भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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सृष्टिभेदेऽपि स्रष्टुरभेदः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४९३

प्रसिद्धिभ्यां तु कारणान्तरपरिग्रहो न्याय्य इति ।
एवं प्राप्ते ब्रूमः—सत्यपि प्रतिवेदान्तं सृज्यमानेष्वाकाशादिषु क्रमाद्द्वारके विगाने न स्रष्टरि किंचिद्विगानमस्ति । कुतः ? यथाव्यपदिष्टोक्तेः यथाभूतो ह्येकस्मिन्


भामती

सदेव सोम्येदमग्र आसीदित्यादीनां कारणविषयाणामसद्वा इदमग्र आसीदित्यादिभिर्वाक्यैः कारण-विषयेविरोधः, कार्यविषयाणामपि विभिन्नक्रमाक्रमोत्पत्तिप्रतिपादकानां विरोधः । तथा कानिचिद-न्यकर्तृकां जगदुत्पत्तिमाचक्षते वाक्यानि, कानिचित् स्वयंकर्तृकाम् । सृष्ट्या च तत्कार्येण तत्कारणतया ब्रह्म लक्षितम् । सृष्टिविप्रतिपत्तौ तत्कारणतायां ब्रह्मलक्षणे विप्रतिपत्तौ सत्यां भवति तल्लक्ष्ये ब्रह्म-ण्यपि विप्रतिपत्तिः । तस्माद् ब्रह्मणि समन्वयाभावान्न समन्वयगम्यं ब्रह्म, वेदान्तास्तु कर्त्रादिप्रतिपादनेन कर्मविधिपरतयोपचरितार्था अविवक्षितार्था वा जपोपयोगिन इति प्राप्तम् । क्रमादीत्यादिग्रहणेनाक्रमो गृह्यते ।

एवं प्राप्त उच्यते —

सर्गक्रमविवादेऽपि न स स्रष्टरि विद्यते ।
सतस्त्वसद्ग्रहो भक्त्या निराकार्यतया क्वचित् ॥

न तावदस्ति सृष्टिकमे विगानं, श्रुतीनामविरोधात् । तथाहि—अनेक शिल्पपटुर्यवदातो देवदत्तः प्रथमं चक्रदण्डादि करोत्यथ तदुपकरणः कुंभं कुंभोपकरणस्त्वाहृत्येदकम्, उदकोपकरणश्च संयवनेन गोधूमकणिकानां करोति पिण्डं, पिण्डोपकरणस्तु पचति घृतपूर्ण, तवस्य देवदत्तस्य सर्वत्रैतस्मिन् कर्तृत्वा-


भामती-व्याख्या

कारणविषयक और कार्यविषयक वाक्यों का परस्पर-विरोध है, जैसे कि “सदेव सोम्य ! इदमग्र आसीत्” (छां. ६।२।१) और “असद्वा इदमग्र आसीत्” (तं. २।७) इत्यादि वाक्य 'सत्' और 'असत्' कारण के प्रतिपादक होने से परस्पर-विरुद्ध हैं। इसी प्रकार कार्य (सृष्टि) के प्रतिपादक वाक्यों की भी एकवाक्यता नहीं, क्योंकि “कुतस्तु खलु सोम्येवं स्यात्” (छां. ६।२।२) इत्यादि वाक्य जगत् को अन्यकर्तृक और “तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्, तन्नाम-रूपाभ्यां व्याक्रियते” (बृह. उ. १।४।७) इत्यादि वाक्य जगत् को स्वयंकर्तृक कहते हैं। सृष्टि का क्रम भी विविधरूप में अभिहित है। इसी सृष्टि के द्वारा ब्रह्म का तटस्थ लक्षण किया गया है—“जन्माद्यस्य यतः” (ब्र. सू. १।१।२)। सृष्टि में विप्रतिपत्ति होने पर सृष्टिकारणत्व-रूप ब्रह्म-लक्षण में विप्रतिपत्ति और विप्रतिपन्न लक्षण के द्वारा ब्रह्मरूप लक्ष्यार्थ में भी विप्रतिपत्ति हो जाती है। जब ब्रह्म में वेदांत-वाक्यों का समन्वय नहीं होता, तब समन्वय-गम्य ब्रह्म क्योंकर होगा ? वेदान्त-वाक्यों का सार्थक्य तो कर्मकाण्ड में अपेक्षित कर्त्ता-भोक्तारूप जीवात्मा का प्रतिपादन कर कर्म-विधिपरता में अथवा जप की उपयोगिता में हो जाता है। “क्रमादिवैचित्र्यात्” इस भाष्य में आदि' पद के द्वारा अक्रम (यौगपद्य) का ग्रहण किया जाता है।

समाधान —

सर्गक्रमविवादेऽपि न स स्रष्टरि विद्यते ।
सतस्त्वसद्ग्रहो भक्त्या निराकार्यतया क्वचित् ॥

सृष्टि-क्रम में किसी प्रकार का विगान (विरोध) नहीं, क्योंकि सभी श्रुतियाँ अविरु-द्धार्थक हैं। जैसे कि अनेक शिल्पों में कुशल देवदत्त भी पहले दण्ड-चक्रादि साधन पदार्थों का संग्रह करता है, उस सामग्री की सहायता से घट का निर्माण करता है, घट में जल भर लाता है, जल से गेहूँ का आटा गून्ध कर पूड़ी के पेड़े बनाता है, उन्हें बेल कर घी में पूड़ियाँ छानता

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