरुषार्थ का साधन कहा गया है—“ब्रह्मविदाप्नोति परम्” ( तै० २।१ ) । ‘‘तरति शोकमात्मवित्’’ ( छां० ६।१।७ ) । सृष्टि के ज्ञान को कहीं भी पुरुषार्थ का साधन नहीं माना गया है, अतः “फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गम्” ( जै० सू० ४।४।३४ ) इस न्याय के अनुसार सृष्टि का ज्ञान स्रष्टारूप ब्रह्म के ज्ञान का अङ्गमात्र है, क्योंकि ब्रह्म-ज्ञान मोक्षफलक और सृष्टि-ज्ञान फल-रहित है, अतः सृष्टि-प्रक्रिया की ऐसी व्याख्या करनी होगी, जिस से ब्रह्म-ज्ञान का अवतार ( आविर्भाव ) हो, श्रुति ने ऐसा ही कहा है—“अन्नेन सोम्य शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छ” ( छां. ६।८।४ ) । वट वृक्ष या उसके अंकुर भाग को शुङ्ग कहते हैं, यहाँ कार्य ( जन्य वस्तु ) मात्र का शुङ्ग पद उपलक्षक है । श्रुति का तात्पर्य यही है कि सृष्ट्यादि अङ्गों के द्वारा अङ्गी ( ब्रह्म ) का ज्ञान करना चाहिए [ सृष्टि और प्रलय का निरूपण एक प्रकार से ब्रह्म की व्याख्या माना गया है— “अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते” [ । इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि सृष्टिविषयक विप्रतिपत्ति स्रष्टा के विषय में किसी प्रकार की विप्रतिपत्ति की जनक नहीं, होती, अपि तु “गुणे त्वन्याय्यकल्पना” ( जै० सू० ९।३।१५ ) इस न्याय के अनुसार सृष्टिरूप गुण ( अङ्गभूत ) पदार्थों की लक्षणादि अन्याय-कल्पना के द्वारा अङ्गीभूत ब्रह्म के ज्ञान में पर्यवसान करना होगा !

४९६ [ अ. १ पा. ४ सू. १५

मन्विच्छ' (छा० ६।८।४) इति । मृदादिदृष्टान्तैश्च कार्यस्य कारणेनाभेदं वदितुं सृष्ट्या- दिप्रपञ्चः श्राव्यत इति गम्यते । तथाच संप्रदायविदो वदन्ति – 'मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या चोदिताऽन्यथा । उपायः सोऽवताराय नास्ति भेदः कथंचन ।' (माण्डू० का० १।१५) । ब्रह्मप्रतिपत्तिप्रतिबद्धं तु फलं श्रूयते – 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तै० २।१), 'तरति शोकमात्मवित्' (छा० ७।१।३) 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति' (श्वे० ३।८) इति । प्रत्यक्षावगमं चेदं फलम्, 'तत्त्वमसि' इत्यसंसार्यात्मत्वप्रतिपत्तौ सत्यां संसार्यात्मत्वव्यावृत्तेः ॥ १४ ॥ यत्पुनः कारणविषयं विगानं दर्शितम् – 'असद्वा इदमग्र आसीत्' इत्यादि, तत्परिहर्त- व्यम् । अत्रोच्यते –

समाकर्षात् ॥ १५ ॥

'असद्वा इदमग्र आसीत्' (तै० २।७) इति नात्रासन्निरात्मकं कारणत्वेन

भामती

पूर्वं प्रकृतं सद्ब्रह्माकृष्यासदेवेदमग्र आसीदित्यभिधीयमानं त्वसतोऽभिधानेऽसम्बद्धं स्यात् । श्रुत्यन्तरेण च मानान्तरेण च विरोधः । तस्मादौपचारिकं व्याख्येयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदिति तु निराकार्य- तयोपन्यस्तमिति न कारणे विवाद इति । सूत्रे चशब्दस्त्वर्थः पूर्वपक्षं निवर्त्तयति— आकाशादिषु सृज्यमानेषु क्रमविगानेऽपि न स्रष्टरि विगानम् । कुतः ? यथैकस्यां श्रुतौ व्यपदिष्टः परमेश्वरः सर्वस्य कर्त्ता तथैव श्रुत्यन्तरेषूक्तः, केन रूपेण ? कारणत्वेन । अपरः कल्पो यथा व्यपदिष्टः क्रम आकाशादिषु, आत्मन आकाशः सम्भूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवीति, तथैव क्रमस्यानपबाधेनेन तत्तेजोऽ- सृजतेत्यादिकायपि सृष्टेरूक्तैर्न सृष्टावपि विगानम् ॥ १४ ॥

