भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 520, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १६ |
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चैतेषां पुरुषाणां न परमेश्वरादन्यस्य स्वातन्त्र्येणावकल्पते । 'यस्य वैतत्कर्म' इत्यपि नायं परिस्पन्दलक्षणस्य धर्मार्धर्मलक्षणस्य वा कर्मणो निर्देशः, तयोरन्यतरस्याप्य-
भामती
पश्यत्यस्मिन् प्राण एवैकधा भवति इत्यादेरुत्तरस्य च ब्रह्मण्येवोपपत्तेर्ब्रह्मविषयत्वं निश्चीयते । अथ कस्मान्न भवतो हिरण्यगर्भगोचरे एव प्रश्नोत्तरे तथा च नैताभ्यां ब्रह्मविषयत्वसिद्धिरित्येतन्निराचिकीर्षुः पठति ॐ एतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं प्रतिष्ठन्त इति ॐ । एतदुक्तं भवति — आत्मैव जीवप्राणादीनामधिकरणं नान्यदिति । यद्यपि च जीवो नात्मनो भिद्यते तथाप्युपाध्यवच्छिन्नस्य परमात्मनो जीवत्वेनोपाधिभेदाद् भेदमारोप्याधाराधेयभावो द्रष्टव्यः । एवं च जीवभवनाधारत्वमुपादानत्वं च परमात्मन उपपन्नम् । तदेवं बालाक्यजातशत्रुसंवादवाक्यसन्दर्भस्य ब्रह्मपरत्वे स्थिते यस्य वैतत्कर्मेति व्यापाराभिधाने न सङ्गच्छत इति कर्मशब्दः कार्याभिधायी भवति, एतदिति सर्वनामपरामृष्टं च तत्कार्यं, सर्वनाम चेदं सन्निहितपरामर्शि, न च किञ्चिदिह शब्दोक्तमस्ति सन्निहितम् । न चादित्यादिपुरुषाः सन्निहिता अपि परामर्शार्हा बहुत्वात् पुंलिङ्गत्वाच्च । एतदिति चैकस्य नपुंसकस्याभिधानादेतेषां पुरुषाणां कर्तृत्वेनेहैव गतार्थत्वाच्च । तस्मादशब्दोक्तमपि प्रत्यक्षसिद्धं सम्बन्धा दृष्ट्वा(?) सम्बन्धार्हं जगदेव पराम्रष्टव्यम् ।
भामती-व्याख्या
नहीं । आदित्य-पुरुषादि का कर्तृत्व, निरतिशय स्वातन्त्र्यादि मुख्य ब्रह्म में ही सम्भव हैं, हिरण्यगर्भादि में नहीं, क्योंकि उनमें ब्रह्माधीनत्व ही है, सर्वथा स्वाधीनत्व नहीं । 'क्ववैषः'— यह प्रश्न और "यदा सुप्तः न कञ्चन स्वप्नं पश्यति"—यह उत्तर भी ब्रह्म में ही उपपन्न होता है, अतः उक्त प्रश्न और उत्तर में ब्रह्मविषयकत्व ही निश्चित होता है । उक्त प्रश्न और उसके उत्तर-वाक्य को हिरण्यगर्भपरक क्यों न मान लिया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए श्रुति कहती है— "एतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते" (कौ. ब्रा. ३।२) । सारांश यह है कि जीव और प्राणादि का आधार आत्मा (ब्रह्म) ही है, अन्य नहीं । यद्यपि जीव आत्मा से भिन्न नहीं, तथापि उपाधि-विशेष से अवच्छिन्न परमात्मा को जीव माना गया है, अतः उपाधि-विशेष के भेद से आत्मा में भेद मान कर आधाराधेयभाव कहा गया है । इस प्रकार बालाकि और अजातशत्रु का संवाद ब्रह्मपरक है—ऐसा स्थिर हो जाने पर "यस्य वैतत् कर्म"—यहाँ 'कर्म' पद की व्यापार-वाचकता संगत नहीं होती, अतः 'कर्म' शब्द को कार्य (जन्य) अर्थ का बोधक माना जाता है । वह कार्य 'एतत्'—इस सर्वनाम पद से परामृष्ट है, यह सर्वनाम सदैव सन्निहितार्थ का परामर्शी होता है । यहाँ सन्निहित कोई पदार्थ किसी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं । आदित्यादि पुरुष सन्निहित होने पर भी परामर्श के योग्य नहीं, क्योंकि वे बहुत हैं और पुँल्लिङ्ग हैं, अतः उनका 'एतत्'—इस नपुंसक-एकवचन के द्वारा परामर्श क्योंकर होगा ? दूसरी बात यह भी है कि "एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता"—इस वाक्य से ही विवक्षित अर्थ की सिद्धि हो जाती है, 'एतत्' पद के द्वारा उनके परामर्श की आवश्यकता ही नहीं रह जाती । परिशेषतः शब्दानुक्त प्रत्यक्ष-सिद्ध अर्थ (जगत्) ही ऐतत् पद के द्वारा परामर्शीय है । [ 'शाब्दः शब्देनैवान्वेति'—इस नियम के अनुसार तदादि सर्वनाम पद भी किसी शाब्द अर्थ के ही परामर्शी होते हैं, अन्य प्रमाण से सिद्ध अर्थ के नहीं, अन्यथा जहाँ घट का प्रत्यक्ष हो रहा है, वहां 'घटोऽस्ति'—ऐसा न कह कर केवल 'अस्ति' कहना ही पर्याप्त होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष-सिद्ध घट के साथ 'अस्ति' पद के द्वारा उपस्थापित सत्ता का अन्वय हो ही जायगा; किन्तु ऐसा नहीं होता । वैसे ही 'एतत् कर्म'—यहाँ पर भी 'कर्म' पद से उपस्थापित कार्यत्व का अन्वय प्रत्यक्ष-सिद्ध जगत् के साथ नहीं हो सकता, किसी शब्द के द्वारा अभिहित जगत् का ही 'एतत्' पद के द्वारा परामर्श होगा,