भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८९
पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः ? तत्त्वेषु वा कथं जनशब्दप्रयोगः ? समाने तु प्रसिद्धयतिक्रमे वाक्यशेषवशात्प्राणादय एव ग्रहीतव्या भवन्ति। जनसंबन्धाच्च प्राणादयो जनशब्दभाजो भवन्ति । जनवचनश्च पुरुषशब्दः प्राणेषु प्रयुक्तः—'ते वा एते पंच ब्रह्मपुरुषाः' ( छा० ३।१३।६ ) इत्यत्र । 'प्राणो ह पिता प्राणो ह माता' (छा० ७।१५।१) इत्यादि च ब्राह्मणम् । समासयलाच्च समुदायस्य रूढत्वमविरुद्धम् । कथं पुनरसति
भामती
न चेयं वस्तुस्वरूपकथाऽपि तूपासनानुष्ठानविधिर्मनसैवानुद्रष्टव्यमिति विधिश्रवणात् ॐ कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोग इति ॐ । जनवाचकः शब्दो जनशब्दः, पंचजनशब्द इति यावत् । तस्य कथं प्राणादिष्वजनेषु प्रयोग इति व्याख्येयम् । अन्यथा तु प्रत्यस्तमितावयवार्थे समुदायशब्दार्थे जनशब्दार्थो नास्तीत्यपर्यनुयोग एव । रूढपरित्यागेनैव वृत्त्यन्तरं दर्शयति ॐ जनसम्बन्धाच्च इति ॐ । जनशब्दभाजः, पञ्चजनशब्दभाजः । ननु सत्यामवयवप्रसिद्धौ समुदायशक्तिकल्पनमनुपपन्नं, सम्भवति च पञ्चविंशत्यां तत्त्वेष्ववयवप्रसिद्धिरित्यत आह ॐ समासयलाच्च इति ॐ । स्यादेतत्—समासवलाच्चेद्रूढिरास्थीयते, हन्त न
भामती-व्याख्या
कल्पना में अश्रुत कल्पना प्रसक्त होती है, अतः प्राणादि-पंचक का ही 'पञ्चजनाः' शब्द से ग्रहण करना चाहिए। यह जो आक्षेप किया गया था कि काण्व और माध्यन्दिन शाखा के वाक्य-शेषों का परस्पर विरोध है, क्योंकि एक वाक्य-शेष में ज्योति को लेकर पंच संख्या पूरी की गई और दूसरे में अन्न (पृथिवी) को लेकर। उसका समाधान यह है कि समानबलवाले दो वाक्यों का विरोध उपस्थित होने पर विकल्प मान लिया जाता है, जैसे—"अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति" (मै० सं० ७।६) और "नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति"—यहाँ षोडशी का ग्रहण किया भी जा सकता है और नहीं भी। दोनों अवस्थाओं में कर्म विगुण नहीं होता। प्रकृत में भी वस्तु-स्वरूप का कथन नहीं कि विकल्प असम्भव हो जाता। यहाँ उपासनानुष्ठान का विधि-वाक्य उपलब्ध होता है—"मनसैवानुद्रष्टव्यम्" (बृह० ४।४।१९)।
"कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः"—इस भाष्य का अर्थ इस प्रकार है—'जनवाचकः शब्दो जनशब्दः अर्थात् 'पञ्चजन' शब्द का यहाँ जनशब्दत्वेन ग्रहण किया गया है। प्रस्तुत प्रश्न की पूरी व्याख्या इस प्रकार हो जाती है कि जो शब्द 'जन' का वाचक है, उसका जन से भिन्न प्राणादि अर्थों में प्रयोग क्यों कर होगा? अर्थात् नहीं हो सकता। अन्यथा [ भाष्यस्थ 'जन' शब्द से 'पञ्चजन' शब्द ग्रहण न कर केवल उसके अवयवरूप 'जन' शब्द का ग्रहण करने पर ] "कथं पुनः प्राणादिषु जनशब्दप्रयोगः ? "—यह आक्षेप असंगत या अनुक्तोपालम्भमात्र हो जाता है, क्योंकि सिद्धान्ती की ओर से कभी नहीं कहा गया कि केवल 'जन' शब्द का प्रयोग प्राणादि में होता है, अपि तु सिद्धान्ती ने तो अवयवार्थ का सर्वथा परित्याग करके केवल समुदायभूत 'पञ्चजन' शब्द को प्राणादिपरक माना है, अतः 'प्राणादिरूप समुदायर्थ में अवयवरूप 'जन' शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता'—यह आक्षेप पर्यवसित होता है, जो कि अनुचित है। प्रकृत में रूढि शक्ति का परित्याग न करते हुए वृत्त्यन्तर (लक्षणा वृत्ति) का निमित्त प्रदर्शित किया जाता है—"जनसम्बन्धाच्च प्राणादयो जनशब्दभाजो भवन्ति"। यहाँ भी 'जनशब्दभाजः' का अर्थ 'पञ्चजनशब्दभाजः'—ऐसा ही करना चाहिए।
जब कि पञ्चविंशति तत्त्वों में अवयवार्थता लोक-प्रसिद्ध (क्लृप्त) है, तब समुदाय शक्ति की कल्पना क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है—"समासबलाच्च समुदायस्य रूढत्वमविरुद्धम्"। लोक-प्रसिद्धि की उपेक्षा करके यदि रूढार्थ की कल्पना की जाती है, तब
६२