नन्वेकत्रात्मन आकाशकारणत्वेनोक्तिरन्यत्र च तेजःकारणत्वेन तत्कथमविगानमत आह

भामती-व्याख्या

यह जो कारणविषयक विगान का निर्देश करते हुए कहा गया कि किसी श्रुति में जगत् कारण तत्त्व 'सत्' कहा गया और किसी में असत् । वह भी संगत नहीं, क्योंकि श्रुतियों का तात्पर्य सद् ब्रह्मगत जगत्कारणता के प्रतिपादन में ही है, असत्कारणता में नहीं, क्योंकि “तदप्येष श्लोको भवति”—इस प्रकार तत्पद के द्वारा पूर्व-प्रतिपादित 'सद् ब्रह्म' का अनुवर्तन करके “असदेवेदमग्र आसीत्”--इस वाक्य के द्वारा असत् का अभिधान करने पर विरोध और असम्बद्ध-प्रतिपादन प्रसक्त होता है, इतना ही नहीं, अन्य श्रुतियों और प्रमाणों से विरोध भी आता है, अतः 'असत्' पद को औपचारिक मानना होगा, जैसा कि भाष्यकार ने कहा है--“असदिति व्याकृतानामरूपविशेषविपरीतरूपमविकृतं ब्रह्मोच्यते, न पुनरत्यन्त-मसत्, न ह्यसतः सज्जन्मास्ति" (तै. उ. भा. पृ. ८०)। वस्तुतः असत्कारणवाद निराकरणीय होने के कारण निर्दिष्ट हुआ है--यह सिद्धान्त-श्लोक में सूचित किया गया है--''निराकार्यतया कचित्” । “कारणत्वेन चाकाशादिषु"--इस सिद्धान्त-सूत्र में चकार 'तु' के अर्थ में प्रयुक्त होकर पूर्व पक्ष का निवर्तक है। आशय यह है कि आकाशादि पदार्थों के सृष्टि-क्रम में विगान (विप्रतिपादन) होने पर भी स्रष्टा (ब्रह्म) में कोई विवाद नहीं, क्योंकि जैसे एक श्रुति में परमेश्वर जगत्कारणत्वेन निर्दिष्ट है, वैसे ही श्रुत्यन्तर में भी। सूत्रकार ने जो कहा है--"यथा व्यपदिष्टोक्तेः", उसका तात्पर्य भी यही है कि आत्मनः आकाशः सम्भूतः' इस वाक्य में जो क्रम व्यपदिष्ट है, उस क्रम की विवक्षा न करके “तन् तेजोऽसृजत"--ऐसा कह दिया गया है, अतः सृष्टि में भी किसी प्रकार का विगान नहीं ॥ १४ ॥

जब कि एक श्रुति में आत्मा का आकाशकारणत्वेन निर्देश है और दूसरी श्रुति में तेजः-

सृष्टिभेदेऽपि स्रष्टुरभेदः ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्४९७

श्राव्यते। यतः 'असन्नेव स भवति, असद् ब्रह्मेति वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद, सन्तमेनं ततो विदुः' इत्यसद्वादापवादेनास्तित्वलक्षणं ब्रह्माऽन्नमयादिकोशपरम्परया प्रत्यगात्मानं निर्धार्य 'सोऽकामयत' इति तमेव प्रकृतं समाकृष्य सप्रपञ्चां सृष्टिं तस्माच्छ्रावयित्वा 'तत्सत्यमित्याचक्षते' इति चोपसंहृत्य 'तदप्येष श्लोको भवति' इति तस्मिन्नेव प्रकृतेऽर्थे श्लोकमिममुदाहरति—'असद्वा इदमग्र आसीत्' इति। यदि त्वसन्निरात्मकम्मिन् श्लोकेऽभिप्रेयेत, ततोऽन्यसमाकर्षणेऽन्यस्योदाहरणादसंबद्धं वाक्यमापद्येत। तस्मान्नामरूपव्याकृतवस्तुविषयः प्रायेण सच्छब्दः प्रसिद्ध इति तद्द्द्व्याकरणाभावापेक्षया प्रागुत्पत्तेः सदेव ब्रह्मासदिवासीदित्यपचर्यते। एषैव 'असदेवेदमग्र आसीत्' (छा० ३।१९।१) इत्यत्रापि योजना, 'तत्सदासीत्' इति समाकर्षणात्। अत्यन्ताभावाभ्युपगमे हि 'तत्सदासीत्' इति किं समाकृष्येत ? 'तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत्' (छा० ६।२।१) इत्यत्रापि न श्रुत्यन्तराभिप्रायेणायमेकीयमतोपन्यासः, क्रियायामिव वस्तुनि विकल्पस्यासंभवात्। तस्माच्छ्रुतिपरिगृहीतसत्पक्षदाढर्यायैवायं मन्दमतिपरिकल्पितस्यासत्पक्षस्योपन्यस्य निरास इति द्रष्टव्यम्। 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्' (बृ० १।४।७) इत्यत्रापि न निरध्यक्षस्य जगतो व्याकरणं कथ्यते, स एव इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यः' इत्यध्यक्षस्य व्याकृतकार्यानुप्रवेशित्वेन समाकर्षात्। निरध्यक्षे व्याकरणाभ्युपगमे ह्यनन्तरेण प्रकृतावलम्बिना स इत्यनेन सर्वनाम्ना कः कार्यानुप्रवेशित्वेन समाकृष्येत ? चेतनस्य चायमात्मनः शरीरेऽनुप्रवेशः श्रूयते। अनुप्रविष्टस्य चेतनत्वश्रवणात्—'पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनः' इति। अपि च यादृशमिदमद्यत्वे नामरूपाभ्यां व्याक्रियमाणं जगत्साध्यक्षं व्याक्रियत एवमादिसर्गेऽपीति गम्यते, दृष्टविपरीतकल्पनानुपपत्तेः। श्रुत्यन्तरमपि 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे करवाणि' (छा० ६।३।२) इति साध्यक्षामेव जगतो व्याक्रियां दर्शयति। व्याक्रियत इत्यपि कर्मकर्तरि लकारः सत्येव परमेश्वरे व्याकर्तरि सौकर्यमपेक्ष्य द्रष्टव्यः। यथा लूयते केदारः स्वयमेवेति सत्येव पूर्णके लवितरि। यद्वा,—कर्मण्येवैष लकारोऽर्थाक्षिप्तं कर्तारमपेक्ष्य द्रष्टव्यः। यथा गम्यते ग्राम इति ॥ १५ ॥


भामती

कारणत्वेन इति । हेतौ तृतीया, सर्वत्राकाशानलानिलादौ साक्षात्कारणत्वेनात्मनः प्रपञ्चितं चेतदधस्तात्। व्याक्रियत इति च कर्मकर्तरि कर्मणि वा रूपम्। न चेतनमतिरिक्तं कर्तारं प्रतिक्षिपति किन्तुपस्थापयति। न हि लूयते केदारः स्वयमेवेति वा लूयते केदार इति वा लवितारं देवदत्तादि प्रतिक्षिपति, अपि तूपस्थापयत्येव; तस्मात्सर्वमवदातम् ॥ १५ ॥


