भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४७२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. ६

शोकविच्छेद इति वेदान्तसिद्धान्तः। तथाऽग्रे - 'यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥' (का० २।४।१०) इति जीवप्राज्ञभेददृष्टिमपवदति। तथा जीवविषयस्यास्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्यानन्तरम् 'अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व' इत्यारभ्य मृत्युना तैस्तैः कामैः प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता यदा न चचाल, तदैनं मृत्युरभ्युदयनिःश्रेयसविभागप्रदर्शनेन विद्याविद्याविभागप्रदर्शनेन च 'विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त' (का० १।२।४) इति प्रशस्य प्रश्नमपि तदीयं प्रशंसन्नुदुवाच- 'तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति॥' (का० १।२।१२) इति, तेनापि जीवप्राज्ञयोरभेद एवेह विवक्षित इति गम्यते। यत्प्रश्ननिमित्तां च प्रशंसां महतीं मृत्योः प्रत्यपद्यत नचिकेताः, यदि तं विहाय प्रशंसानन्तरमन्यमेव प्रश्नमुपक्षिपेदस्थान एव सा सर्वा प्रशंसा प्रसारिता स्यात्। तस्मात् 'येयं प्रेते'

भामती

तत्र श्रुत्युपन्यासेन भगवता भाष्यकारेण दर्शितः। ॐ तथा जीवविषयस्यास्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्येत्यादि ॐ। येयं प्रेत इति हि नचिकेताः प्रश्नमुपश्रुत्य तत्तत्कामविषयप्रलोभं चास्य प्रतीत्य मृत्युर्विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्य इत्यादिना नचिकेतसं प्रशस्य प्रश्नमपि तदीयं प्रशंसंस्तस्मिन् प्रश्ने ब्रह्मैवोत्तरमुवाच। ॐ तं दुर्दर्शम् इति ॐ। यदि पुनर्जोवात्प्राज्ञो भिद्येत जीवगोचरः प्रश्नः प्राज्ञगोचरं चोत्तरमिति किं केन सङ्गच्छेत? अपि च यद्विषयं प्रश्नमुपश्रुत्य मृत्युर्नैव प्रशंसितो नचिकेता यदि तमेव भूयः पृच्छेत्तदुत्तरे चावदध्यात् ततः प्रशंसा वृथार्था स्यात् प्रश्नान्तरे त्वसावस्थाने प्रसारिता सत्यदृष्टार्था स्यादित्याह ॐ यत्प्रश्नः इति ॐ। यस्मिन् प्रश्नो यत्प्रश्नः। शेषमतिरोहितार्थम् ॥ ६ ॥

भामती-व्याख्या

प्रतिवचन भी एक ही है। सूत्रकार ने जो तीन प्रश्नों का निर्देश किया है, वह जीव और परमात्मा के औपाधिक भेद को मन में रख कर किया है। जीव और परमात्मा का वास्तविक अभेद है—यह भगवान् भाष्यकार ने 'तत्त्वमसि' (छां. ६।८।७) इत्यादि श्रुति प्रमाणों का उपन्यास करके सिद्ध किया है। 'तथा जीवविषयस्यास्तित्वनास्तित्वप्रश्नस्येत्यादि' भाष्य के द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि नचिकेता के 'येयं प्रेते विचिकित्सा'—इस प्रश्न को सुन कर यम देव ने चिरजीवन, पुत्रपौत्र, विविध धन-धान्यादि के विविध प्रलोभन दिए "विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा नचिकेता की प्रशंसा की, इतना ही नहीं, नचिकेता के जीवविषयक प्रश्न की भी प्रशंसा की और उसके उत्तर में परमात्मा (ब्रह्म) का स्वरूप प्रस्तुत किया—'तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टम्' (कठो. १।२।१२)। यदि जीव से प्राज्ञात्मा (ब्रह्म) भिन्न है, तब जीवविषयक प्रश्न के उत्तर में प्राज्ञ की चर्चा संगत क्योंकर होगी? दूसरी बात यह भी है कि जिस विषय का प्रश्न सुनकर यम ने नचिकेता की प्रशंसा की यदि उसी विषय का प्रश्न वह दुबारा करता है और उसका उत्तर सुनने की उत्सुकता दिखाता है, तब उसकी प्रशंसा दृष्टार्थक होती है, अन्यथा विषयान्तर का प्रश्न करने पर प्रशंसा अदृष्टार्थक हो जाती है—ऐसा भाष्यकार कह रहे हैं—यत्प्रश्ननिमित्तां च प्रशंसां महतीं मृत्योः प्रत्यपद्यत नचिकेताः।' 'यत्प्रश्न' पद में सप्तमी समास है—'यस्मिन् (विषये) प्रश्नः यत्प्रश्नः' अर्थात् जिस विषय का प्रश्न सुनकर यमदेव ने नचिकेता की महती प्रशंसा की, उस विषय को छोड़ कर अन्यविषयक प्रश्न की कल्पना की जाती है, तब वह प्रशंसा नितान्त अनुचित हो जाती है। फलतः जीवविषयक 'येयं प्रेते'—इस प्रश्न का ही 'अन्यत्र धर्मात्'—यहाँ अनुवर्तन होता है। शेष भाष्य अत्यन्त सुगम है॥६॥