भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४९६ [ अ. १ पा. ४ सू. १५

मन्विच्छ' (छा० ६।८।४) इति । मृदादिदृष्टान्तैश्च कार्यस्य कारणेनाभेदं वदितुं सृष्ट्या- दिप्रपञ्चः श्राव्यत इति गम्यते । तथाच संप्रदायविदो वदन्ति – 'मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या चोदिताऽन्यथा । उपायः सोऽवताराय नास्ति भेदः कथंचन ।' (माण्डू० का० १।१५) । ब्रह्मप्रतिपत्तिप्रतिबद्धं तु फलं श्रूयते – 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तै० २।१), 'तरति शोकमात्मवित्' (छा० ७।१।३) 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति' (श्वे० ३।८) इति । प्रत्यक्षावगमं चेदं फलम्, 'तत्त्वमसि' इत्यसंसार्यात्मत्वप्रतिपत्तौ सत्यां संसार्यात्मत्वव्यावृत्तेः ॥ १४ ॥ यत्पुनः कारणविषयं विगानं दर्शितम् – 'असद्वा इदमग्र आसीत्' इत्यादि, तत्परिहर्त- व्यम् । अत्रोच्यते –

समाकर्षात् ॥ १५ ॥

'असद्वा इदमग्र आसीत्' (तै० २।७) इति नात्रासन्निरात्मकं कारणत्वेन

भामती

पूर्वं प्रकृतं सद्ब्रह्माकृष्यासदेवेदमग्र आसीदित्यभिधीयमानं त्वसतोऽभिधानेऽसम्बद्धं स्यात् । श्रुत्यन्तरेण च मानान्तरेण च विरोधः । तस्मादौपचारिकं व्याख्येयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदिति तु निराकार्य- तयोपन्यस्तमिति न कारणे विवाद इति । सूत्रे चशब्दस्त्वर्थः पूर्वपक्षं निवर्त्तयति— आकाशादिषु सृज्यमानेषु क्रमविगानेऽपि न स्रष्टरि विगानम् । कुतः ? यथैकस्यां श्रुतौ व्यपदिष्टः परमेश्वरः सर्वस्य कर्त्ता तथैव श्रुत्यन्तरेषूक्तः, केन रूपेण ? कारणत्वेन । अपरः कल्पो यथा व्यपदिष्टः क्रम आकाशादिषु, आत्मन आकाशः सम्भूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवीति, तथैव क्रमस्यानपबाधेनेन तत्तेजोऽ- सृजतेत्यादिकायपि सृष्टेरूक्तैर्न सृष्टावपि विगानम् ॥ १४ ॥

नन्वेकत्रात्मन आकाशकारणत्वेनोक्तिरन्यत्र च तेजःकारणत्वेन तत्कथमविगानमत आह

भामती-व्याख्या

यह जो कारणविषयक विगान का निर्देश करते हुए कहा गया कि किसी श्रुति में जगत् कारण तत्त्व 'सत्' कहा गया और किसी में असत् । वह भी संगत नहीं, क्योंकि श्रुतियों का तात्पर्य सद् ब्रह्मगत जगत्कारणता के प्रतिपादन में ही है, असत्कारणता में नहीं, क्योंकि “तदप्येष श्लोको भवति”—इस प्रकार तत्पद के द्वारा पूर्व-प्रतिपादित 'सद् ब्रह्म' का अनुवर्तन करके “असदेवेदमग्र आसीत्”--इस वाक्य के द्वारा असत् का अभिधान करने पर विरोध और असम्बद्ध-प्रतिपादन प्रसक्त होता है, इतना ही नहीं, अन्य श्रुतियों और प्रमाणों से विरोध भी आता है, अतः 'असत्' पद को औपचारिक मानना होगा, जैसा कि भाष्यकार ने कहा है--“असदिति व्याकृतानामरूपविशेषविपरीतरूपमविकृतं ब्रह्मोच्यते, न पुनरत्यन्त-मसत्, न ह्यसतः सज्जन्मास्ति" (तै. उ. भा. पृ. ८०)। वस्तुतः असत्कारणवाद निराकरणीय होने के कारण निर्दिष्ट हुआ है--यह सिद्धान्त-श्लोक में सूचित किया गया है--''निराकार्यतया कचित्” । “कारणत्वेन चाकाशादिषु"--इस सिद्धान्त-सूत्र में चकार 'तु' के अर्थ में प्रयुक्त होकर पूर्व पक्ष का निवर्तक है। आशय यह है कि आकाशादि पदार्थों के सृष्टि-क्रम में विगान (विप्रतिपादन) होने पर भी स्रष्टा (ब्रह्म) में कोई विवाद नहीं, क्योंकि जैसे एक श्रुति में परमेश्वर जगत्कारणत्वेन निर्दिष्ट है, वैसे ही श्रुत्यन्तर में भी। सूत्रकार ने जो कहा है--"यथा व्यपदिष्टोक्तेः", उसका तात्पर्य भी यही है कि आत्मनः आकाशः सम्भूतः' इस वाक्य में जो क्रम व्यपदिष्ट है, उस क्रम की विवक्षा न करके “तन् तेजोऽसृजत"--ऐसा कह दिया गया है, अतः सृष्टि में भी किसी प्रकार का विगान नहीं ॥ १४ ॥

जब कि एक श्रुति में आत्मा का आकाशकारणत्वेन निर्देश है और दूसरी श्रुति में तेजः-