भामती-व्याख्या

कारणत्वेन, तब कारणता में विगान क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है—'नात्रासन्निरात्मकं कारणत्वेन श्राव्यते'। यहाँ 'कारणत्वेन' में तृतीया विभक्ति हेत्वर्थक है। सर्वत्र आकाश, तेज, वायु आदि में साक्षात् कारणत्वेन आत्मा निर्दिष्ट है। इस का विस्तार पहले किया जा चुका है। 'व्याक्रियेत'—यह कर्मकर्त्ता या कर्म में प्रत्यय है। इस पद के द्वारा अतिरिक्त चेतन कर्त्ता का निराकरण नहीं किया जाता, अपि तु उस का उपस्थापन किया जा रहा है, क्योंकि "लूयते केदारः स्वयमेव"—ऐसे प्रयोग के द्वारा लविता ( काटनेवाले ) पुरुष का निषेध नहीं किया जाता, अपि तु उस का उपस्थापन किया जाता है ॥ १५ ॥

६३

४९८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १६

( ५ बालाक्यधिकरणम् । सू० १६-१८ )

जगद्वाचित्वात् ॥ १६ ॥

कौषीतकिब्राह्मणे बालाक्यजातशत्रुसंवादे श्रूयते—'यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः' (कौ० ब्रा० ४।१९) इति । तत्र किं जीवो वेदितव्यत्वेनोपदिश्यते, उत मुख्यः प्राणः, उत परमात्मेति विशयः । किं तावत्प्राप्तम् ? प्राण इति । कुतः ? 'यस्य वैतत्कर्म' इति श्रवणात्, परिस्प-

भामती

ननु ब्रह्म ते ब्रवाणीति ब्रह्माभिधानप्रकरणादुपसंहारे च सर्वान् पाप्मनोऽपहृत्य सर्वेषाञ्च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेदेति निरतिशयफलश्रवणाद् ब्रह्मवेदनादन्यस्य तदसम्भवात् । आदित्यचन्द्रादिगतपुरुषकर्तृत्वस्य च यस्य वैतत्कर्मेति च स्यात्सत्यवच्छेदे सर्वनाम्ना प्रत्यक्षसिद्धस्य जगतः परामर्शन जगत्कर्तृत्वस्य च ब्रह्मणोऽन्यत्रासम्भवात्कथं जीवमुख्यप्राणाशङ्का ? उच्यते—ब्रह्म ते ब्रवाणीति बलाकिना गार्ग्यण ब्रह्माभिधानं प्रतिज्ञाय तत्तदादित्यादिगताब्रह्मपुरुषाभिधानेन न तावद् ब्रह्मोक्तम् । यस्य चाजातशत्रोर्यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत् कर्मेति वाक्यं न तेन ब्रह्माभिधानं प्रतिज्ञातम् । न चान्यदीयेनोपक्रमेणान्यस्य वाक्यं शक्यं नियन्तुम् । तस्मादजातशत्रोर्वाक्यसन्दर्भपौर्वापर्यालोचनया योऽस्यार्थः प्रतिभाति, स एव ग्राह्यः । अत्र च कर्मशब्दस्तावद् व्यापारे निरूढ-

भामती-व्याख्या

विषय—कौषीतकी ब्राह्मणगत बालाकि और अजातशत्रु के संवाद में आया है—"यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता, यस्य वैतत् कर्म, स वै वेदितव्यः" ( कौ. ब्रा. ४।१९ ) इस वाक्य का अर्थ विचारणीय है ।

संशय—उक्त श्रुति में कथित कर्त्ता प्राण है ? या जीव ? अथवा परमात्मा ?

शङ्का—"ब्रह्म ते ब्रवाणि" ( बृह. उ. २।१।१ ) यह प्रकरण-ब्रह्माभिधान का है, उपसंहार में भी कहा गया है—"सर्वान् पाप्मनोऽपहृत्य सर्वेषां च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेद"। यहाँ 'स्वाराज्य' के समान निरतिशय फल की प्राप्ति श्रुत है, जो कि ब्रह्म-ज्ञान का ही फल है, उससे भिन्न और किसी वेदनादि का फल नहीं हो सकता, आदित्य और चन्द्रमण्डलादिगत पुरुष का जनकत्व ब्रह्म से अन्यत्र सम्भव नहीं, "यस्य वैतत् कर्म स वै वेदितव्यः" (कौ. ब्रा. ४।१९) यहाँ पर यद्यपि कोई अवच्छेद (विशेष प्रकरणादि निर्णायक) नहीं, तथापि 'एतत्' पद के द्वारा जिस प्रत्यक्ष-सिद्ध जगत् का ग्रहण होता है, उसकी कारणता ब्रह्म में ही सम्भव है, अन्यत्र नहीं, अतः यहाँ ब्रह्म से भिन्न जीव और मुख्य प्राण के ग्रहण की शङ्का क्योंकर होगी ?

समाधान—बलाक-पुत्र गार्ग्य ने "ब्रह्म ते ब्रवाणि"—ऐसा प्रतिज्ञा की, उसने आदित्यादिगत ब्रह्मेतर पुरुषों का ही अभिधान किया, ब्रह्म का नहीं और जिस अजातशत्रु का "यो वै बालाके एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता, यस्य वैतत् कर्म"—यह वाक्य है, उसने ब्रह्माभिधान की प्रतिज्ञा नहीं की । अन्य व्यक्ति के उपक्रम ( प्रतिज्ञा ) से अन्य व्यक्ति के उपसंहार की एकवाक्यता स्थापित नहीं की जा सकती । परिशेषतः अजातशत्रु के उक्त सन्दर्भ-वाक्य की पौर्वापर्यालोचना से जो उस वाक्य का अर्थ निकलता हो, वही ग्राह्य होगा ।

