भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 508

४९० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. १३

प्रथमप्रयोगे रूढिः शक्याऽऽश्रयितुम् ? शक्योद्भिदादिवदित्याह—प्रसिद्धार्थसंनिधाने ह्यप्रसिद्धार्थः शब्दः प्रयुज्यमानः समभिव्याहारात्तद्विषयो नियम्यते, यथा 'उद्भिदा यजेत', 'यूपं छिनत्ति', 'वेदिं करोति' इति । तथाऽयमपि पंचजनशब्दः समासान्त्वाख्यानादवगतसंज्ञाभावः संज्ञाकांक्षी वाक्यशेषसमभिव्याहृतेषु प्राणादिषु वर्तिष्यते । कैश्चित्तु देवाः पितरो गन्धर्वा असुरा रक्षांसि च पंच पंचजना व्याख्याताः । अन्यैश्च


भामती

दृष्टस्तर्हि तस्य प्रयोगोऽश्वकर्णादिवद् वृक्षादिषु । तथा च लोकप्रसिद्धयभावात्न रूढिरित्याक्षिपति ॐ कथं पुनरसतीति ॐ । जनेषु तावत् पञ्चजनशब्दस्य प्रथमः प्रयोगो लोकेषु दृष्ट इत्यसति प्रथमप्रयोग इत्यसिद्धमिति स्वकीयस्तयानभिधायाभ्युपेत्य प्रथमप्रयोगाभावं समाधत्ते ॐ शक्योद्भिदादिवद् इति ॐ । आचार्यदेशीयानां मतभेदेष्वपि न पञ्चविंशतिस्तत्त्वानि सिध्यन्ति । परमार्थतस्तु पञ्चजना वाक्यशेषगता एवेत्याशयवानाह ॐ कैश्चित् तु इति ॐ । शेषमतिरोहितार्थम् ॥ १२-१३ ॥


भामती-व्याख्या

जैसे 'अश्वकर्ण' शब्द की प्रसिद्धि वृक्षादि में होती है, वैसे ही 'पञ्चजन' शब्द की प्रसिद्धि पञ्चविंशति तत्त्वों में क्यों है ? एवं जिस अर्थ में जिस शब्द का प्रयोग लोकप्रसिद्ध नहीं, उस अर्थ में उस शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता, क्योंकि शाब्दिक मर्यादा के प्रखर पारखी आचार्यों का कहना है कि “लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः” (ब्र० सि० पृ० ८२) इस आक्षेप का समाधान कोई आचार्य इस प्रकार करता है—'शक्या उद्भिदादिवत्' । [ आशय यह है कि एकमात्र लोक-व्यवहार ही शब्द-शक्ति का निर्णायक नहीं, अपितु प्रसिद्धार्थक पदों का समभिव्याहार या सन्निधान भी तात्पर्य-निश्चायक होता है, जैसा कि महर्षि जैमिनि ने “प्रसिद्धसन्निधानम्” (जै. सू. ९।४।२५) ऐसा कह कर सूचित किया है । शबरस्वामी भी कहते हैं—“प्रसिद्धस्य सन्निधौ यदभिधीयते, तत्तथैव” (शबर० पृ० १७८०) वार्तिककारने भी कहा है—

पदमज्ञातसन्दिग्धं प्रसिद्धैरपृथक्श्रुति ।
निर्णायते निरूढं तु न स्वार्थादपनीयते ॥ (तं. वा. पृ. ३२५)

“उद्भिदा यजेत पशुकामः” (तै० ब्रा० १९।७।३) यहाँ सन्देह किया गया है कि 'उद्भिद्' पद क्या किसी कर्म की संज्ञा है ? अथवा कर्म के उद्देश्य से किसी साधन (द्रव्य) का समर्पक ? पूर्वपक्षी ने कहा कि लोक-व्यवहार से उद्भिद्' पद याग के साधनोभूत किसी द्रव्य में रूढ प्रतीत नहीं होता, अतः 'उद्भिद्यत भूमिरनेन'—इस योग-व्युत्पत्ति से अवगत खनित्र (फावड़ा) आदि द्रव्य का विधान ज्योतिष्टोमनामक कर्म में करना चाहिए । सिद्धान्ती ने कहा कि अप्रसिद्धार्थक पद के अर्थ का निर्णय प्रसिद्धार्थक पद की सन्निधि से होता है । प्रकृत में 'यजेत' शब्द का अर्थ है—'यागेन भावयेत्' अतः पूरा वाक्य 'उद्भिदा यागेन भावयेत्'— ऐसा बनता है । दोनों तृतीयान्त पदों का अभिन्न अर्थ में तात्पर्य पर्यवसित होता है । 'याग' शब्द कर्म में प्रसिद्ध है, अतः 'उद्भिद्' पद भी कर्मविशेष की संज्ञा है । जैसे प्रसिद्धार्थक 'याग' पद की सन्निधि से 'उद्भिद्' पद कर्म-विशेष का बोधक है, वैसे ही सन्निहित वाक्य शेष के आधार पर 'पञ्चजन' शब्द प्राणादिपरक निर्णीत होता है ] । कतिपय आचार्यों ने देव, पितर, गन्धर्व, असुर और राक्षस'—इन पाँचों का ग्रहण 'पंचजन' शब्द से किया है एवं अन्य आचार्यों ने ब्राह्मणादि चार वर्ण और निषाद—इनको पंचजन कहा है । कहीं-कहीं 'पांचजन्या विशा' (ऋ. सं. ८।५३।७) इस प्रकार 'प्रजा' का वाचक