भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. १२
रूढत्वाभिप्रायेणैव केचित्पंचजना नाम विवक्ष्यन्ते, न सांख्यतत्त्वाभिप्रायेण । ते कतीत्यस्यामाकांक्षायां पुनः पंचेति प्रयुज्यते । पंजजना नाम ये केचित्ते च पंचैवेत्यर्थः । सप्तर्षयः सप्तेति यथा ॥ ११ ॥
के पुनस्ते पंचजना नामेति ? तदुच्यते—
प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १२ ॥
'यस्मिन्पञ्च पञ्चजनाः' इत्यत उत्तरस्मिन्मन्त्रे ब्रह्मस्वरूपनिरूपणाय प्राणादयः पञ्च निर्दिष्टाः—'प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः' इति । तेऽत्र वाक्यशेषगताः संनिधानात्पञ्चजना विवक्ष्यन्ते । कथं
भामती
विशेषे निरूढवृत्तिस्तदपरित्यागेनैव निपत्यादानसादृश्येनार्थवादिकेन क्रतुविशेषे वर्तते, तथा पञ्चजनशब्दोऽवयवार्थयोगानपेक्ष एकस्मिन्नपि वर्तते यथा सप्तर्षिशब्दो वसिष्ठ एकस्मिन् सप्तसु च वर्तते । न चैष तत्त्वेषु रूढः पंचविंशतिसंख्यानुरोधेन तत्त्वेषु वर्त्तयितव्यः । रूढौ सत्यां पंचविंशतेरेव संख्याया अभावात् कथं तत्त्वेषु वर्तते ॥ ११ ॥
एवञ्च के ते पञ्चजना इत्यपेक्षायां किं वाक्यशेषगताः प्राणादयो गृह्यन्तामुत पंचविंशतिस्तत्त्वानीति विशये तत्त्वानामप्रामाणिकत्वात् प्राणादीनाञ्च वाक्यशेषे श्रवणात्तत्परित्यागे श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात्प्राणादय एव पञ्चजनाः । न च काण्वमाध्यन्दिनयोर्विरोधान्न प्राणादीनां वाक्यशेषगतानामपि ग्रहणमिति साम्प्रतं, विरोधेऽपि तुल्यबलतया षोडशिग्रहणाग्रहणवद्विकल्पोपपत्तेः ।
भामती-व्याख्या
अर्थ की संज्ञा माननी होगी । संज्ञा शब्द रूढ होता है, यौगिक नहीं, अतः 'जन' शब्द की अवयव-व्युत्पत्ति के द्वारा तत्त्वपरता उचित नहीं, अपितु अवयवार्थ-सापेक्ष यौगिक शब्द की अपेक्षा तन्निरपेक्ष रूढ शब्द के द्वारा किसी मुख्य अर्थ का ग्रहण करना होगा । यदि उस अर्थ का प्रकृत वाक्य के साथ कोई सम्बन्ध नहीं बनता, या पूर्वोत्तर वाक्यों से विरोध होता है, तब रूढि शक्ति का परित्याग न करते हुए अन्य वृत्ति के द्वारा अर्थान्तर की कल्पना करके वाक्य का उपपादन करना होगा, जैसे—"श्येनेनाभिचरन् यजेत” ( षड्विंश. ३।८ ) यहाँ 'श्येन' शब्द 'बाज' पक्षी में रूढ है, अतः उस अर्थ का परित्याग न करते हुए "यथा वै श्येनो निपत्यादत्ते एवमयं द्विषन्तं भ्रातृव्यं निपादत्ते" ( षड्विश. ३।८ ) इस अर्थवाद में प्रतिपादित श्येन के स्वभाव का साम्य अपना कर 'श्येन' शब्द यागविशेष का वाचक माना जाता है । उसी प्रकार 'पंचजन' शब्द भी अवयवार्थ-निरपेक्ष किसी एक अर्थ का भी वाचक वैसे ही हो सकता है, जैसे कि 'सप्तर्षि' शब्द वसिष्ठादि सात ऋषियों का भी बोधक होता है और अकेले वसिष्ठ का भी । 'पञ्चजन' शब्द तत्त्वों में कहीं रूढ नहीं माना जाता कि पञ्चविंशति संख्या के अनुरोध पर वह सांख्याभिमत तत्त्वार्थक मान लिया जाय । 'पंचजन' शब्द जब रूढ है, तब 'पंच' शब्द को पृथक् संख्या-परक नहीं माना जा सकता, तब संख्या के सम्बन्ध से तत्त्वार्थक क्योंकर होगा ॥ ११ ॥
जब कि 'पंचजन' शब्द तत्त्वार्थक नहीं हो सकता, तब 'के ते पंचजनाः'—ऐसी आकांक्षा होने पर क्या वाक्य-शेषगत प्राणादि का ग्रहण किया जाय ? अथवा सांख्याभिमत पंचविंशति तत्त्वों का ? ऐसा संशय होने पर निर्णय-सूत्र प्रस्तुत किया गया है—"प्राणादयो वाक्यशेषात्" । अर्थात् पंचविंशति तत्त्वों की अप्रामाणिकता स्थिर हो चुकी है और प्राणादि वाक्य-शेष में प्रतिपादित हैं, अतः प्राणादि का परित्याग करने में श्रुत-हानि और तत्त्वों की