पूर्वपक्ष—"यस्यैतत् कर्म"—यहाँ पर 'कर्म' पद व्यापार (क्रिया) अर्थ में रूढ है किन्तु 'क्रियते इति कर्म'-ऐसी व्युत्पत्ति के द्वारा कार्यमात्र (जन्य वस्तुमात्र) का बोधक माना जाता है । रूढि शक्ति के अक्षुण्ण रहते-रहते यौगिक व्युत्पत्ति का आश्रयण उचित नहीं माना जा सकता ब्रह्म एक उदासीन और अपरिणामी तत्त्व है, उसका यह व्यापार (जगत् की रचना) नहीं माना

बालाकिसंवादे ब्रह्मवादः ] हिन्दीसहितभामतीसंचालितम् ४९९

न्दलक्षणस्य च कर्मणः प्राणाश्रयत्वात्, वाक्यशेषे च 'अथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति' इति प्राणशब्ददर्शनात्, प्राणशब्दस्य च मुख्ये प्राणे प्रसिद्धत्वात् । ये चैते पुरस्ताद्वा- लाकिना 'आदित्ये पुरुषश्चन्द्रमसि पुरुषः' इत्येवमादयः पुरुषा निर्दिष्टास्तेषामपि भवति प्राणः कर्त्ता, प्राणावस्थाविशेषत्वादित्यादिदेवतानाम्- 'कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते' (बृह० ३।९।९) इति श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः । जीवो वाऽयमिह वेदितव्यतयोपदिश्यते । तस्यापि धर्माधर्मलक्षणं कर्म शक्यते श्रावयितुम्- 'यस्य वैतत्कर्म' इति । सोऽपि भोक्तृत्वादङ्गोपकरणभूतानामेतेषां पुरुषाणां कर्तोप- पद्यते । वाक्यशेषे च जीवलिङ्गमवगम्यते । यत्कारणं वेदितव्यतयोपन्यस्तस्य पुरुषाणां कर्तुर्वेदनायोपेतं बालाकिं प्रति बुबोधयिषुरजातशत्रुः सुप्तं पुरुषमामन्त्र्यामन्त्रणशब्दा- श्रवणात्प्राणादीनामभोक्तृत्वं प्रतिबोध्य यष्टिघातोत्थानात्प्राणादिव्यतिरिक्तं जीवं

भामती

वृत्तिः कार्येषु क्रियत इति व्युत्पत्त्या वर्तेत । न च रूढौ सत्यां व्युत्पत्तिर्युक्ताऽऽश्रयितुम् । न च ब्रह्मण उदासीनस्यापरिणामिनो व्यापारवत्ता । वाक्यशेषे चाथास्मिन् प्राण एवैकधा भवतीति श्रवणात्परिस्पन्द- लक्षणस्य च कर्मणो यत्रोपपत्तिः, स एव वेदितव्यतयोपविश्यते । आदित्यादिगतपुरुषकर्तृत्वं च प्राणस्यो- पपद्यते हिरण्यगर्भरूपप्राणावस्थाविशेषत्वादित्यादिदेवतानां कतम एको देवः प्राण इति श्रुतेः । उपक्रमा- नुरोधेन चोपसंहारे सर्वशब्दः सर्वान् पाप्मन इति च सर्वेषां भूतानामिति चापेक्षिकवृत्तंर्बहून् पाप्मनो बहूनां भूतानामित्येवं परो द्रष्टव्यः । एकस्मिन् वाक्ये उपक्रमानुरोधादुपसंहारो वर्णनीयः । यदि तु दृप्तबालाकिमब्रह्मणि ब्रह्माभिधायिनमपोद्याजातशत्रोर्वचनं ब्रह्मविषयमेवान्यथा तु तदुक्ताद्विशेषं विवक्षोर- ब्रह्माभिधानमसम्बद्धं स्यादिति मन्यते, तथापि नैवद् ब्रह्माभिधानं भवितुमर्हति, अपि तु जीवाभिधानमेव, यत्कारणं वेदितव्यतयोपन्यस्तस्य पुरुषाणां कर्तुर्वेदनायोपेतं बालाकिं प्रति बुबोधयिषुरजातशत्रुः सुप्तं पुरुषमामन्त्र्यामन्त्रणशब्दाश्रवणात् प्राणादीनामभोक्तृत्वमस्वामित्वं प्रतिबोध्य यष्टिघातोत्थानात् प्राणादि-

भामती-व्याख्या

जा सकता ।

वाक्यशेष में ‘‘अथास्मिन् प्राण एकधा भवति’’—ऐसा प्राण श्रुत है, अतः परिस्पन्द- नरूप क्रिया जिस पदार्थ में उपपन्न हो सके, वही यहाँ वेदितव्यतया उपदिष्ट माना जायगा । आदित्यादिगत पुरुष की कर्तृता प्राण में उपपन्न हो जाती है, क्योंकि हिरण्यगर्भरूप प्राण के आदित्यादिगत पुरुष ( देवता ) विकार माने गये हैं, अन्य श्रुतियों में भी कहा गया है— ‘‘कतम एको देवः ? प्राण इति’’ ( बृ० उ० ३।९।९ )। उपक्रम के अनुरोध पर ‘‘सर्वान् पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां च भूतानां श्रेष्ठ्यं पर्येति’’—इस उपसंहार-वाक्य में ‘सर्व’ शब्द पापों और भूतों की आपेक्षिक सर्वता ( भूयस्ता ) का प्रतिपादक है अर्थात् बहुत-से पापों का अपघात करके बहुत-से भूतों में श्रेष्ठता प्राप्त करता है—ऐसा ही वहाँ अर्थ होगा, क्योंकि महावाक्य में उपक्रम के अनुसार ही उपसंहार का वर्णन करना चाहिए ।

