भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चजनशब्दस्य प्राणादिपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४८७
पंचविंशतिसंख्यायाः। आत्मा तावदिह प्रतिष्ठां प्रत्याधारत्वेन निर्दिष्टः, यस्मिन्निति सप्तमीसूचितस्य 'तमेव मन्य आत्मानम्' इत्यात्मत्वेनानुकर्षणात्। आत्मा च चेतनः पुरुषः। स च पंचविंशतावन्तर्गत एवेति न तस्यैवाधारत्वमाधेयत्वं च युज्यते। अर्थान्तरपरिग्रहे च तत्त्वसंख्यातिरेकः सिद्धान्तविरुद्धः प्रसज्येत तथा 'आकाशश्च प्रतिष्ठितः' इत्याकाशस्यापि पंचविंशतावन्तर्गतस्य न पृथगुपादानं न्याय्यम्। अर्थान्तरपरिग्रहे चोक्तं दूषणम्। कथं च संख्यामात्रश्रवणे सत्यश्रुतानां पंचविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहः प्रतीयेत? जनशब्दस्य तत्त्वेष्वरूढत्वात्। अर्थान्तरोपसंग्रहेऽपि संक्योपपत्तेः। कथं तर्हि पंच पंचजना इति? उच्यते—'दिक्संख्ये संज्ञायाम्' (पा० सू० २।१।५०) इति विशेषणस्मरणात्संज्ञायामेव पंचशब्दस्य जनशब्देन समासः। ततश्च
भामती
मात्रम्। यदि सत्त्वरजस्तमांसि प्रधानेनेकीकृत्याकाशा तत्त्वेभ्यो व्यतिरिच्यते, तदा सिद्धान्तव्याकोपः। अथ तु सत्त्वरजस्तमांसि मिथो भेदेन विवक्ष्यन्ते, तथापि वस्तुतत्त्वव्यवस्थापने आधारत्वेनात्मा निष्कृष्यतामाधेयान्तरेभ्यस्त्वाकाशस्याधेयस्य व्यतिरेचनमनर्थकमिति गमयितव्यम्। ॐ कथञ्च संख्यामात्रश्रवणे सति इति ॐ। दिक्संख्ये संज्ञायामिति संज्ञायां समासस्मरणात् पञ्चजनशब्दस्तावदयं क्वचित्प्ररूढः। न च रूढौ सत्यामवयवप्रसिद्धेर्ग्रहणं सापेक्षत्वात्, निरपेक्षत्वाच्च रूढेः। तद्यदि रूढौ मुख्योऽर्थः प्राप्यते ततः स एव ग्रहीतव्योऽथ त्वसौ न वाक्ये सम्बन्धार्हः पूर्वोत्तरवाक्यविरोधी वा ततो रूढ्यपरित्यागेनैव वृत्त्यन्तरेणार्थान्तरं कल्पयित्वा वाक्यमुपपादनीयम्। यथा श्येनेनाभिचरन् यजेतेति श्येनशब्दः शकुनि-
भामती-व्याख्या
शब्द विशेषण और 'जन' शब्द विशेष्य है। विशेषणीभूत 'पंच' शब्द का अन्य पंच विशेषण से सापेक्ष हो जाता है, सापेक्ष पद असमर्थ माना जाता है और समास सदैव समर्थ पदों में ही होता है, जैसा कि “समर्थः पदविधिः” (पा० सू० २।१।१) इस सूत्र में भाष्यकार ने कहा है—'सापेक्षमसमर्थं भवति' (महाभाष्य० पृ० २।११)। जैसे कि 'ऋद्धस्य राजपुरुषः' यहाँ पर विशेषणीभूत 'राज' शब्द का 'ऋद्ध' विशेषण होने के कारण 'पुरुष' पद के साथ उस का समास नहीं होता, अपि तु 'ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः'—ऐसा वाक्य ही रह जाता है।
सूत्रस्थ 'नानाभावात्' शब्द की व्याख्या करने के पश्चात् 'अतिरेकात्' पद की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है—'अतिरेकाच्च न पंचविंशतितत्त्वाभिप्रायम्'। यस्मिन् पंच पंचजनाः' आकाशश्च प्रतिष्ठितः' यहाँ 'पंच पंचजनाः'—इस वाक्य के द्वारा पचीस तत्त्वों का ग्रहण करने और आकाश की पृथक् गिनती करने पर अभिमत पचीस संख्या से अतिरिक्त छब्बीस तत्त्व हो जाते हैं और 'यस्मिन्' शब्द से आधारभूत आत्मा का आहित पचीस तत्त्वों से पृथक्करण करने पर सत्ताईस तत्त्व हो जाते हैं। 'अतिरेकात्' यह हेत्वन्तर यहाँ पृथक् प्रयत्न-साध्य नहीं, अपि तु 'नानात्वात्'—इस हेतु की खोज में किए जानेवाले प्रयत्न से ही अतिरेक्ताच्च' इस का लाभ भी हो जाता है, अतः यह हेतु-प्रयोग केवल अभ्युच्चयमात्र है [एक तथ्य की गवेषणा में अपने-आप अनुनिष्पन्न पदार्थों को अभ्युच्चय कहा गया है—'अभ्युच्चयो यदिदमिह भवतीति विज्ञानेऽपरमपि भवतीति विज्ञानम्' (शाबर पृ० १७९१)]।
“कथं च संख्यामात्रश्रवणे सत्यश्रुतानां पंचविंशतितत्त्वानामुपसंग्रहः प्रतीयेत्” इस भाष्य का आशय यह है कि 'पंचजनाः'—यहाँ पर “दिक्संख्ये संज्ञायाम्” (पा. सू. २।१।५०) इस सूत्र के द्वारा समास सम्पन्न किया गया है। इस सूत्र का कहना है कि दिशा और संख्या के वाचक शब्दों का उत्तर पदों के साथ तभी समास होता है, जब कि समस्त पद किसी पदार्थ की संज्ञा हो, जैसे—'दक्षिणाग्निः', 'सप्तर्षयः'। इसी प्रकार, पंचजन' शब्द भी किसी