भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४९८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १६

( ५ बालाक्यधिकरणम् । सू० १६-१८ )

जगद्वाचित्वात् ॥ १६ ॥

कौषीतकिब्राह्मणे बालाक्यजातशत्रुसंवादे श्रूयते—'यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः' (कौ० ब्रा० ४।१९) इति । तत्र किं जीवो वेदितव्यत्वेनोपदिश्यते, उत मुख्यः प्राणः, उत परमात्मेति विशयः । किं तावत्प्राप्तम् ? प्राण इति । कुतः ? 'यस्य वैतत्कर्म' इति श्रवणात्, परिस्प-

भामती

ननु ब्रह्म ते ब्रवाणीति ब्रह्माभिधानप्रकरणादुपसंहारे च सर्वान् पाप्मनोऽपहृत्य सर्वेषाञ्च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेदेति निरतिशयफलश्रवणाद् ब्रह्मवेदनादन्यस्य तदसम्भवात् । आदित्यचन्द्रादिगतपुरुषकर्तृत्वस्य च यस्य वैतत्कर्मेति च स्यात्सत्यवच्छेदे सर्वनाम्ना प्रत्यक्षसिद्धस्य जगतः परामर्शन जगत्कर्तृत्वस्य च ब्रह्मणोऽन्यत्रासम्भवात्कथं जीवमुख्यप्राणाशङ्का ? उच्यते—ब्रह्म ते ब्रवाणीति बलाकिना गार्ग्यण ब्रह्माभिधानं प्रतिज्ञाय तत्तदादित्यादिगताब्रह्मपुरुषाभिधानेन न तावद् ब्रह्मोक्तम् । यस्य चाजातशत्रोर्यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता यस्य वैतत् कर्मेति वाक्यं न तेन ब्रह्माभिधानं प्रतिज्ञातम् । न चान्यदीयेनोपक्रमेणान्यस्य वाक्यं शक्यं नियन्तुम् । तस्मादजातशत्रोर्वाक्यसन्दर्भपौर्वापर्यालोचनया योऽस्यार्थः प्रतिभाति, स एव ग्राह्यः । अत्र च कर्मशब्दस्तावद् व्यापारे निरूढ-

भामती-व्याख्या

विषय—कौषीतकी ब्राह्मणगत बालाकि और अजातशत्रु के संवाद में आया है—"यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता, यस्य वैतत् कर्म, स वै वेदितव्यः" ( कौ. ब्रा. ४।१९ ) इस वाक्य का अर्थ विचारणीय है ।

संशय—उक्त श्रुति में कथित कर्त्ता प्राण है ? या जीव ? अथवा परमात्मा ?

शङ्का—"ब्रह्म ते ब्रवाणि" ( बृह. उ. २।१।१ ) यह प्रकरण-ब्रह्माभिधान का है, उपसंहार में भी कहा गया है—"सर्वान् पाप्मनोऽपहृत्य सर्वेषां च भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं पर्येति य एवं वेद"। यहाँ 'स्वाराज्य' के समान निरतिशय फल की प्राप्ति श्रुत है, जो कि ब्रह्म-ज्ञान का ही फल है, उससे भिन्न और किसी वेदनादि का फल नहीं हो सकता, आदित्य और चन्द्रमण्डलादिगत पुरुष का जनकत्व ब्रह्म से अन्यत्र सम्भव नहीं, "यस्य वैतत् कर्म स वै वेदितव्यः" (कौ. ब्रा. ४।१९) यहाँ पर यद्यपि कोई अवच्छेद (विशेष प्रकरणादि निर्णायक) नहीं, तथापि 'एतत्' पद के द्वारा जिस प्रत्यक्ष-सिद्ध जगत् का ग्रहण होता है, उसकी कारणता ब्रह्म में ही सम्भव है, अन्यत्र नहीं, अतः यहाँ ब्रह्म से भिन्न जीव और मुख्य प्राण के ग्रहण की शङ्का क्योंकर होगी ?

समाधान—बलाक-पुत्र गार्ग्य ने "ब्रह्म ते ब्रवाणि"—ऐसा प्रतिज्ञा की, उसने आदित्यादिगत ब्रह्मेतर पुरुषों का ही अभिधान किया, ब्रह्म का नहीं और जिस अजातशत्रु का "यो वै बालाके एतेषां पुरुषाणां कर्त्ता, यस्य वैतत् कर्म"—यह वाक्य है, उसने ब्रह्माभिधान की प्रतिज्ञा नहीं की । अन्य व्यक्ति के उपक्रम ( प्रतिज्ञा ) से अन्य व्यक्ति के उपसंहार की एकवाक्यता स्थापित नहीं की जा सकती । परिशेषतः अजातशत्रु के उक्त सन्दर्भ-वाक्य की पौर्वापर्यालोचना से जो उस वाक्य का अर्थ निकलता हो, वही ग्राह्य होगा ।

पूर्वपक्ष—"यस्यैतत् कर्म"—यहाँ पर 'कर्म' पद व्यापार (क्रिया) अर्थ में रूढ है किन्तु 'क्रियते इति कर्म'-ऐसी व्युत्पत्ति के द्वारा कार्यमात्र (जन्य वस्तुमात्र) का बोधक माना जाता है । रूढि शक्ति के अक्षुण्ण रहते-रहते यौगिक व्युत्पत्ति का आश्रयण उचित नहीं माना जा सकता ब्रह्म एक उदासीन और अपरिणामी तत्त्व है, उसका यह व्यापार (जगत् की रचना) नहीं माना