यदि ‘भ्रान्त बालाकि के अब्रह्म में ब्रह्मत्वाभिधान का निराकरण करके अजातशत्रु ने अपने वाक्य में ब्रह्म का अभिधान किया, अन्यथा बालाकि को अब्रह्माभिधायी कहना संगत क्योंकर होगा ? अतः प्राण का प्रतिपादन सम्भव नहीं’—ऐसा माना जाता है, तब भी यह कहा जा सकता है कि यह सन्दर्भ ब्रह्माभिधान का नहीं हो सकता, अपितु जीव का अभिधायक माना जा सकता है, क्योंकि वेदितव्यतया निर्दिष्ट जो आदित्य-पुरुषादि का कर्त्ता आत्मा है, उसके जिज्ञासु बालाकि को उसका बोध कराने की इच्छा से अजातशत्रु बालाकि को साथ लेकर एक सोए हुए व्यक्ति के पास गया—‘‘तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुः’’ (बृह० उ० २।१।१५)। सोए हुए पुरुष का नाम लेकर अजातशत्रु ने पुकारा—‘‘बृहत्पाण्डुरवासः सोमराजन् !’’

५०० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. १६

भोक्तारं प्रतिबोधयति । तथा परस्तादपि जीवलिङ्गमवगम्यते—'तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते एवमेवैत आत्मान एतमात्मानं भुञ्जन्ति (कौ० ब्रा० ४।२०) इति । प्राणभृत्त्वाच्च जीवस्योपपन्नं प्राणशब्दत्वम् । तस्माज्जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर इह ग्रहणीयो न परमेश्वरः, तल्लिङ्गानवगमादिति ।


भामती

व्यतिरिक्तं जीवं भोक्तारं स्वामिनं प्रतिबोधयति परस्तादपि तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्ति एवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते एवमेते आत्मान एनमात्मानं भुञ्जन्तीति श्रवणात् । यथा श्रेष्ठी प्रधानः पुरुषः स्वैर्भृत्यैः करणभूतैर्विषयान् भुङ्क्ते यथा वा स्वा भृत्याः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्ति, ते हि श्रेष्ठिनमशनाच्छादनादिग्रहणेन भुञ्जन्ति, एवमेवैष प्रज्ञात्मा जीव एतैरादित्यादिगतैरात्मभिर्विषयान् भुङ्क्ते । ते ह्यादित्यादय आलोकदृष्ट्यादिना साचिव्यमाचरन्तो जीवात्मानं भोजयन्ति, जीवात्मानमपि यजमानं तदुत्सृष्टहविरादानादिनादित्यादयो भुञ्जन्ति, तस्माज्जीवात्मैव ब्रह्मणोऽभेदाद् ब्रह्मह वेदितव्यतयोपदिश्यते । यस्य वैतत् कर्मेति जीवप्रयुक्तानां देहेन्द्रियादीनां कर्म जीवस्य भवति । कर्मजन्यत्वाद्वा धर्माधर्मयोः कर्मशब्दवाच्यत्वं रूढ्यनुसारात् । तौ च धर्माधर्मो जीवस्य धर्माधर्माक्षिप्तत्वाच्चादित्यादीनां भोगोपकरणानां तेषु जीवस्य कर्तृत्वमुपपन्नम् । उपपन्नं च प्राणभृत्त्वाज्जीवस्य प्राणशब्दत्वम् । ये च प्रश्नप्रतिवचने क्वैष एतत् बालाके पुरुषोऽशयिष्ट यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यतीति । अनयोरपि न स्पष्टं ब्रह्माभिधानमुपलभ्यते । जीवव्यतिरेकश्च प्राणात्मनो हिरण्यगर्भस्याप्युपपद्यते, तस्माज्जीवप्रणयो-


भामती-व्याख्या

(बृह. उ. २।१।१५) । वह जब पुकारने पर नहीं उठा, तब अजातशत्रु ने अपनी यष्टि (छड़ी) के इशारे से उसे जगाकर उठाया। सुप्त पुरुष की इस उत्थापन प्रक्रिया से प्राणादि में अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व सूचित कर प्राणादि से भिन्न चेतन पुरुष (जीव) में भोक्तृत्व अवबोधित किया। पश्चाद्भावी उपसंहार-वाक्य में भी एक दृष्टान्त के द्वारा जीव का ज्ञान कराया गया—'तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्ति, एवमेवैष प्रज्ञात्मा एतैरात्मभिर्भुङ्क्ते एवमेवैते आत्मान एनमात्मानं भुञ्जन्ति' (कौ. ब्रा. ४।२०) अर्थात् जैसे कोई सेठ (मुखिया पुरुष) अपने भृत्यों के द्वारा उपहृत विषयों का उपभोग करता है। अथवा जैसे भृत्यगण अपने सेठ से वेतनादि लेकर सेठ का उपभोग करते हैं। उसी प्रकार यह प्रज्ञात्मा (जीव) भी इन आदित्यादि देवों की सहायता से शब्दादि विषयों का उपभोग करता है अथवा आदित्यादि देवगण जीवरूप यजमान के द्वारा त्यक्त हवि का उपभोग करते हैं। अतः जीवात्मा ही यहाँ ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण वेदितव्यतया उपदिष्ट है। 'यस्य वैतत् कर्म'—यहाँ 'कर्म' पद का अर्थ व्यापार या क्रिया ही है, इन्द्रियादि का कर्म जीव का ही समझा जाता है अथवा कर्म से जनित होने के कारण धर्म और अधर्म का 'कर्म' पद से ग्रहण किया गया है, क्योंकि 'कर्म' पद जिन यागादि कर्मों में रूढ है, धर्मादि उन कर्मों से अविनाभूत हैं। धर्मादि के द्वारा आदित्यादि देवों का भी जीव कर्त्ता माना जाता है। जीव प्राणभृत् होने के कारण प्राणपदास्पद भी हो जाता है। 'क्वैष एतद् बालाके ! पुरुषोऽशयिष्ट ?' 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यति' (कौ. ब्रा. ३।३) इत्यादि जो प्रश्न और उत्तररूप वाक्य हैं, उनका अभिधेय भी स्पष्टरूप से ब्रह्म नहीं प्रतीत होता। 'क्व' और 'एष'—इस प्रकार सप्तमी और प्रथमा विभक्ति के द्वारा जो जीव का अपने से भिन्न किसी आधार तत्त्व में अवस्थित होने का प्रश्न किया गया है, उससे भी ब्रह्मरूप आधार सिद्ध नहीं होता, क्योंकि 'प्राणे' इस सप्तम्यन्त पद से जिस हिरण्यगर्भात्मक प्राण तत्त्व

