भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालाकिसंवादे ब्रह्मवादः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५०१
एवं प्राप्ते ब्रूमः— परमेश्वर एवायमेतेषां पुरुषाणां कर्ता स्यात्। कस्मात्? उपक्रमसामर्थ्यात्। इह हि बालाकिरजातशत्रुणा सह 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' इति संवदितुमुपचक्रमे। स च कतिचिदादित्याद्यधिकरणान्पुरुषानमुख्यब्रह्मदृष्टिभाज उक्त्वा तूष्णीं बभूव। तमजातशत्रुः 'मृषा वै खलु मा संवदिष्ठाः ब्रह्म ते ब्रवाणि' इत्यमुख्यब्रह्मवादितयाऽपोद्य तत्कर्तारमन्यं वेदितव्यतयोपचिक्षेप। यदि सोऽप्यमुख्यब्रह्मदृष्टिभाक् स्यात्, उपक्रमो बाध्येत। तस्मात्परमेश्वर एवायं भवितुमर्हति। कर्तृत्वं
भामती
रन्यतर इह ग्राह्यो न परमेश्वर इति प्राप्तम्। एवं प्राप्ते उच्यते—
मृषावादिनमापोद्य बालाकिं ब्रह्मवादिनम्।
राजा कथमसम्बद्धं मिथ्या वा वक्तुमर्हति॥
यथा हि केनचिन्मणिलक्षणज्ञमानिना काचे मणिरेव वेदितव्य इत्युक्ते परस्य काचोऽयं मणिनं, तल्लक्षणायोगादित्यभिधाय आत्मनो विशेषं ज्ञापयितव्योऽन्तरत्वाभिधानमसम्बद्धम्। अमणौ मण्यभिधानं न पूर्ववादिनो विशेषमापादयति स्वयमपि मृषाभिधानात्। तस्मादनेनोत्तरवादिना पूर्ववादिनो विशेषमापादयता मणितत्त्वमेव वक्तव्यम्। एवमजातशत्रुणा दृप्तबालाकेरब्रह्मवादिनो विशेषमात्मनो दर्शयता जीवप्राणाभिधाने असम्बद्धमुक्तं स्यात्। तयोर्वाऽब्रह्मणोर्ब्रह्माभिधाने मिथ्याभिहितं स्यात्। तथा च न कश्चिद्विशेषो बालाकेर्गार्ग्यादजातशत्रोर्भवेत्। तस्मादनेन ब्रह्मतत्त्वमभिधातव्यं तथा सत्यस्य न मिथ्यावद्यम्। तस्माद् ब्रह्म ते ब्रवाणीति ब्रह्मणोऽपक्रमात्सर्वान् पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषाञ्च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेदेति च सति सम्भवे सर्वश्रुतेरसङ्कोचान्निरतिशयेन फलेनोपसंहाराद् ब्रह्मवेदनादन्यतश्च तदनुपपत्तेरादित्यादिपुरुषकर्तृत्वस्य च स्वातन्त्र्यलक्षणस्य मुख्यस्य ब्रह्मण एव सम्भवादन्वेषां हिरण्यगर्भादीनां तत्पारतन्त्र्यात् क्वैष एतद्बालाके इत्यादेर्जीवाधिकरणभवनापादानप्रश्नस्य यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन
भामती-व्याख्या
को आधार बताया गया है, उसमें जीव-व्यतिरेक (जीव का भेद) उपपन्न हो जाता है। फलतः जीव और प्राण—इन दो में से किसी एक का ही यहाँ ग्रहण करना चाहिए।
सिद्धान्त—
मृषावादिनमापोद्य बालाकिं ब्रह्मवादिनम्।
राजा कथमसम्बद्धं मिथ्या वा वक्तुमर्हति॥
जैसे कोई जौहरी का ढोंग बनाकर काच (शीशे) को मणि (हीरादि) कह रहा है। दूसरा व्यक्ति कहता है—"काचोऽयं मणिनं, तल्लक्षणायोगात्'। इस प्रकार सत्यवादी व्यक्ति का आगे चल कर अतत्त्वाभिधान करना सर्वथा असम्बद्धाभिधान है, क्योंकि अतत्त्वाभिधान करने पर पहले व्यक्ति से दूसरे का कोई अन्तर नहीं रहता, दोनों ही मृषावादी हैं, अतः इस दूसरे व्यक्ति को पहले व्यक्ति से अपना भेद सिद्ध करने के लिए यथार्थाभिधान ही करना होगा। प्रकृत में भी राजा अजातशत्रु को भी भ्रान्त एवं अब्रह्मवादी बालाकि से अपनी विशेषता जताने के लिए सत्य ब्रह्मतत्त्व का ही अभिधान करना होगा, जीव और प्राणरूप अब्रह्म में ब्रह्मत्वाभिधान करने पर असम्बद्धाभिधायी और मृषावादी ही समझा जायगा और बालाकि गार्ग्य से अजातशत्रु का कोई अन्तर.नहीं रह जाता। फलतः "ब्रह्म ते ब्रवाणि"—इस प्रकार उपक्रम के आधार पर "सर्वान् पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेद"—इस श्रुति के 'सर्व' शब्द का संकुचित अर्थ न करके सहज-सिद्ध अर्थ करना आवश्यक है। वैसा अर्थ करने पर निरतिशय फल की प्राप्ति में पर्यवसान होता है। यह सब कुछ ब्रह्म-ज्ञान से ही सम्भव हो सकता है, अन्य के ज्ञान से