भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबालाकिसंवादे ब्रह्मवादः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५०३
प्रकृतत्वात्, असंश्ब्दितत्वाच्च। नापि पुरुषाणामयं निर्देशः, एतेषां पुरुषाणां कर्तेत्येव तेषां निर्दिष्टत्वात्, लिङ्गवचनविगानाच्च। नापि पुरुषविषयस्य करोत्यर्थस्य क्रिया-फलस्य वाऽयं निर्देशः, कर्तृशब्देनैव तयोरुपात्तत्वात्। पारिशेष्यात्प्रत्यक्षसंनिहितं
भामती
एतदुक्तं भवति — अत्यल्पमिदमुच्यते एतेषामादित्यादिगतानां जगदेकदेशभूतानां कर्तेति, किन्तु कृत्स्नमेव जगदस्य कार्यमिति वाशब्देन सूच्यते। जीवप्राणशब्दौ च ब्रह्मपरौ जीवशब्दस्य ब्रह्मोपलक्षण-परत्वात् न पुनर्ब्रह्मशब्दो जीवोपलक्षणपरस्तथा सति हि बहुसमञ्जसं स्यादित्युक्तम्। न चानधिगतार्था-वबोधनस्वरसस्य शब्दस्याधिगतबोधनं युक्तम्। नाप्यनधिगतेनाधिगतोपलक्षणमुपपन्नम्। न च सम्भवत्ये-कवाक्यत्वे वाक्यभेदो न्याय्यः। वाक्यशेषानुरोधेन च जीवप्राणपरमात्मोपासनात्रयविधाने वाक्यत्रयं भवेत्, पौर्वापर्यपर्यालोचनया तु ब्रह्मोपासनपरत्वे एकवाक्यतैव। तस्मान्न जीवप्राणपरत्वमपि तु ब्रह्म-परत्वमेवेति सिद्धम्। स्यादेतत् — निर्दिश्यन्तां पुरुषाः कार्यास्तद्विषया तु कृतिर्निर्दिष्टा तत्फलं वा कार्य-
भामती-व्याख्या प्रत्यक्ष-सिद्ध का नहीं। किसी शब्द के द्वारा अनभिहित जगत् का कर्मता के साथ अन्वय क्योंकर होगा? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि तदादि सर्वनाम पदों की शक्ति बुद्धिविषयता-वच्छेदकोपलेखित पदार्थ में मानी जाती है, यह जगत् भी प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है, अतः बुद्धिस्थ वस्तु का 'एतत्' पद से परामर्श सम्भव हो जाता है, 'एतत्' शब्द के द्वारा परामृष्ट जगत् पदार्थ भी शाब्द होकर 'कर्म' शब्द से उपस्थापित कार्यता के साथ अन्वित हो जायगा]। "यस्य वा एतत्कर्म" यहाँ पर 'वा' शब्द के द्वारा यह ध्वनित किया गया है कि उस महान् ब्रह्म तत्त्व के लिए 'एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता'— ऐसा कहना तो बहुत थोड़ा है, ब्रह्म में उत्कर्षता का आधायक नहीं, क्योंकि जिस ब्रह्म का समस्त विश्व कार्य है, उसके लिए आदित्यादि पुरुषों की कर्तृता कौन-सी बड़ी बात है? 'जीव' और 'प्राण'— ये दोनों शब्द ब्रह्मपरक हैं। 'जीव' शब्द जैसे ब्रह्म का उपलक्षक है, वैसे 'ब्रह्म' शब्द जीव का उपलक्षक नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर वेदान्त-सिद्धान्त का बहुत-सा भाग असङ्गत हो जाता है, जैसे वेदान्त-वाक्यों का प्रामाण्य प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनधिगत अर्थ के अवबोधन में माना जाता है, जीव तो प्रत्यक्षतः अधिगत है, अतः जीवपरता में न तो वेदान्त-वाक्यों का प्रामाण्य बनता है और न अनधिगत ब्रह्म अधिगत जीव का उपलक्षक हो सकता है।
प्रकृत वेदान्त-वाक्यों की ब्रह्मपरता में एकवाक्यता बनी रहती किन्तु जीव, मुख्य प्राण और ब्रह्म— इन तीनों की उपासना का प्रतिपादन मानने पर तीन वाक्य पर्यवसित होते हैं, एकवाक्यता भङ्ग हो जाती है। पूर्वापर के वाक्यों की आलोचना से एक ब्रह्म की उपासना में तात्पर्य मानने पर एकवाक्यता सुरक्षित रहती है। अतः जीव और प्राण के प्रतिपादक वाक्यों का परम तात्पर्य ब्रह्म में ही स्थिर होता है— यह पहले "नोपासात्रैविध्या-दाश्रितत्त्वादिह तद्योगात्" (ब्र. सू. १।१।३१) इस सूत्र में कहा जा चुका है।
शङ्का— यह जो कहा गया कि "यस्य वा एतत् कर्म"— यहाँ 'कर्म' पद से व्यापार (क्रिया) का अभिधान करने पर पुनरुक्ति हो जाती है, क्योंकि "य एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता"— यहाँ कर्त्ता पद से भी क्रिया का प्रतिपादन होता है। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि (१) कार्य (घटादि जन्य पदार्थ), (२) कृति (भावना) और (३) कृति का फल (कार्य की उत्पत्ति) इन तीनों में से केवल कार्य का निर्देश "य एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता"— यहाँ पर किया गया है, कृति और कृति-फल दोनों का निर्देश नहीं किया गया, अतः "यस्य वैतत् कर्म"— यहाँ 'कर्म' पद से उन दोनों का भी निर्देश करने पर पुनरुक्ति क्यों होगी?