भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४९४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. १४

वेदान्ते सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सर्वात्मैकोऽद्वितीयः कारणत्वेन व्यपदिष्टस्तथाभूत एव वेदान्तान्तरेष्वपि व्यपदिश्यते । तद्यथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० २।१) इति । अत्र तावज्ज्ञानशब्दे परेण च तद्विशेषेण कामयितृत्ववचनेन चेतनं ब्रह्म न्यरूपयत्,

भामती

च्छक्यं वक्तुं देवदत्ताच्चक्रादि सम्भूतं तस्माच्चक्रादेः कुम्भादीति। शक्यञ्च देवदत्तात् कुम्भः समुद्भूतस्तस्मादुदकाहरणादीत्यादि । नह्यस्यासम्भवः सर्वत्रास्मिन् कार्य्यजाते क्रमवत्यपि देवदत्तस्य साक्षात्कर्त्तुरनुस्यूतत्वात्तथेहापि । यद्यप्याकाशादिक्रमेणैव सृष्टिरस्तथाप्याकाशानलानिलादौ तत्र तत्र साक्षात् परमेश्वरस्य कर्तृत्वान्नच्छक्यं वक्तुं परमेश्वरादाकाशः सम्भूत इति, शक्यं च वक्तुं परमेश्वरादनलः सम्भूत इत्यादि । यदि त्वाकाशाद्वायुर्वायोस्तेज इत्युक्त्वा तेजसो वायुर्वायोराकाश इति ब्रूयाद्भवद्विरोधो न चैतदस्ति । तस्मादभूषामविवादः श्रुतीनाम् । एवं 'स इमान् लोकानसृजत' इत्यक्रमाभिधायिन्यपि श्रुतिरविरुद्धा । एषा हि स्वव्यापारमभिधानक्रमेण कुर्वंती नाभिधेयानां क्रमं निरुणद्धि, ते तु यथाक्रमावस्थिता एवाक्रमेणोच्यन्ते । यथा क्रमवन्ति ज्ञानानि जानातीति । तदेवमविगानम् । अभ्युपेत्य तु विगानमुच्यते सृष्टौ खल्वेतद्विगानम् । स्रष्टा तु सर्ववेदान्तवाक्येष्वनुस्यूतः परमेश्वरः प्रतीयते नात्र श्रुतिविगानं मात्रयाप्यस्ति । न च सृष्टिविगानं स्रष्टरि तदधीननिरूपणे विगानमावहतीति वाच्यम्, नह्येष स्रष्टृत्वमात्रेणोच्यतेऽपि तु सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्यादिना रूपेणोच्यते स्रष्टा । तच्चास्य रूपं सर्ववेदान्तवाक्यानुगतम् । तज्ज्ञानं च

भामती-व्याख्या

है। इन सभी कार्यों के सम्पादन में देवदत्त कर्त्ता है, अतः यह कह सकते हैं कि देवदत्त से चक्रादि सामग्री और चक्रादि सामग्री से घट सम्भूत (उत्पन्न) हुआ एवं ऐसा भी कहा जा सकता है कि देवदत्त से घट उत्पन्न हुआ और घट से जलाहरण किया जाता है। ऐसा कहना असम्भव कदापि नहीं, क्योंकि समस्त क्रमिक कार्य-कलाप का साक्षात् कर्त्ता देवदत्त सर्वत्र अनुस्यूत है। वैसे ही यहाँ भी सभी प्रकार से कहा जा सकता है। यद्यपि सृष्टि सदैव आकाशादि-क्रम से होती है, तथापि आकाश, वायु और तेज आदि कार्यों का साक्षात् परमेश्वर ही कर्त्ता है, अतः यह कहा जा सकता है 'परमेश्वराद् आकाशः सम्भूतः', परमेश्वराद् वायुः सम्भूतः, परमेश्वरात् तेजः सम्भूतम्' । यदि आकाश से वायु और वायु से तेज संभूत हुआ-ऐसा कह कर तेज से वायु और वायु से आकाश संभूत हुआ-ऐसा कहा जाता, तब अवश्य विरोध उपस्थित होगा । किन्तु ऐसा कहीं नहीं कहा गया है, अतः इन श्रुतियों में किसी प्रकार का विरोध नहीं। इसी प्रकार 'स इमान् लोकानसृजत'—ऐसा उपक्रम कर सर्ग-प्रतिपादिका श्रुति विरुद्ध नहीं मानी जाती, क्योंकि यह श्रुति अभिधान-क्रम से अपना व्यापार करती हुई अभिज्ञान क्रम का विरोध कभी भी नहीं करती । अभिधेय पदार्थ तो यथाक्रम अवस्थित होकर युगपत् वैसे ही कहे जाते हैं, जैसे 'क्रमवन्ति ज्ञानानि जानाति' । इस प्रकार के प्रतिपादन को विगान कदापि नहीं कहा जा सकता ।

श्रुतियों के विगान (विरुद्धार्थ-प्रतिपादन) को स्वीकार कर लेने पर भी यह कहा जा सकता है कि यह विगान केवल सृष्टि के विषय में है, स्रष्टा आत्मा तो सभी वेदान्त-वाक्यों में अनुस्यूत परमेश्वर ही है। इसके विषय में श्रुतियों का किसी प्रकार का भी विवाद नहीं । यदि सृष्टि में विवाद या विगान है, तब सृष्टि के अधीन ही जिस स्रष्टा का निरूपण होता है, उस में विवाद क्यों न होगा ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि स्रष्टा परमेश्वर का निरूपण केवल सृष्टि के अधीन नहीं, क्योंकि तटस्थ लक्षण में सृष्टि की अपेक्षा होने पर भी स्वरूप लक्षण में उसकी कदापि अपेक्षा नहीं—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० २।१।१) इत्यादि वाक्यों के द्वारा स्वरूपतः परमेश्वर का निरूपण किया जाता है, सृष्टि के माध्यम से नहीं।