बालाकिसंवादे ब्रह्मवादः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५०१

एवं प्राप्ते ब्रूमः— परमेश्वर एवायमेतेषां पुरुषाणां कर्ता स्यात्। कस्मात्? उपक्रमसामर्थ्यात्। इह हि बालाकिरजातशत्रुणा सह 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' इति संवदितुमुपचक्रमे। स च कतिचिदादित्याद्यधिकरणान्पुरुषानमुख्यब्रह्मदृष्टिभाज उक्त्वा तूष्णीं बभूव। तमजातशत्रुः 'मृषा वै खलु मा संवदिष्ठाः ब्रह्म ते ब्रवाणि' इत्यमुख्यब्रह्मवादितयाऽपोद्य तत्कर्तारमन्यं वेदितव्यतयोपचिक्षेप। यदि सोऽप्यमुख्यब्रह्मदृष्टिभाक् स्यात्, उपक्रमो बाध्येत। तस्मात्परमेश्वर एवायं भवितुमर्हति। कर्तृत्वं

भामती

रन्यतर इह ग्राह्यो न परमेश्वर इति प्राप्तम्। एवं प्राप्ते उच्यते—

मृषावादिनमापोद्य बालाकिं ब्रह्मवादिनम्।
राजा कथमसम्बद्धं मिथ्या वा वक्तुमर्हति॥

यथा हि केनचिन्मणिलक्षणज्ञमानिना काचे मणिरेव वेदितव्य इत्युक्ते परस्य काचोऽयं मणिनं, तल्लक्षणायोगादित्यभिधाय आत्मनो विशेषं ज्ञापयितव्योऽन्तरत्वाभिधानमसम्बद्धम्। अमणौ मण्यभिधानं न पूर्ववादिनो विशेषमापादयति स्वयमपि मृषाभिधानात्। तस्मादनेनोत्तरवादिना पूर्ववादिनो विशेषमापादयता मणितत्त्वमेव वक्तव्यम्। एवमजातशत्रुणा दृप्तबालाकेरब्रह्मवादिनो विशेषमात्मनो दर्शयता जीवप्राणाभिधाने असम्बद्धमुक्तं स्यात्। तयोर्वाऽब्रह्मणोर्ब्रह्माभिधाने मिथ्याभिहितं स्यात्। तथा च न कश्चिद्विशेषो बालाकेर्गार्ग्यादजातशत्रोर्भवेत्। तस्मादनेन ब्रह्मतत्त्वमभिधातव्यं तथा सत्यस्य न मिथ्यावद्यम्। तस्माद् ब्रह्म ते ब्रवाणीति ब्रह्मणोऽपक्रमात्सर्वान् पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषाञ्च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेदेति च सति सम्भवे सर्वश्रुतेरसङ्कोचान्निरतिशयेन फलेनोपसंहाराद् ब्रह्मवेदनादन्यतश्च तदनुपपत्तेरादित्यादिपुरुषकर्तृत्वस्य च स्वातन्त्र्यलक्षणस्य मुख्यस्य ब्रह्मण एव सम्भवादन्वेषां हिरण्यगर्भादीनां तत्पारतन्त्र्यात् क्वैष एतद्बालाके इत्यादेर्जीवाधिकरणभवनापादानप्रश्नस्य यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन

भामती-व्याख्या

को आधार बताया गया है, उसमें जीव-व्यतिरेक (जीव का भेद) उपपन्न हो जाता है। फलतः जीव और प्राण—इन दो में से किसी एक का ही यहाँ ग्रहण करना चाहिए।

सिद्धान्त—

मृषावादिनमापोद्य बालाकिं ब्रह्मवादिनम्।
राजा कथमसम्बद्धं मिथ्या वा वक्तुमर्हति॥

जैसे कोई जौहरी का ढोंग बनाकर काच (शीशे) को मणि (हीरादि) कह रहा है। दूसरा व्यक्ति कहता है—"काचोऽयं मणिनं, तल्लक्षणायोगात्'। इस प्रकार सत्यवादी व्यक्ति का आगे चल कर अतत्त्वाभिधान करना सर्वथा असम्बद्धाभिधान है, क्योंकि अतत्त्वाभिधान करने पर पहले व्यक्ति से दूसरे का कोई अन्तर नहीं रहता, दोनों ही मृषावादी हैं, अतः इस दूसरे व्यक्ति को पहले व्यक्ति से अपना भेद सिद्ध करने के लिए यथार्थाभिधान ही करना होगा। प्रकृत में भी राजा अजातशत्रु को भी भ्रान्त एवं अब्रह्मवादी बालाकि से अपनी विशेषता जताने के लिए सत्य ब्रह्मतत्त्व का ही अभिधान करना होगा, जीव और प्राणरूप अब्रह्म में ब्रह्मत्वाभिधान करने पर असम्बद्धाभिधायी और मृषावादी ही समझा जायगा और बालाकि गार्ग्य से अजातशत्रु का कोई अन्तर.नहीं रह जाता। फलतः "ब्रह्म ते ब्रवाणि"—इस प्रकार उपक्रम के आधार पर "सर्वान् पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेद"—इस श्रुति के 'सर्व' शब्द का संकुचित अर्थ न करके सहज-सिद्ध अर्थ करना आवश्यक है। वैसा अर्थ करने पर निरतिशय फल की प्राप्ति में पर्यवसान होता है। यह सब कुछ ब्रह्म-ज्ञान से ही सम्भव हो सकता है, अन्य के ज्ञान से

