भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअजाशब्दस्य मायापरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७९
स्वतन्त्रा काचित्प्रकृतिः प्रधानं नामाजामन्त्रेणाम्नायत इति शक्यते वक्तुम्। प्रकरणात्तु सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा नामरूपयोः प्रागवस्थानेनापि मन्त्रेणाम्नायत इत्युच्यते। तस्याश्च स्वविकारविषयेण त्रैरूप्येण त्रैरूप्यमुक्तम् ॥ ९ ॥
कथं पुनस्तेजोबन्नात्मना त्रैरूप्येण त्रिरूपाऽजा प्रतिपत्तुं शक्यते ? यावता न तावत्तेजोऽबन्नेष्वजाकृतिरस्ति। न च तेजोबन्नानां जातिश्रवणादजातिनिमित्तोऽप्यजाशब्दः संभवतीति । अत उत्तरं पठति -
कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १० ॥
नायमजाकृतिनिमित्तोऽजाशब्दः। नापि यौगिकः। किं तर्हि ? कल्पनोपदेशोऽयम्। अजारूपकक्लृप्तिस्तेजोबन्नलक्षणायाश्चराचरयोनेरुपदिश्यते। यथा हि लोके यदृच्छया काचिदजा रोहितशुक्लकृष्णवर्णा स्याद्बहुबर्करा सरूपबर्करा च, तां च कश्चिदजो जुषमाणोऽनुशयीत, कश्चिच्चैनां भुक्तभोगां जह्यात्, एवमियमपि तेजोबन्नलक्षणा भूतप्रकृतिस्त्रिवर्णा बहु सरूपं चराचरलक्षणं विकारजातं जनयति, अविदुषा च क्षेत्रज्ञेनोपभुज्यते, विदुषा च परित्यज्यत इति। न चेदमाशङ्कितव्यम् — एकः क्षेत्रज्ञोऽ-
भामती
शक्तिर्योनिः सा च प्रतिजीवं नानेत्युक्तमतो वीप्सोपपन्ना। शेषमतिरोहितार्थम् ॥ ९ ॥
सूत्रान्तरमवतारयितुं शङ्कते ॐ कथं पुनः इति ॐ। अजाकृतिर्जातिस्तेजोबन्नेषु नास्ति। न च तेजोबन्नानां जन्मश्रवणादजन्मनिमित्तोऽप्यजाशब्दः संभवतीत्याह ॐ न च तेजोऽबन्नानाम् इति ॐ।
सूत्रमवतारयति ॐ अत उत्तरं पठति ॐ। ननु किं छागा लोहितशुक्लकृष्णैव ? यादृशीनामपि छागानामुपलम्भादित्यत आह ॐ यदृच्छया इति ॐ। बहुबर्करा बहुशावा। शेषं निगदव्याख्यातम् ॥१०॥
भामती-व्याख्या
का दर्शन किया, जिसका सहयोग पा कर ब्रह्म इस त्रिगुणात्मक प्रपञ्च का कारण बन जाता है। "योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः" ( श्वेता० ४।११ ) इस श्रुति में 'योनिं-योनिम्'— ऐसा वीप्सा का प्रयोग इस लिए किया है कि जो अविद्या शक्ति जगत् की योनि कही जाती है, वह जीव के भेद से भिन्न होती है, एक नहीं। शेष भाष्य सुबोध है ॥ ९ ॥
दसवें सूत्र को अवतरित करने के लिए शङ्का की जाती है— "कथं पुनः"। शङ्कावादी का आशय यह है कि यहाँ 'अजा' शब्द का प्रवृत्ति-निमित्त 'अजात्व' जाति है? अथवा अवयवार्थ ? तेज, जल और पृथिवी में 'अजात्व' आकृति (जाति) नहीं रहती, अतः 'अजा' शब्द को 'जातिप्रवृत्ति-निमित्तक नहीं कह सकते। जन्माभावरूप अवयवार्थ भी 'अजा' शब्द का प्रवृत्ति-निमित्त नहीं हो सकता— "न च तेजोऽबन्नानां जातिश्रवणात्"। अर्थात् श्रुतियों के द्वारा तेज आदि की जाति ( जन्म ) का प्रतिपादन किया है, अतः 'न जायते'— ऐसा अवयवार्थ भी वहाँ सम्भव नहीं ।
उक्त शङ्का का निराकरण सूत्र के द्वारा किया जाता है— "अत उत्तरं पठति— कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः"। अर्थात् यहाँ 'अजा' शब्द न तो जातिप्रवृत्तिनिमित्तक है और न यौगिक, अपितु रूपक-कल्पना के द्वारा प्रयुक्त हुआ है। यद्यपि लोक में सभी अजाएँ ( बकरियाँ ) लोहितशुक्लकृष्णात्मक नहीं होतीं, तथापि यदृच्छा से जो बकरी वैसी चित्रा होती है, उसी का प्रकृत में रूपक प्रस्तुत किया गया है। बहुबर्करा का अर्थ है कि बहुत बच्चोंवाली बकरी ॥ १० ॥