भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४९२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १४ |
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तत्रेदमपरमाशङ्क्यते—न जन्मादिकारणत्वं ब्रह्मणो ब्रह्मविषयं वा गतिसामान्यं वेदान्तवाक्यानां प्रतिपत्तुं शक्यम् । कस्मात् ? विगानदर्शनात् । प्रतिवेदान्तं ह्यन्यान्या सृष्टिरुपलभ्यते, क्रमादिवैचित्र्यात् । तथा हि—क्वचित् , आत्मन आकाशः संभूतः' ( तै० २।१ ) इत्याकाशादिका सृष्टिराम्नायते । क्वचित्तेज आदिका—'तत्तेजोऽसृजत' इति । क्वचित्प्राणादिका—'स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम्' ( प्र० ६।४ ) इति क्वचिदक्रमेणैव लोकानामुत्पत्तिराम्नायते—'स इमाँल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मर- मापः' ( ऐ० उ० ४।१।२ ) इति । तथा क्वचिदसत्पूर्विका सृष्टिः पठ्यते—'असद्वा इदमग्र आसीत्ततो वै सद्जायत' ( तै० २।७ ) इति । 'असदेवेदमग्र आसीत्तत्सदासी- त्सत्समभवत्' ( छा० ३।१९।१ ) इति च । क्वचिदसद्वादनिनिराकरणेन सत्पूर्विका प्रक्रिया प्रतिज्ञायते—'तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत्' इत्युपक्रम्य 'कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत्' ( छा० ६।२।१,२ ) इति । क्वचित् स्वयंकर्तृकैव व्याक्रिया जगतो निगद्यते—'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्ना- मरूपाभ्यामेव व्याक्रियत' ( बृ० १।४।७ ) इति । एवमनेकधा विप्रतिपत्तेर्वस्तुनि च विकल्पस्यानुपपत्तेर्न वेदान्तवाक्यानां जगत्कारणावधारणपरता न्याय्या । स्मृतिन्याय-
भामती
सविरोधे ब्रह्मणि जगद्योनौ न समन्वयः सेद्धुमर्हति । तथा च न जगत्कारणत्वं ब्रह्मणो लक्षणं, न च तत्र गतिसामान्यम्, न च तत्सिद्धये प्रधानस्याशब्दत्वप्रतिपादनं, तस्माद्वाक्यानां विरोधाविरोधाभ्यामुक्ता- क्षेपसमाधानाभ्यां समन्वय एवोपपाद्यत इति समन्वय लक्षणे सङ्गतमिदमधिकरणम् ।
वाक्यानां कारणे कार्ये परस्परविरोधतः ।
समन्वयो जगद्योनौ न सिध्यति परात्मनि ॥
भामती-व्याख्या
साथ इस अधिकरण की संगति क्या ? विरोधाविरोध-चिन्ता के लिए तो द्वितीय अविरोधा- ध्याय की रचना की गई है। उस शङ्का का निराकरण किया गया है—'प्रतिपादितं ब्रह्मणो लक्षणमित्यादि'। आशय यह है कि अविरोध लक्षण (द्वितीयाध्याय) का प्रयोजन यह है कि अनेक शाखाओं या एक शाखा के सम्बन्धित वाक्यों की आलोचना से अधिगत वाक्यार्थ पर प्रमाणान्तरों के द्वारा उद्भावित विरोध के माध्यम से जो प्रकृत वाक्यार्थ-ज्ञान में अप्रामाण्य की शङ्का की जाती है, उसका परिहार करते हुए प्रामाण्य व्यवस्थापित करना। वहाँ सृष्टि- विषयक वाक्यों का जो परस्पर-अविरोध प्रतिपादित है वह केवल आनुषङ्गिक है, अविरोधा- ध्याय का मुख्य प्रतिपाद्य नहीं। किन्तु यहाँ सृष्टि-प्रतिपादक वाक्यों का परस्पर-विरोध होने पर सभी वाक्यों का एक ब्रह्म में समन्वय नहीं सिद्ध होता और ब्रह्म में जगत् की कारणता पर्यवसित नहीं होती। ब्रह्म-लक्षण की अनुपपत्ति के साथ-साथ गति-सामान्य [ सभी वेदान्त- वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय ] एवं सांख्याभिमत प्रधानगत अशाब्दता की सिद्धि भी नहीं होती। फलतः वाक्यों के विरोधाविरोध या आक्षेप-समाधान की शैली अपना कर समन्वयरूप मुख्य प्रयोजन की जो सिद्धि की जाती है, वह सर्वथा प्रथम (समन्वय) अध्याय से संगत है।
संशय—परस्पर-विरोधी सृष्टि-वाक्यों का जगतकारणीभूत ब्रह्म में समन्वय हो सकता है? अथवा नहीं ?
पूर्वपक्ष—
वाक्यानां कारणे कार्ये परस्परविरोधतः ।
समन्वयो जगद्योनौ न सिध्यति परात्मनि ॥