भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. १६
भोक्तारं प्रतिबोधयति । तथा परस्तादपि जीवलिङ्गमवगम्यते—'तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते एवमेवैत आत्मान एतमात्मानं भुञ्जन्ति (कौ० ब्रा० ४।२०) इति । प्राणभृत्त्वाच्च जीवस्योपपन्नं प्राणशब्दत्वम् । तस्माज्जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर इह ग्रहणीयो न परमेश्वरः, तल्लिङ्गानवगमादिति ।
भामती
व्यतिरिक्तं जीवं भोक्तारं स्वामिनं प्रतिबोधयति परस्तादपि तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्ति एवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते एवमेते आत्मान एनमात्मानं भुञ्जन्तीति श्रवणात् । यथा श्रेष्ठी प्रधानः पुरुषः स्वैर्भृत्यैः करणभूतैर्विषयान् भुङ्क्ते यथा वा स्वा भृत्याः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्ति, ते हि श्रेष्ठिनमशनाच्छादनादिग्रहणेन भुञ्जन्ति, एवमेवैष प्रज्ञात्मा जीव एतैरादित्यादिगतैरात्मभिर्विषयान् भुङ्क्ते । ते ह्यादित्यादय आलोकदृष्ट्यादिना साचिव्यमाचरन्तो जीवात्मानं भोजयन्ति, जीवात्मानमपि यजमानं तदुत्सृष्टहविरादानादिनादित्यादयो भुञ्जन्ति, तस्माज्जीवात्मैव ब्रह्मणोऽभेदाद् ब्रह्मह वेदितव्यतयोपदिश्यते । यस्य वैतत् कर्मेति जीवप्रयुक्तानां देहेन्द्रियादीनां कर्म जीवस्य भवति । कर्मजन्यत्वाद्वा धर्माधर्मयोः कर्मशब्दवाच्यत्वं रूढ्यनुसारात् । तौ च धर्माधर्मो जीवस्य धर्माधर्माक्षिप्तत्वाच्चादित्यादीनां भोगोपकरणानां तेषु जीवस्य कर्तृत्वमुपपन्नम् । उपपन्नं च प्राणभृत्त्वाज्जीवस्य प्राणशब्दत्वम् । ये च प्रश्नप्रतिवचने क्वैष एतत् बालाके पुरुषोऽशयिष्ट यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यतीति । अनयोरपि न स्पष्टं ब्रह्माभिधानमुपलभ्यते । जीवव्यतिरेकश्च प्राणात्मनो हिरण्यगर्भस्याप्युपपद्यते, तस्माज्जीवप्रणयो-
भामती-व्याख्या
(बृह. उ. २।१।१५) । वह जब पुकारने पर नहीं उठा, तब अजातशत्रु ने अपनी यष्टि (छड़ी) के इशारे से उसे जगाकर उठाया। सुप्त पुरुष की इस उत्थापन प्रक्रिया से प्राणादि में अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व सूचित कर प्राणादि से भिन्न चेतन पुरुष (जीव) में भोक्तृत्व अवबोधित किया। पश्चाद्भावी उपसंहार-वाक्य में भी एक दृष्टान्त के द्वारा जीव का ज्ञान कराया गया—'तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्ति, एवमेवैष प्रज्ञात्मा एतैरात्मभिर्भुङ्क्ते एवमेवैते आत्मान एनमात्मानं भुञ्जन्ति' (कौ. ब्रा. ४।२०) अर्थात् जैसे कोई सेठ (मुखिया पुरुष) अपने भृत्यों के द्वारा उपहृत विषयों का उपभोग करता है। अथवा जैसे भृत्यगण अपने सेठ से वेतनादि लेकर सेठ का उपभोग करते हैं। उसी प्रकार यह प्रज्ञात्मा (जीव) भी इन आदित्यादि देवों की सहायता से शब्दादि विषयों का उपभोग करता है अथवा आदित्यादि देवगण जीवरूप यजमान के द्वारा त्यक्त हवि का उपभोग करते हैं। अतः जीवात्मा ही यहाँ ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण वेदितव्यतया उपदिष्ट है। 'यस्य वैतत् कर्म'—यहाँ 'कर्म' पद का अर्थ व्यापार या क्रिया ही है, इन्द्रियादि का कर्म जीव का ही समझा जाता है अथवा कर्म से जनित होने के कारण धर्म और अधर्म का 'कर्म' पद से ग्रहण किया गया है, क्योंकि 'कर्म' पद जिन यागादि कर्मों में रूढ है, धर्मादि उन कर्मों से अविनाभूत हैं। धर्मादि के द्वारा आदित्यादि देवों का भी जीव कर्त्ता माना जाता है। जीव प्राणभृत् होने के कारण प्राणपदास्पद भी हो जाता है। 'क्वैष एतद् बालाके ! पुरुषोऽशयिष्ट ?' 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यति' (कौ. ब्रा. ३।३) इत्यादि जो प्रश्न और उत्तररूप वाक्य हैं, उनका अभिधेय भी स्पष्टरूप से ब्रह्म नहीं प्रतीत होता। 'क्व' और 'एष'—इस प्रकार सप्तमी और प्रथमा विभक्ति के द्वारा जो जीव का अपने से भिन्न किसी आधार तत्त्व में अवस्थित होने का प्रश्न किया गया है, उससे भी ब्रह्मरूप आधार सिद्ध नहीं होता, क्योंकि 'प्राणे' इस सप्तम्यन्त पद से जिस हिरण्यगर्भात्मक प्राण तत्त्व