५०२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. १६

चैतेषां पुरुषाणां न परमेश्वरादन्यस्य स्वातन्त्र्येणावकल्पते । 'यस्य वैतत्कर्म' इत्यपि नायं परिस्पन्दलक्षणस्य धर्मार्धर्मलक्षणस्य वा कर्मणो निर्देशः, तयोरन्यतरस्याप्य-

भामती

पश्यत्यस्मिन् प्राण एवैकधा भवति इत्यादेरुत्तरस्य च ब्रह्मण्येवोपपत्तेर्ब्रह्मविषयत्वं निश्चीयते । अथ कस्मान्न भवतो हिरण्यगर्भगोचरे एव प्रश्नोत्तरे तथा च नैताभ्यां ब्रह्मविषयत्वसिद्धिरित्येतन्निराचिकीर्षुः पठति ॐ एतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं प्रतिष्ठन्त इति ॐ । एतदुक्तं भवति — आत्मैव जीवप्राणादीनामधिकरणं नान्यदिति । यद्यपि च जीवो नात्मनो भिद्यते तथाप्युपाध्यवच्छिन्नस्य परमात्मनो जीवत्वेनोपाधिभेदाद् भेदमारोप्याधाराधेयभावो द्रष्टव्यः । एवं च जीवभवनाधारत्वमुपादानत्वं च परमात्मन उपपन्नम् । तदेवं बालाक्यजातशत्रुसंवादवाक्यसन्दर्भस्य ब्रह्मपरत्वे स्थिते यस्य वैतत्कर्मेति व्यापाराभिधाने न सङ्गच्छत इति कर्मशब्दः कार्याभिधायी भवति, एतदिति सर्वनामपरामृष्टं च तत्कार्यं, सर्वनाम चेदं सन्निहितपरामर्शि, न च किञ्चिदिह शब्दोक्तमस्ति सन्निहितम् । न चादित्यादिपुरुषाः सन्निहिता अपि परामर्शार्हा बहुत्वात् पुंलिङ्गत्वाच्च । एतदिति चैकस्य नपुंसकस्याभिधानादेतेषां पुरुषाणां कर्तृत्वेनेहैव गतार्थत्वाच्च । तस्मादशब्दोक्तमपि प्रत्यक्षसिद्धं सम्बन्धा दृष्ट्वा(?) सम्बन्धार्हं जगदेव पराम्रष्टव्यम् ।

भामती-व्याख्या

नहीं । आदित्य-पुरुषादि का कर्तृत्व, निरतिशय स्वातन्त्र्यादि मुख्य ब्रह्म में ही सम्भव हैं, हिरण्यगर्भादि में नहीं, क्योंकि उनमें ब्रह्माधीनत्व ही है, सर्वथा स्वाधीनत्व नहीं । 'क्ववैषः'— यह प्रश्न और "यदा सुप्तः न कञ्चन स्वप्नं पश्यति"—यह उत्तर भी ब्रह्म में ही उपपन्न होता है, अतः उक्त प्रश्न और उत्तर में ब्रह्मविषयकत्व ही निश्चित होता है । उक्त प्रश्न और उसके उत्तर-वाक्य को हिरण्यगर्भपरक क्यों न मान लिया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए श्रुति कहती है— "एतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते" (कौ. ब्रा. ३।२) । सारांश यह है कि जीव और प्राणादि का आधार आत्मा (ब्रह्म) ही है, अन्य नहीं । यद्यपि जीव आत्मा से भिन्न नहीं, तथापि उपाधि-विशेष से अवच्छिन्न परमात्मा को जीव माना गया है, अतः उपाधि-विशेष के भेद से आत्मा में भेद मान कर आधाराधेयभाव कहा गया है । इस प्रकार बालाकि और अजातशत्रु का संवाद ब्रह्मपरक है—ऐसा स्थिर हो जाने पर "यस्य वैतत् कर्म"—यहाँ 'कर्म' पद की व्यापार-वाचकता संगत नहीं होती, अतः 'कर्म' शब्द को कार्य (जन्य) अर्थ का बोधक माना जाता है । वह कार्य 'एतत्'—इस सर्वनाम पद से परामृष्ट है, यह सर्वनाम सदैव सन्निहितार्थ का परामर्शी होता है । यहाँ सन्निहित कोई पदार्थ किसी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं । आदित्यादि पुरुष सन्निहित होने पर भी परामर्श के योग्य नहीं, क्योंकि वे बहुत हैं और पुँल्लिङ्ग हैं, अतः उनका 'एतत्'—इस नपुंसक-एकवचन के द्वारा परामर्श क्योंकर होगा ? दूसरी बात यह भी है कि "एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता"—इस वाक्य से ही विवक्षित अर्थ की सिद्धि हो जाती है, 'एतत्' पद के द्वारा उनके परामर्श की आवश्यकता ही नहीं रह जाती । परिशेषतः शब्दानुक्त प्रत्यक्ष-सिद्ध अर्थ (जगत्) ही ऐतत् पद के द्वारा परामर्शीय है । [ 'शाब्दः शब्देनैवान्वेति'—इस नियम के अनुसार तदादि सर्वनाम पद भी किसी शाब्द अर्थ के ही परामर्शी होते हैं, अन्य प्रमाण से सिद्ध अर्थ के नहीं, अन्यथा जहाँ घट का प्रत्यक्ष हो रहा है, वहां 'घटोऽस्ति'—ऐसा न कह कर केवल 'अस्ति' कहना ही पर्याप्त होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष-सिद्ध घट के साथ 'अस्ति' पद के द्वारा उपस्थापित सत्ता का अन्वय हो ही जायगा; किन्तु ऐसा नहीं होता । वैसे ही 'एतत् कर्म'—यहाँ पर भी 'कर्म' पद से उपस्थापित कार्यत्व का अन्वय प्रत्यक्ष-सिद्ध जगत् के साथ नहीं हो सकता, किसी शब्द के द्वारा अभिहित जगत् का ही 'एतत्' पद के द्वारा परामर्श होगा,

