भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४७८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १९ |
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तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्य' इति, तान्येवेह तेजोबन्नानि प्रत्यभिज्ञायन्ते रोहितादिशब्द- सामान्यात्। रोहितादीनां च शब्दानां रूपविशेषेषु मुख्यत्वान्नाङ्कत्वाच्च गुणविषय- त्वस्य। असंदिग्धेन च संदिग्धस्य निगमनं न्याय्यं मन्यन्ते। तथेहापि 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति । किंकारणं ब्रह्म' (श्वे० १।१) इत्युपक्रम्य 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवा- त्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' (श्वे० १।३) इति पारमेश्वर्याः शक्तेः समस्तजगद्विधायिन्या वाक्योपक्रमेऽवगमात्। वाक्यशेषेऽपि 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' इति 'यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः' (श्वे० ४।१०, ११) इति च तस्या एवावगमान्न
भामती
एवं प्रत्यभिज्ञानान्न तु सांख्यपरिकल्पिता प्रकृतिः, तस्या अप्रामाणिकतया श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गा- द्ब्रह्माविना च रोहिताद्युपचारस्य सति मुख्यार्थसम्भवेऽयोगात् तदिदमुक्तं ॐ रोहितादीनां शब्दानाम् इति ॐ । अजापदस्य च समुदायप्रसिद्धिपरित्यागेन न जायत इत्यवयवप्रसिद्धाश्रयणे दोषप्रसङ्गात् । अत्र तु रूपककल्पनया समुदायप्रसिद्धेरेवानपेक्षायाः स्वीकारात्। अपि चायमपि श्रुतिकलापोऽस्मद्दर्शना- नुगुणो न सांख्यस्मृत्यनुगुण इत्याह ॐ तथेहापि इति ॐ । ॐ किंकारणं ब्रह्मेत्युपक्रम्य इति ॐ । ब्रह्म- स्वरूपं तावज्जगत्कारणं न भवति विशुद्धत्वात्तस्य यथाहुः —
पुरुषस्य च शुद्धस्य नाशुद्धा विकृतिर्भवेत्
इत्याशयवतीयं श्रुतिः : पृच्छति ॐकिंकारणंॐ यस्य ब्रह्मणो जगदुत्पत्तिस्तत् किकारणं ब्रह्मेत्यर्थः। ते ब्रह्मविदो ध्यानयोगेनात्मानं गताः प्राप्ता अपश्यन्निति योजना। ॐ यो योनिं योनिम् इति ॐ । अविद्या
भामती-व्याख्या
लोहितशुक्लकृष्णम्” (श्वेता. ४।५)। यदि इस ज्योति को अशब्द या अप्रामाणिक माना जाता है, “तब यदग्ने रोहितं रूपम्” (छां. ६।४।१) इत्यादि वाक्यों में श्रुत तत्त्व का बाध और अश्रुत (प्रधान) तत्त्व की कल्पना करनी पड़ेगी। अग्न्यादि में जब मुख्यत: लोहितत्वादि का समन्वय हो जाता है, तब रञ्जनात्मक रजोगुणादि की कल्पना संगत नहीं कही जा सकती, यहो सब कुछ ध्यान में रख कर भाष्यकार कह रहे हैं— “रोहितादीनां शब्दानां रूपविशेषेषु मुख्यत्वात्”। ‘अजा’ शब्द समुदाय (रूढि) शक्ति के द्वारा इसी मायारूप ज्योति का अभिधायक है, अतः रूढि शक्ति का परित्याग करके अवयव-शक्ति के द्वारा अर्थान्तर का प्रतिपादक नहीं हो सकता। माया रूप रूढ अर्थ का परित्याग करके ‘न जायते इत्यजा’— ऐसा अवयवार्थ का आश्रयण करने पर “रूढिर्योगमपहरति”—इस सहज-सिद्ध नियम का उल्लंघन होगा। प्रसिद्ध माया को अजा (छागी) के रूप में प्रस्तुत जो रूपकालङ्कार अभिनीत किया गया है, उसका सामञ्जस्य करने के लिए ‘अजा’ शब्द के रूढ अर्थ का ग्रहण करना आवश्यक है, क्योंकि रूढ अर्थ अवयवादि की शक्ति से निरपेक्ष होकर शीघ्र उपस्थित हो जाता है।
दूसरी बात यह भी है कि प्रकरण के अनुरोध पर उक्त सभी श्रुतियों का समन्वय हमारे वेदान्त-दर्शन के अनुरूप ही होता है, यह कहा जा रहा है—“तथेहापि ब्रह्मवादिनो वदन्ति”। निश्चितार्थक वाक्य की सहायता से सन्दिग्धार्थक वाक्य का नयन किया जाता है। प्रकृत में सन्देह किया गया—“किंकारणं ब्रह्म?” अर्थात् जगत् का कारण जो ब्रह्म कहा जाता है, वह किंकारणं (किसहायकं) अर्थात् वह ब्रह्म शुद्ध है, अशुद्ध कार्य का स्वतः कारण नहीं होता, अतः किस तत्त्व की सहायता से अशुद्ध जगत् का कारण बनता है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है—“ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्” (श्वेता. १।३)। अर्थात् ब्रह्मवेत्ताओं ने अपने ध्यानरूप योग के द्वारा उस दैवी शक्ति (माया)