बालाकिसंवादे ब्रह्मवादः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५०३

प्रकृतत्वात्, असंश्ब्दितत्वाच्च। नापि पुरुषाणामयं निर्देशः, एतेषां पुरुषाणां कर्तेत्येव तेषां निर्दिष्टत्वात्, लिङ्गवचनविगानाच्च। नापि पुरुषविषयस्य करोत्यर्थस्य क्रिया-फलस्य वाऽयं निर्देशः, कर्तृशब्देनैव तयोरुपात्तत्वात्। पारिशेष्यात्प्रत्यक्षसंनिहितं

भामती

एतदुक्तं भवति — अत्यल्पमिदमुच्यते एतेषामादित्यादिगतानां जगदेकदेशभूतानां कर्तेति, किन्तु कृत्स्नमेव जगदस्य कार्यमिति वाशब्देन सूच्यते। जीवप्राणशब्दौ च ब्रह्मपरौ जीवशब्दस्य ब्रह्मोपलक्षण-परत्वात् न पुनर्ब्रह्मशब्दो जीवोपलक्षणपरस्तथा सति हि बहुसमञ्जसं स्यादित्युक्तम्। न चानधिगतार्था-वबोधनस्वरसस्य शब्दस्याधिगतबोधनं युक्तम्। नाप्यनधिगतेनाधिगतोपलक्षणमुपपन्नम्। न च सम्भवत्ये-कवाक्यत्वे वाक्यभेदो न्याय्यः। वाक्यशेषानुरोधेन च जीवप्राणपरमात्मोपासनात्रयविधाने वाक्यत्रयं भवेत्, पौर्वापर्यपर्यालोचनया तु ब्रह्मोपासनपरत्वे एकवाक्यतैव। तस्मान्न जीवप्राणपरत्वमपि तु ब्रह्म-परत्वमेवेति सिद्धम्। स्यादेतत् — निर्दिश्यन्तां पुरुषाः कार्यास्तद्विषया तु कृतिर्निर्दिष्टा तत्फलं वा कार्य-

भामती-व्याख्या प्रत्यक्ष-सिद्ध का नहीं। किसी शब्द के द्वारा अनभिहित जगत् का कर्मता के साथ अन्वय क्योंकर होगा? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि तदादि सर्वनाम पदों की शक्ति बुद्धिविषयता-वच्छेदकोपलेखित पदार्थ में मानी जाती है, यह जगत् भी प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है, अतः बुद्धिस्थ वस्तु का 'एतत्' पद से परामर्श सम्भव हो जाता है, 'एतत्' शब्द के द्वारा परामृष्ट जगत् पदार्थ भी शाब्द होकर 'कर्म' शब्द से उपस्थापित कार्यता के साथ अन्वित हो जायगा]। "यस्य वा एतत्कर्म" यहाँ पर 'वा' शब्द के द्वारा यह ध्वनित किया गया है कि उस महान् ब्रह्म तत्त्व के लिए 'एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता'— ऐसा कहना तो बहुत थोड़ा है, ब्रह्म में उत्कर्षता का आधायक नहीं, क्योंकि जिस ब्रह्म का समस्त विश्व कार्य है, उसके लिए आदित्यादि पुरुषों की कर्तृता कौन-सी बड़ी बात है? 'जीव' और 'प्राण'— ये दोनों शब्द ब्रह्मपरक हैं। 'जीव' शब्द जैसे ब्रह्म का उपलक्षक है, वैसे 'ब्रह्म' शब्द जीव का उपलक्षक नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर वेदान्त-सिद्धान्त का बहुत-सा भाग असङ्गत हो जाता है, जैसे वेदान्त-वाक्यों का प्रामाण्य प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनधिगत अर्थ के अवबोधन में माना जाता है, जीव तो प्रत्यक्षतः अधिगत है, अतः जीवपरता में न तो वेदान्त-वाक्यों का प्रामाण्य बनता है और न अनधिगत ब्रह्म अधिगत जीव का उपलक्षक हो सकता है।

प्रकृत वेदान्त-वाक्यों की ब्रह्मपरता में एकवाक्यता बनी रहती किन्तु जीव, मुख्य प्राण और ब्रह्म— इन तीनों की उपासना का प्रतिपादन मानने पर तीन वाक्य पर्यवसित होते हैं, एकवाक्यता भङ्ग हो जाती है। पूर्वापर के वाक्यों की आलोचना से एक ब्रह्म की उपासना में तात्पर्य मानने पर एकवाक्यता सुरक्षित रहती है। अतः जीव और प्राण के प्रतिपादक वाक्यों का परम तात्पर्य ब्रह्म में ही स्थिर होता है— यह पहले "नोपासात्रैविध्या-दाश्रितत्त्वादिह तद्योगात्" (ब्र. सू. १।१।३१) इस सूत्र में कहा जा चुका है।

शङ्का— यह जो कहा गया कि "यस्य वा एतत् कर्म"— यहाँ 'कर्म' पद से व्यापार (क्रिया) का अभिधान करने पर पुनरुक्ति हो जाती है, क्योंकि "य एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता"— यहाँ कर्त्ता पद से भी क्रिया का प्रतिपादन होता है। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि (१) कार्य (घटादि जन्य पदार्थ), (२) कृति (भावना) और (३) कृति का फल (कार्य की उत्पत्ति) इन तीनों में से केवल कार्य का निर्देश "य एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता"— यहाँ पर किया गया है, कृति और कृति-फल दोनों का निर्देश नहीं किया गया, अतः "यस्य वैतत् कर्म"— यहाँ 'कर्म' पद से उन दोनों का भी निर्देश करने पर पुनरुक्ति क्यों होगी?